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Saturday, December 6, 2008

नकवी सुनें, सब सुनें

बी जे पी प्रवक्ता नकवी साहब के लिपस्टिक वाले प्रदर्शनकारी महिलाओं के बयान के बाद ये बहस तेज हो गई है कि क्या विरोध प्रदर्शन कुछ ख़ास लोगों का ही हक़ है । विरोध प्रदर्शन का तौर तरीका क्या हो? ये भी हकीकत है कि सेलिब्रेटीज के जज्बातों पर सहज भरोसा क्यों नही होता। क्या उनके आंसू नकली होते हैं? क्या उनका गुस्सा फरेबी होता है? क्या उनकी हँसी फर्जी होती है? इस पर कुछ टिप्पणियां आई हैं , इस उम्मीद से इसे पब्लिश किया जा रहा है कि इसमे और भी लोगों की भागीदारी हो और लोगों के विचार सामने आयें....

ab inconvenienti said...
मोमबत्ती छाप प्रदर्शन करने वाले, जोगिंग करके आतंक का खात्मा करने वाले, अमीर-अघाये बम्बइया हस्तियां और फ़िल्म स्टार. नकवी तो ग़लत कह ही गए, खामियाजा भी भुगत रहे हैं. खैर,पर क्या इन हीरोइनों ने ज़िन्दगी में कभी पोलिंग बूथ देखा है? ८०% को तो यह भी पता नहीं होगा की देश का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कौन है, अमेरिका में किस पार्टी की सरकार है या अरुणाचल प्रदेश नक्शे में कहाँ है.
December 3, 2008 11:38 PM
राहुल said...
अब भाई , आपने बिल्कुल मार्के की बात उठाई है कि इन लोगों ने पोलिंग बूथ नही देखा है, ये लोग अमीर, अघाए और खाए पिए लोग हैं. एकदम सही बात. लेकिन भाई मेरे, इस देश मे कितने लोग वोट डालते हैं? ये जो हमारी सरकार है, कितनो लोगों के वोट से बनती है? मेरे ख्याल से ये बात आप अच्छी तरह से जानते होंगे. जो भी वोट नही डालता वो इस देश मे जीने कॅया हक नही खो देता, उससे संविधान के मूलभूत अधिकार नही छीन लिए जाते. अपनी सुरक्षा की माँग करना हर नागरिक का अधिकार है, बिल्कुल वैसे ही जैसे कि वोट देने का अधिकार है. और इस अधिकार पर उंगली उठाना सीधे सीधे संविधान की आत्मा को चोट पहुचना है. नक़वी ने वही किया है. इसके अलावा नक़वी ने स्त्रियों का अपमान भी तो किया है. अपनी मर्दानगी भारी थोथी जवानी के जोश मे आकर वह भारतीय मर्यादा तक भूल गये कि स्त्रियों के साथ सम्मान से पेश आना चाहिए.
December 4, 2008 8:33 AM
ab inconvenienti said...
लिपस्टिक पाउडर लगाने वाली महिलाएं और सूटेड बूटेड लोग........ या महिलाओं के साथ पुरूष वर्ग का भी तो अपमान है, पर सूट बूट वाला भाग आपको नज़र न आया? हर महिला का अपमान तो किया नहीं सिर्फ़ टिपटॉप और मेकअप वाली ....... ये अमीर, जब ख़ुद पर आई तो दहल गए, ले मोमबत्ती हाथों में निकल पडेकहाँ रहते है जब हैदराबाद और राजस्थान में लोग मरते हैं? और जहाँ तक संविधान द्वारा दिया जाने वाला जीने का अधिकार है, वह तो इनके पास सबसे ज़्यादा है. मरने को तो केवल चौराहों फुटपाथों पर चलने वाला ही है. शोभा डे ने अपने वर्ग और सोसाइटी के पक्ष में कह ही दिया है, "आख़िर हम लोग सबसे ज़्यादा कर भरते हैं, हमारी सुरक्षा का सबसे बेहतर इंतजाम कराया जाना चाहिए".और कितने मोमबत्ती वालों ने यह शपथ ली की हम अपने बच्चों को सेना ज्वाइन करवाएंगे या उन्हें कमांडो बन कर आतंकवाद का खत्म करता देखना चाहेंगे? ये उथले ओछे लोग.
December 4, 2008 9:54 AM
Bhuwan said...
अब ऐसा है की अगर कपडों और वेश भूषा ही लोगों की मानसिकता का आइना होता तो फ़िर बात क्या होती जनाब... हम ऊँची सोसाइटी में रहने वाले लिपस्टिक और मेक अप करने वाले लोगों के विरोध को इस वजह से खारिज नही कर सकते... जहा तक वेश भूषा की बात है तो नेता भी खादी और पुलिस वाले खाकी पहनते है..लेकिन मचाते तो गंध ही हैं न...
December 4, 2008 10:50 PM
राहुल said...
अब भाई, बात आपकी फिर से सही है की ये लोग ओछे हैं, उथले हैं या जो कुछ भी हैं. सेना मे दाखिले की बात है तो मैं भी शर्त लगाकर कह सकता हू की यही आप जो उनकी तरफ उंगली उठा रहे हैं, चार उंगलियाँ आपकी तरफ भी उठ रही हैं, यक़ीनन आप सेना मे नही हैं और नेया ही आपके बच्चे. जीतने अधिकार आपको हैं, उतने ही मुझे हैं और उतने ही इन लोगों को भी. सतही बातों मे वक्त मत जया कीजिए. कुछ रचनात्मक कीजिए

2 comments:

PANKAJ MISHRA said...

इन् बेचारे नेताओं को माफ़ को दिजिये. ये तो इतने बेचारे हैं की जुवान फिसली नहीं की गद्दी फिसल जाती है. ये लोग तो पुरूस हैं ही नही. जब पौरुष का काम होता है तो घर में दुब्के रहतें हैं. उसके बाद ज़ुबान से ही कुछ पौरुषता दिखाने की कोशिश करते हैं। मौके का फायदा उठाने के चक्कर में उनकी जुबान फिसल जाती है।
pankaj mishra

PANKAJ MISHRA said...

इन् बेचारे नेताओं को माफ़ को दिजिये. ये तो इतने बेचारे हैं की जुवान फिसली नहीं की गद्दी फिसल जाती है. ये लोग तो पुरूस हैं ही नही. जब पौरुष का काम होता है तो घर में दुब्के रहतें हैं. उसके बाद ज़ुबान से ही कुछ पौरुषता दिखाने की कोशिश करते हैं। मौके का फायदा उठाने के चक्कर में उनकी जुबान फिसल जाती है।
pankaj mishra