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Wednesday, December 17, 2008

...ये मजाक का वक्त नही है अभिज्ञान

नेताओं की ज़ुबान फ़िसल जाना कोई नई बात नहीं है...उनकी ज़बान ही बनी है शायद फ़िसलने के लिए। सत्ता तंत्र शायद हमॆशा नींद में होता है इसलिए हम लिखते या बोलते हैं कि फ़लां मामले में सत्ता तंत्र की नींद टूटी। सत्ता तंत्र की बेफ़िक्री का ये अंदाज़ नया नहीं है। न ही अंतुले साहब जैसों का बेपरवाह रवैया। इसमें कुछ भी नया नहीं है। ये सब लोगों की नाउम्मीदी की स्थापित मूर्तियां हैं। लेकिन मुंबई बम धमाकों के बाद इसबात की बहस जरूर बनती है कि क्या मीडिया की दृष्टि भी बेरौनक हो गई है? हां, ये मीडिया के ख़िलाफ किसी मुहिम का हिस्सा नहीं है, ये भरोसा जरूर दिलाना चाहूंगा।एनडीटीवी को मैं अबतक सबसे संज़ीदा न्यूज़ चैनल इसलिए मानता रहा हूं क्योंकि अपनी छवि को लेकर सचेत रहने वाले कुछेक चैनलों में उसकी गिनती होती है। ज़ाहिर है कि चैनल को इसके लिए कड़ी मेहनत करनी होती है। इसी चैनल के एंकर अभिज्ञान को अन्य दर्शकों की तरह मैं भी पसंद करता रहा हूं...एक सजग पत्रकार होने के नाट लेकिन मुंबई धमाकों ने मेरा दिल तोड़ दिया...एनडीटीवी और अभिज्ञान, दोनों ने। आतंकी हमले के दौरान मैने एनडीटीवी पर ही बने रहने की हरचंद कोशिश की। लेकिन अभिज्ञान की एक लाइन ने जैसे मुझे सनाके में डाल दिया...दिल के अंदर टूटे भरोसे के एक-एक कांच को मैनें महसूस किया। उन्होंने होटल ताज के सामने से लाइव के दौरान मुझ जैसे तमाम कमअक्ल दर्शकों को कहा कि यही वो जगह है जहां समुंदर की ठंडी-ठंडी लहरें महसूस की जा सकती हैं...यहां आम दिनों में लोगों का हुजूम लगा रहता है। अभिज्ञान का चेहरा ऐसा था जैसे गोवा में जाकर पर्यटकों के लिए किसी प्रोग्राम की एंकरिंग कर रहे हों।...ईमानदारी से, उस वक्त कहा गया उनका एक-एक शब्द, उनका लहजा बेहद विद्रूप, अश्लील और हैरानी का सबब था। अभिज्ञान उस ख़ौफनाक मंजर में ये सब बातें कह और सुना रहे थे जब होटल ताज़ से रह-रहकर क्षत-विक्षत लाशें निकल रही थीं। फिजां में दहशत की ख़ौफनाक हवा चल रही थी। देश जानना चाहता था कि वहां कितने आतंकी हैं...दहशतगर्दों ने कितने मासूमों की जान ले ली। लेकिन अभिज्ञान ताज़ किनारे बहने वाली ठंडी बयार का आंकड़ा पेश कर रहे थे।...ये बौद्धिक जुर्म है अभिज्ञान।...उस समय मुंबई सेंट्रल वाला कार्यक्रम चल रहा था और अभिज्ञान के इसी मुदित अंदाज की वज़ह से स्टूडियो से पूरा परिदृश्य डायवर्ट कर नरीमन हाउस ले जाया गया।...यहां मेरा भरोसा टूटा।अकेले अभिज्ञान ही इसके ग़ुनाहग़ार नहीं हैं। दिल्ली में धमाके हुए तो न्यूज़ चैनल्स के स्टूडियो में भी जैसे जलजला आ गया। सबने लाइव से लेकर एक-एक चीज़ पर खोजी रिपोर्ट दी। एक चैनल ने कहा कि इंडिया गेट पर एक ऐसा बच्चा मिला है जिसके पेट पर आतंकियों ने बम बांध रखा है...दूसरे चैनलों ने भी उसकी पड़ताल किए बिना फालो कर लिया...कुछ देर बाद ही उस चैनल ने अपनी ख़बर का खंडन तो कर दिया लेकिन जिन चैनलों ने उसे फालो किया उन्होंने अपने दर्शकों से माफी मांगे बिना चुपके से ख़बर उतार दी। क्या है हमारी खबरों की प्रमाणिकता पर सवाल नहीं है? और हां, इसी ख़बर के दौरान दूसरे दिन एक जाने-माने चैनल के कद्दावर प्राइम टाइम एंकर से लेकर जाने क्या-क्या, उन्होंने बाकायदा स्टूडियो में साइकिल मंगवाकर ये बताने की कोशिश की कि ऐसी ही साइकिल में बम बांधकर रखे गए थे। ...भाई कोई इस ज़नाब को बताएगा कि साइकिल दुनिया भर में एक जैसी ही होती है...आतंकी साइकिल नहीं बल्कि उसपर सवार होने वालों की मंशा होती है। दरअसल, कुछ ख़ास, कुछ अलग दिखाने की मंशा ऐसी ही बेवकूफ़ाना हरक़तों में तब्दील हो जाती है।कुछ ऐसा ही बिहार के कोसी में आई बाढ़ के दौरान भी देखने को मिला। हालांकि शुरुआती दिनों में न्यूज चैनलों की इसमें ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखी। ....डाउन मार्केट ख़बर रही होगी उनके लिए। बाद में जब चैतन्य हुए तो बाढ़ से संबंधित अच्छी ख़बरें भी दिखाई। लेकिन एक न्यूज चैनल ने बाढ़ पर ख़ास दिखाने के चक्कर में स्पेशल रिपोर्ट दी....क्रोमा लगाया-कोसी का क़हर...एक खूबसूरत सी न्यूज एंकर नाव के एक ढांचे में सवार होकर बाढ़ की तबाही को बयान कर रही थी।...एंकर बाकायदा मेकअप और टचअप में। समझ सकते हैं कि तबाही की जानकारी के लिए इच्छुक लोगों के दिल पर ये खूबसूरत एंकर कहर ढा रही थी...मित्रों, इसीलिए ये मशविरा देना पड़ रहा है कि - ज़रा सोचिये।

3 comments:

Bhuwan said...

थोड़े पुराने..लेकिन बेहद गंभीर और संवेदनशील विषय पर अच्छी पोस्ट.

Dhirendra/Mahesh/Shrikant said...

Dear Sanjiv, this is just to let you know that I have seen your blog, though cursorily. As soon as I get some time I shall read it and react. Wish you goodluck.
Shrikant

Anonymous said...

this was my first time that i have visited you article and it is awesome ..