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Wednesday, December 3, 2008

सुन लें नकवी साहब !

सुन रहे हैं नकवी साहब.... प्रीति जिंटा क्या बोल रही है। कह रही है कि वो नही डरती नकवी साहबों से। वो तो ताज हमले के ख़िलाफ़ मुंबई में हुए प्रदर्शन में बाकायदा लिपस्टिक लगा कर शामिल हुई.... ( कैमरे के नजदीक चेहरा लाकर अपना मेकप भी दिखाया। शायद आपको चिढाने का इरादा रहा हो।) और सत्ता के ख़िलाफ़ नारे भी सरगर्म कर रही हैं प्रीति। यह सब करने के लिए उन्होंने आप जैसे लोकतंत्र के किसी प्रमाणिक रहनुमा से इजाज़त लेने की भी जरुरत नही समझी। ....ताज्जुब है, हिमाकत देखिये, यह सब प्रीति जिंटा स्वीकार भी कर रही हैं.... बाकायदा ऑन एयर।
नही प्रीति....बचपने की बात मत करो। ये फिल्मी परदा नही है.... जहाँ स्क्रिप्ट राइटर या निर्देशक की चलेगी। ये असली जिंदगी है। इसमे भी हिंदुस्तान। यहाँ सब सियासत तय करती है। तुम्हारी खुशी और tumhare गम से लेकर तुम क्या पहनोगी ....क्या बोलोगी। बोलते समय कितना मुह खोलोगी, जो कम से कम लोकतंत्र के दायरे में होगा। ज्यादा मुह खुलने पर नकवी साहबों के सियासत तुम्हे जमुहूरियत विरोधी करार दे सकती है... लिपस्टिक की लाली देख लेने पर तुम्हारे विरोध को प्रायोजित ठहराया जा सकता है। विरोध प्रदर्शन के दौरान जींस पहनना तुम्हे भारी पड़ सकता है.... पश्चिम परस्त बताकर तुम्हारे विरोध को ड्रामा बताये जाने का खतरा है। तुम्हे नकवी साहब और उनकी नस्ल के तमाम नेताओं से भय खाना चाहिए। तुम्हारे जैसे लोगों की आवाज़ अवाम का प्रतिनिधि स्वर नही है। ये हक सिर्फ़ नकवी साहबों का है। केवल इतना भर समझ लो और समझदार हो जाओ।
हाँ तो नकवी साहब इतना बता रहे हैं, क्या लोकतंत्र पर वाकई इतना खतरा है? सिर्फ़ नकवी ही क्यों मिडिया के भी विशेषज्ञ इस बहद में मग्शूल हैं। ताज पर आतंकी हमले के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन और नेता विरोधी माहौल को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया जा रहा है.... पकिस्तान मुर्दाबाद की बजाय नेता मुर्दाबाद के नारे उछालना ग़लत है। ये बर्ताव ऐसा है जो लोकतंत्र को कमजोर और अलगाववाद को मजबूत करेगे। - ये नकवी साहबों का डर है।
गौर से देखें .... लोगों का गुस्सा लोकतंत्र के ख़िलाफ़ नही है। संविधान में उनकी आस्था जरा भी डावांडोल नही हुई है। पोलिटिकल सिस्टम से उन्हें एतराज नही है। लोकतंत्र में अदद नेताओं की अनिवार्यता से उनका इनकार भी नही है। उनका गुस्सा अच्युतानंदानों से है. शिवराज पटिलों से है। देशमुख जैसे उन नेताओं से है जो ताज हमले के बाद अपने बेटे और मित्रों के साथ इस अंदाज़ में वहां पहुचे जैसे पिकनिक स्पॉट पर आए हों। नकवी साहबों को मुहैया होने वाले सुरक्षा के भरी तामझाम को लेकर लोग भड़के हुए हैं। यानि गुस्सा नेताओं के चाल चरित्र को लेकर है।
इस पूरे प्रकरण के एक सकारात्मक पहलु पर गौर किया जन चाहिए। मराठी-बिहारी, अगडे-पिछडे और उत्तर दक्षिण जैसे खांचो में बँटे लोगो को इस आतंकी हमले ने एक जुट होने का मौका भी दिया है। मिडिया हाउसेस में इस घटना को लेकर आए एस एम् एस देखिये। या अलग अलग शहरों के लोगों की राय जानिए। सब इसे मुंबई की बजाय देश पर हमला मान रहे हैं। कोल्कता हो या लाखनाऊ सब जगह इसी जज्बे का संचार हुआ है। ऐसे हालात में इस पर गौर किया जाना थोड़ा हताशा देने वाला है कि मुंबई की घटना ने सचिन की नींद उदा दी.... लता मंगेशकर ३०० बार रोई, लेकिन राज प्रकरण पर ये हस्तियां खामोश क्यों रहीं । - ये एक बचकानी सोच है । भावनाओं को आंकडों में देखने की कोशिश है। उसका औसत निकालने का प्रयास है। पूरे प्रकरण के बाद लोग गुस्से को तात्कालिक प्रतिक्रिया की रूप में नही लेना चाहिए। ना ही इसे लोकतंत्र विरोधी संकेत माना जाना चाहिए। क्या पता इसी में हमारे सियासी चेहरे को बदलने की ताकत छिपी हो।

5 comments:

ab inconvenienti said...

मोमबत्ती छाप प्रदर्शन करने वाले, जोगिंग करके आतंक का खात्मा करने वाले, अमीर-अघाये बम्बइया हस्तियां और फ़िल्म स्टार. नकवी तो ग़लत कह ही गए, खामियाजा भी भुगत रहे हैं. खैर,
पर क्या इन हीरोइनों ने ज़िन्दगी में कभी पोलिंग बूथ देखा है? ८०% को तो यह भी पता नहीं होगा की देश का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कौन है, अमेरिका में किस पार्टी की सरकार है या अरुणाचल प्रदेश नक्शे में कहाँ है.

राहुल said...

अब भाई , आपने बिल्कुल मार्के की बात उठाई है कि इन लोगों ने पोलिंग बूथ नही देखा है, ये लोग अमीर, अघाए और खाए पिए लोग हैं. एकदम सही बात. लेकिन भाई मेरे, इस देश मे कितने लोग वोट डालते हैं? ये जो हमारी सरकार है, कितनो लोगों के वोट से बनती है? मेरे ख्याल से ये बात आप अच्छी तरह से जानते होंगे. जो भी वोट नही डालता वो इस देश मे जीने कॅया हक नही खो देता, उससे संविधान के मूलभूत अधिकार नही छीन लिए जाते. अपनी सुरक्षा की माँग करना हर नागरिक का अधिकार है, बिल्कुल वैसे ही जैसे कि वोट देने का अधिकार है. और इस अधिकार पर उंगली उठाना सीधे सीधे संविधान की आत्मा को चोट पहुचना है. नक़वी ने वही किया है. इसके अलावा नक़वी ने स्त्रियों का अपमान भी तो किया है. अपनी मर्दानगी भारी थोथी जवानी के जोश मे आकर वह भारतीय मर्यादा तक भूल गये कि स्त्रियों के साथ सम्मान से पेश आना चाहिए.

ab inconvenienti said...

लिपस्टिक पाउडर लगाने वाली महिलाएं और सूटेड बूटेड लोग........

या महिलाओं के साथ पुरूष वर्ग का भी तो अपमान है, पर सूट बूट वाला भाग आपको नज़र न आया? हर महिला का अपमान तो किया नहीं सिर्फ़ टिपटॉप और मेकअप वाली ....... ये अमीर, जब ख़ुद पर आई तो दहल गए, ले मोमबत्ती हाथों में निकल पडेकहाँ रहते है जब हैदराबाद और राजस्थान में लोग मरते हैं?

और जहाँ तक संविधान द्वारा दिया जाने वाला जीने का अधिकार है, वह तो इनके पास सबसे ज़्यादा है. मरने को तो केवल चौराहों फुटपाथों पर चलने वाला ही है. शोभा डे ने अपने वर्ग और सोसाइटी के पक्ष में कह ही दिया है, "आख़िर हम लोग सबसे ज़्यादा कर भरते हैं, हमारी सुरक्षा का सबसे बेहतर इंतजाम कराया जाना चाहिए".

और कितने मोमबत्ती वालों ने यह शपथ ली की हम अपने बच्चों को सेना ज्वाइन करवाएंगे या उन्हें कमांडो बन कर आतंकवाद का खत्म करता देखना चाहेंगे? ये उथले ओछे लोग.

Bhuwan said...

अब ऐसा है की अगर कपडों और वेश भूषा ही लोगों की मानसिकता का आइना होता तो फ़िर बात क्या होती जनाब... हम ऊँची सोसाइटी में रहने वाले लिपस्टिक और मेक अप करने वाले लोगों के विरोध को इस वजह से खारिज नही कर सकते... जहा तक वेश भूषा की बात है तो नेता भी खादी और पुलिस वाले खाकी पहनते है..लेकिन मचाते तो गंध ही हैं न...

राहुल said...

अब भाई, बात आपकी फिर से सही है की ये लोग ओछे हैं, उथले हैं या जो कुछ भी हैं. सेना मे दाखिले की बात है तो मैं भी शर्त लगाकर कह सकता हू की यही आप जो उनकी तरफ उंगली उठा रहे हैं, चार उंगलियाँ आपकी तरफ भी उठ रही हैं, यक़ीनन आप सेना मे नही हैं और नेया ही आपके बच्चे. जीतने अधिकार आपको हैं, उतने ही मुझे हैं और उतने ही इन लोगों को भी. सतही बातों मे वक्त मत जया कीजिए. कुछ रचनात्मक कीजिए.