Pages

Monday, December 22, 2008

अंतुले के बयां से ठीक से निबटना चाहिए

अंतुले के ताज़ा बयां पर सवाल उठ रहे है। इस बयां को टीवी जर्नलिस्ट गंगेश जी ने नए सवालो के साथ देखा है, जो ज्यादा गंभीर है-
ए आर अंतुले के बयान पर राजनीतिक तूफान खड़ा हुआ....ये किसी आश्चर्य से कम नहीं क्योंकि ये राजनीतिक मामला है ही नहीं....दरअसल इस पर तो जांच होनी चाहिए कि पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भारत के दावों पर शक करने की गुंजाइश देने वाला ये बयान आया क्यों....ये सिर्फ राजनीतिक लाभ या वोट बैंक की राजनीति कतई नहीं है जैसा कि राजनीतिक दलों को लगा...मुस्लिम वोट या सहानुभूति लेने के और भी कई तरीके सियासतदानों को मालूम हैं और अब तक उसी रास्ते का इस्तेमाल कर वो ये हासिल भी करते रहे हैं......हां अगर कोई नया नेता इस तरह का बयान देता तो ये माना जा सकता था कि उसकी ये नासमझी है लेकिन अगर अंतुले जैसा सीजन्ड नेता इस तरह के बयान देता है तो इसके पीछे के कारणों की समीक्षा की जानी चाहिए....राजनीतिक हो हल्ला इसका निवारण नहीं है.....अंतुले के बयान से कई कड़ियां जुड़ती हैं....जांच एजेंसियों को पता करना चाहिए कि उनके बयान के पीछे कहीं `विदेशी हाथ' तो नहीं....लोग सवाल उठा सकते हैं कि ऐसे वरिष्ठ नेता पर इस तरह के आरोप लगाना ठीक नहीं लेकिन ऐसे सवाल उठाने वालों को एक बार उन घरों में झांक आना चाहिए जिन घरों में मुंबई हमलों के बाद से रोशनी नहीं हुई....माफ कीजिए वरिष्ठ और कनिष्ठ का सम्मान बाद में कर लेंगे फिलहाल तो हिसाब करने का वक्त है....राजनेताओं की भी जुबानी मानें तो देश एक अघोषित युद्ध लड़ रहा है और इसमें पीठ पर छुरा घोपने वालों के लिए बस एक ही सजा मुकर्रर है....मैं जो कह रहा हूं उसमें बौद्धिकता तलाशने की न कोई जगह है और न ही इजाजत ...ये खरा खरा कह देने का समय है....अंतुले साहब के बयान पर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले कुछ तथ्यों का ध्यान रखा जाए तो बेहतर होगा.....मुंबई हमलों के बाद सबसे ज्यादा निशाने पर है दाउद और उसका गिरोह.....दाउद का संबंध महाराष्‍ट्र से रहा है और उसका साम्राज्य राजनीति, पुलिस और अपराध के नेक्सस के कारण ही फला-फूला......अंतुले का राजनीतिक जीवन भी महाराष्ट्र से जुड़ा है.......हो सकता है उनका कोई संबंध दाउद से न हो लेकिन इस संयोग पर सुरक्षा एजेंसियों को तफ्तीश तो कर ही लेनी चाहिए.....संयोग के दायरे में ये भी है कि दाउद का साम्राज्य जब फैला तो महाराष्ट्र में किन राजनेताओं की तूती बोलती थी और उनके आय के साधन क्या हैं और क्या रहे हैं.....क्योंकि अंतुले के बयान का दूसरा लाभ सीधा पाकिस्तान को पहुंचा है.....इसने ये शक भी पैदा किया है कि क्या कुछ राजनेता विदेशी हाथों में भी खेलते हैं.....ये सवाल और शक इसलिए ज्यादा गहरे हैं क्योंकि अंतुले कोई आम राजनीतिज्ञ नहीं....इनकी जुबान फिसल नहीं सकती और अगर फिसलती तो वो अपने बयान पर सफाई दे सकते थे....इस समय वो अपने बयान पर कायम हैं, शुक्र है मीडिया ने उस बयान का फॉलोअप ज्यादा देर और दूर तक नहीं किया कम से कम अंतुले के एंड पर .......नहीं तो पता नहीं आतंकवाद के मुद्दे पर देश को किस दोराहे पर खड़ा कर देते अंतुले.....कांग्रेस ने तत्काल ये फैसला लेकर कि इस बयान से पार्टी का कुछ लेना देना नहीं, स्थिति संभाली....ये भी ठीक हुआ कि इस पर विपक्ष ने ज्यादा देर तक तमाशा नहीं किया क्योंकि इस पर जितनी देर तक तमाशा होता रहता दुनिया की नजर उतनी ही देर तक इस पर बनी रहती......इसलिए अंतुले के बयान पर उन्हें माफी या सजा नैतिक आधार पर नहीं बल्कि कानून सम्मत तरीके से दी जानी चाहिए....महज राजनेता होने की वजह से उन्हें माफी या सजा देना उनके अपराध को कम करना होगा.....उनके बयान पर संजीदगी से सोचने का समय है

Wednesday, December 17, 2008

...ये मजाक का वक्त नही है अभिज्ञान

नेताओं की ज़ुबान फ़िसल जाना कोई नई बात नहीं है...उनकी ज़बान ही बनी है शायद फ़िसलने के लिए। सत्ता तंत्र शायद हमॆशा नींद में होता है इसलिए हम लिखते या बोलते हैं कि फ़लां मामले में सत्ता तंत्र की नींद टूटी। सत्ता तंत्र की बेफ़िक्री का ये अंदाज़ नया नहीं है। न ही अंतुले साहब जैसों का बेपरवाह रवैया। इसमें कुछ भी नया नहीं है। ये सब लोगों की नाउम्मीदी की स्थापित मूर्तियां हैं। लेकिन मुंबई बम धमाकों के बाद इसबात की बहस जरूर बनती है कि क्या मीडिया की दृष्टि भी बेरौनक हो गई है? हां, ये मीडिया के ख़िलाफ किसी मुहिम का हिस्सा नहीं है, ये भरोसा जरूर दिलाना चाहूंगा।एनडीटीवी को मैं अबतक सबसे संज़ीदा न्यूज़ चैनल इसलिए मानता रहा हूं क्योंकि अपनी छवि को लेकर सचेत रहने वाले कुछेक चैनलों में उसकी गिनती होती है। ज़ाहिर है कि चैनल को इसके लिए कड़ी मेहनत करनी होती है। इसी चैनल के एंकर अभिज्ञान को अन्य दर्शकों की तरह मैं भी पसंद करता रहा हूं...एक सजग पत्रकार होने के नाट लेकिन मुंबई धमाकों ने मेरा दिल तोड़ दिया...एनडीटीवी और अभिज्ञान, दोनों ने। आतंकी हमले के दौरान मैने एनडीटीवी पर ही बने रहने की हरचंद कोशिश की। लेकिन अभिज्ञान की एक लाइन ने जैसे मुझे सनाके में डाल दिया...दिल के अंदर टूटे भरोसे के एक-एक कांच को मैनें महसूस किया। उन्होंने होटल ताज के सामने से लाइव के दौरान मुझ जैसे तमाम कमअक्ल दर्शकों को कहा कि यही वो जगह है जहां समुंदर की ठंडी-ठंडी लहरें महसूस की जा सकती हैं...यहां आम दिनों में लोगों का हुजूम लगा रहता है। अभिज्ञान का चेहरा ऐसा था जैसे गोवा में जाकर पर्यटकों के लिए किसी प्रोग्राम की एंकरिंग कर रहे हों।...ईमानदारी से, उस वक्त कहा गया उनका एक-एक शब्द, उनका लहजा बेहद विद्रूप, अश्लील और हैरानी का सबब था। अभिज्ञान उस ख़ौफनाक मंजर में ये सब बातें कह और सुना रहे थे जब होटल ताज़ से रह-रहकर क्षत-विक्षत लाशें निकल रही थीं। फिजां में दहशत की ख़ौफनाक हवा चल रही थी। देश जानना चाहता था कि वहां कितने आतंकी हैं...दहशतगर्दों ने कितने मासूमों की जान ले ली। लेकिन अभिज्ञान ताज़ किनारे बहने वाली ठंडी बयार का आंकड़ा पेश कर रहे थे।...ये बौद्धिक जुर्म है अभिज्ञान।...उस समय मुंबई सेंट्रल वाला कार्यक्रम चल रहा था और अभिज्ञान के इसी मुदित अंदाज की वज़ह से स्टूडियो से पूरा परिदृश्य डायवर्ट कर नरीमन हाउस ले जाया गया।...यहां मेरा भरोसा टूटा।अकेले अभिज्ञान ही इसके ग़ुनाहग़ार नहीं हैं। दिल्ली में धमाके हुए तो न्यूज़ चैनल्स के स्टूडियो में भी जैसे जलजला आ गया। सबने लाइव से लेकर एक-एक चीज़ पर खोजी रिपोर्ट दी। एक चैनल ने कहा कि इंडिया गेट पर एक ऐसा बच्चा मिला है जिसके पेट पर आतंकियों ने बम बांध रखा है...दूसरे चैनलों ने भी उसकी पड़ताल किए बिना फालो कर लिया...कुछ देर बाद ही उस चैनल ने अपनी ख़बर का खंडन तो कर दिया लेकिन जिन चैनलों ने उसे फालो किया उन्होंने अपने दर्शकों से माफी मांगे बिना चुपके से ख़बर उतार दी। क्या है हमारी खबरों की प्रमाणिकता पर सवाल नहीं है? और हां, इसी ख़बर के दौरान दूसरे दिन एक जाने-माने चैनल के कद्दावर प्राइम टाइम एंकर से लेकर जाने क्या-क्या, उन्होंने बाकायदा स्टूडियो में साइकिल मंगवाकर ये बताने की कोशिश की कि ऐसी ही साइकिल में बम बांधकर रखे गए थे। ...भाई कोई इस ज़नाब को बताएगा कि साइकिल दुनिया भर में एक जैसी ही होती है...आतंकी साइकिल नहीं बल्कि उसपर सवार होने वालों की मंशा होती है। दरअसल, कुछ ख़ास, कुछ अलग दिखाने की मंशा ऐसी ही बेवकूफ़ाना हरक़तों में तब्दील हो जाती है।कुछ ऐसा ही बिहार के कोसी में आई बाढ़ के दौरान भी देखने को मिला। हालांकि शुरुआती दिनों में न्यूज चैनलों की इसमें ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखी। ....डाउन मार्केट ख़बर रही होगी उनके लिए। बाद में जब चैतन्य हुए तो बाढ़ से संबंधित अच्छी ख़बरें भी दिखाई। लेकिन एक न्यूज चैनल ने बाढ़ पर ख़ास दिखाने के चक्कर में स्पेशल रिपोर्ट दी....क्रोमा लगाया-कोसी का क़हर...एक खूबसूरत सी न्यूज एंकर नाव के एक ढांचे में सवार होकर बाढ़ की तबाही को बयान कर रही थी।...एंकर बाकायदा मेकअप और टचअप में। समझ सकते हैं कि तबाही की जानकारी के लिए इच्छुक लोगों के दिल पर ये खूबसूरत एंकर कहर ढा रही थी...मित्रों, इसीलिए ये मशविरा देना पड़ रहा है कि - ज़रा सोचिये।

Tuesday, December 16, 2008

गोरी के गांव की खोज

नीरज ने बचपन में गांव के दिनों में बांसुरी की आवाज सुनी थी। शायद ये आवाज आज भी उनके ज़ेहन में ज़िदा है। गाव, शहर और गोरी के बहाने शायद उसी सुरीली तान को याद कर रहे हैं नीरज-जाड़े की ऐसी ही सुबह थी। मैनें बांसुरी की मीठी तान सुनी थी...कहीं दूर कोई बांसुरी बजा रहा था (विश्वास कीजिए, ये किसी रुमानी फिल्म का कथानक नहीं था)...कोई पुराना नग्मा बजा रहा था- गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा। बांसुरी की तान बचपन से ही मुझे मोहित करती रही है। ...गांव में स्कूल आते-जाते वक्त भैंसो (शर्तिया गाएं नहीं थीं) की पीठ पर बैठे गांव के छोकरों को बड़े बेफ़िक्र अंदाज में बांसुरी बजाते सुना और देखा करता था। उन्हे मिली ये स्वतंत्रता और सुविधा मुझे बेहद रिझाती थी। भैंस की सवारी और बांसुरी का साथ, मेरी नज़र में उनको एक अलग क्लास में रखती थी..जिन्हें दशमलव और चक्रवृद्धि ब्याज़ जैसे सवालों से कोई लेना-देना नहीं होता था। कभी-कभार उनसे इसके बारे में पूछ लो तो खीसें निपोड़कर आपके ही चेहरे को देखने लगते जैसे हम उदबिलाव हों। लेकिन उम्र के साथ सुरों का लगाव बढ़ता गया। थोड़ा बड़ा हुआ तो संगीत सुनने का थोड़ा शऊर हुआ। पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और रोनू मजुमदार की बांसुरी मुझे मोहित करने लगी। ...खैर, उस दिन सुबह के वक्त बंसी की तान से मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। सुबह राम-नाम लेने का वक्त और उसपर गोरी, उसके गांव की शान को बघारती उसकी तान। नज़र दौड़ाई तो एक युवक दिख गया...पुरानी सी पैंट-शर्ट और बिखरे हुए बाल...कंधे पर बांस की खपच्ची में टंकी बांसुरियां...उसके लबों पर एक बांसुरी लगी थी, जिससे ये नग्मा निकल रहा था। ...शायद कुछेक बांसुरी बेचने के इरादे से इधर चला आया था। लेकिन सोच में पड़ गया...दिल्ली के इस कंक्रीट के जंगल में उसकी बांसुरी का खरीददार कौन होगा...न बच्चे और न बूढ़े। ...नजरें दौड़ाई...सड़कें अलसाई पड़ी थी...बड़ी-बड़ी इमारतों की आंखों में अब भी कुछ घंटे की नींद बाकी थी। लेिन बांसुरी वाले का नग्मा जारी रहा। थोड़ी हंसी आई...जाने किस गोरी और किस गांव की याद में बेजार बना फिर रहा है। गोरी का गांव तो जाने कब का पीछे छूट गया भाई मेरे...लेकिन इससे उसका कोई लेना-देना नही था। कभी-कभी सचिन जिस लय के साथ बल्लेबाजी करते हैं...उसका सुर की भी गहराई कम न रही होगी। जिन घरों में गद्देदार बिस्तर पर लोगों को नींद नहीं आती...सेंसेक्स और निफ़्टी से लेकर डाउजोन्स में गिरावट की चिंता चैन से सोने नहीं देती...ग्लोबल रीसेशन की खबरों ने उनकी नींद उड़ा दी हो...वहां इस दो पैसे की बांसुरी कहां बिकने वाली थी। सो, नहीं बिकी...नग्मे की धुन धीमी होती गई और लड़का ओझल हो गया। ख़ुदा करे, उसे अपनी गोरी का गांव भी मिल गया हो और शहर में तब्दील न हुआ हो तो गांव वैसा ही सुंदर हो। आमीन।

किसके पास है इसका जवाब

आशीष मिश्र, एमएचवन न्यूज़ चैनल के पत्रकार हैं। उन्होंने संसद पर हमले की बरसी के तुरंत बाद मुझे एक मेल के जरिये नेताओं के चाल-चरित्र को लेकर टिप्पणी भेजी थी। व्यस्तता की वज़ह से उसे तुरंत प्रकाशित नहीं किया जा सका....लेकिन उनका सवाल मौजूं है-
गुरुवार को शपथ लिया, शनिवार को भूल गए...ये हमारे नेता हैं। प्रणव मुखर्जी का कहना है कि आतंक की धुरी है पाक़...आडवाणी के हम एक सौ पांच का उद्धरण...और राहुल गांधी के सिपाही के साहस पर दिया गया भाषण देश ने ग़ौर से सुना। लेकिन महज दो दिनों बाद, जब संसद और सांसदों की हिफ़ाजत में नौ शहीदों को याद करने की बारी आई तो महज बारह सांसदों ने ही संसद में आने की ज़हमत उठाई। कथनी और करनी में फ़र्क का इससे चुभता उदाहरण आप ढूंढ़ते रह जाएंगे...शायद मिले नहीं। पत्रकार प्रमोद बिष्ट की पत्नी सुनीता बिष्ट हमारे कार्यक्रम में आई थीं, उन्होंने बताया कि उनसे जितने वायदे किए गए, कोई पूरा नहीं हुआ।...ये हैरान करने वाला था। निजी तौर पर मुझे यक़ीन नहीं हुआ कि ऐसा भी हो सकता है। लेकिन शहीद हुए प्रमोद बिष्ट की पत्नी एक हक़ीकत के रूप में हमारे सामने थीं। वो कह रही थीं कि शीला दीक्षित ने कहा था कि रोज़गार देंगी..बाद में कहा देखेंगी...और अब तो ये आश्वासन भी नही। मित्रों, अगर इसके बाद भी नेताओं की जमात से आप उम्मीद बांधे बैठे हैं तो बीजेपी के प्रकाश जावड़ेकर का बयान भी कम हैरानी भरा नहीं है। संसद पर हमले की बरसी पर गिनती के सांसदों की संसद में मौजूदगी पर उन्होंने कहा कि- शनिवार या रविवार को हर कोई मौजूद नहीं हो सकता। सांसदों को उनके इलाके में भी जाना होता है। प्रकाश जी, सांसदों के लिए शायद संसद भवन भी अपना ही इलाक़ा होता है। और क्यों शनिवार या रविवार को उपस्थित नहीं हो सकते सांसद। क्या आप ये कहना चाहते हैं कि हर सांसद शनिवार और रविवार को अनिवार्य रूप से अपने इलाके में ही होता है? क्या आप ये कहना चाहते हैं कि हमारे सांसदों के लिए सप्ताहांत में अपने क्षेत्र में जाना इतना जरूरी है कि संसद पर हमले की बरसी पर भी मौजूद नहीं रह सकते? इन सब नेताओं के लिए सुनीता बिष्ट एक सवाल हैं...संसद पर हमले के दौरान शहीद हुए प्रमोद बिष्ट की विधवा को उसका हक़ और सम्मान नहीं दिला सकने वाले सांसद देश के लिए आखिरकार क्या और कितना कर पाएंगे सोचने वाली बात है।

Saturday, December 13, 2008

सरहद पर मोहब्बत के दीये


नीरज एकबार फिर पूरे उत्साह से नए विषय के साथ हमारे साथ हैं। हिंद-पाक़ रिश्तों के बीच दुनिया के दारोगा यानी अमेरिका की भूमिका पर विचार कर रहे हैं, नीरज। हालांकि तनाव भरे माहौल में सरहद पर मोहब्बत की मोमबत्तियां जलाने जैसी रवायत पर भी उनकी नज़र है-

वाघा बार्डर पर एकबार फिर मोहब्बत के दीये जलाए गए...मुंबई आतंकी हमले के बाद हिंद-पाक़ रिश्तों में आई तल्ख़ी के बावजूद वाघा बार्डर के ये दीये जैसे धधकते सवाल की मानिंद हैं।...आख़िर ये मोहब्बत का पैग़ाम किसके लिए? ये शांति के दीये आखिरकार कब असर में आएंगे?..हैरानी ये भी हो सकती है कि संजय दत्त की पत्नी मान्यता जो मुंबई में मारे गए लोगों की याद में मोमबत्तियां जलाकर श्रद्धांजलि दे रही थीं, वही मान्यता हिंद-पाक़ दोस्ती के लिए भी दीये जला रही थीं। बाघा बार्डर से शायद आप वाक़िफ हों। पंजाब के एतिहासिक शहर अमृतसर से बेहद क़रीब है ये बार्डर। वाघा बार्डर पर हर रोज़ होने वाले औपचारिक जलसे को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग आते हैं। इधर हिंदुस्तान की अवाम और सरहद पार पाकिस्तानी अवाम। देशभक्ति के तराने गूंजते हैं, जज़्बाती नारे भी लगाए जाते हैं। दोनों देशों में अगर तल्ख़ी आ जाए, वो चाहे सियासी हो या ग़ैर सियासी, इसका असर पाक रेंजर्स और सीआरपीएफ के जवानों पर बखूबी दिखता है।...बहरहाल, मैं बात कर रहा था सरहद पर मोहब्बत के दीयों की।...ये मौक़ा था मानवाधिकार दिवस का। दस दिसंबर को यूनाइटेड नेशंस का स्थापना दिवस है, जो पूरी दुनिया में मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी मौक़े पर इकट्ठा हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता। ...और दीप जलाने से लेकर आपसी मोहब्बत और दोस्ती के पैग़ाम को हर हाल में आगे बढ़ाने की हिमायत की गई।...वाघा बार्डर के लिए ये सिलसिला कोई नया नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर की अगुवाई में हर साल यहां दीये जलाए जाते हैं...ये रवायत अब काफी पुरानी हो चुकी है। तरक़्कीपसंद लोगों की एक जमात हमेशा से हिंद-पाक़ रिश्तों की बेहतरी की हिमायती रही है। इनकी दलील होती है कि दोनों ही मुल्क़ों में चंद लोग ही इस रिश्ते के ख़िलाफ हैं। ...और इस संबंध को बेहतर होते नहीं देखना चाहते।लेकिन बात सिर्फ इतनी भर नहीं है। मुंबई आतंकी हमले ने जाने या अनजाने अमेरिका को पंच बनने का मौक़ा उपलब्ध करा दिया है। हमने अमेरिका को ऐसा मौक़ा हमने दे दिया है जिसकी ताक में अमेरिका लगातार लगा था। हम भी अपनी फरियाद लेकर अमेरिका के पास जा रहे हैं और पाक़िस्तान भी अपनी फ़रियाद वहीं सुना रहा है। ...हम ख़ुश हैं कि अमेरिका ने हमारे पक्ष में बोला। पाक़िस्तान को ख़ुशी है कि अमेरिका ने उसपर ज्यादा शक- शुबहा नहीं जताया। दुनिया का दारोगा मुदित भाव में दोनों को बराबर का भरोसा दे रहा है। ये ख़तरनाक है। दोनों देशों का रिश्ता द्विपक्षीय न होकर एक मजबूत बिचौलिये पर आकर टिक गया है। देर-सबेर हमें इसकी क़ीमत भी चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए।

....वैचारिक गिरोहबंदी है ये

गंगेश गुंजन न केवल पत्रकार है बल्कि अख़बार और टीवी पत्रकारिता, दोनों में ही उनकी खासी दखल है।...एक लंबा तजुर्बा है। हाल के परिदृश्य पर टिपण्णी करते हुए उन्होंने वैचारिक गिरोहबंदी की पहचान की। उनके गुस्से को समझा जा सकता है-

ग्लोबल युग ने जितनी तेजी से संस्कार, मूल्यों और नैतिकता को लील लिया है, उससे कम तेज गति से पत्रकारिता से मानवीय मूल्य और राष्ट्रीय-सामाजिक सरोकार लुप्त नहीं हुए हैं......लोकतंत्र का मतलब विचारों को व्यक्त करने की आजादी तो है लेकिन इसका मतलब राष्ट्र की अवधारणा को ही ध्वस्त करना नहीं है.....पिछले कई अवसरों से लग रहा है कि घटनाओं पर जो लेख-विचार अखबारों, पत्रिकाओं और टीवी पर आ रहे हैं वो गिरोहबंदी ज्यादा है....ये पेज थ्री सेलेब्रेटीज की गिरोहबंदी है, ये पत्रकारिता में उंचे नाम बन चुके या मान लिए गए लोगों की गिरोहबंदी है.....जो एक खास तरह के विचार थोपने पर आमादा हैं....इन विचारों में बड़े शहरों की बौद्धिकता भरी बातें तो होती हैं लेकिन आम हिंदुस्तानी की संवेदनाएं नहीं होतीं.......माफ कीजिए लेकिन मुंबई ब्लास्ट पर भी ऐसी ही कोशिश शुरू हुई थी लेकिन इस बार आम आदमी किसी के विचार सुनना नहीं चाहता था और उसने बिना किसी की परवाह किए अपने स्तर पर विरोध करने का अलग रास्ता तय कर लिया....पहली बार देश के अंदर सिविल डिप्लोमेसी के अलंबरदारों को ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ी लोगों ने खुद ही अपना रास्ता तय कर लिया......इस बार के आक्रोश से अगर नेता स्तब्ध रहे तो बुद्धिजीवियों का गिरोह भी कम हैरानी में नहीं...... अप्रासंगिक हो चुके उनके विचार दुनिया के सामने उजागर न हो जाएं इसके लिए उन्होंने षडयंत्र रचा और विरोध की दिशा भले ही तय न कर पाएं हों विरोध की भाषा उन्होंने जरूर तय कर दी....दरअसल मुंबई ब्लास्ट के बाद लोगों का गुस्सा सिस्टम की देखरेख कर रहे लोगों के खिलाफ था जिसे बड़ी चालाकी से उन्होंने पूरे सिस्टम के खिलाफ ही बता दिया........और थोड़ी देर के लिए ही सही ऐसा लगा कि मुंबई ब्लास्ट के खिलाफ सड़क पर निकले लोग लोकतंत्र विराधी हैं.....मुख्तार अब्बास नकवी दरअसल यही समझकर बौखला गए थे....मगर उनके आरोपों को जवाब मुंबई ब्लास्ट के बाद हुए विधानसभा चुनावों के दौरान ही मिल गया था जब मतदान के दिन बड़ी संख्या में लोग निकले और उन्होंने ये जता दिया कि लोकतंत्र पर से उनका विश्वास कम नहीं हुआ है....मुंबई ब्लास्ट के बाद का विरोध दरअसल सिविल प्रोटेस्ट का अनूठा उदाहरण है जो बताता है कि जिदा कौम हैं हम,सब कुछ सहने के लिए नहीं बने.....इस बार सड़कों पर निकले प्रहरी बुद्धिजीवियों की व्याख्या में भले ही उलझ गए हों लेकिन मेरा मानना है कि जल्द ही हम सब उठ खड़े होंगे और अपनी भाषा में अपनी तरह से अपना विरोध जताएंगे.....जो सिर्फ संवेदनाओं से गाइड होगा....भारी भरकम व्याख्या या डिपलोमेटिक समझ से नहीं ......

Thursday, December 11, 2008

...राजा एक सवाल भी है

राजा चौधरी यूपी के मेरठ के रहने वाले हैं। पता नहीं इसपर गर्व करें या उनकी शर्मिंदगी भरी हरक़तों पर अफसोस जाहिर करें। पड़ताल कर रहे हैं नीरज।
किसी ख़बरिया चैनल पर राजा चौधरी की थाने में पिटाई की ख़बर चल रही थी। राजा का नाम शायद आपके भी जेहन में हो। बिग बास के फाइनल में आशुतोष से मात खाने वाला राजा चौधरी। ...तो मैं बात कर रहा था राजा की। उस ख़बर की जिसमें थाने में बैठे राजा की पिटाई हो रही थी। एक पुलिसवाला तबियत से राजा ख़ातिरदारी कर रहा था...सर्किल और ऐरो बनाकर इस चांटे को दिखाया जा रहा था। इसके बावजूद राजा बमभोले की जय के नारे लगा रहा था। जैसे कोई किला फ़तह कर लिया हो।...ये कोई पहला मौक़ा नहीं है, जब राजा चौधरी ख़बर बने हों। मयनोशी ने उन्हें और उनके परिवार को भी जाने कैसे-कैसे दिन न दिखाए। हंगामा, मारपीट और बदतमीजी। राजा के गले में इसका टैग हमेशा से लटका रहा है। यही उसकी शख़्सियत का स्थायी भाव बन गया।
लेकिन राजा एक सवाल भी हैं। बार-बार राजा ही ख़बर क्यों बनते हैं। ...मयनोशी अगर इकलौती वज़ह है तो उनसे ज्यादा टल्ली होने वाले और भी हैं ज़माने में। लेकिन ख़बर बनने की योग्यता कम ही लोगों में होती है। दुर्भाग्य से राजा में मीडिया को ये योग्यता जरूरत से कुछ ज्यादा ही दिखती है। जिसके कारण आज राजा की ये दुर्गति हो रही है। दरअसल, राजा की कहानी एक ऐसे नाकाम अभिनेता की है, जिसकी पत्नी को अभिनेत्री के तौर पर क़ामयाबी मिली। जिसे शोहरत मिली...जिसे एक बेहतर पहचान मिली। छोटे पर्दे की प्रेरणा यानी श्वेता तिवारी। करीब-करीब हर घर में जानी-पहचानी जाती हैं। मगर राजा के पास क्या है- कुछेक टीवी सीरियल्स, चंद फ्लाप भोजपुरी फिल्में...और बेशुमार बदनामियां।
टीवी शो -नच बलिये- में राजा और श्वेता की पति-पत्नी की जोड़ी दिखी थी। इसके कुछ दिनों बाद ही दोनों के बीच मनमुटाव की ख़बरें आने लगीं। नौबत यहां तक पहुंची कि श्वेता ने राजा के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दी। पहली बार दोनों का पारिवारिक झगड़ा जमाने के सामने खुलकर आ गया। मीडिया को इस घरेलू झगड़े में फिल्म अभिमान की पटकथा दिख गई जो कहीं अधिक सच्ची थी। मीडिया का हुजूम जब राजा के सामने पहुंचा तो उसने खूब बदतमीजियां कीं...मीडिया को दोहरा मसाला मिल गया। ...खैर, कुछ दिनों तक मीडिया के खेल लेने के बाद बात आई-गई हो गई। इस बीच राजा ने मालीवुड कहे जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश की फिल्मों में भी हाथ आजमाया। पलक क्रियेशन के नाम से प्रोडक्शन हाउस भी बनाया लेकिन उसकी बदनामियों का सिलसिला शायद अभी लंबा चलना था।
राजा को बिग बास के घर में देखा गया। लेकिन यहां भी आइटम गर्ल संभावना के साथ पंगा ले बैठे। हालांकि इसमें राजा की गलती कम और ऐसे शो की डिमांड को ज्यादा जिम्मेदार माना जा सकता है। ...वहां से छूटे तो राजा ने रोज गदर मचाना शुरू कर दिया। पहले तो मुंबई पुलिस ने उसे एक ऐसे शख़्स के साथ पकड़ा, जो न तो- ही- हैं और न ही- शी- में उनकी गिनती होती है। उसके बाद टैरो कार्ड रीडर का मामला सामने आया। फिर बिग बास में उनके साथ रहे जुल्फ़ी ने राजा पर चोरी का इल्ज़ाम लगाते हुए पुलिस में मामला दर्ज करा दिया। कुल मिलाकर राजा और उनकी हरक़तों ने खूब सुर्खियां बटोरीं।
फिर उसी सवाल पर आते हैं। राजा क्यों ख़बर हैं। क्या राजा सिलेब्रिटी होने की क़ीमत चुका रहे हैं। क्या इसलिए वो ख़बर हैं कि वो एक क़ामयाब अभिनेत्री के नाकाम पति हैं। ख़बरिया चैनलों के लिए इसलिए ख़बर हैं कि उन्हें राजा के रूप में ऐसी सामग्री मिल गई जिसपर घंटों तक बिना कुछ ख़ास मेहनत के राजा रंगीला- अय्याशी का राजा- के रूप में घंटों खेले जाने की योग्यता है।...लेकिन अगर आप महानगरीय जीवन से वाक़िफ हैं तो राजा को अधिक संवेदनशीलता के साथ समझ सकते हैं। एक हारे हुए पति...एक हारे हुए नायक ...और छोटे शहर से आए एक ऐसे शख़्स की छटपटाहट को समझ सकते हैं, मायानगरी की बुलंदियों को छूने आया था।

Tuesday, December 9, 2008

चौंक गई पार्टिया, पर जनादेश दुरुस्त

नीरज जाने-माने पत्रकार हैं। ये अलग बात है कि उनके जाने-माने को इतना प्रचारित नहीं किया गया है। निजी तौर पर मुझे मालूम है कि नीरज एक संजीदा पत्रकार हैं इसलिए हाल में हुए विधानसभा चुनाव के बारे में उनकी टिप्पणी को पब्लिश किया जा रहा है।
राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आ चुके हैं। इसे सत्ता का सेमीफाइनल कहे या sighasan का semefainal...या जो भी नाम देना चाहें दे सकते हैं। या जिस भी नजरिये से देखना चाहें, देख सकते हैं...पर इतना जरूर है कि इन चुनावी नतीजों ने जितना बीजेपी ने चौंकाया है...उतना ही कांग्रेस को भी। पहले बीजेपी की बात करें तो पार्टी ये तय मानकर चल रही थी कि दिल्ली का ताज तो मिलेगा ही मिलेगा...पार्टी ने पूरे भरोसे से अपने वरिष्ठ नेता वीके मल्होत्रा को सीएम पद का उम्मीदवार बनाया...महंगाई, भ्रष्टाचारर और आतंकवाद को मुद्दा बनाया गया...और पार्टी ने नारा दिया महंगी पड़ी कांग्रेस...ऐन मतदान से पहले मुंबई एपिसोड ने पार्टी मानो मुराद ही पूरी कर दी...लेकिन जनादेश ने दिल्ली में कमल के खिलने का कोई मौका नहीं छोड़ा...राजस्थान का जो जनादेश आया है, मुझे नहीं लगता कि बीजेपी को भी इससे बेहतर परिणाम की उम्मीद रही होगी...क्योंकि महारानी ने रियासत समझकर शासन चलाया, मानों लोकतांत्रिक सरकार नहीं, राजगद्दी मिल गई हो...जिसकी वो स्वभाविक वारिस हों। मध्यप्रदेश में कमल फिर से विपक्ष सिर-फुटौव्वल में मगन रहा...तो साध्वी उमा बीजेपी से लड़ रही ..और कहें तो नहीं भी लड़ रहीं थी। जैसे बीजेपी की ए टीम और बी टीम नुमाइश मैच खेल रही हो...फायदे में ए टीम ही ही। छत्तीसगढ़ की बात करें तो डाक्टर से नेता बने, रमन सिंह ने शासन की सेहत का ध्यान रखा।...और दो रुपये किलो पर चावल देकर जनता की चिंता को भी समझा। ऊपर से नकारा विपक्ष ने भी बीजेपी की पूरी मदद की। पर कांग्रेस की बात करें तो जनादेश आने के बाद भले ही पार्टी नेताओं के चेहरे खिले हुए हों मगर मुंबई एपिसोड के बाद कांग्रेस -सहमी और बेचारगी का भाव लिए नजर आ रही थी। मतगणना के पहले तक कांग्रेसी दिग्गज भी अगर-मगर पर अटक रहे थे। उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि मुंबई का जख़्म पार्टी की कितनी लुटिया डुबोएगा। क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ कि जनता इस कदर सत्ताधारियों पर बिफर पड़ी। पर्टी को शुक्रगुजार होना चाहिए कि जनता ने इन चुनावों में म्योच्योर डेमोक्रेसी की तरफ अपना फैसला सुनाया, किसी भवावेश में नहीं। अगर बीजेपी और कांग्रेस को छोड़ तीसरे दल बीएसपी की बात करें तो इन चुनावों में यूपी के बाहर भी हाथी की चाल महसूस की गई। हालांकि पार्टी सुप्रीमो जितनी उम्मीद कर रही होंगी, जनता ने उतनी अहमियत बीएसपी को फिलहाल नहीं दी। आखिर में यही कहूंगा अगर इन राज्यों के चुनाव वाकई सेमीफाइनल हैं तो आप फाइनल की झलक इनमें खुद भी देख सकते हैं।

Saturday, December 6, 2008

नकवी सुनें, सब सुनें

बी जे पी प्रवक्ता नकवी साहब के लिपस्टिक वाले प्रदर्शनकारी महिलाओं के बयान के बाद ये बहस तेज हो गई है कि क्या विरोध प्रदर्शन कुछ ख़ास लोगों का ही हक़ है । विरोध प्रदर्शन का तौर तरीका क्या हो? ये भी हकीकत है कि सेलिब्रेटीज के जज्बातों पर सहज भरोसा क्यों नही होता। क्या उनके आंसू नकली होते हैं? क्या उनका गुस्सा फरेबी होता है? क्या उनकी हँसी फर्जी होती है? इस पर कुछ टिप्पणियां आई हैं , इस उम्मीद से इसे पब्लिश किया जा रहा है कि इसमे और भी लोगों की भागीदारी हो और लोगों के विचार सामने आयें....

ab inconvenienti said...
मोमबत्ती छाप प्रदर्शन करने वाले, जोगिंग करके आतंक का खात्मा करने वाले, अमीर-अघाये बम्बइया हस्तियां और फ़िल्म स्टार. नकवी तो ग़लत कह ही गए, खामियाजा भी भुगत रहे हैं. खैर,पर क्या इन हीरोइनों ने ज़िन्दगी में कभी पोलिंग बूथ देखा है? ८०% को तो यह भी पता नहीं होगा की देश का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कौन है, अमेरिका में किस पार्टी की सरकार है या अरुणाचल प्रदेश नक्शे में कहाँ है.
December 3, 2008 11:38 PM
राहुल said...
अब भाई , आपने बिल्कुल मार्के की बात उठाई है कि इन लोगों ने पोलिंग बूथ नही देखा है, ये लोग अमीर, अघाए और खाए पिए लोग हैं. एकदम सही बात. लेकिन भाई मेरे, इस देश मे कितने लोग वोट डालते हैं? ये जो हमारी सरकार है, कितनो लोगों के वोट से बनती है? मेरे ख्याल से ये बात आप अच्छी तरह से जानते होंगे. जो भी वोट नही डालता वो इस देश मे जीने कॅया हक नही खो देता, उससे संविधान के मूलभूत अधिकार नही छीन लिए जाते. अपनी सुरक्षा की माँग करना हर नागरिक का अधिकार है, बिल्कुल वैसे ही जैसे कि वोट देने का अधिकार है. और इस अधिकार पर उंगली उठाना सीधे सीधे संविधान की आत्मा को चोट पहुचना है. नक़वी ने वही किया है. इसके अलावा नक़वी ने स्त्रियों का अपमान भी तो किया है. अपनी मर्दानगी भारी थोथी जवानी के जोश मे आकर वह भारतीय मर्यादा तक भूल गये कि स्त्रियों के साथ सम्मान से पेश आना चाहिए.
December 4, 2008 8:33 AM
ab inconvenienti said...
लिपस्टिक पाउडर लगाने वाली महिलाएं और सूटेड बूटेड लोग........ या महिलाओं के साथ पुरूष वर्ग का भी तो अपमान है, पर सूट बूट वाला भाग आपको नज़र न आया? हर महिला का अपमान तो किया नहीं सिर्फ़ टिपटॉप और मेकअप वाली ....... ये अमीर, जब ख़ुद पर आई तो दहल गए, ले मोमबत्ती हाथों में निकल पडेकहाँ रहते है जब हैदराबाद और राजस्थान में लोग मरते हैं? और जहाँ तक संविधान द्वारा दिया जाने वाला जीने का अधिकार है, वह तो इनके पास सबसे ज़्यादा है. मरने को तो केवल चौराहों फुटपाथों पर चलने वाला ही है. शोभा डे ने अपने वर्ग और सोसाइटी के पक्ष में कह ही दिया है, "आख़िर हम लोग सबसे ज़्यादा कर भरते हैं, हमारी सुरक्षा का सबसे बेहतर इंतजाम कराया जाना चाहिए".और कितने मोमबत्ती वालों ने यह शपथ ली की हम अपने बच्चों को सेना ज्वाइन करवाएंगे या उन्हें कमांडो बन कर आतंकवाद का खत्म करता देखना चाहेंगे? ये उथले ओछे लोग.
December 4, 2008 9:54 AM
Bhuwan said...
अब ऐसा है की अगर कपडों और वेश भूषा ही लोगों की मानसिकता का आइना होता तो फ़िर बात क्या होती जनाब... हम ऊँची सोसाइटी में रहने वाले लिपस्टिक और मेक अप करने वाले लोगों के विरोध को इस वजह से खारिज नही कर सकते... जहा तक वेश भूषा की बात है तो नेता भी खादी और पुलिस वाले खाकी पहनते है..लेकिन मचाते तो गंध ही हैं न...
December 4, 2008 10:50 PM
राहुल said...
अब भाई, बात आपकी फिर से सही है की ये लोग ओछे हैं, उथले हैं या जो कुछ भी हैं. सेना मे दाखिले की बात है तो मैं भी शर्त लगाकर कह सकता हू की यही आप जो उनकी तरफ उंगली उठा रहे हैं, चार उंगलियाँ आपकी तरफ भी उठ रही हैं, यक़ीनन आप सेना मे नही हैं और नेया ही आपके बच्चे. जीतने अधिकार आपको हैं, उतने ही मुझे हैं और उतने ही इन लोगों को भी. सतही बातों मे वक्त मत जया कीजिए. कुछ रचनात्मक कीजिए

मेराडोना, बंगाली संदेस और सबका हीरो

अद्भुत..अविस्मर्णीय ...बेजोड़। शायद कुछ ऐसे ही अहसास होंगे कोलकाता के उन हजारों लोगों के जो मेराडोना से रूबरू हुए । हिंदुस्तान की धरती पर फुटबॉल का जादूगर। उत्सवधर्मी देश में फुटबॉल का देवता डिएगो मेराडोना। फुटबॉल के लिए जुनूनी कोलकाता के दर्शकों के बीच मेराडोना। इतिहास के पन्नों में दर्ज एक सुनहरा नाम। एक ऐसी शख़्सियत, जिसे देख-देखकर भारत सहित दुनिया के कई देशों की एक नस्ल जवान हुई। उसी पीढ़ी ने डिएगो को स्थूलकाय काया के साथ भी देखा था... ड्रग्स के कारन बीमार, बेजार और हताश दिखने वाला एक शख्स, लेकिन डिएगो फ़िर खड़ा हुआ। जिंदगी के मैदान में फ़िर से एक बेजोड़ फाइटर की तरह कूदा। लोगों को अपने हीरो की बदशक्ल तस्वीर पर थोडी निराशा जरूर हुई थी लेकिन डिएगो से प्यार कभी कम नहीं हुआ। शनिवार को उनके कोलकाता के नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचने पर प्रशंसकों का हुजूम स्वागत के लिए तैयार था...कई तो घंटों इंतजार के बाद अपने हीरो का दीदार कर रहे थे.. मैराडोना हैरान थे...लोग उन्हें अपना पसंदीदा बंगाली रोसोगुल्ला खिलाना चाहते थे। मगर ये संभव नहीं था।...लोग अर्जेटीना की जर्सी पहनकर डिएगो को लेकर अपने सम्मान को जाहिर कर रहे थे। अपने देश से हजारों किलोमीटर दूर इतनी बड़ी संख्या में अपने प्रशंसकों का ये मिठास पाकर डिएगो गदगद थे। उन्हें ये सहज विश्वास नहीं हो रहा था कि किसी ग़ैर मुल्क़ में लोगों का इतना प्यार हासिल होगा। ...मगर हिंदुस्तानियों के लिए इसमें हैरानी का कोई तत्व नहीं था। ये देश सरहद और भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर भी अपने हीरो चुन लेता है...और उसकी दीवानगी पर इसका वास्तव में कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका हीरो दुनिया के किस हिस्से का है। ये तो खैर, डिएगो हैं। सेरेना विलियम्स भले सचिन तेंदुलकर को नहीं जानती हों मगर ख़ुद सेरेना के प्रशंसकों की हिन्दुस्तान में कमी नही। अपने दौर में पेले , मोहम्मद अली, जोन मेकैनरो, ब्रूस ली , स्टेफी ग्राफ जैसे अनगिनत नाम हैं जिनके हिंदुस्तान में लाखों प्रशंसक हैं। कट्टर प्रतिद्वंद्वी होते हुए भी पाकिस्तानी क्रिकेटर वसीम अकरम हिंदुस्तानी क्रिकेट प्रेमियों के बीच कम मक़बूल नहीं हैं। ब्रायर लारा को खेलते हुए देखने के लिए भारत में उनके प्रशंसक- भगवान से विनती कर वेस्ट इंडीज के शुरुआती दो विकेट जल्द-से-जल्द गिरवा देते थे। क्योंकि लारा थर्ड डाउन बल्लेबाजी के लिए आते थे...और अगर जल्दी आउट हो जाएं तो भारत वेस्टइंडीज पारी के जल्द-से-जल्द सिमट जाने की प्रार्थना करते थे।...ये कितना अजीब है। लारा भारत के खिलाफ खेल रहे होते थे और भारतीय दर्शक अपनी टीम के ही खिलाफ लारा का शतक देखने की भगवान से विनती करते थे। भारत के ख़िलाफ़ लारा अगर अच्छा खेले तो बेशक हमारे जैसे लाखों प्रशंसकों की शायद दुआ उनके साथ थी। दरअसल ये भारतीय दर्शकों का वो जज़्बा है जो दुनिया के किसी अन्य हिस्से में देखने को मिले। यही भारतीयता भी है...जो हमें कुदरती तौर पर स्वीकार्यता का संस्कार देता है।...क्या हुआ जो डिएगो अर्जेटीना जैसे नामालूम देश से हैं। क्या फर्क पड़ता है कि डिएगो कभी हिंदुस्तान के साथ भी न खेले हों।...क्या अंतर पड़ता है कि डिएगो उनकी जुबान नहीं समझते हों....इन सबके बावजूद लोगों से मिल रही मोहब्बत को देखकर डिएगो हैरान हैं। वाकई, हममे से कोई हैरान नहीं है...क्योंकि अपने हीरो को लेकर दीवानगी बिल्कुल जानी-पहचानी है।...अपने समय के नायक को एकबार फिर सलाम।

Wednesday, December 3, 2008

सुन लें नकवी साहब !

सुन रहे हैं नकवी साहब.... प्रीति जिंटा क्या बोल रही है। कह रही है कि वो नही डरती नकवी साहबों से। वो तो ताज हमले के ख़िलाफ़ मुंबई में हुए प्रदर्शन में बाकायदा लिपस्टिक लगा कर शामिल हुई.... ( कैमरे के नजदीक चेहरा लाकर अपना मेकप भी दिखाया। शायद आपको चिढाने का इरादा रहा हो।) और सत्ता के ख़िलाफ़ नारे भी सरगर्म कर रही हैं प्रीति। यह सब करने के लिए उन्होंने आप जैसे लोकतंत्र के किसी प्रमाणिक रहनुमा से इजाज़त लेने की भी जरुरत नही समझी। ....ताज्जुब है, हिमाकत देखिये, यह सब प्रीति जिंटा स्वीकार भी कर रही हैं.... बाकायदा ऑन एयर।
नही प्रीति....बचपने की बात मत करो। ये फिल्मी परदा नही है.... जहाँ स्क्रिप्ट राइटर या निर्देशक की चलेगी। ये असली जिंदगी है। इसमे भी हिंदुस्तान। यहाँ सब सियासत तय करती है। तुम्हारी खुशी और tumhare गम से लेकर तुम क्या पहनोगी ....क्या बोलोगी। बोलते समय कितना मुह खोलोगी, जो कम से कम लोकतंत्र के दायरे में होगा। ज्यादा मुह खुलने पर नकवी साहबों के सियासत तुम्हे जमुहूरियत विरोधी करार दे सकती है... लिपस्टिक की लाली देख लेने पर तुम्हारे विरोध को प्रायोजित ठहराया जा सकता है। विरोध प्रदर्शन के दौरान जींस पहनना तुम्हे भारी पड़ सकता है.... पश्चिम परस्त बताकर तुम्हारे विरोध को ड्रामा बताये जाने का खतरा है। तुम्हे नकवी साहब और उनकी नस्ल के तमाम नेताओं से भय खाना चाहिए। तुम्हारे जैसे लोगों की आवाज़ अवाम का प्रतिनिधि स्वर नही है। ये हक सिर्फ़ नकवी साहबों का है। केवल इतना भर समझ लो और समझदार हो जाओ।
हाँ तो नकवी साहब इतना बता रहे हैं, क्या लोकतंत्र पर वाकई इतना खतरा है? सिर्फ़ नकवी ही क्यों मिडिया के भी विशेषज्ञ इस बहद में मग्शूल हैं। ताज पर आतंकी हमले के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन और नेता विरोधी माहौल को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया जा रहा है.... पकिस्तान मुर्दाबाद की बजाय नेता मुर्दाबाद के नारे उछालना ग़लत है। ये बर्ताव ऐसा है जो लोकतंत्र को कमजोर और अलगाववाद को मजबूत करेगे। - ये नकवी साहबों का डर है।
गौर से देखें .... लोगों का गुस्सा लोकतंत्र के ख़िलाफ़ नही है। संविधान में उनकी आस्था जरा भी डावांडोल नही हुई है। पोलिटिकल सिस्टम से उन्हें एतराज नही है। लोकतंत्र में अदद नेताओं की अनिवार्यता से उनका इनकार भी नही है। उनका गुस्सा अच्युतानंदानों से है. शिवराज पटिलों से है। देशमुख जैसे उन नेताओं से है जो ताज हमले के बाद अपने बेटे और मित्रों के साथ इस अंदाज़ में वहां पहुचे जैसे पिकनिक स्पॉट पर आए हों। नकवी साहबों को मुहैया होने वाले सुरक्षा के भरी तामझाम को लेकर लोग भड़के हुए हैं। यानि गुस्सा नेताओं के चाल चरित्र को लेकर है।
इस पूरे प्रकरण के एक सकारात्मक पहलु पर गौर किया जन चाहिए। मराठी-बिहारी, अगडे-पिछडे और उत्तर दक्षिण जैसे खांचो में बँटे लोगो को इस आतंकी हमले ने एक जुट होने का मौका भी दिया है। मिडिया हाउसेस में इस घटना को लेकर आए एस एम् एस देखिये। या अलग अलग शहरों के लोगों की राय जानिए। सब इसे मुंबई की बजाय देश पर हमला मान रहे हैं। कोल्कता हो या लाखनाऊ सब जगह इसी जज्बे का संचार हुआ है। ऐसे हालात में इस पर गौर किया जाना थोड़ा हताशा देने वाला है कि मुंबई की घटना ने सचिन की नींद उदा दी.... लता मंगेशकर ३०० बार रोई, लेकिन राज प्रकरण पर ये हस्तियां खामोश क्यों रहीं । - ये एक बचकानी सोच है । भावनाओं को आंकडों में देखने की कोशिश है। उसका औसत निकालने का प्रयास है। पूरे प्रकरण के बाद लोग गुस्से को तात्कालिक प्रतिक्रिया की रूप में नही लेना चाहिए। ना ही इसे लोकतंत्र विरोधी संकेत माना जाना चाहिए। क्या पता इसी में हमारे सियासी चेहरे को बदलने की ताकत छिपी हो।

Monday, December 1, 2008

ताकि सनद रहे ...

ये अगर शहीद संदीप उन्नीकृष्णन का घर नही होता तो कुत्ता भी इस घर में नही आता- अच्युतानंदन, सीएम, केरल।


मै जबतक वहां पहुँचा, आतंकवादी भाग चुके थे- शिवराज पाटिल, पूर्व गृहमंत्री, भारत सरकार।


इतने बड़े शहर में एकाध हादसा हो जाता है- आरआर पाटिल, पूर्व उप मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र।


लिपिस्टिक लगाकर और जींस पहनकर नारे लगा रही महिलाये कश्मीरी अलगाववादी की तरह व्यवहार कर रही थी- मुख्तार अब्बास नकवी, प्रवक्ता, बीजेपी।
अभिनेता बेटा और निर्देशक रामू को ताज हादसे वाले दौरे के समय ले जाना ग़लत नही, रामू कोई आतंकवादी नही- देशमुख, सीएम, महाराष्ट्र।


मित्रों, इन बयानों के बाद कुछ कहने की जरूरत शायद नही रह जाती है। ये सब बयान, जैसा कि आपको मालूम है, मुंबई धमाकों के बाद हमारी बजबजाती सियासत के गलीच जानवरों के है....जो ख़ुद आदमी होना चाहेंगे , न कोई उन्हें आदमियों में गिनना चाहेगा। मनुष्यता की सारी पहचान खो चुके है। गिन-गिन कर देख लीजिये॥ हर एक को गौर से सुन लीजिये.


जिनसे सबसे ज्यादा शिकायत और जिनपर सबसे ज्यादा गुस्सा...वो सबसे पहले...यानी, केरल के सीएम। कामरेड , तुमने तो बिल्कुल ही हद कर दी....मुझे तुम्हारे बयान से जितनी शर्मिंदगी है, औरो पर उतनी नही। मै तो समझ रहा था की तुम भी आदमी हो...लेकिन तुम तो मामूली किस्म के सीएम निकले। चलो कामरेड , तुम्हारी भी सही वक्त पर पहचान हो गई। कम-से-कम ताज़ा पीढी तो सही ढंग से तुम्हारी और तुम्हारे नस्ल की पहचान कर पायेगी..पहले के लोगो को तो तुम्हारे वामपंथ ने खूब सपने दिखाए ।


हमारे दोनों पाटिल साहब का तो क्या कहना। इन दोनों ने तो भारतीय राजनीति में जो मिसाल कायम की है...वो लंबे समय तक जेहन में जिन्दा रहेगी। नफीस बड़े पाटिल साहब जिस अंदाज में गृह मंत्रालय सँभालने की शुरुआत की थी, अपने इस्तीफे की घोषणा के वक्त भी उनके चेहरे पर किसी तरह की शर्मिंदगी या पछतावा नही था। कुछ महीने सत्ता में रहने का अफ़सोस जरूर रहा होगा। नक्सलवाद और सूट बदलने वाले मामले के बाद बड़े पाटिल साहब ने मुंबई बम धमाकों के बाद जो बयान दिया उसे सुनकर या तो आप अपना सर पीट लें, या उनके जैसे तमाम नेताओं का। उन्होंने कहा कि उनके पहुचने से पहले सारे आतंकवादी भाग चुके थे। ये अलग बात है कि दो दिनों तक पूरी मुंबई या .... या फ़िर कहिये हिन्दुस्तान की आत्मा को आतंकवादियों ने बंधक बनाये रखा ।


छोटे पाटिल साहब बिहार के युवक राज पर गोलियां चलवाकर जिस अंदाज में गोली का जवाब गोली से देने की बात कही थी, इस बार भी उनका अंदाज़ उतनी ही बेशर्मी भरा रहा। उन्होंने ताज हमले को मामूली हादसा बताया और कहा कि बड़े शहरों में ऐसा होता है। ....शायद पाटिल जैसे बड़े लोग ऐसी छोटी छोटी ही बातें करेंगे।


सबसे कम शिकायत बी जे पी के नकवी साहब से है। उन्होंने जो कुछ कहा, उनके चाल चरित्र पर मुफीद बैठता है। उन्होंने कहा कि हादसे का विरोध प्रायोजित था, और उसमे शामिल महिलायें किसी के कहे पर नारेबाजी कर रहे थे। उन्होंने तो इस प्रदर्शन को लोकतंत्र विरोधी भी बता दिया। ....नकवी साहब ने हम सब को लोकतंत्र की नई परिभाषा बताई, इस मुल्क को लोकतंत्र का नया चेहरा दिखाया। हम सभी को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए।

Friday, November 28, 2008

हम लडेंगे साथी

दोस्तों, कभी सोचा न था कि ऐसे असहज हालात और भारी मनोदशा में अपने ब्लॉग की पहली पोस्ट डालूँगा। विश्वास कीजिये, पहली पोस्ट के लिए मन पिछले कई दिनों से उत्साह से भरा हुआ था । मन में अलग अलग सामग्रियां आ रही थी, और जा रही थी। लेकिन ब्लॉग पर लिखने का ज्ञान न होने की वजह से कई दिनों तक मामला टलता रहा। ...अब अचानक मुंबई बम धमाकों ने हिलाकर रख दिया है। सो, असर हो, न हो लेकिन जब आतंकियों की बन्दूंकें मुकाबिल हों तो लिखने का इरादा पक्का हो गया।

पिछले कई घंटे से अधिक से मुंबई धमाकों से हुई तबाही के शॉट्स मन में लगातार घूम घूम जा रहे हैं। ...देश के मान पर किया गया ये हमला हर हिन्दुस्तानी को हिला गया। इस हमले से हमारे मुल्क का सम्मान लहूलुहान हुआ है। आतंकियों की गोलियां शरीर से कही ज्यादा अवचेतन में घाव कर गई हैं.... हम आप और सभी हिन्दुस्तानी इस खूनी होली से डरे, लेकिन एक कसक दिलों में आकार ले रही है.... सब्र का इम्तेहान आख़िर कब तक। कब तक ये देश अपने नागरिकों और हेमंत करकरे जैसे जाबांज अफसरों- जवानो कि लाशों को गिनती करता रहेगा... कब तक आतंकी मंसूबे देश के अलग अलग हिस्सों में फलीभूत होते रहेंगे। क्या इन हमलों के गहरे निहितार्थ हैं। मोटे तौर पर क्या हम पाकिस्तान बनने के करीब पहुँच गए हैं? ये बड़ा डर है।

विश्व परिदृश्य पर पाकिस्तान की साख और उसकी हालत किसी से छिपी नही है। सैलानी पकिस्तान से परहेज करते हैं। अब अलग अलग देशों की क्रिकेट टीमें भी पकिस्तान जाने से इनकार कर रही हैं। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने तो वह जाने से साफतौर से मना कर दिया। एक साल से वह कोई भी टीम नही गई है। टीम इंडिया भी पाकिस्तान जाने से हिचकिचा रही है... पी बी सी भारत से लगातार दौरे की गुहार लगा रहा है। लेकिन इस बीच हिन्दुस्तान में क्रिकेट लगातार परवान चढ़ता रहा। विश्व की सबसे ताकतवर संस्था बनी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड।

अब तक मुगालता रहा कि भले ही पड़ोस के हालात bekaaboo हो गए हों, लेकिन हम अपनी धरती पर सुरक्षित हैं। इस हमले ने तो इस भरोसे को ही रौंद कर रख दिया है। धमाकों का हवाला देकर इंग्लैंड टीम सीरीज बीच में ही छोड़कर चली गई... आगे के टेस्ट के लिए दुबारा आएगी या नही, कहा नही जा सकता। चैम्पियंस लीग भी दाव पर लग गया है। ऐसे में क्या ये कहा जा सकता है कि हमले के लिए जानबूझकर ये वक्त चुना गया। विश्व आर्थिक मंदी के बावजूद हिन्दुस्तान में बेशुमार पैसे उगलने वाले क्रिकेट को तबाह करने का इरादा तो नही था ? क्या इसके जरिये उन - उन आर्थिक स्रोतों पर हमला करने का मंसूबा तो नही है, जहाँ से भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया के कई देशों के लिए आँखों की चुभन बनी हुई है- भले ही आतंकियों की ऐसी mansha ना भी हो, लेकिन भारत को इन मोर्चों पर धक्का तो जरूर लगा है।

इससे भी बड़ा सवाल देश के तानेबाने को लेकर है। देश की सामाजिक व्यवस्था पर इन धमाकों से असरात को लेकर चौकस रहने की ख़ास जरूरत है। वह भी उस देश में जहाँ उपरवाले का इन्साफ- के नाम पर कुछ भी स्थापित कर देने का रवैया हो । ... अभी हमारे एक मित्र कह रहे थे के साध्वी प्रज्ञा सिंह के साथ बदसलूकी के कारण हेमंत करकरे को ऐसी मौत मिली। कुछ तो ये कहते सुने गए कि अफजल गुरुको फांसी नही दिए जाने का parinaam है ये। जबकि एकाध सज्जन का तर्क था कि वाजपेयी सरकार में तो मुर्गे खिलाकर आतंकवादियों को जहाज से सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया।

प्रधानमन्त्री बनने का इंतज़ार कर रहे आडवानी और उनकी भगवा मंडली की बातों की बाजीगरी अब और तेज़ होनी तय है। भले ही गृहमंत्री के तौर पर उनका अपना रेकोर्ड शिवराज पाटिल से बेहतर न हो। ...ये सब ऐसे समय में हो रहा है, जब हिंदू आतंकवाद की पहचान हो रही है। ...जब कई राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। जल्द ही लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। लिहाजा इस बात के खतरे कम नही हैं कि जवाबी कारवाई के नाम पर कुछ और मालेगाव धमाकों से दहल उठें। मुंबई धमाकों का हवाला देकर कोई और प्रज्ञा सिंह हिंदू nayak के रूप में न सामने आए। यानि धर्म के नाम पर उन्माद के सैलाब का खतरा ज्यादा गंभीर है। मजहबी कट्टरता का उन्माद जितनी तेजी से इस मुल्क में फैलेगा , इसके पकिस्तान बनने का डरावना सफर उतना ही आसान होगा। दरअसल, पकिस्तान की आज की स्थिति इसी फलसफे का नतीजा है और आतंकवादियों का इरादा भी यही है। ये हमला देश की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती कम, हमारे सामाजिक तानेबाने को तोड़ने और वैश्विक स्तर पर हमारी सुरक्षा की पोल पट्टी खोलने की साजिश अधिक है। ...इसलिए सुरक्षा प्रबंधों को चाक चौबंद करने की जरूरत तो है ही, हमें अपने चट्टानी संयम को टूटने नही देना है। आतंकी मंसूबों को नाकाम करने का शायद इससे बड़ा हथियार हो भी नही सकता।

Sunday, November 23, 2008

पान

कसम से, क्या चीज़ है पान। खुदा की बनाई सबसे बड़ी नेमत है पान। हरे हरे देसी पान का पत्ता, उसपर बढ़िया चूना कत्था और भीगी डली। भोला बत्तीस तो अब जल्दी मिलता नही, तुलसी या बाबा मिल जाता है। और हाँ, किमाम इलायची भी जरूर होना चाहिए। पंडित जी लपेट कर जैसे ही दें, तुरंत मुह मे जाकर सेटिंग करने लगता है। और ये कोई आज से नही। दरअसल ब्रम्हा पान खाते थे। गिलौरी मुह मे रखकर ही सरस्वती को पढाते थे। बिना पान के हमारे प्राइमरी के मास्टर तक नही पढाते। वो तो खैर ब्रम्हा थे। सुना है, नारद को पान की आदत ब्रम्हा से ही लगी। तभी तो एक बार नारद ने विष्णु वाजपेयी के घर जाकर उन्हें पान की महिमा बताई थी। उन्होंने बताया था, सारे देश को पान की आदत डलवा दो, राजकोषीय घाटा कम हो जाएगा। पान खाने के बाद तो सुरती भी बेकार हो जाती है। कचहरी मे वकील भी तो पान खाते हैं, बिजली ऑफिस मे बैठे एस डी ओ भी तो पान खाते हैं। जितने भी भगवान् हैं, सब पान खाते हैं , चाहे आर टी ओ भगवान् को देखिये या फिर चाहे एस डी एम् भगवान् को देखिये, सब पान खाते हैं। तो भइया, पान की महिमा अपरम्पार है। एक बार नारद ने पान खाकर मुरली मनोहर के गमले मे थूक दिया। फ़िर क्या था, वहा से पान की जो बेल निकली, आज तक मुरली वाले के होठो का कोना लाल किए रहती है। और मुरली वाले ने बंसी छोड़ कर पानदान अपना लिया, कांख मे दबाये रहते हैं हमेशा। और तो और, पूरा देश पान की जुगाली मे व्यस्त है, आलू के दाम बढे, सब चिल्लाए, टमाटर सूरज की तरह लाल हो गया, सब घर छोड़ कर बाहर आ गए, लेकिन पिछले एक साल मे पान की कीमतों मे तीन बार इजाफा हुआ, मजाल है की पान की गिलौरी ने किसी के मुह से आवाज निकलने दी हो। मुह की आवाज दबानी हो तो पान खिलाइये, मुह से सुंदर सुंदर राग निकालने हो तो पान खाइए। पान पान पान ..... बस पान।

शाखा कैसे लगाएँ

कुछ समय पहले हमारे मोहल्ले मे संघ शाखा लगनी शुरू हुई। पहले एक दाढ़ी वाले बुजुर्ग सज्जन दिखे, फिर तो सात-आठ लोग आर्मः-दक्शः करते दिखने लगे। संयोग से इनमे कुछ लोग वही हैं जिनके साथ मैं वोलिबाल खेलता हूँ। एक दिन बुजुर्ग ने मेरी तरफ ऊँगली दिखाकर कहा कि मेरी तो इच्छा है कि किसी तरह ये काली शर्ट वाले भाई साहब शाखा मे आयें, सुबह उठने मे परेशानी हो तो हम लोग उठा देंगे । मैंने कहा कि मैं तो साढ़े चार बजे भोर मे ही उठ जाता हूँ । बोले आइये तो थोड़ी कसरत हो जायेगी। मैंने कहा, मैं कसरत भी टहलते वक्त ही कर लेता हूँ। थोड़ी झल्लाहट के साथ उन्होने कहा कि कम से कम प्रार्थना तो साथ मे कर ही सकते हैं। मैंने कहा कि प्रार्थना भी कोई साथ मे करने की चीज है? इसके बाद वे खुद को दूसरे लोगों से बात करने मे व्यस्त दिखाने लगे और मुझमे रूचि लेना बंद कर दिया।यह बात मैंने अपने एक वरिष्ठ अखबारी साथी को बताई तो उन्होने एक पुरानी खबर और उसे दिए गए शीर्षक का किस्सा मुझे सुनाया। खबर दिल्ली की ही थी । पंजाबीबाग इलाक़े मे एक संघ पदाधिकारी किसी बालक के साथ रँगे हाथ पकड़े गए। मोहल्ले के लोगों ने बाहर से दरवाजा बंद कर दिया और काफी नाटक के बाद पुलिस के दखल से मामला रफा-दफा हुआ। स्ट्रिन्गेर ने खबर भेज दी लेकिन डेस्क पर हेडिंग लगाने वालों कि आफत आ गयी । क्या किया जाये कि बात भी आ जाये और शालीनता भी बची रहे। आखिरकार चीफ सब ने हथौड़े की तरह हेडिंग मारी ' शाखा लगाते पकडे गए संघ प्रचारक '। इसके बाद से अखबार मे शाखा लगाने को लेकर कोई कन्फ्यूजन नही पैदा हुआ।

नोट - ये पहलु से लिया गया है...साभार है

मुम्बई से लौटते उदास चेहरों की दास्ताँ

प्रभात
बीस साल हुए जब प्रभात बरेली मे अमर उजाला के दफ्तर गए फोटोग्राफर बनने और बन गए अखबारनवीस । बरेली संस्करण मे सम्पादकीय के सभी विभागों मे काम किया, रिपोर्टिंग से लेकर रविवारीय पन्ने के संपादन तक। लेकिन, फोटोग्राफी की लत थी कि बढती ही गई । जितना घूमा या फिर लिखा, उसके मूल मे वजह तसवीरें उतारना ही रहा। आजकल दैनिक जागरण के नए अखबार आई नेक्स्ट के लिए काम कर रहे हैं । नया ठौर के लिए उन्होने ये लेख अपनी किताब "आज के दौर की अखबारनवीसी " से दिया है ।

मुम्बई से आने वाली रेलगाड़ियों मे इन दिनों फैज़ाबादियों की तादाद बढ़ गई है। गर्मियों की शुरुआत के साथ पूर्वांचल लौटने वाले यों भी ज्यादा होते हैं। ब्याह - गौने के दिन जो शुरू होने वाले हैं। मगर इन चेहरों पर उत्साह का कोई उल्लास नही, सफ़र की थकान भी नही, सब कुछ छीन लिए जाने की उदासी दिखती है। मुम्बई पुलिस इन दिनों नाईट क्लबों -बियर बार को लेकर अचानक सख्त हो गई है। रोज़ रोज़ छापे , गिरफ्तारियां , नए नए कायदे-निर्देश। इन बंधनों ने उनसे उनकी रोज़ी छीन ली। तारून के बेलगरा, तकमीनगंज,मामगंज, और रसूलाबाद जैसे इलाकों से मुम्बई गए तमाम कुनबे लॉट आये हैं। मुम्बई के नई 'नैतिकता' के मारे इंसानी चहरे , नाचने गाने के बहाने सनातन इंसानी फितरत मे अपनी बेहतरी तलाशते चिचुक गए चहरे। हाथ, गले और उँगलियों की सुनहरी चमक उनकी पेशानी की रेखाओं पर कोई असर नही डालती। कल क्या होगा, किसी को अंदाज़ नही। अब देखा जाएगा दो चार महीने बाद।बेलगरा बाज़ार से आगे जाती सड़क के किनारे खडे सेमल के उंचे पेड़ों से उतरकर आँचल फैलाती शाम , साईकिल के कैरियर पर बैठी वह युवती एक झटके से उतरकर घर के सामने पडी चारपाई पर बैठ जाती है। सवालिया निगाहों से ताकती है और फिर दूसरी तरफ मुह करके पान की पीक थूकती है। उस घर को देखकर एकबारगी किसी को अंदाज़ नही होगा कि मुम्बई की चकाचौंध भरी दुनिया से भी इसका कोई नाता हो सकता है। मगर सच तो यही है। माया मुम्बई मे रहती हैं अपनी बेटी खुशबु के साथ। गहनों से लदी स्थूलकाय महिला मीना हैं, उनकी बहन। थोड़े संकोच के साथ शुरू हुई पूरी बातचीत मे मुम्बई के कारोबार की असलियत अप्रत्यक्ष रुप से बनी रही। शुरुआत की माया की बुआ रामवती ने जो एक जमाने मे थियेटर कम्पनी मे अभिनय करती और गाती भी थी। बनारस मे बाकायदा उस्ताद शुकरुल्ला से तालीम और फिर थियेटर की बाइज़्ज़त नौकरी। मगर तब का ज़माना और था, रियासतें थीं , जमींदार थे सो ऎसी तंगी नही थी। माया मुम्बई मे हाजी अली के पास एक बियर बार मे काम करती थी। काम यानी डांस। पिछले महीने किसी होटल मे किसी नेता को पीट दिया गया और फिर तो ख़ूब हंगामा हुआ। कार्निवल बार, जहाँ वह काम करती थी, बंद हो गया। काम के बारे मे पूछने पर बताती हैं कि नाच गाना और क्या। कभी किसी ने पूछ लिया कि जूस पीने चलोगी तो चले जाते हैं। वहीँ हज़ार पांच सौ दे देता है। फिर होटल मे बुलाता है। यही है कुल जिंदगी। फारस रोड पर चिक्कलबाड़ा की एक चाल, जिसमे एक ही कमरे मे बाथरूम और रसोई सब कुछ और बार की जगमग रातें। यहाँ लौट आने पर मुम्बई बहुत याद आता है उन्हें। क्या मुम्बई की सुबह ! 'कहॉ का सवेरा बाबू। रात भर तो हाड तोड़ते -जागते हैं , कब सुबह हो जाती है पता ही नही चलता। फिर लौटकर दिन भर सोते हैं' बताती हैं माया। उन्हें अफ़सोस है कि अपनी बेटी के लिए कुछ नही कर पाई । फिरोजी रंग की पोशाक मे घर के अन्दर बाहर घूमती वह किशोरी भी उनके साथ बार मे जाने लगी थी। हाव भाव मे ग्राम्य परिवेश से अलग होने की अभिजात किस्म की झलक। पुलिस ने कह दिया है कि २१ साल से कम की युवतियाँ अब बार मे डांस नही करेंगी। सो उसका आसरा भी गया। यों और करे भी तो क्या, उसे पढ लिखा नही पाई। बेटा है जो यहीं रहकर पढता है।बताती हैं कि एक भाई को पढ़ाया लिखाया , दूसरे भाई-भाभी और बहन को भी देखती है। ये सब यहीं गाँव मे ही रहते हैं। कई बार मन करता है कि कुछ और जमीन खरीदकर यहीं गाँव मे ही रह जाएँ मगर हो नही पाता। यह मुम्बई की कशिश है जो बार बार खींच ले जाती है। माया को पछतावा है , मुम्बई से लौट आने का नही, इस पेशे मे आने का। कहती हैं कि अब न तो पैसा है और ना ही इज़्ज़त रह गई है इस पेशे मे। फिर भी यही क्यों ! माया का जवाब बाक़ी सारे सवालो को खामोश कर देता है। ' इस पेशे मे सबको तलाश है एक एसे शख्स की जो अपना लेगा, ढ़ेर सारा पैसा देगा और अपना नाम भी। इज़्ज़त की इसी जिंदगी की तलाश मे जाने कितनी जिंदगियां गर्क हो जाती हैं। मगर आस है कि पीछा ही नही छोडती।' यह सेलयुलायड का 'चांदनी बार' नही, जिंदगी है, जहाँ विडम्बनाएँ हैं , विद्रूपता है और विरोधाभास ऐसे कि फिल्मी कहानी फिस्स हो जाए ।

Saturday, November 22, 2008