Pages

Saturday, December 13, 2008

सरहद पर मोहब्बत के दीये


नीरज एकबार फिर पूरे उत्साह से नए विषय के साथ हमारे साथ हैं। हिंद-पाक़ रिश्तों के बीच दुनिया के दारोगा यानी अमेरिका की भूमिका पर विचार कर रहे हैं, नीरज। हालांकि तनाव भरे माहौल में सरहद पर मोहब्बत की मोमबत्तियां जलाने जैसी रवायत पर भी उनकी नज़र है-

वाघा बार्डर पर एकबार फिर मोहब्बत के दीये जलाए गए...मुंबई आतंकी हमले के बाद हिंद-पाक़ रिश्तों में आई तल्ख़ी के बावजूद वाघा बार्डर के ये दीये जैसे धधकते सवाल की मानिंद हैं।...आख़िर ये मोहब्बत का पैग़ाम किसके लिए? ये शांति के दीये आखिरकार कब असर में आएंगे?..हैरानी ये भी हो सकती है कि संजय दत्त की पत्नी मान्यता जो मुंबई में मारे गए लोगों की याद में मोमबत्तियां जलाकर श्रद्धांजलि दे रही थीं, वही मान्यता हिंद-पाक़ दोस्ती के लिए भी दीये जला रही थीं। बाघा बार्डर से शायद आप वाक़िफ हों। पंजाब के एतिहासिक शहर अमृतसर से बेहद क़रीब है ये बार्डर। वाघा बार्डर पर हर रोज़ होने वाले औपचारिक जलसे को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग आते हैं। इधर हिंदुस्तान की अवाम और सरहद पार पाकिस्तानी अवाम। देशभक्ति के तराने गूंजते हैं, जज़्बाती नारे भी लगाए जाते हैं। दोनों देशों में अगर तल्ख़ी आ जाए, वो चाहे सियासी हो या ग़ैर सियासी, इसका असर पाक रेंजर्स और सीआरपीएफ के जवानों पर बखूबी दिखता है।...बहरहाल, मैं बात कर रहा था सरहद पर मोहब्बत के दीयों की।...ये मौक़ा था मानवाधिकार दिवस का। दस दिसंबर को यूनाइटेड नेशंस का स्थापना दिवस है, जो पूरी दुनिया में मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी मौक़े पर इकट्ठा हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता। ...और दीप जलाने से लेकर आपसी मोहब्बत और दोस्ती के पैग़ाम को हर हाल में आगे बढ़ाने की हिमायत की गई।...वाघा बार्डर के लिए ये सिलसिला कोई नया नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर की अगुवाई में हर साल यहां दीये जलाए जाते हैं...ये रवायत अब काफी पुरानी हो चुकी है। तरक़्कीपसंद लोगों की एक जमात हमेशा से हिंद-पाक़ रिश्तों की बेहतरी की हिमायती रही है। इनकी दलील होती है कि दोनों ही मुल्क़ों में चंद लोग ही इस रिश्ते के ख़िलाफ हैं। ...और इस संबंध को बेहतर होते नहीं देखना चाहते।लेकिन बात सिर्फ इतनी भर नहीं है। मुंबई आतंकी हमले ने जाने या अनजाने अमेरिका को पंच बनने का मौक़ा उपलब्ध करा दिया है। हमने अमेरिका को ऐसा मौक़ा हमने दे दिया है जिसकी ताक में अमेरिका लगातार लगा था। हम भी अपनी फरियाद लेकर अमेरिका के पास जा रहे हैं और पाक़िस्तान भी अपनी फ़रियाद वहीं सुना रहा है। ...हम ख़ुश हैं कि अमेरिका ने हमारे पक्ष में बोला। पाक़िस्तान को ख़ुशी है कि अमेरिका ने उसपर ज्यादा शक- शुबहा नहीं जताया। दुनिया का दारोगा मुदित भाव में दोनों को बराबर का भरोसा दे रहा है। ये ख़तरनाक है। दोनों देशों का रिश्ता द्विपक्षीय न होकर एक मजबूत बिचौलिये पर आकर टिक गया है। देर-सबेर हमें इसकी क़ीमत भी चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए।

2 comments:

MANVINDER BHIMBER said...

संजीव ,
तुम्हारा ब्लॉग देख कर अच्छा लगा साथ ही केंट बोर्ड और आर्मी की बीट भी याद आ गई..... वो दिन बहुत अच्छे दिन थे....
गंगेश भाई को मेरी भी याद दिलाना .....मोनिका और कुहू को भी .......
अपना फोन नम्बर भी देना....मेरे नम्बर वही है.....

Anonymous said...

sab kuch sahi hai..blog achcha hai lekh achche hai..bas ek baat ki mohlla ki nakal na kare plz. apni pahchan banaye.. style banaye..
behtar likhe..

apka shubhchintak