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Tuesday, December 9, 2008

चौंक गई पार्टिया, पर जनादेश दुरुस्त

नीरज जाने-माने पत्रकार हैं। ये अलग बात है कि उनके जाने-माने को इतना प्रचारित नहीं किया गया है। निजी तौर पर मुझे मालूम है कि नीरज एक संजीदा पत्रकार हैं इसलिए हाल में हुए विधानसभा चुनाव के बारे में उनकी टिप्पणी को पब्लिश किया जा रहा है।
राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आ चुके हैं। इसे सत्ता का सेमीफाइनल कहे या sighasan का semefainal...या जो भी नाम देना चाहें दे सकते हैं। या जिस भी नजरिये से देखना चाहें, देख सकते हैं...पर इतना जरूर है कि इन चुनावी नतीजों ने जितना बीजेपी ने चौंकाया है...उतना ही कांग्रेस को भी। पहले बीजेपी की बात करें तो पार्टी ये तय मानकर चल रही थी कि दिल्ली का ताज तो मिलेगा ही मिलेगा...पार्टी ने पूरे भरोसे से अपने वरिष्ठ नेता वीके मल्होत्रा को सीएम पद का उम्मीदवार बनाया...महंगाई, भ्रष्टाचारर और आतंकवाद को मुद्दा बनाया गया...और पार्टी ने नारा दिया महंगी पड़ी कांग्रेस...ऐन मतदान से पहले मुंबई एपिसोड ने पार्टी मानो मुराद ही पूरी कर दी...लेकिन जनादेश ने दिल्ली में कमल के खिलने का कोई मौका नहीं छोड़ा...राजस्थान का जो जनादेश आया है, मुझे नहीं लगता कि बीजेपी को भी इससे बेहतर परिणाम की उम्मीद रही होगी...क्योंकि महारानी ने रियासत समझकर शासन चलाया, मानों लोकतांत्रिक सरकार नहीं, राजगद्दी मिल गई हो...जिसकी वो स्वभाविक वारिस हों। मध्यप्रदेश में कमल फिर से विपक्ष सिर-फुटौव्वल में मगन रहा...तो साध्वी उमा बीजेपी से लड़ रही ..और कहें तो नहीं भी लड़ रहीं थी। जैसे बीजेपी की ए टीम और बी टीम नुमाइश मैच खेल रही हो...फायदे में ए टीम ही ही। छत्तीसगढ़ की बात करें तो डाक्टर से नेता बने, रमन सिंह ने शासन की सेहत का ध्यान रखा।...और दो रुपये किलो पर चावल देकर जनता की चिंता को भी समझा। ऊपर से नकारा विपक्ष ने भी बीजेपी की पूरी मदद की। पर कांग्रेस की बात करें तो जनादेश आने के बाद भले ही पार्टी नेताओं के चेहरे खिले हुए हों मगर मुंबई एपिसोड के बाद कांग्रेस -सहमी और बेचारगी का भाव लिए नजर आ रही थी। मतगणना के पहले तक कांग्रेसी दिग्गज भी अगर-मगर पर अटक रहे थे। उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि मुंबई का जख़्म पार्टी की कितनी लुटिया डुबोएगा। क्योंकि पहली बार ऐसा हुआ कि जनता इस कदर सत्ताधारियों पर बिफर पड़ी। पर्टी को शुक्रगुजार होना चाहिए कि जनता ने इन चुनावों में म्योच्योर डेमोक्रेसी की तरफ अपना फैसला सुनाया, किसी भवावेश में नहीं। अगर बीजेपी और कांग्रेस को छोड़ तीसरे दल बीएसपी की बात करें तो इन चुनावों में यूपी के बाहर भी हाथी की चाल महसूस की गई। हालांकि पार्टी सुप्रीमो जितनी उम्मीद कर रही होंगी, जनता ने उतनी अहमियत बीएसपी को फिलहाल नहीं दी। आखिर में यही कहूंगा अगर इन राज्यों के चुनाव वाकई सेमीफाइनल हैं तो आप फाइनल की झलक इनमें खुद भी देख सकते हैं।

1 comment:

Dipti said...

जनता के पास भी कोई ख़ास विकल्प नहीं थे। चुनाव के नतीज़े कुछ ऐसे हैं जैसे कि खराब टमाटरों में से कुछ कम खराब को अपने लिए चुन लेना।