Pages

Tuesday, December 16, 2008

गोरी के गांव की खोज

नीरज ने बचपन में गांव के दिनों में बांसुरी की आवाज सुनी थी। शायद ये आवाज आज भी उनके ज़ेहन में ज़िदा है। गाव, शहर और गोरी के बहाने शायद उसी सुरीली तान को याद कर रहे हैं नीरज-जाड़े की ऐसी ही सुबह थी। मैनें बांसुरी की मीठी तान सुनी थी...कहीं दूर कोई बांसुरी बजा रहा था (विश्वास कीजिए, ये किसी रुमानी फिल्म का कथानक नहीं था)...कोई पुराना नग्मा बजा रहा था- गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा। बांसुरी की तान बचपन से ही मुझे मोहित करती रही है। ...गांव में स्कूल आते-जाते वक्त भैंसो (शर्तिया गाएं नहीं थीं) की पीठ पर बैठे गांव के छोकरों को बड़े बेफ़िक्र अंदाज में बांसुरी बजाते सुना और देखा करता था। उन्हे मिली ये स्वतंत्रता और सुविधा मुझे बेहद रिझाती थी। भैंस की सवारी और बांसुरी का साथ, मेरी नज़र में उनको एक अलग क्लास में रखती थी..जिन्हें दशमलव और चक्रवृद्धि ब्याज़ जैसे सवालों से कोई लेना-देना नहीं होता था। कभी-कभार उनसे इसके बारे में पूछ लो तो खीसें निपोड़कर आपके ही चेहरे को देखने लगते जैसे हम उदबिलाव हों। लेकिन उम्र के साथ सुरों का लगाव बढ़ता गया। थोड़ा बड़ा हुआ तो संगीत सुनने का थोड़ा शऊर हुआ। पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और रोनू मजुमदार की बांसुरी मुझे मोहित करने लगी। ...खैर, उस दिन सुबह के वक्त बंसी की तान से मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। सुबह राम-नाम लेने का वक्त और उसपर गोरी, उसके गांव की शान को बघारती उसकी तान। नज़र दौड़ाई तो एक युवक दिख गया...पुरानी सी पैंट-शर्ट और बिखरे हुए बाल...कंधे पर बांस की खपच्ची में टंकी बांसुरियां...उसके लबों पर एक बांसुरी लगी थी, जिससे ये नग्मा निकल रहा था। ...शायद कुछेक बांसुरी बेचने के इरादे से इधर चला आया था। लेकिन सोच में पड़ गया...दिल्ली के इस कंक्रीट के जंगल में उसकी बांसुरी का खरीददार कौन होगा...न बच्चे और न बूढ़े। ...नजरें दौड़ाई...सड़कें अलसाई पड़ी थी...बड़ी-बड़ी इमारतों की आंखों में अब भी कुछ घंटे की नींद बाकी थी। लेिन बांसुरी वाले का नग्मा जारी रहा। थोड़ी हंसी आई...जाने किस गोरी और किस गांव की याद में बेजार बना फिर रहा है। गोरी का गांव तो जाने कब का पीछे छूट गया भाई मेरे...लेकिन इससे उसका कोई लेना-देना नही था। कभी-कभी सचिन जिस लय के साथ बल्लेबाजी करते हैं...उसका सुर की भी गहराई कम न रही होगी। जिन घरों में गद्देदार बिस्तर पर लोगों को नींद नहीं आती...सेंसेक्स और निफ़्टी से लेकर डाउजोन्स में गिरावट की चिंता चैन से सोने नहीं देती...ग्लोबल रीसेशन की खबरों ने उनकी नींद उड़ा दी हो...वहां इस दो पैसे की बांसुरी कहां बिकने वाली थी। सो, नहीं बिकी...नग्मे की धुन धीमी होती गई और लड़का ओझल हो गया। ख़ुदा करे, उसे अपनी गोरी का गांव भी मिल गया हो और शहर में तब्दील न हुआ हो तो गांव वैसा ही सुंदर हो। आमीन।

3 comments:

विनय said...

बहुत ख़ूब!

Bhuwan said...

बेहतरीन आलेख. पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. हम कंक्रीट के इन जंगलों में भी गाँव की मिटटी की सोंधी महक ढूंढते रहते है...

Ajit Sharma said...

बेहतरीन आलेख. पढ़ कर बहुत अच्छा लगा.