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Saturday, December 13, 2008

....वैचारिक गिरोहबंदी है ये

गंगेश गुंजन न केवल पत्रकार है बल्कि अख़बार और टीवी पत्रकारिता, दोनों में ही उनकी खासी दखल है।...एक लंबा तजुर्बा है। हाल के परिदृश्य पर टिपण्णी करते हुए उन्होंने वैचारिक गिरोहबंदी की पहचान की। उनके गुस्से को समझा जा सकता है-

ग्लोबल युग ने जितनी तेजी से संस्कार, मूल्यों और नैतिकता को लील लिया है, उससे कम तेज गति से पत्रकारिता से मानवीय मूल्य और राष्ट्रीय-सामाजिक सरोकार लुप्त नहीं हुए हैं......लोकतंत्र का मतलब विचारों को व्यक्त करने की आजादी तो है लेकिन इसका मतलब राष्ट्र की अवधारणा को ही ध्वस्त करना नहीं है.....पिछले कई अवसरों से लग रहा है कि घटनाओं पर जो लेख-विचार अखबारों, पत्रिकाओं और टीवी पर आ रहे हैं वो गिरोहबंदी ज्यादा है....ये पेज थ्री सेलेब्रेटीज की गिरोहबंदी है, ये पत्रकारिता में उंचे नाम बन चुके या मान लिए गए लोगों की गिरोहबंदी है.....जो एक खास तरह के विचार थोपने पर आमादा हैं....इन विचारों में बड़े शहरों की बौद्धिकता भरी बातें तो होती हैं लेकिन आम हिंदुस्तानी की संवेदनाएं नहीं होतीं.......माफ कीजिए लेकिन मुंबई ब्लास्ट पर भी ऐसी ही कोशिश शुरू हुई थी लेकिन इस बार आम आदमी किसी के विचार सुनना नहीं चाहता था और उसने बिना किसी की परवाह किए अपने स्तर पर विरोध करने का अलग रास्ता तय कर लिया....पहली बार देश के अंदर सिविल डिप्लोमेसी के अलंबरदारों को ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ी लोगों ने खुद ही अपना रास्ता तय कर लिया......इस बार के आक्रोश से अगर नेता स्तब्ध रहे तो बुद्धिजीवियों का गिरोह भी कम हैरानी में नहीं...... अप्रासंगिक हो चुके उनके विचार दुनिया के सामने उजागर न हो जाएं इसके लिए उन्होंने षडयंत्र रचा और विरोध की दिशा भले ही तय न कर पाएं हों विरोध की भाषा उन्होंने जरूर तय कर दी....दरअसल मुंबई ब्लास्ट के बाद लोगों का गुस्सा सिस्टम की देखरेख कर रहे लोगों के खिलाफ था जिसे बड़ी चालाकी से उन्होंने पूरे सिस्टम के खिलाफ ही बता दिया........और थोड़ी देर के लिए ही सही ऐसा लगा कि मुंबई ब्लास्ट के खिलाफ सड़क पर निकले लोग लोकतंत्र विराधी हैं.....मुख्तार अब्बास नकवी दरअसल यही समझकर बौखला गए थे....मगर उनके आरोपों को जवाब मुंबई ब्लास्ट के बाद हुए विधानसभा चुनावों के दौरान ही मिल गया था जब मतदान के दिन बड़ी संख्या में लोग निकले और उन्होंने ये जता दिया कि लोकतंत्र पर से उनका विश्वास कम नहीं हुआ है....मुंबई ब्लास्ट के बाद का विरोध दरअसल सिविल प्रोटेस्ट का अनूठा उदाहरण है जो बताता है कि जिदा कौम हैं हम,सब कुछ सहने के लिए नहीं बने.....इस बार सड़कों पर निकले प्रहरी बुद्धिजीवियों की व्याख्या में भले ही उलझ गए हों लेकिन मेरा मानना है कि जल्द ही हम सब उठ खड़े होंगे और अपनी भाषा में अपनी तरह से अपना विरोध जताएंगे.....जो सिर्फ संवेदनाओं से गाइड होगा....भारी भरकम व्याख्या या डिपलोमेटिक समझ से नहीं ......

3 comments:

Anonymous said...

ye baat ab samajh me aaye

MANVINDER BHIMBER said...

संजीव ,
तुम्हारा ब्लॉग देख कर अच्छा लगा साथ ही केंट बोर्ड और आर्मी की बीट भी याद आ गई..... वो दिन बहुत अच्छे दिन थे....
गंगेश भाई को मेरी भी याद दिलाना .....मोनिका और कुहू को भी .......
अपना फोन नम्बर भी देना....मेरे नम्बर वही है.....

cmpershad said...

इस में कोई शक नहीं कि मुम्बई की जनता अन्य क्षेत्रों से अधिक कान्शियस है अपने कर्तव्यों और दायित्वों को लेकर। इसका उदाहरण है रोज़मर्रा के जीवन में उनका डिसिप्लिन। इसीलिए वहां की जनता ने अपना आक्रोश बहुत से आतंकी दंगों को झेलने के बाद अब जता दिया है कि वे नेताओं के झूठे आश्वासनों पर अब भरोसा नहीं करेगी और कुछ ठोस कदम ही यह रोष रोक सकते हैं। इसी का परिणाम था राष्ट्र के गृहमंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री का जाना।