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Saturday, December 6, 2008

मेराडोना, बंगाली संदेस और सबका हीरो

अद्भुत..अविस्मर्णीय ...बेजोड़। शायद कुछ ऐसे ही अहसास होंगे कोलकाता के उन हजारों लोगों के जो मेराडोना से रूबरू हुए । हिंदुस्तान की धरती पर फुटबॉल का जादूगर। उत्सवधर्मी देश में फुटबॉल का देवता डिएगो मेराडोना। फुटबॉल के लिए जुनूनी कोलकाता के दर्शकों के बीच मेराडोना। इतिहास के पन्नों में दर्ज एक सुनहरा नाम। एक ऐसी शख़्सियत, जिसे देख-देखकर भारत सहित दुनिया के कई देशों की एक नस्ल जवान हुई। उसी पीढ़ी ने डिएगो को स्थूलकाय काया के साथ भी देखा था... ड्रग्स के कारन बीमार, बेजार और हताश दिखने वाला एक शख्स, लेकिन डिएगो फ़िर खड़ा हुआ। जिंदगी के मैदान में फ़िर से एक बेजोड़ फाइटर की तरह कूदा। लोगों को अपने हीरो की बदशक्ल तस्वीर पर थोडी निराशा जरूर हुई थी लेकिन डिएगो से प्यार कभी कम नहीं हुआ। शनिवार को उनके कोलकाता के नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचने पर प्रशंसकों का हुजूम स्वागत के लिए तैयार था...कई तो घंटों इंतजार के बाद अपने हीरो का दीदार कर रहे थे.. मैराडोना हैरान थे...लोग उन्हें अपना पसंदीदा बंगाली रोसोगुल्ला खिलाना चाहते थे। मगर ये संभव नहीं था।...लोग अर्जेटीना की जर्सी पहनकर डिएगो को लेकर अपने सम्मान को जाहिर कर रहे थे। अपने देश से हजारों किलोमीटर दूर इतनी बड़ी संख्या में अपने प्रशंसकों का ये मिठास पाकर डिएगो गदगद थे। उन्हें ये सहज विश्वास नहीं हो रहा था कि किसी ग़ैर मुल्क़ में लोगों का इतना प्यार हासिल होगा। ...मगर हिंदुस्तानियों के लिए इसमें हैरानी का कोई तत्व नहीं था। ये देश सरहद और भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर भी अपने हीरो चुन लेता है...और उसकी दीवानगी पर इसका वास्तव में कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका हीरो दुनिया के किस हिस्से का है। ये तो खैर, डिएगो हैं। सेरेना विलियम्स भले सचिन तेंदुलकर को नहीं जानती हों मगर ख़ुद सेरेना के प्रशंसकों की हिन्दुस्तान में कमी नही। अपने दौर में पेले , मोहम्मद अली, जोन मेकैनरो, ब्रूस ली , स्टेफी ग्राफ जैसे अनगिनत नाम हैं जिनके हिंदुस्तान में लाखों प्रशंसक हैं। कट्टर प्रतिद्वंद्वी होते हुए भी पाकिस्तानी क्रिकेटर वसीम अकरम हिंदुस्तानी क्रिकेट प्रेमियों के बीच कम मक़बूल नहीं हैं। ब्रायर लारा को खेलते हुए देखने के लिए भारत में उनके प्रशंसक- भगवान से विनती कर वेस्ट इंडीज के शुरुआती दो विकेट जल्द-से-जल्द गिरवा देते थे। क्योंकि लारा थर्ड डाउन बल्लेबाजी के लिए आते थे...और अगर जल्दी आउट हो जाएं तो भारत वेस्टइंडीज पारी के जल्द-से-जल्द सिमट जाने की प्रार्थना करते थे।...ये कितना अजीब है। लारा भारत के खिलाफ खेल रहे होते थे और भारतीय दर्शक अपनी टीम के ही खिलाफ लारा का शतक देखने की भगवान से विनती करते थे। भारत के ख़िलाफ़ लारा अगर अच्छा खेले तो बेशक हमारे जैसे लाखों प्रशंसकों की शायद दुआ उनके साथ थी। दरअसल ये भारतीय दर्शकों का वो जज़्बा है जो दुनिया के किसी अन्य हिस्से में देखने को मिले। यही भारतीयता भी है...जो हमें कुदरती तौर पर स्वीकार्यता का संस्कार देता है।...क्या हुआ जो डिएगो अर्जेटीना जैसे नामालूम देश से हैं। क्या फर्क पड़ता है कि डिएगो कभी हिंदुस्तान के साथ भी न खेले हों।...क्या अंतर पड़ता है कि डिएगो उनकी जुबान नहीं समझते हों....इन सबके बावजूद लोगों से मिल रही मोहब्बत को देखकर डिएगो हैरान हैं। वाकई, हममे से कोई हैरान नहीं है...क्योंकि अपने हीरो को लेकर दीवानगी बिल्कुल जानी-पहचानी है।...अपने समय के नायक को एकबार फिर सलाम।

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