Pages

Saturday, December 5, 2009

सरकार, नाराज़ हो रहे हैं

पिछले दिनों संसद में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी साहब हत्थे से उखड़ गए। महंगाई के सवाल पर उखड़े थे। उससे दो दिनों पहले मुंबई आतंकी हमले में प्रभावित परिवारों को मुआवजे को लेकर लालकृष्ण आडवाणी की बात पर प्रणब दा उखड़ गए।... प्रणब दा का कहना था कि मुंबई आतंकी हमले की आंच पर बीजेपी अपनी सियासी रोटी सेंक रही है। जबकि आडवाणी इसका ब्यौरा दे रहे थे कि कितनों को मुआवजा नहीं मिला जो उन्हें मिलना चाहिये था।... उससे पहले सरकार में विदेश मंत्री एसएम कृष्णा और विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर फाइव स्टार होटलों में पाए गए। दोनों, खर्च कटौती की सोनिया गांधी की नई मुहिम को पलीता लगाते रहे और हो- हल्ला होने पर दोनों शाहखर्च मंत्री अकड़ गए कि वे अपने खर्चे पर फाइव स्टार होटलों में सुकून ढूंढ़ रहे थे। हाल में इसी यूपीए सरकार के एक और मंत्री सुल्तान अहमद भी फाइव स्टार होटल का सुकून उठाते देखे गए। लेकिन उम्मीदों से कहीं उलट बंगाल शेरनी ममता बनर्जी ने उस न्यूज़ चैनल को सीपीएम का न्यूज़ चैनल बता दिया जिसने इस ख़बर को प्रमुखता से दिखाया था। उस दिन भी लोगों को हैरानी हुई होगी देश में चीनी के लगातार बढ़ते दाम के कारण आम लोग परेशान थे।... गन्ना समर्थन मूल्य को लेकर किसान आंदोलन तेज था। लेकिन प्रणब दा विकास दर को लेकर अच्छा संकेत दे रहे थे। या फिर सरकार की तरफ से ये भी कहा जा रहा था कि हिंदुस्तान में आर्थिक मंदी बेअसर रहा। एक और अवसर आया... जब सवाल पूछने वाले सांसद लोकसभा से ग़ैर हाज़िर थे। सरकार की तरफ से बयान आया कि इतना पैसा जाया होता है...कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला ने इसे चिंताजनक बताया। दरअसल, सवाल पूछने वाले 18 सांसद सदन से ग़ायब थे और बीस सवाल पूछे जाने थे।...इसके ठीक दो दिनों बाद राज्यसभा में भी सवाल पूछने वाले सदस्य ग़ायब पाए गए जिसमें समाजवादी पार्टी के अमर सिंह के साथ कई और सदस्य ग़ायब थे... लेकिन दिलचस्प बात ये है कि ग़ायब रहने वालों की फेहरिस्त में राजीव शुक्ला का भी नाम शामिल था जो दो दिनों पहले सवाल पूछने वाले सदस्यों की ग़ैर हाजिरी को चिंताजनक बता रहे थे।
इन तथ्यों को देखने के बाद साफ है कि सरकार आत्मविश्वास से भरी हुई है। लोकसभा चुनाव नतीजों ने यूपीए और ख़ासतौर पर कांग्रेस को जिस तरह की सफलता मिली, उसने विपक्षी दलों के लिए जैसे हताशा जैसी स्थिति पैदा कर दी है।... साफ लग रहा है कि कमजोर विपक्ष के रहते सरकार पूरी तरह से निश्चिंत है। यहां तक कि सहयोगी दल भी उसपर किसी तरह से दबाव बनाने की हैसियत में नहीं हैं। किसी ने घुड़की दिखाई तो सरकार के पास कई विकल्प हैं... जो सरकार की पालकी ढो सकते हैं। वामदल, लालू और पासवान सरीखे कह रहे हैं कि वे जब कमजोर पड़े तो विपक्ष पर इसका सीधा असर पड़ा है। सरकार की मनमानियों के ख़िलाफ़ वामदलों के पास बोलने की ताक़त नहीं रह गई है। लेकिन कॉमरेडों के पास जब ताक़त थी, तो उनका जनवादी चेहरा कमजोर था। लालू यादव अब दो रुपये किलो आलू का प्रचार कर रहे हैं लेकिन जब इनमें सामर्थ्य था... ताक़त थी तो जनता के सवालों पर जूझने की बजाय उन सबने यूपीए सरकार की पालकी ढोयी। इसलिए उनका ये कहना, बहाने से कम नहीं लगता कि अगर वे बेहतर ताक़त में होते तो सरकार ऐसी मनमानियां नहीं कर पाती। विपक्ष भी जानता है कि महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा है, लेकिन अव्वल तो वे भी मौजूदा सरकार का कोई विकल्प दे पाने में अबतक विफल रहे... दूसरे, उनके पास इसका हौसला भी नहीं रह गया है। सो, प्रणब दा उखड़ रहे हैं... बंगाल शेरनी लाल- पीला हो रही हैं... लोग, बस ताक रहे हैं।

Wednesday, November 25, 2009

मुफ़लिसी में हंसी


पवन के कार्टून का मुरीद रहा हूं... रेखाचित्रों से ज्यादा उनके कार्टून का सब्जेक्ट जोरदार रहा है। कार्टून पर जाकर क्लिक कीजिये और आप भी मजा लीजियेः संजीव

Monday, November 16, 2009

एक दिलचस्प टिप्पणी

वरिष्ठ टीवी पत्रकार श्री अंशुमान त्रिपाठी जी को मैने व्यंग्य- लुटेरों के लिए भी आचार संहिता बने- मेल किया था। जिसे पढ़ने के बाद उनकी दिलचस्पी टिप्पणी आईः संजीव
संजीव भाई, लुटेरों के लिए ही आचार सहिता होती हैं। शर्माजी हमारे आपके जैसे इंसान हैं। नाईयों की मदद से ही हम आपकी जिंदगी संवरती सुधरती है। बीबियां भी हमारी मर्दानगी के किससे मुश्किल से ही सुनती है। और हिंदी न्यूज चैनलों में काम करते करते बाहर रिरियाने की,कमजोर को छकाने की और अपनों के बीच गाल बजाने की आदत हो जाती है। लइके बड़े लायक थे। जिस नाई के यहां बैठते थे उसीकी नहीं बजाते थे। हमारा तो पेशा ही ज़रा उल्टा है। गर्लफ्रेंड अगर शर्माजी की भी होती तो कसम से वो रिक्शे पर बैठे बैठे मोबाइल पर बतियाते हुए आते। पीटीसी समझा रहे होते, एंगल बता रहे होते या फिर उसके खिलाफ साज़िश का पर्दाफाश सुना रहे होते। ज़रूर शर्माजी कापी रायटर रहे होंगे। अदने से, लिए हुए छोटे छोटे से सपने से,सुंदरी अगर कॉपी जंचवाने आजाए तो सुंदर सपनों में खो जाते होंगे। उन्हें जीवन जगत का प्रेमी बनाया होगा ऐसे ही किसी प्यार ने। बड़े प्यारे जीव हैं पत्नी से बात करने का वक्त निकाल लेते हैं। या तो उनका बॉस नई नौकरी या छोकरी ढूंढ़ने में व्यस्त होगा। वरना न्यूज़ चैनलों से खबरों के गायब होने के लिए वो ही जिम्मेदार माने जाते। तो कुल मिला कर समस्या यही है कि किसके आचार को आधार बना कर संहिता बनाई जाए। शर्माजी, वो लुटेरे,या अमर नाई जिसने 500 के नोट में मोबाइल जायदाद वापिस दिलवाई। हां भाई सब जानते हैं कि महंगा मोबाइल खरीद पाना हैसियत से बाहर है लेकिन हैसियत बढ़ाने के लिए दिखाना ज़रूरी है। तो पत्रकार के लिए मोबाइल अचल संपत्ति के बराबर ही है। कईयों की नज़रें टेढ़ी हुई होंगी- कहां से खरीदा इतना महंगा मोबाइल। मोबाइल से उनका ये लगाव ही उनको महंगा पड़ा। बहरहाल संजीव भाई देख लीजिए कहीं हमने खींच खींच कर इसे लंबा तो नहीं कर दिया। मुख्य लेख से अगर बड़ा हो गया हो तो माफी चाहुंगा। दरसल बचपन में संपादकजी को पत्र भेज भेज कर लिखना सीखा था। कुछ साथी उप संपादक मुख्य लेख से बड़ी मेरी प्रतिक्रिया छाप देते थे। मुझे मेरी प्रतिभा का अहसास बचपन में ही हो गया था। बाद में पता चला कि ये प्रतिक्रियाएं ही बड़े पत्रकारों का लेख होती हैं। यानि नया लिखने के लिए तो रिसर्च की ज़रूरत पड़ती है। इसलिए ज़ल्द से जल्द इतना बड़ा पत्रकार बन जाना चाहिए कि प्रतिक्रिया ही मूल पर भारी पड़ जाए। तो संजीव भाई आचार संहिता तो हमारे जैसे पत्र लेखकों के लिए भी बननी चाहिए जो मूल रचना की कनपटी पर लंबी प्रतिक्रिया की दोनाली रख कर भोकाल क्रिएट करते हैं। अगर ये दोनाली लेकर आप साइबर यात्रा पर निकल जाए और दिन भर में 25-50 ब्ल़ाग पर डाका मार आए, तो यकीनन आप रातों रात ऑन लाइन जर्नलिज्म में छा जाइएगा। टारगेट ञाडिएंस की पूरी टीआरपी मिलेगी। सो माफ कीजिएगा, अआगे फिर कहीं मुलाकात होगी।

Saturday, November 14, 2009

लुटेरों की भी आचार संहिता बने

ग़ाज़ियाबाद में मेरे पड़ोसी एकदिन लुट- लुटाकर घर आए... पिटना रह गया था सो ये नहीं लिख रहा हूं कि लुट- पिटकर वापस आए। मित्रों, शर्मा जी भले आदमी हैं और मेरे जैसे दुष्ट के पड़ोसी हैं इसलिये इस भरोसे के साथ उनके लुटने की दास्तां लिख रहा हूं कि वे नाराज़ नहीं होंगे... नाराज़ हो भी गए तो उसी तरह चुप लगा बैठेंगे जैसे लुटने के बाद चुपचाप घर आ गए। उन्हें लूटने के लिए कोई चंगेज़ खां नहीं आया था... पड़ोस में ही लुट गए। नोयडा के फिल्म सिटी में उनका दफ़्तर है और एक हिंदी न्यूज़ चैनल में काम करते हैं। वसुंधरा तक बस में जाते हैं और वहां से रिक्शे में सवार होकर घर लौट रहे थे। लुटे इसलिये कि ग़लती शर्मा जी की थी। रिक्शे में सवार होकर हाथों में मोबाइल रखने की उन्हें क्या ज़रूरत थी?... मगर जवानी में बचपना कर गए। मोहल्ले के ही दो-चार लड़के रिक्शे के पास आकर उन्हें रोका और उनसे मोबाइल फोन लेकर लगे नाचने... शर्मा जी ने सोचा, शायद कोई परिचित है। अंधेरे में चौंधियाते हुए शर्मा जी ने चेहरा देखा तो सबके सब मोहल्ले के छिछेरे थे... मन ही मन शर्मा जी इनसे दबते रहे हैं। सो बोलती बंद हो गई... मोबाइल फोन मांगने के लिए रिरियाने लगे तो उनके सामने ...उनके ही मोबाइल फोन से लौंडे अपनी गर्लफ्रैंड से बातें करने लगे।
शर्मा जी लुटे थे इसलिये लुटी हुई मुद्रा में घर आए और पत्नी को सूरत-ए-हाल कह सुनाया। निदान निकाला गया कि ये लड़के जिस नाई की दुकान पर उठते- बैठते हैं उनसे गुहार की जाए। दूसरे दिन सुबह- सुबह शर्मा जी ने सैलून में जाकर उसके मालिक से बातचीत की... उसने कहा कि पांच सौ रुपये उन्हें दे देने पर दस हजार की उनकी मोबाइल वापस मिल सकती है। शर्मा जी खुश हो गए... लुटेरों के इस पेशेवर अंदाज पर जैसे फ़िदा हो गए... उनकी ईमानदारी पर जैसे मुग्ध हो गए। तुरंत से पहले पांच सौ का नोट दिया और शाम को उनका मोबाइल फोन वापस हो गया।
तो शर्मा जी लुटेरों की इस अदा पर फ़िदा थे और हर वक़्त चहक रहे थे...ऐसे ही चहकते हुए मेरे पास आए और लूट के पेशे पर बहस करने बैठे। लूट को लेकर मैने भी अपना तजुर्बा उन्हें सुनाया। बताया कि एकबार मुझसे एक लड़के ने टाइम पूछा... दन से ऊपर के दाहिनी जेब से मोबाइल निकालकर उसे टाइम बताने के लिए देखने लगा कि लुटेरे को मेरा मोबाइल पसंद आ गया... बताने की उसने जरूरत नहीं समझी और मोबाइल छीनकर ले भागा।...ऐसे ही किस्सों से बात बढ़ी। फिर ये हुआ कि लुटेरों का भी एक आचार संहिता होनी चाहिये। इस पाक़ पेशे में इन दिनों कई नापाक़ लोग आ गए हैं। मसलन, कहीं भी किसी के कान पर सटाकर दम निकाल दे रहे हैं। उन्हें भी पता है कि मारना नहीं है और लुटने वाले को भी पता है कि ये बेवजह का भौकाल कान पर चिपकाए दे रहा है। ये कोई छिछोरा पेशा तो है नहीं इसलिये इसका भी कोई क़ायदा और अपनी तहजीब होनी चाहिये। होना ये चाहिये कि लुटेरे जब कभी किसी को लूटें तो एक कूपन दे दें... उस कूपन की वैधता एक महीने- दो महीने या साल भर होनी चाहिये। यानी, जो एक बार लुट गया उसे कम- से- कम उस कूपन की वैधता तक बेधड़क कहीं भी आने- जाने मोबाइल और पर्स साथ ले जाने की छूट मिले। ये सुविधा स्त्रीलिंग और पुल्लिंग, दोनों पर बहाल होनी चाहिए।
कूपन रहते कोई पाक़ किस्म का लुटेरा हाथ लगाता है तो उस कूपन को दिखाकर आगे बढ़ जाएं...। इसमें छोटा रीचार्ज स्टाइल वाली भी व्यवस्था हो...अगर मोटा कैश लेकर कहीं आना- जाना हो तो तीन दिनों या दो दिनों के छोटे रीचार्ज पर भी काम चलाया जा सके... और हां, बिना कूपन के कोई मिले तो बनियान छोड़कर लुटेरे उसका सबकुछ उतरवा सकते हैं... या लुटेरे चाहें तो ऐसे सज्जन को इस जुर्म में जेल भिजवाने की सिफारिश भी करवा सकते हैं... जैसे डीटीसी बसों में लिखा होता है कि बिना टिकट पकड़े गए तो छह माह की सश्रम जेल या इतने हजार रुपये जुर्माना या दोनों ही भुगतना पड़ेगा।...लुटेरों को सुविधा ये होगी कि वे किसी भी वेष में रह सकते हैं। मसलन, ऑटो चालक, टैक्सी चालक, सार्वजनिक जगहों पर ...यानी हर कहीं...जाने किस रूप में भगवान मिल जाएं। किसी को भी किसी भी वक़्त टिकट चेक करने की मुद्रा में लुटेरों को लोगों का बटुआ तलाशने की सुविधा होगी। ये उनपर होगा कि लूट के समय मिला नोकिया का कौन -सा मॉडल उन्हें सूट करता है। पसंद नहीं आने पर लप्पड़- थप्पड़ करने की भी उन्हें सुविधा होगी...नागरिकों को ये सुविधा नहीं होगी (अबतक है क्या?) कि ऐसे मामलों में ख़्वामख़ाह थाने और पुलिस को परेशां करें... अगर थाने भी गए तो पुलिस को ऐसे लोगों को लतियाकर निकाल बाहर करने की सुविधा होगी। और लुटेरों को ये सुविधा किसी भी वक़्त... दिन हो या रात... हर वक़्त होगी, ये उनकी इच्छा है कि उन्हें किस शिफ़्ट में काम करना पसंद आता है... लेकिन अख़बार वालों को ये सुविधा नहीं होगी कि वे ऐसा लिख दें कि दिनदहाड़े लूट... वे ये भी नहीं लिखेंगे कि फलां जगह एक आदमी लुटा या पिटा। हां, वे लिख सकते हैं कि - रिचार्ज कूपन नहीं रखने की सजा मिली।
शर्मा जी से बहस के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि इस तरह की संहिता बन जाने के बाद जैसे रामराज का मंज़र हर ओर दिखने लगेगा। शर्मा जी भी खुश हुए कि इसमें हर वर्ग का ख़्याल रखा गया है... क्या शरीफ़ और क्या लुटेरे। क्या पुलिस और क्या पब्लिक। क्या महिला और क्या पुरुष। आजकल हम इसी आचार संहिता को व्यापक रूप देने में लगे हैं।

Saturday, October 17, 2009

...बगल की बेड पर मरीज़ गुजर गया

बीच में कुछ दिनों तक बीमार पड़ने की वजह से आपको -मृत्यु- नाम से लिखी जा रही श्रृंखला की अगली किस्त तुरंत नहीं पढ़ा पाया। खेद है। आगे पढ़िये। - संजीव
...किसी अनहोनी की आशंका में हैरान- परेशान हमदोनों अस्पताल में दाख़िल हुए... मेरे ससुर जी ( मरीज़) बिस्तर पर बेहोशी की हालत में पड़े थे और मेरी सास बगल वाले बेड के पास खड़ी होकर संताप में डूबी महिला के पास अवाक मुद्रा में खड़ी थीं... यानी उसके बुजुर्ग पति दुनिया में नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो चुका था। अस्पताल वाले आए और दस मिनट के भीतर मरीज़ की नाक और मुंह में लगे तमाम उपकरण हटाकर ॥चेहरा चादर से ढंक दिया और बाहर की ओर स्ट्रेचर लेकर गए... बरामदे में महिला अपने पति की लाश के साथ खड़ी थी... जो न रो पा रही थी और न ही संयत थी। उदास भाव से हम भी घंटे- डेढ़ घंटे बाद कहीं सिर टिकाने की जगह खोजने लगे...लेकिन तीमारदारों के बड़े सभागार में इतने ज्यादा तीमारदार थे कि हॉल किसी तंग कमरे में तब्दील हो गया था। लोग जहां- तहां जमीन पर सोये थे...बेंचों पर बैठे लोग भी ऊंघ- ऊंघकर गिर रहे थे। हम बरामदे में आ गए...देखा कुछ लोग वहां भी किनारे में साये पड़े थे। हम भी एक चादर ले आए और इस इरादे से जूते उतार कर बैठ गए कि इसी मुद्रा में कुछ आराम तो मिलेगा। लेकिन गार्ड ने हमे देखते ही करीब आया और गुरुमुखी में डंडा दिखाते हुए कहा कि यहां से तामझाम हटाओ। हमने कहा कि हम तो सो नहीं रहे... बाकी लोग सो भी रहे हैं...तुम्हें उनपर क्यों नहीं एतराज है भाई ?...उसने या तो मेरी हिंदी समझी नहीं या फिर वह भी नींद से भरा होने के कारण झुंझलाया था... कहा कि फ़ौरन यहां से हटाओ। हमने बहस छोड़ चादर लेकर दूसरी मंजिल पर आ गए जहां कुछ अंधेरा था और बरामदे में काफी लोग सो भी रहे थे। हमने भी इधर- उधर देखने की बजाय रास्ते के ठीक बगल में औरों की तरह चादर बिछाई और चोरी चले जाने के डर से जूतों को चादर के नीचे डालकर बेखबर सो गए... लेकिन कानों के पास से चहलकदमी का अहसास पूरी रात होता रहा जब बरामदे से होकर लोग गुजरते थे।...तक़रीबन पौने पांच बजे नींद खुली तो देखा मेरे साथी मुकेश जी पहले ही उठ चुके हैं....लेकिन सफाईकर्मी बरामदे में पोछे लगा रहे थे और वे जैसे- जैसे आगे बढ़ रहे थे... बरामदे में सोए लोग वैसे...वैसे अपनी चादर लेकर भाग रहे थे... सफाईकर्मियों के लिए ये रोज का मंजर था... इसलिए इसमें उनके लिए कोई रस नहीं रह गया था। हम भी लपककर मरीज के वार्ड में गए। वहां मेरी सास उसी मुद्रा में बैठी थीं जिस मुद्रा में उन्हें रात छोड़ गया था। मुकेश जी ने मुझे देखते ही कैंटीन से सबके लिए चाय ली। चाय पीते- पीते ख़ासा वक्त हो गया... हम शौच के लिए इधर- उधर भटकने लगे। क्योंकि अस्पताल के हर मंजिल पर सिर्फ दो शौचालय मगर इस्तेमाल करने वालों की बड़ी भीड़...। अब करें तो क्या करें... हम अस्पताल के बाहर सड़क के पार भी गए लेकिन कोई शौचालय नहीं मिला। दोबारा जब आए तो सबसे ऊपरी मंजिल पर जाकर देखा... वहां एक शौचालय मिला जो साफ- सुथरा... शायद किसी की निग़ाह उसपर नहीं पड़ी होगी क्योंकि सबसे ऊपरी मंजिल पर था। मैं और मुकेश जी वहां से फ़ारिग होकर वार्ड में आए... वार्ड में ससुर जी की तंद्रा टूट चुकी थी... वे बेड पर बैठने की मुद्रा में लेटे हुए थे और मेरी सास उन्हें ब्रश करने में मदद कर रही थीं। खुशी का ठिकाना नहीं रहा... उन्होंने कुछ हल्की- फुल्की बातचीत भी की।... अचानक ध्यान आया कि खून देने के लिए ब्लड बैंक भी जाना है... और मुकेश जी को खून देना था...इसलिए हम ब्लड बैंक की तरफ लपके। उसने कहा कि पहले भरपूर नाश्ता कर लो फिर ब्लड लेंगे। हम अस्पताल के बाहर आकर नाश्ते का जुगाड़ देखने लगे। हम तीन लोग थे और सुबह में नाश्ते का भला क्या इंतजाम हो सकता था। नजर पड़ी एक ठेले वाले पर जो गर्मागर्म परांठे परोस रहा था। हम ऑर्डर देकर बैठ गए... कई और ग्राहक वहां खा रहे थे। दस मिनट- पंद्रह मिनट- आधा घंटा बीत गया तो मेरा धैर्य जवाब दे गया। मेरे बाद आए ग्राहकों को तो वो खिला रहा था लेकिन हमारी तरफ देखना भी गंवारा नहीं। समझ में आया... हमारे साथ गए लोगों ने बिहारी अंदाज में परांठे का ऑर्डर दिया था जिसे लेकर परांठेवाला बार- बार पंजाबी में भुनभुना रहा था। मैने उससे कहा कि भाई ब्लड देने के लिए जाना है...अगर जल्द से दो या एक ही प्लेट दे दो या फिर हम चलें। अनमनाते ढंग से उसने फिर क़रीब बीस मिनट बाद तीन प्लेट परांठे लगाने लगा। मैने उसे रोक दिया... मैने कहा कि सिर्फ दो प्लेट देना... मुझे तुम्हारे परांठे बिल्कुल नहीं खाने। ...पता नहीं उसने समझा या नहीं, उसपर कोई फ़र्क नहीं पड़ा। दोनों को नाश्ता कराने के बाद हम ब्लड बैंक में आ गए।( जारी)

Monday, September 28, 2009

आस्था के चटख रंग


बंगाल में विजयदशमी के दिन शादीशुदा महिलाएं सिंदूर खेला में हिस्सा लेती हैं... बंगाल की ये परंपरा आस्था के रंगों में पगी होती है।

Sunday, September 27, 2009

...काली बिल्ली ने आख़िरकार हमारा रास्ता काट दिया

शाम लगभग सात बज चुके थे... मैं अपने एक और रिश्तेदार के साथ वापस दिल्ली जाना चाहता था लेकिन डॉक्टर ने कहा कि डायलिसिस होगा...अभी, इसी वक़्त। उन्हें स्ट्रेचर पर ले गया। वहां 120 रुपये की पर्ची कटाने के बाद तत्काल डायलिसिस कर दी गई। लगभग एक घंटे बाद मरीज़ को वापस ले जाते समय एक डॉक्टर ने कहा कि डिपार्टमेंट के हेड डॉ.विवेकानंद झा आपको याद कर रहे हैं... मैं इस डर से झिझकते हुए गया कि पता नहीं फिर बेवजह डांटना न शुरू कर दे...लेकिन बेहद ज़हीन किस्म के डॉ.झा ने जाते ही बताया कि आपके अखबार के एक साथी का फोन आया था...मैने मरीज को देख लिया है लेकिन ये हमारे डिपार्टमेंट का मामला नहीं है...आप उन्हीं अखबारी साथी से कहो कि हड्डी वाले डॉक्टर से आपको मिलवाएं...क्योंकि किडनी फिलहाल ठीक है। थोड़ा संतोष हुआ और उसी रिपोर्टर को फोन करके पूरी बात बताई। उसने भरोसा दिया कि अब आप सेफ हैं...हेड की निगाह में आपका केस आ गया है तो आप किस्मतवाले हैं...यहां किसी भी दूसरे मरीज़ का ऐसा नसीब नहीं होता है कि हेड खुद उसके बारे में जांच- पड़ताल करे। मैने उनसे गुजारिश की कि भाई एक वार्ड तो दिलवा ही दो... स्ट्रेचर पर भला कैसे मरीज को रखा जा सकता है क्योंकि इलाज लंबा चलना है...उसने कहा कि यहां यही मुश्किल है... वार्ड नहीं मिल सकता...आपको उसी तरह काम चलाना होगा...पीजीआई में ढाई सौ बेड हैं लेकिन मरीजों की संख्या नौ सौ के आसपास है, भला कैसे वार्ड मिलेगा। ( वे ऐसा ब्यौरा दे रहे थे जो गाहे- बगाहे हेथ बीट की रिपोर्टिंग करते समय अपने अखबार में छापते भी रहे होंगे)... मैने उससे बात करने के बाद उस रिपोर्टर के बॉस से बात की जो मेरे परिचित पत्रकार हैं... बेहद मानवीय और संवेदनाओं से भरे। खुद अखबारी व्यस्तताओं के कारण वे आ नहीं पाए थे लेकिन फोन पर लगातार जानकारी ले रहे थे। उनसे बताया कि सर, जरा रिपोर्टर से कहकर वार्ड तो दिलवा दें। उन्होंने तुरंत रिपोर्टर से बात की और रिपोर्टर का फोन दन्न से मेरे पास। उसने बताया कि उसकी बात हो गई है फलां डॉक्टर से...आप उनसे मिल लो। मरीज को स्ट्रेचर सहित इमर्जेंसी में पहुंचाने के बाद मैं भागा- भागा उस डॉक्टर के पास वार्ड के इंतजाम के लिए गया। डॉक्टर ने साफ कर दिया कि उनके डिपार्टमेंट का केस ही नहीं है इसलिये यहां बेड नहीं मिल सकता... फिर उसी रिपोर्टर को फोन मिलाकर पूरी बात बताई तो उसने कहा कि किडनी का मामला है इसलिये हड्डी वार्ड में कैसे बेड मिल सकता है?...खैर मैं ऊब चुका था...सो, मरीज के पास आ गया। वहां देखा तो ससुर जी स्ट्रेचर पर बेहोशी की हालत में पड़े थे और मेरी सास अनवरत खड़ी... क्योंकि वहां मरीजों के तीमारदारों के बैठने की कोई जगह नहीं थी। वहां मौजूद दूसरे मरीजों के तीमारदार भी या तो खड़े थे या प्लास्टिक की अपनी स्टूल ख़रीद लाए थे।
मैं फिर वापस दिल्ली लौटने की बात सोचने लगा...चूंकि एक दिन की ही छुट्टी ली थी इसलिये रुकना थोड़ा मुश्किल हो सकता था। फिर एक डॉक्टर साहब आए और उन्होंने कहा कि अभी के अभी मरीज़ का यूरिन, ब्लड टेस्ट के साथ ईसीजी होगा। मैने उनसे कहा कि साहब कल नहीं हो सकता है क्या... उन्होंने पूछा अभी क्यों नहीं... मैने कहा कि मरीज के साथ कोई होगा नहीं और मैं दिल्ली वापस हो रहा हूं। डॉक्टर ने बिफरते हुए कहा कि मरीज को भी साथ ले जाओ...मेरे को क्या है...एक डेथ सर्टिफिकेट ही तो बनाना है। सुनते ही मैने डॉक्टर की तरफ ख़ामोश रहने का इशारा करते हुए युरिन टेस्ट के लिए पिशाब की थैली का नॉब ढूंढ़ने लगा जिससे कि शीशी में युरिन का नमूना लिया जा सके। पंद्रह मिनट की कोशिशों के बाद भी थैली नहीं खुली... मेरे साथ और भी लोगों ने कोशिश की लेकिन नतीजा नहीं निकला... फिर मैने उसी डॉक्टर की तरफ असहाय मुद्रा में देखते हुए गुहार लगाई ...बार- बार कहा कि सिर्फ बता भर दें... लेकिन डॉक्टर ने नहीं सुनी। एक नर्स आती दिखी...उनसे कहा तो उसने मुझे कंधे से हटाते हुए अपने रास्ते निकल गई। मैं दोबारा आकर नमूना लेने के लिए थैली में नॉब ढूंढ़ने लगा। आसपास के तीमारदारों को आग्रह किया लेकिन वे सब पहले ही इतने दुखों के मारे थे कि दुनिया से बेजार मुद्रा में देखते रहे। ख़ैर...बड़ी कोशिशों के बाद जब नॉब मिला तो मेरी बेवकूफी से थैली से पिशाब का फौव्वारा निकलने लगा... जबतक संभालता, फर्श पर काफी बिखर चुका था। खैर हमने नमूना लेकर युरिन दे दिया... खून का नमूना भी डॉक्टर साब दे चुके थे उसे भी जमा कराया... और वापस आकर मरीज को ईसीजी के लिए ले गया... वहां भी दिक्क़त ज्यादा नहीं हुई और आधे घंटे में तीनों काम निबटाकर वापस आ गया।...लेकिन मरीज़ की बेहोशी नहीं टूटी... उनका बुखार दुगुना लग रहा था... डॉक्टर जब आया तो थर्मामीटर लगाकर देखा... तपतपाते शरीर में चार डिग्री बुखार निकला। उन्होंने दवा दे दी तो मेरी सास ने अपनी चिंता छोड़ते हुए मुझसे और मेरे साथ के और लोगों से खाना खा लेने की ज़िद करने लगीं। सबने बारी- बारी से बाहर निकलकर खा लिया तो मैं भी एक और रिश्तेदार के साथ हॉस्पिटल से बार ढाबे में खाने पहुंचा। रेट लिस्ट देखा तो हैरानी हुई... पचास रुपये में दाल –रोटी। हम दो आदमी थे और सौ रुपये का टोकन लेकर खाना खा लिया। ढाबे पर मौजूद लोगों की थाली भरी-पूरी थी... कहीं चिकन कराही और किसी थाली में दूसरे नॉनवेज आइटम। महंगा ढाबा होने के बाद भी लोगों की भीड़ इतनी कि बामुश्किल हमें जगह मिली तो हमने जल्दी- जल्दी खाकर निबटाया। वापस आने लगे तो सामने सड़क पर काली बिल्ली मिली... उसे देखकर मेरे कदम ठिठके... थोड़ी देर बाद जब दोबारा जाने लगा तो पता नहीं कहां से उसी काली बिल्ली ने आकर मेरा रास्ता काट दिया... मैं आशंका से भरा हुआ अस्पताल में दाखिल हुआ। (जारी)

Friday, September 25, 2009

...मेहरबानी करके पत्रकार साथी न पढ़ें

(अगर आप पेशे से पत्रकार हैं या फिर डॉक्टर हैं तो इस पोस्ट को कतई न पढ़ें। सबसे पहले पत्रकार। मुझे अहसास हुआ है कि हम सब एक ऐसी सुविधाजनक दुनिया में जी रहे हैं जहां यूटोपिया जैसी स्थिति है... वहां कोई बीमार नहीं पड़ता, कोई नहीं मरता, वहां कोई दुखी नहीं है,, उनके साथ कोई होनी- अनहोनी नहीं होती, हम किसी ( ऊपरवाले भी) से नहीं डरते.. अगर उनके नाते- रिश्तेदार दुखी हैं, मुफलिसी में हैं, मुश्किल में हैं... जरूरतमंद हैं तो हम पत्रकार उन्हें उनके दुखों के साथ छोड़कर वापस अपनी हंसती- खिलखिलाती दुनिया में आ जाते हैं... क्योंकि जीना- मरना दुनिया का नियम है।..इसलिये ऊपरवाले से दुआ मांगें कि आपका कोई जानने वाला पत्रकार न हो ...अगर हो भी तो उससे कभी किसी भी मोड़ पर मदद मांगने की जरूरत न पड़े...और अगर जरूरत पड़े भी तो उनसे मदद मांगना मत। हां, डॉक्टर भी न पढ़ें क्योंकि जन्म और मृत्यु उनके लिए एक कागजी दस्तावेज भर है, जिसपर वे अपनी ग़ैर जज्बाती कलम से दिन और तारीख भर देते हैं.)
मित्रों, अभी मेरे एक रिश्तेदार सख़्त बीमार हुए... पहले बिहार के मुजफ्फरपुर में उनका ऑपरेशन हुआ और बाद में पटना में। दिक्कत ये हुई थी कि मरीज़ जो थे वे पोलियो अभियान के लिए साईकिल से जा रहे थे, गिर पड़े। पता चला कि कूल्हे की हड्डी टूट गई। डॉक्टर भी हैरान... साईकिल से गिरने भर से हड्डी टूट जाए। टेस्ट कराया और ऑपरेशन कर दिया। ऑपरेशन तो सही हुआ लेकिन दूसरी समस्या डॉक्टर ने बता दी कि किडनी डैमेज हो गया है। दस –पंद्रह दिनों में कई बार डायलिसिस भी कराया...अंत में पटना के लिए रेफर कर दिया। पटना में डॉक्टरों की हड़ताल के दौरान पीएमसीएच की बजाय उन्हें नालंदा मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। वहां के डॉक्टरों ने इन दो रोगों का इलाज करते- करते बता दिया कि फेफड़े में पानी चला गया है और इसका इलाज चंडीगढ़ में ही संभव है। मुझे सूचना दी गई... चंडीगढ़ पीजीआई में मैने अपने सोर्स भिड़ाए। वहां एक वरिष्ठ पत्रकार मेरे जानने वाले हैं...उन्होंने तसल्ली दी कि यहां भर्ती करा दिया जाएगा। मैने भी पटना सूचना दे दी और तीसरे ही दिन वे लोग पटना से राजधानी एक्सप्रेस में सवार होकर दिल्ली पहुंच गए। दिल्ली में एंबुलेंस लेकर मैं अपने एक और रिश्तेदार के साथ मौजूद था। स्ट्रेचर पर उन्हें ट्रेन से उतारकर एंबुलेंस तक लाया... वहां मेरी पत्नी ने उन्हें देखा तो अवाक रह गईं... मेरे ससुर के छोटे भाई हैं..यानी मेरी पत्नी के चाचा। दाढ़ी बढ़ी हुई...आंखों के चारों तरफ कालिमा....बदरंग चेहरा। लेकिन फिर भी जीने की एक उम्मीद लिये शून्य को निहारते रहे। उनकी पत्नी और छोटे भाई का परिवार भी साथ आया था। हम सबलोग एंबुलेंस में सवार होकर चंडीगढ़ पीजीआई पहुंचने वाले थे उससे पहले चंडीगढ़ के अपने परिचितों को फोन किया...उन्होंने अपने एक रिपोर्टर का मोबाइल नंबर दिया और भरोसा दिलाया कि अस्पताल के गेट पर मिल जाएगा। हम हैरान- परेशान होकर दोपहर तक़रीबन दो बजे पीजीआई में पहुंचे।
वहां का नजारा देखकर हिल गए। बाहर भीड़ लगी थी और लोगों के बीच स्ट्रेचर के लिए मारामारी मची थी। एंबुलेंस वाला जल्दी मचा रहा था, उसे दिल्ली वापस लौटना था। एक स्ट्रेचर पर एक महिला मरीज सोई थी और उसके पास एक गाड़ी लगी तो मुझे लगा कि मरीज़ को उतारने के बाद स्ट्रेचर खाली हो जाएगा। सो, मैं लपका। लेकिन मेरे जो रिश्तेदार दिल्ली से मेरे साथ गए थे उन्होंने इशारों में बताया कि लाश है... स्ट्रेचर के पास महिला का पति सिसकियां भर रहा था और महिला की लाश स्ट्रेचर पर पड़ी थी। ख़ैर, मैने उस रिपोर्टर को फोन मिलाया तो उसने कहा कि दो मिनट में आ रहा हूं ...इसी बीच आधे घंटे की मशक्कत के बाद हम एक स्ट्रेचर हासिल करने में सफल हुए और अपने मरीज को लेकर अंदर जाने लगे तो गेट पर रोक दिया गया... दो लोगों से ज्यादा नहीं।
फिर ख्याल आया कि रिपोर्टर को फोन मिलाऊं....उसने फिर कहा कि दो मिनट में आ ही रहा हूं। मैने बताया कि बामुश्किल अंदर आ पाया हूं... अगर जल्दी आकर इलाज शुरू करा सको तो बेहतर। विश्वास मानिये, ( कसम खाकर कहता हूं) लगभग सवा घंटे के बाद रिपोर्टर साहब जबतक नामूदार हुए तबतक हम इमर्जेंसी में किसी तरह अपने मरीज को लेकर घुसने में कामयाब हो गए। रिपोर्टर का फोन आया तो सामने खड़ा था। मुझे तसल्ली हुई कि अबतक हुई फजीहत ख़त्म ...इनका रोज हस्पताल आना- जाना होगा इसलिये इलाज तो कम- से- कम फौरन शुरू हो ही जाएगा। वजह ये थी कि मरीज की हालत कुछ ज्यादा ही ख़राब होने लगी थी, लंबी यात्रा की वजह से। रिपोर्टर साहब मुझे वहां रिस्पेशन के भीतर ले गए और एक साहब ( उस आदमी को ज़िंदगी में दोबारा देखने की इच्छा नहीं है) से परिचय कराया। साहब का ठाठ इतना कि उन्होंने न तो मेरी ओर नजर उठाने की जहमत उठाई और मेरा बढ़ा हुआ हाथ उनके हाथ की बाट जोहता दोबारा पैंट की जेब में चला गया... उन्होंने देखा... मगर बहुत देर के बाद। हाथ मिलाना तो खैर। इसके बावजूद रिपोर्टर साहब बार- बार कहते रहे कि आपकी हर समस्या से फलां साहब सुलझा देंगे और अब आप आराम से मरीज के आसपास रहिये...कई डॉक्टरों को फोन किया है...सबके सब आते ही होंगे। मैं मरीज के पास आया तो वहां उनकी पत्नी और भाई खड़े मिले। एक डॉक्टर ने दवा की एक पर्ची पकड़ाई ...मैं फौरन से पेश्तर उसे अंदर के मेडिकल स्टोर ले लाकर मरीज के पास इस उम्मीद में खड़ा हो गया कि अब इलाज तो शुरू हो जाए। आसपास गुजर रहे कई डॉक्टरों से आग्रह किया लेकिन जबतक मेरी बात पूरी होती, डॉक्टर कई बेड बाद नजर आता। मेरे जैसे परेशां तीमारदार कई थे। ख़ैर दो घंटे बाद एक डॉक्टर फिर आया...मैने गलती ये की कि उससे शिकायत कर बैठा कि एक डॉक्टर साहब ने ये दवा लाने दी थी लेकिन तब से वे दिखे ही नहीं। डॉक्टर साहब फायर हो गए... कहने लगे कि क्या समझते हो कि डॉक्टर दवा मांगकर कहीं भाग गया?... माइंड योअर लैंग्वेज..मैन। मैं खामोश रहा और डॉक्टर साब गुस्से के मारे वहां से चले गए... उन्होंने भी दवा नहीं दी। दस मिनट बाद एक और डॉक्टर जब आया तो मैंने या किसी ने भी उनसे कुछ नहीं कहा। उन्होंने बड़ी खामोशी से दवा दे दी और चले गए। (जारी)

Sunday, September 13, 2009

नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की




शाम हो चुकी थी जब हम ताजमहल को देखने के बाद मथुरा की ओर चले... रास्ते में एक जगह आगरा का मशहूर पेठा लिया...एक चौराहे पर बड़ी –सी दुकान में। फिर बारिश शुरू हुई तो मथुरा तक अनवरत बरसती रही। दिल्ली- मथुरा रोड पर अंदेरे में जुगनुओं की तरह दिखने लगा तो अंदाजा मिल गया कि मथुरा आ गए... मथुरा की रिफाइनरी में लगी लाइटें रात के अंधेरे में रौशन होने वाले जुगुनू की तरह ही दिखते हैं। और जल्द ही हम मथुरा में मंदिर के आसपास पहुंच गए... बारिश थोड़ी थम गई। हम भीगते- भीगते ही मंदिर की तरफ चल निकले... दो- चार मिनट पहले ही आरती ख़त्म हो गई थी और देशी- विदेशी श्रद्धालुओं का रेला उधर से आता दिखा। हम मंदिर के गेट पर पहुंचे...द्वार पर सैकड़ों साल पहले की डिजाइन की तरह ही दो द्वारपाल अंकित हैं और दरवाजा भी परंपरागत डिजाइन का दिखा। वहां सिक्योरिटी चेकिंग के लिये हमें वहां रोक दिया गया। तसल्ली से तलाशी ली गई... थोड़ी बदमतमीजी से पेश आए यूपी पुलिस के जवान... शर्ट के भीतर अपना पहचान पत्र डाले था... जब ज़िद की तो वो भी निकाल दिया... प्रेस का कार्ड देखकर उसने थोड़ी मेहरबानी की और जाने दिया। अंदर गया तो मंदिर से लगती हुई मस्जिद दिखी... खैर हम अंदर गए तो महामाया देवी की मूर्ति देखी... वहां से जन्मभूमि की तरफ और श्रद्धालु जा रहे थे तो हम भी भूलभूलैया जैसे रास्ते से खोह में बने श्रीकृष्ण जन्मभूमि स्थल पर पहुंचे... मैं अवाक रह गया। ये वास्तव में ये कंस की जेल ही नहीं उस स्पेशल सेल की तरह है जिसमें असाधारण किस्म के कैदी उस ज़माने में रखे जाते होंगे। अंदर दीवारों पर अंकितम चित्रों पर यहां का महात्म दिखाया गया है और श्रीकृष्ण के जन्म की कहानी गाइड वगैरह श्रद्धालुओं को समझा रहे थे। मैं ये सोचकर जैसे अभिभूत हो गया कि नंदलला का जन्म यहीं हुआ होगा। पूरे परिवार ब़ड़ी देर तक जड़वत बने रहे। ...थोड़ी देर बाद हमसब ऊपर आए। वहां कुछ देर मंदिरों में घूमने के बाद औरतों ने कुछ ख़रीदारी भी की। वहां चाक- चौबंद सुरक्षाकर्मियों को भी देखा।... वहां से हम सबलोग दोबारा वहां आए जहां गाड़ी खड़ी की थी... वहीं एक दुकान से मथुरा के पेड़े ख़रीद लिये ...भरपूर। अब गाड़ी में दोबारा बैठे और दिल्ली की तरफ हमारा कुनबा निकल लिया... घड़ी देखी ठीक बारह बजे थे। एक ढाबे पर गाड़ी रुकवाकर हम सबका भोजन हुआ... काफी महंगा था खाना। ढाबे पर काम करने वाले स्टाफ ने हमें बंगाली समझ लिया तो एक ने पूछा- दादा- दादा भात खाबो ? ..मैने उसे डपटकर कहा कि तू बिहारी है का रे ?...वो खींसे निपोरने लगा...यानी वो भी समझ गया और मैं भी। बड़े प्रेम से खाना खिलाया...। पौने बजे के आसपास हम दिल्ली की ओर निकल पड़े... तीन बजे भोर में हम दिल्ली पहुंचे... रास्ते भर गीत सुनते आए- राधे- राधे –राधे बरसाने वाली राधे... श्रीराधे- राधे बरसाने वाली राधे।

Tuesday, September 8, 2009

एक अश्रु मोती... समय के गाल पर



हम ताजमहल की झलक पाते उससे पहले ही दर्शकों की लंबी लाइन दिखी… काले घने बादल। शाम चार बज चुके थे और छह बजे ताजमहल का द्वार दर्शकों के लिए बंद हो जाता है। लाइन लंबी थी इसलिये हम उम्मीद छोड़ चुके थे कि हम ताजमहल को देख सकेंगे। ख़ैर जैसे- तैसे टिकट कटाकर हम पूरे परिवार लाइन में लग गए....मगर आसपास घूम रहे दलालों ने हमें परेशां कर दिया। ये दलाल ताजमहल में तुरंत प्रवेश के नाम पर डेढ़ सौ से लेकर तीन सौ रुपये तक मांग रहे थे। उससे पूछा कि किस रास्ते ले जाओगे भला...उसने कहा, ये हम पर छोड़ दो। हम नहीं माने। बादलों को देख बड़ी संख्या में छाते वाले तंग करने लगे... डेढ़ सौ रुपये से लेकर ढाई सौ रुपये तक के छाते... मगर सभी छाते सेकेंड हैंड। धीरे- धीरे जब हम प्रवेश द्वार के क़रीब पहुंचे तो समझ में आ गया कि दलालों की कमाई रास्ता भी यही है... यहीं से दलाल लोगों को पुलिस वालों की सरपरस्ती में जबरन लाइन में घुसा दे रहे थे... हमारे आगे भी तीन- तीन बूढ़े और अधेड़ घुसकर खींसें निपोरने लगे... हमने भी संतोष कर लिया। हालांकि हर दलाल बुरा होता है लेकिन ये ताज के दलाल के रूप में मेरे जेहन में जैसे बैठ गए। सिक्योरिटी चेकिंग के दौरान एक बच्चे के हाथ में खिलौने वाला मोबाइल फोन देखकर गार्ड ने उससे छीनकर कचरे के डब्बे में फेंक दिया... बच्चा हैरानी और रुआसे का भाव लिये अंदर चला गया और उसके पिता (शायद)... हें- हें- हें –हें करते हुए भीड़ में गुम हो गए।
अंदरूनी हिस्से में ताजमहल का दरवाजा... मैदान की हरी- हरी घास का दरीचा।.... उफ़... सामने ही ताज था...इतना खूबसूरत जैसे किसी शाहजहां के आदेश पर बीस हजार मजदूरों की सेना ने इसे नहीं बनाया बल्कि खुद कुदरत ने अपनी निगहबानी में....अपनी छुअन से... इस इमारत में मोहब्बत और खूबसूरती का अहसास भर दिया हो।... ऐसा जैसे हर तारीफ़ जहां पहुंचकर अधूरी रह जाती है... यहां पहुंचकर टैगोर ने लिखा- एक अश्रु मोती ...समय के गाल पर। ताजहमल के उस हिस्से में पहुंचकर मैने आगरा के किले की तरफ देखा... जहां क़ैद एक शहंशाह या फिर कहिये एक आशिक़ निगाह... फ़क़त एक झरोखे से अपनी माशूक की कब्र को निहारता हुआ दुनिया से फ़ना हो गया। कहते हैं कि ताजमहल के तैयार होने के तत्काल बाद शाहजहां को उसके बेटे औरंगजेब ने आगरा किले में कैद में डाल दिया था। मराठी उपन्यासकर नागनाथ इनामदार – शहंशाह- नाम के अपने उपन्यास में लिखते हैं कि औरंगजेब ने अपने पिता शारजहां को क़ैद करने को अपनी सियासी मजबूरी मानी थी... सत्ता पाने की होड़ में अपने ही पिता को क़ैद में रखना मजबूरी भरा उसका फ़ैसला था लेकिन उसने पिता के जज्बातों की कद्र करते हुए किले के कैदखाने में एक झरोखा बनवाया था जहां से ताज़ दिखता है... और कैद में सोते- जागते इसी झरोखे से ताज को निहारते शाहजहां का इंतक़ाल हुआ।
ताजमहल के सामने बेंच पर बैठकर मैने अपने मां और पिताजी के फोटो खींचे... भाई को उसके परिवार के साथ और फिर भाई के साले ने हमसबका एक फोटो खींचा। इस बेंच पर दुनिया के नामीगिरामी लोगों को फोटो खिंचवाते हुए सैकड़ों दफे देखा है।...अचानक बेटे के सवाल से मेरी तंद्रा टूटी... स्वप्निल ने पूछा कि – पापा ये मंदिर है ?...मैं लटपटा गया। ख़ैर मैने संक्षिप्त –सा जवाब देकर पीछा छुड़ाया... नहीं बेटा, ये एक इमारत है... वर्षों पुरानी। ...ताजमहल को लेकर बाकी तमाम बातें मैने स्वप्निल को यह सोचकर नहीं बताई कि स्कूल में उसे और बच्चों के साथ ताजमहल के बारे में शायद बेहतर ढंग से बताया जाएगा।...इसी बीच मेरी बीबी थोड़ी चुहल करने लगी... उसने शिकायती अंदाज में कहा कि शाहजहां ने अपनी बीबी के लिये ताजमहल बनवाया था और आप मेरे लिए एक मकान तक नहीं बनवा सकते....मैंने सोचा कहूं- बावली...ये मक़बरा है जो शाहजहां ने मुमताज के इंतक़ाल के बाद बनवाया... और तुम्हारे लिये जिंदा रहते मकान बनवाना (ख़रीदना) दूसरी बात है।... उसका मूड बिगड़ न जाए इसलिये ख़ामोश रहा। ( जारी)

Thursday, August 27, 2009

...मेरे महबूब कहीं और मिलाकर मुझसे उर्फ ताज़


वृंदावन से हमलोग मथुरा की तरफ जाने लगे। रास्ते में ड्राईवर ने हमें पूछा कि मथुरा चलें या फिर आगरा ?... हालांकि उसने बताया कि पहले आगरा ही चलें क्योंकि वहां ताजमहल में साढ़े छह बजे तक ही प्रवेश मिल पाएगा... और लौटती समय में मथुरा में शाम की आरती तक यहां पहुंच जाएंगे। हमें उसका आइडिया पसंद आया और हम सीधे आगरा की तरफ निकल लिये... रास्ते में एक जगह लिखा मिला बरसाना 12 किलोमीटर। ख़ैर। रास्ते में ड्राईवर ने एक हरियाणवी गाना लगा दिया जो पॉप अंदाज में गाया गया है- आ बैठ बुलेरो में... सपेशल तेरी ख़ातिर लाया।... पिताजी के कहने पर गाना बंद भी करा दिया। आगरा पहुंचने से काफी पहले अंदाजा मिल गया कि हम जल्द ही पहुंचने वाले हैं... हर जगह जैसे ताजमहल का नजारा था। एक गुरुद्वारानुमा सफ़ेद इमारत देखी जिसमें ताजमहल जैसी गुंबदें बुलंद थीं। आगरा की ज़ामा मस्ज़िद। ...आगरा के जर्रे- जर्रे पर जैसे ताज का अक्स था। ताज़ को लेकर दिल में एक जमाने से तरह- तरह के ख़यालात थे... ताज़ को मैने कभी इतिहास के नज़रिये से देखा तो कभी फिल्मों के नजरिये से... कभी दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल ताज को उसी अंदाज में देखने की कोशिश की तो कभी वहां होकर आए सैलानियों की जुबानी सुनी।... सबने उस्ताज जाक़िर हुसैन की तर्ज पर जैसे कहा हो- वाह ताज़। हर तरफ ताज की संगमरमरी खुबसूरती की तारीफ़ सुनी... लेकिन मैं ताज को लेकर साहिर के ख़यालात से ख़ुद को नज़दीक पाता रहा... पहला ऐसा इंक़लाबी शायर जिसने ताज को नये नज़रिये से देखने की कोशिश की... पहली बार मुहब्बत की इमारत कहे जाने ताज़महल की तस्वीर पर लगी पैबंदों की शिनाख़्त की। आपको याद हो न हो...साहिर साहब की नज़्म- ताजमहल- की इन पंक्तियों को दोबारा ताज़ा करें- ताज तेरे लिये इक मज़हरे- उल्फ़त ( प्यार का प्रतिमान) ही सही/ तुझको इस वादी-ए- रंगीं से अक़ीदत ही सही/ मेरे महबूब कहीं और मिलाकर मुझसे/बज़्म- ए- शाही में ग़रीबों का ग़ुज़र क्या मानी/ सब्त जिस राह पे हों सतवते शाही के निशां/ उसपे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी/ मेरे महबूब पसे- पर्दा-ए- तशहीरे- वफ़ा तूने/ सतवत के निशां को तो देखा होता/मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली/ अपने तारीक-मकानों को तो देखा होता/ अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्‍बत की है/ कौन कहता है सादिक़ न थे जज़्बे उनके/ लेकिन उनके लिए तशहीर का सामान नहीं/ क्‍योंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे/ ये इमारतो-मकाबिर, ये फ़सीलें, ये हिसार/ मुतलक-उल-हुक्‍म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूं/ दामने-दहर पे उस रंग की गुलकारी है/ जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अज़दाद का खूं/ मेरी मेहबूब, उन्‍हें भी तो मुहब्‍‍बत होगी/ जिनको सन्‍नाई ने बख्‍शी शक्‍ले-जमील/ उनके प्‍यारों के मक़ाबिर रहे बेनामो-नुमूद/ आज तक उन पे जलाई ना किसी ने कंदील/ये चमनज़ार, ये जमना का किनारा, ये महल/ ये मुनक्‍क़श दरोदीवार, ये मेहराब, ये ताक़/ इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर/ हम ग़रीबों की मुहब्‍बत का उड़ाया है मज़ाक़/ मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझे। ... गाड़ी के ड्राईवर ने हमसबको ताजमहल के मुख्यद्वार के आगे चौराहे पर उतारा और हम रिक्शे में नहीं बैठे... बैटरी से चलने वाली उस गाड़ी में भी नहीं बैठे जिसपर ज्यादातर विदेशी बैठे थे...हम सब एक ऊंट गाड़ी में बैठे जिसे देखते ही मेरा बेटा स्वप्निल और भतीजा अमर्त्य...दोनों एकसाथ कैमल- कैमर का शोर मचाते हुए मचल उठे थे। सबको बिठाकर पिताजी के साथ मैं और छोटे भाई का साला चंदन... खरामा –खरामा ताजमहल की ओर चल पड़े...। (जारी)

तिमिर मिटाता एक दीप



तहलका में रेमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता दीप जोशी के बारे में जानें -संजीव


देश की तस्वीर बदलने का सपना देखने और इस दिशा में जुनून के साथ काम करने वाले दीप जोशी को रेमन मैगसेसे पुरस्कार मिला है. अपनी धुन के पक्के इस मुसाफिर के सफर के बारे में बता रही हैं तुषा मित्तल
‘अगर मेरे हाथ में एक जादुई छड़ी होती तो मैं कुछ ऐसा करता कि विकास से जुड़े कामों की तरफ भी युवाओं का वैसा ही आकर्षण हो जैसा इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट जैसे विकल्पों की तरफ होता हैं’
इलाहाबाद में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते दीप जोशी जब उत्तराखंड में बसे अपने गांव जाते तो बस की लंबी यात्रा के दौरान अक्सर उनके मन में ख्याल आता, ‘पहाड़ के लोगों की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए मैं अपनी पढ़ाई को किस तरह इस्तेमाल कर सकता हूं?’ 25 साल बाद इस सवाल का जवाब उनके लिए प्रतिष्ठित रेमन मैगसेसे पुरस्कार लेकर आया है. इस पुरस्कार को एशिया का नोबेल भी कहा जाता है. पुरस्कार के लिए नामों का चुनाव करने वाली ज्यूरी का कहना था कि भारत में ग्रामीण विकास के क्षेत्र में जोशी ने अपने संगठन प्रदान के जरिए जिस तरह से अपने दिल और दिमाग का इस्तेमाल किया है उसने गैर सरकारी संगठनों के आंदोलन को एक पेशेवर स्वरूप दिया है.
जोशी का बचपन उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के एक गांव में बीता. उनसे उनके बचपन के बारे में पूछिए और वो उन दिनों को याद करते हैं जब वो जंगल में पशुओं को चराने जाते थे और वहां से चूल्हे के लिए लकड़ियां इकट्ठी करके भी लाते थे. वो कहते हैं, ‘सुविधाएं नहीं होने पर भी वो जगह रिश्तों की आत्मीयता और जीवन की संपूर्णता से भरी-पूरी थी. हिमालय के पहाड़ों में जिंदगी कहीं ज्यादा समानतावादी थी मगर अब चीजें खराब हो रही हैं.’
इलाहाबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से 1972 में इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए जोशी ने अमेरिका की राह पकड़ी. यहां उन्होंने जाने-माने मैसेच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलजी में दाखिला लिया. 1977 में वो स्वदेश लौटे और पुणे स्थित एक गैरसरकारी संगठन में काम करने लगे. फिर एक दिन उनकी मुलाकात रजनीकांत और माबेल एरोल से हुई जो अमेरिकी डॉक्टर थे और स्थानीय लोगों को सामुदायिक स्वास्थ्य-कर्मी बनने के लिए प्रशिक्षित कर रहे थे. ये दोनों डॉक्टर पुणे के झमखेड़ इलाके पर खास ध्यान दे रहे थे जहां नवजात मृत्यु दर प्रति 1000 पर 60 थी जो राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा थी. जोशी कहते हैं, ‘जिस तरह से वे लोगों की मदद करने के लिए अपनी बुद्धि और भावनाओं का इस्तेमाल कर रहे थे उससे मुझे बेहद प्रेरणा मिली.’
जोशी ने महसूस किया कि अगर एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सके जो ज्यादा शिक्षित लोगों को जमीनी मुद्दों की तरफ खींच सके तो इस देश की तस्वीर बदल जाएगी. वो कहते हैं, ‘राज्य नियम बना सकता है और पैसा बांट सकता है मगर ये लोगों को गरीबी से बाहर नहीं निकाल सकता. राज्य को ज्यादा मतलब शक्ति से होता है. हम एक ऐसे माध्यम के जरिए विकास की उम्मीद किस तरह कर सकते हैं जिसको चलाने वाला ईंधन सत्ता हो. ये बुनियादी रूप से गलत धारणा है.’
फोर्ड फाउंडेशन से मिली डेढ़ लाख डॉलर की आर्थिक सहायता और आईआईटी और आईआईएम के पढ़े विजय महाजन की मदद से उन्होंने 1983 में प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन यानी प्रदान की स्थापना की. आज प्रदान भारत के 3000 गांवों के करीब 1.7 लाख परिवारों की जिंदगी बेहतर बना रहा है. इसकी सबसे सफलतम परियोजनाओं में से एक है आदिवासियों का एक पोल्ट्री कोऑपरेटिव. जोशी कहते हैं, ‘दस साल पहले अगर कोई मुझसे कहता कि आदिवासियों का पोल्ट्री कोऑपरेटिव एक दिन 60 करोड़ रुपये सालाना का टर्नओवर हासिल कर लेगा तो मैं खूब हंसता.’1983 में जब प्रदान शुरू हुआ था तो इसमें 100 से भी कम स्वयंसेवक थे. आज ये हर साल 70,000 से भी ज्यादा छात्र स्वयंसेवकों को अपनी तरफ खींचता है. भविष्य के बारे में जोशी कहते हैं, ‘अगर मेरे हाथ में एक जादुई छड़ी होती तो मैं कुछ ऐसा करता कि विकास से जुड़े कामों की तरफ भी युवाओं का वैसा ही आकर्षण हो जैसा इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट जैसे विकल्पों की तरफ होता हैं.’

Monday, August 24, 2009

बेहतर भविष्य के इंतज़ार में

भुवन के ब्लॉग -लूज़ शंटिंग - पर दीप्ति का ताजा पोस्ट पढ़ें... । इसके जरिये अपने आसपास... और समाज को महसूस करें - संजीव

नाम- इंतज़ार
उम्र- 15 साल (लगभग)
स्थानीय निवासी- उत्तर प्रदेश
फिलहाल बसेरा- पुरानी दिल्ली का एक रैन बसेरा
जब हम उससे और उसके साथियों से मिलने के लिए शैल्टर होम पहुंचे तो वो सभी बच्चे टीवी पर टॉम एण्ड जैरी देख रहे थे। असल में हम अपने आप में एक अनोखे बैंक को कवर करने के मक़सद से वहाँ पहुंते थे। इतंज़ार से जब मैं मिली तो सबसे पहली बात जो मैंने कही वो थी कि क्या नाम है, शानदार...
इंतज़ार, शादियों और पार्टियों में लाइट सिर पर उठाने का काम करता है। साथ-साथ वो एक बैंक का मैनेजर भी है। बैंक को वो बैंक नहीं बल्कि ख़ज़ाना कहता हैं। क्योंकि उनके इसे बैंक कहने पर भारतीय रिज़र्व बैंक को आपत्ति थी। इंतज़ार फ़िलहाल अपने इस व्यस्त दिनचर्या के साथ पढ़ाई भी कर रहा है। वो सातवीं क्लास में पढ़ता है। इंतज़ार से मिलने पर वो एक गंभीर और अपने भविष्य के प्रति सजग बच्चा लगता है। जब उससे बातचीत शुरु हुई तो मालूम चला कि वो अपने घर से भागकर दिल्ली आया था। वो इतना तो बताता है कि उसका घर उत्तर प्रदेश में है लेकिन, वहाँ कहाँ ये वो नहीं बताता है। न ही वो अपने माता-पिता का नाम बताने को तैयार है। भविष्य में इलैक्ट्रिशिय बनने के ख़्वाब संजोए इंतज़ार पहले एक नशेड़ी था। भयंकर नशा करना उसका रोज़ाना का काम था, वो जो भी कमाता था नशे में उड़ा देता था। ऐसे में उसका कई बार कई तरह से शोषण भी हुआ, जिसके बारे में खुलकर वो कुछ नहीं कहता है। इतंज़ार फिलहाल एक स्वयंसेवी संस्था बटरफ़्लाई के शेल्टर होम में रहता है। सरकारी रैन बसरे के एक कमरे का ये शेल्टर होम आज उसका घर है। इंतज़ार अकेला नहीं है, यहाँ उसके जैसे कुछ 40 बच्चे रह रहे हैं। ये सभी अपने घरों से भागकर दिल्ली आए हुए हैं। पुरानी दिल्ली रेल्वे स्टेशन के आसपास भटकते इन बच्चों को बटरफ़्लाई एक बेहतर ज़िंदगी देना चाहता हैं। इस शेल्टर होम में बच्चों को खाने-पीने से लेकर पढ़ाई तक की व्यवस्था है। यहाँ से बच्चों को स्कूल भेजा जाता है। उन्हें योग सिखाया जाता है। उनकी नशे और जुए जैसी लतों को दूर करने में मदद की जाती हैं। यहाँ काम करनेवाले बताते हैं दिल्ली भाग कर आनेवाले बच्चों की तादाद बहुत ज़्यादा है। पुरानी दिल्ली के आसपास एक ऐसा पूरा गिरोह काम करता है जो कि इन बच्चों का शोषण करता हैं और उन्हें पकड़कर बेच देता है। संस्था के एक सदस्य का कहना था कि यहाँ एक भी बच्चा ऐसा नहीं है जिसका शोषण न हुआ हो। यहाँ रह रहे बच्चे अलग-अलग राज्यों से है। ये बच्चे सालों तक अपनी असलियत छुपाकर रखते हैं। कितना भी पूछो घर का पता नहीं बताते हैं। कुछ अगर बता भी दे तो वापस नहीं जाना चाहते हैं। बेमक़सद घरों से भागे इन बच्चों के पास आज एक मक़सद हैं और वो है ख़जा़ना। ख़ज़ाना, का पूरा नाम चिल्डर्न डेवेलपमेंट ख़ज़ाना है। ये ख़जा़ना बटरफ़्लाई ने इन बच्चों के साथ मिलकर खोला है। इसमें बच्चे अपनी कमाई, अपनी बचत जमा करते हैं। महीने में 20, 30 या 50 रुपए अपने ही इस ख़ज़ाने में जमा करने वाले ये बच्चे इसे ख़ुद ही चलाते हैं। इनके शेल्टर होम में बाक़ायदा एक काउन्टर है। सभी के अकाउन्ट नंबर है और सभी के पास अपनी पास बुक है। ये पूरे मायनों में बैंक की तरह काम करता हैं। यहाँ पैसा जमा करनेवालों को ब्याज भी मिलता हैं। बटरफ़्लाई कि ये योजना बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने और फ़िजूलखर्ची से बचाने के लिए है। ख़ासकर नशे से बच्चों को दूर रखने के लिए। पास में पैसे न होने पर ये बच्चे नशा नहीं करते हैं। यहाँ रह रहा रोहित स्कूल जाता है और काम भी करता है। वो रोज़ाना दस रुपए ख़ज़ाना में जमा करता है, वो कहता है कि ऐसा करने से उसका भविष्य संवर जाएगा। गोपाल की उम्र कुछ 10 साल होगी। उसने फिलहाल ख़ज़ाना में 7 रुपए जमा करवाए है, वो बड़ी मासूमियत से बताता है कि जमा तो 27 थे लेकिन, उसने 20 रुपए चॉकलेट के लिए निकाल लिए। उत्तराखंड से भागकर आया गोपाल पायलट बनना चाहता है इसके लिए वो पैसे जमा करना चाहता है। ख़ज़ाना अपने आप में बहुत बेहतरीन पहल मालूम होती है। ये स्कीम फिलहाल भारत के 4 या 5 शहरों के साथ-साथ श्रीलंका, अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश और क़जाकिस्तान के कुछ शहरों में चल रही हैं। इसके चलते कई नौजवान अपने पैरों पर खड़े हुए हैं और एक बेहतर भविष्य की उम्मीद में बटरफ़्लाई इसे और आगे बढ़ाना चाहता हैं...

Sunday, August 23, 2009

...बोलो वृंदावन बिहारी लाल की


मेरी मां और पिताजी बहुत दिनों के बाद हमारे यहां कुछ दिनों के लिए आए। उसके बारे में बाद में बताऊंगा। अभी जन्माष्टमी से ठीक एक दिन के बाद मां-पिताजी को उनकी काफी उत्सुकता और इच्छा को देखते हुए उन्हें लेकर वृंदावन, मथुरा और आगरा गया था। लाख मना करने के बावजूद गाड़ी का किराया बहाने से पूछकर पिताजी ने जबरन थमा दिया- 3200 रुपये। सुबह साढ़े आठ बजे बिना कुछ खाये- पीये ( चाय तक नहीं) मां- पिताजी, मैं और मेरी पत्नी के साथ दो छोटे- छोटे बच्चे, मेरा छोटा भाई और उनकी पत्नी के साथ बेटा और एक साला एक बड़ी गाड़ी में सवार होकर निकले। तक़रीबन साढ़े दस बजे हम वृंदावन में थे…। सुबह से ही छाये काले बादल दिल्ली की बजाय वृंदावन पहुंचते- पहुंचते पूरे तरन्नुम के साथ बरस रहे थे। शहर के बाहरी हिस्से में रमणरेती पुलिस चौकी के पास लंबे जाम को देखते हुए वहीं एक गली में गाड़ी खड़ी कर दी। बाहर बेतहाशा बारिश और सड़कों पर गाड़ियों और लोगों की भीड़ को देखते हुए मैने अनमने ढंग से पिताजी से कहा कि पहले मथुरा चलते हैं ..लौटती वक़्त में आ यहां जाएंगे... पिताजी हैरान हुए। बोले, बारिश ही तो हो रही है... एकबार आए हैं तो बिना दर्शन के नहीं जाएंगे। अनमने ढंग से जूते गाड़ी में उतारकर मूसलाधार बारिश के बीच सड़कों पर आ गए। घुटने- घुटने भर पानी और टूटी सड़कों के कारण तलवे के नीचे आने वाले ईंट- पत्थर... लेकिन पिताजी और मां को बड़े मजे में आगे बढ़ते देखा तो जैसे जोश आ गया... महिलाओं में अलग किस्म का जोश था। लेकिन मंदिर का पता नहीं होने के कारण कुछ देर ऐसे ही भटकते रहे... गाइड भी हमें बार- बार घेर रहे थे लेकिन परिवार के साथ परेशानी में फंसा हुआ देख दो सौ –तीन सौ मांग रहे थे। मैं दे भी देता... लेकिन पिताजी की मौजूदगी में इतना पैसा पानी में देने की हिम्मत नहीं थी। सो, बड़ी मुश्किल से एक ऑटोवाला नज़र आया... पूछा तो बोला सौ रुपये में मंदिर तक पहुंचा देगा। हमसब उसी में बैठ गए। बीच- बीच में देशी- विदेशी श्रद्धालुओं की भीड़ और गाड़ियों का रेला। मंदिर पहुंचते- पहुंचते ऑटो में सवार होने के बाद भी हमसब तरबतर हो चुके थे और बारिश की गति और भी तेज। ख़ैर। ऑटो वाले ने हमें जहां उतारा वहां से मंदिर जाने के लिए गलीनुमा सड़क है। वहां आसपास की दुकानें राधामय थीं। किसी भजनीक का भजन बज रहा था- राधे- राधे ...राधे बरसाने वाली राधे। पिताजी ग़ौर से सुनने लगे... हमसबको भी बेहद मधुर लगा। फिर घुटने –घुटने भर पानी में हम मंदिर की ओर बढ़ने लगे। बूढ़े, बच्चे और महिलाओं की भीड़ पर मूसलाधार बारिश का मानो कोई असर ही नहीं था।...सब तरफ बस राधे- राधे की गूंज थी... काफी मशक्कत के बाद हम मंदिर परिसर में आख़िरकार पहुंच गए। बेहद छोटे मंदिर में काफी दूर से ही दर्शन कर लिया... भीड़ के बीच में मैं मां- पिताजी को लेकर अंदर गया लेकिन बहुत आगे तक नहीं जा पाया... मंदिर से बाहर बरामदे की तरफ आने के समय मां-पिताजी के चेहरे दमक रहे थे...भीड़ के साथ- साथ मां- पिताजी भी हाथ उठाकर राधे- राधे का जयघोष कर रहे थे.... मां का भाव कुछ ऐसा था जो कुछ वर्षों पहले जब मैं उन्हें पहली बार ऋषिकेष लेकर गया था उस समय लक्ष्मण झूला पर खड़ी मां रोने लगी... मैं हतप्रभ। मां से पूछा तो जैसे मुंडी हिलाकर खोयी हुई मुद्रा में खड़ी रही... बगल में ले जाकर पिताजी ने बताया कि अपने इधर ये माना जाता है कि बेटा अगर तीर्थयात्रा पर ले जाए तो जनम सफल हो जाता है... इसलिये खुशी के मारे रो रही है। ...तो मित्रो, पिताजी- मां वृंदावन तो आए थे अपने पैसे से लेकिन इसका श्रेय आज भी हम दोनों भाइयों को देते हुए जैसे आशीर्वाद दे रहे थे। धर्म में मेरी वाक़ई आस्था नहीं है लेकिन वृंदावन आकर, मां- पिताजी के दमकते- चहकते चहरों को देखकर धर्म से इनकार करने को जी नहीं चाहता। उसी मूसलाधार बारिश में पिताजी ने वापस चलने की इच्छा भी जताई जिससे कि समय पर मथुरा भी पहुंच जाएं। सो, आनन- फानन में दोबारा जब सड़क तक पहुंचे तो कोई ऑटोवाला नहीं था। दुकान में किसी तरह सब लोग खड़े हो गए... सबको चाय पिलवाई और उनसब को चाय पीता हुआ छोड़कर मैं तक़रीबन एक किलोमीटर दूर तक ऑटो की तलाश में निकल गया। बड़ी मुश्किल से एक ऑटोवाला तैयार हुआ और उसे लेकर मंदिर तक आया। उसमें सवार होकर निकले तो सड़कों पर इतना पानी भर गया कि ऑटो के भीतर भी चलते समय पानी घुसने लगा... ऑटोवाले ने स्थानीय ब्रज की भाषा में बोला कि जमुना मैया आज इधर ही आ गई लगती है... उसी ने इशारे से दिखाया... नजदीक में ही यमुना बहती हैं।... फिर सौ रुपये देकर हम अपनी गाड़ी तक पहुंच गए। (जारी)

Wednesday, August 19, 2009

जिन्ना के बहाने जसवंत का जलजला

बीजेपी ने अपने पार्टी नेता जसवंत सिंह को बाहर का रास्ता दिखा दिया। ये बहुत अप्रत्याशित नहीं है। लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी के भीतर सत्ता को लेकर जिस तरह की छटपटाहट देखी जा रही थी, ये उसी की परिणति है। पार्टी के बड़े नेता अपने ही दल के नेताओं के बीच सवालों के तीर से परेशान थे। जसवंत सिंह ने उन्हीं नेताओं में से एक थे जिन्होंने पार्टी नेतृत्व पर सवाल खड़ा किया... फिर पार्टी के संसदीय दल के नेता को लेकर असंतोष जाहिर कर चुके थे... ऐसे में जिन्ना पर लिखी उनकी क़िताब जैसे बहाना बन गई। पार्टी ने उन्हें बाहर करने में देरी नहीं की। अब उस जसवंत सिंह को पार्टी से निकालने का बीजेपी नेतृत्व का अंदाज जरा देखिये जो पार्टी में तीस वर्षों से थे... और वाजपेयी की सरकार में अहम जिम्मेदारियां उन्हें दी गई। जसवंत का दुख भी यही तो था कि जिस वाजपेयी सरकार में उन्हें हनुमान बताया जा रहा था... पार्टी ने उन्हें रावण की तरह बाहर कर दिया। पार्टी ने उनकी सदस्यता ख़त्म किये जाने को लेकर लोकतांत्रितक रवैया नहीं अपनाया। मसलन, कारण बताओ नोटिस जारी करना तो दूर उन्हें पहले तो फोन पर पार्टी की शिमला में होने वाली चिंतन बैठक में शामिल नहीं होने का निर्देश दिया गया...और जसवंत जब आखिरकार शिमला भी पहुंच गए तो उन्हें फोन पर ही उनके निष्कासन की सूचना भेज दी गई। दरअसल, बीजेपी का ये अंदाज भी नया नहीं है। जसवंत सिंह के निष्कासन से बीजेपी के भीतर लोकतांत्रिक ढांचे की पोल खोलता है। बीजेपी के साथ दिक़्कत ये है कि अपने हीरो को लेकर वो दिग्भ्रमित रही है। जैसे, कांग्रेस गांधी को मानती है... समाजवादी पार्टी लोहिया और बीएसपी डॉ.अंबेडकर को अपनी पार्टी का चेहरा मानती है। लेकिन बीजेपी के साथ दिक्कत ये है कि उसके पास ऐसे नेताओं की कमी है। डॉ.हेडगेवार, गोलवरकर जी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी सहित तमाम नाम ऐसे हैं जो मौजूदा दौर में बहुत ज्यादा जाने- पहचाने चेहरे नहीं हैं। ऐसे में बीजेपी को अगर अपने मुख्य विपक्षी कांग्रेस पर निशाना साधना हो तो गांधी पर साध नहीं सकते... क्योंकि लोगों को वो स्वीकार्य नहीं होगा। इसलिये पार्टी ने नेहरू का चयन किया। लेकिन बीजेपी में अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में ऐसा भी दौर आया जिसमें वाजपेयी नेहरू वाद के ज्यादा करीब दिखने लगे। पार्टी के कुछ नेताओं ने इसका रास्ता निकालते हुए जिन्ना की प्रशंसा करते हुए कांग्रेस को झुलसाने की कोशिश की। लेकिन बीजेपी जिन्ना को भी अपना हीरो नहीं मान सकती क्योंकि ये उसकी जड़ों को ही बर्दाश्त नहीं होगा और न ही इसकी स्वीकार्यता होती। सो, जसवंत की बलि चढ़ गई। अब देखिये कि जसवंत ने पहले ही साफ कर दिया उनकी क़िताब बीजेपी का दस्तावेज नहीं है। पुस्तक के विमोचन अवसर पर भी पार्टी का कोई नेता या विचारक नहीं था... वहां थे तो मार्क्सवादी आलोचक डॉ.नामवर सिंह, अधिवक्ता रामजेठमलानी और पत्रकार एम.जे.अक़बर। पार्टी ने भी जसवंत की किताब को उनका निजी विचार बताते हुए पल्ला झाड़ लिया था। फिर ऐसा क्या हुआ जो पार्टी को जसवंत से किनारा करना पड़ा? जिन्ना प्रेम ही अगर कारण है तो आडवाणी भी ये गुनाह कर चुके हैं।..पार्टी ने जसवंत को बाहर कर दिया लेकिन पार्टी के लिए सवाल अब भी ख़त्म हो गया क्या?... असल में पार्टी का सवालों से जी चुराने का यही रवैया मौजूदा राजनीति में उसके अप्रासंगिक होते जाने का बड़ा कारण है।

Saturday, August 15, 2009

शीला जी! ऐसा विकास आपको ही मुबारक़


दिल्ली की मुख्यमंत्री को मैं इसलिये जानता हूं क्योंकि वे रह-रहकर दिल्ली में नागरिक सुविधाओं में कमी के लिए बाहरी लोगों के बहाने पूर्वी यूपी और बिहार के मजदूरों, रिक्सा चालकों और ग़रीबों को जिम्मेदार मानती रही हैं। शीला दीक्षित को इसलिये जानता हूं क्योंकि महंगाई, लगातार बढ़ता अपराध, बटला हाउस एनकाउंटर जैसे तमाम मामलों के बावजूद विधानसभा चुनाव में दिल्ली की जनता शीला दीक्षित सरकार पर रीझ गई और दोबारा दिल्ली की गद्दी सौंप दी। ... लेकिन उन्हें नये कारणों से मैं जानूंगा। शीला दीक्षित ने तरक्की और विकास को लेकर नई स्थापना दी है। उन्होंने विकास और महंगाई का अनोखा संबंध देश की मूरख जनता को समझाया है। अद्भुत बिल्कुल मौलिक, खालिस कांग्रेसी परिभाषा उन्होंने गढ़ी है। उत्तर प्रदेश के रामपुर में गई शीला दीक्षित ने लगातार बढ़ती महंगाई की वजह बताई। शीला दीक्षित की मानें तो देश चूंकि बड़ी तरक्की कर रहा है इसलिए महंगाई बढ़ रही है। उनके कहने का लब्बोलुबाव था कि आज लोग विदेशों में शॉपिंग करते हैं, जो हमारी तरक्की का सबूत है।
यानी, हम जितनी तरक्की करेंगे, महंगाई उतनी बढ़ेगी। यानी, हमारे विकास दर के साथ महंगाई दर भी कुलांचे भरेगा। यानी, हमारी अमीरी के बरअक्स ग़रीबी का ग्राफ भी बढ़ता जाएगा। यानी, हिंदुस्तान में अनाज खा-खाकर अघाए लोगों की संख्या जितनी बढ़ेगी, कुपोषण पढ़ेगा और भुखमरी की संख्या भी बढ़ेगी। चलिये, शीला जी के बयान का ये मतलब न भी निकालें तो ये तो निकाल ही सकते हैं कि देश तरक्की कर रहा है। महंगाई के बावजूद (बकौल शीला जी)। देखिये कि शीला जी के उसी तरक्कीशुदा मुल्क़ में बुंदेलखंड आता है। उसी देश में विदर्भ है। उसी हिंदुस्तान में बिहार, बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा जैसे सूबे भी है जहां पिछड़ेपन की स्थिति लगातार भयावह हो रही है। इन राज्यों में शीला जी की दिल्ली की तरह की तरक्की नहीं है.. इन राज्यों में केवल महंगाई और पिछड़ापन है। इन राज्यों में कितने लोग विदेशों में जाकर शॉपिंग करते हैं... शीला जी ही बेहतर बता सकती हैं।
अर्थ नीति जानने वाले शीला दीक्षित के बयान को किस तरह से लेते हैं पता नहीं, लेकिन लगता है कि शीला दीक्षित अभी भी ध्यान बंटाने का कोई प्रभावी सियासी तरीका नहीं जान पाई हैं। महंगाई को लेकर शीला दीक्षित का बयान बचकाना लगता है। लेकिन शीला दीक्षित के उस बयान को लेकर क्या कहियेगा जो वे बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों को लक्ष्य करके देती रही हैं। दरअसल, शीला दीक्षित हमेशा ही बहानों की तलाश में रही हैं। लोग जब दिल्ली में पानी –बिजली की किल्लत की बात कहते हैं तो शीला जी कहती हैं कि दिल्ली में बहुत ज्यादा बाहरी लोगों के आने से ये स्थिति पैदा हुई। लेकिन शीला जी को उनके सचिवों ने बताया या नहीं, रोजी- रोटी की तलाश में दिल्ली आए इन्हीं बाहरी लोगों ने उनके मिशन कॉमनवेल्थ की तैयारियों का जिम्मा उठाए घूंम रहे हैं। चमचमाती सड़कों, फ्लाईओवर, मेट्रो लाइनों से लेकर तमाम जगहों पर इन सूबों से आए मेहनतकश ही दिल्ली के ऐश-ओ- आराम के इंतजाम में लगे हैं। शीला जी ने इन्हीं बाहरी वोटरों को रिझाने के लिए ऐन चुनाव के पहले उन लोगों को दिल्ली में ठौर देने का सब्जबाग दिखाया था जो महाराष्ट्र से पिट- पिटाकर आ रहे थे। दिल्ली के कई विधानसभा इलाकों में इन बाहरी लोगों ( शीला जी के लिए वोटर) की बड़ी संख्या को देखते हुए छठ पूजा के मौके पर अपनी मौजूदगी दिखा आई। अब चुनाव बीते दिनों की बात हो गई तो बाहरी लोगों पर नागरिक सुविधाओं की कमी का ठीकरा फोड़ रही हैं। क्या पता कॉमनवेल्थ गेम्स अच्छी तरह से संपन्न हो जाने के बाद इन बाहरी लोगों को दिल्ली से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया जाए। क्या पता आने वाले दिनों में महंगाई के लिए भी कुछ सूबों को यह कहते हुए जिम्मेदार बता दिया जाए वहां के लोग ज्यादा खाते हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश अनाज के आसमान छूते दामों के लिए हिंदुस्तान को यही कहते हुए तो जिम्मेदार ठहराया था। अगर इस रूप में देखें तो शीला दीक्षित का महंगाई को लेकर दिया गया बयान भी आधुनिक, तरक्कीपसंद और मौलिक लगता है। विकास और महंगाई का ये रिश्ता, जो शीला जी ने बताया है... ऐसा ही है तो ऐसी तरक्की शीला जी और उनके अपनों को ही मुबारक़।

Monday, August 10, 2009

मासूम मुहब्बत और दुविधाएं- लव आजकल


समीक्षा पढ़कर किसी फ़िल्म या क़िताब के बारे में मैं कोई राय नहीं बनाता था... लेकिन तहलका पर नई फिल्म -लव आजकल- की समीक्षा अच्छी लगी। फिल्मों में आपकी दिलचस्पी हो तो पढ़ें और वक़्त मिले तो देखने का मशविरा भी दूंगाः संजीव

फिल्म समीक्षा
फिल्म लव आजकल
निर्देशक इम्तियाज अली
कलाकार सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण

‘हम आम आदमी हैं. मैंगो पीपल..और हमें अमर नहीं होना. हमें इसी जन्म में मिलना है और साथ रहना है.’ यह मौजूदा दौर की प्रेम कहानी है जो अगले जन्म के वादों के भरोसे यह पूरा जन्म अलग अलग बिताने को कतई तैयार नहीं
इम्तियाज बॉलीवुड की अब तक की सबसे मासूम प्रेम-कहानियां बना रहे हैं और यह तब, जब उनके किरदारों के पास अभूतपूर्व खिलंदड़पना है. ओमकारा या कल हो न हो से कहीं अधिक लव आजकल के लिए सैफ को याद रखा जाएगा. यह ऐसी फिल्म है जिसे सैफ खास बना देते हैं और जो सैफ को और भी खास बना देती है. यह सिर्फ एक संयोग नहीं है कि इम्तियाज ने करीना और सैफ दोनों को उनके करियर की क़रीब क़रीब सर्वश्रेष्ठ फिल्में दी हैं. पिछले दशक की सतही प्रेमकथाओं से निकल कर हम भाग्यशाली समय में हैं कि ऐसी फिल्में देख पा रहे हैं. इम्तियाज के पास वास्तविक और मजेदार संवादों का ऐसा खजाना है कि आप हंसते और अभिभूत रहते हैं. दीपिका भी इतनी शोख और मुखर इससे पहले कभी नहीं दिखी. अगर आपने सोचा न था और जब वी मेट देखी है तो आपको पहले से ही पता होगा कि नतीजा क्या होगा? कहानी के कुछ हिस्से अलग परिस्थितियों में अलग ढंग से दोहराए जाते हैं और आप उन्हें हर बार पकड़ भी लेते हैं. साथ ही प्रीतम का मधुर संगीत है जिसके कुछ हिस्से इधर उधर से उठा लिए गए हैं. लेकिन तभी आप फिर से फिल्म में डूब जाते हैं क्योंकि कहानी वो तत्व नहीं है जो इम्तियाज की फिल्मों को इतना रोचक बनाती है. वह तत्व है उस कहानी को कहने का तरीका और उसके पीछे की ईमानदारी. आप जानते हैं कि मिलन होगा ही और सब कुछ अच्छा हो जाएगा, लेकिन आप नायक-नायिका के बीच होने वाले संवाद को सुनने को उत्सुक रहते हैं. वे जब पहली बार एक दूसरे को छूते हैं, तब से फिल्म के अंत तक उनके रिश्ते में बच्चों की सी मासूमियत है.
‘हम आम आदमी हैं. मैंगो पीपल..और हमें अमर नहीं होना. हमें इसी जन्म में मिलना है और साथ रहना है.’ यह मौजूदा दौर की प्रेम कहानी है जो अगले जन्म के वादों के भरोसे यह पूरा जन्म अलग अलग बिताने को कतई तैयार नहीं. वह हीर रांझा या रोमियो जूलियट की तरह अमर होने की बजाय साथ रहने को ज्यादा जरूरी समझता है. मोबाइल और इंटरनेट के युग में हमारे रिश्तों में जो दोस्ती, प्यार और कमिटमेंट के बीच की दुविधाएं हैं, यह उन दुविधाओं की फिल्म है. इसमें आपसी सहमति से होने वाले ब्रेक अप हैं, उनको मनाने के लिए दी गई पार्टियां भी और फिर दूरियों से बढ़ने वाला प्रेम भी जिसे आजकल की आपाधापी भरी जिन्दगी भी मैला नहीं कर पाई है. यह युवाओं की फिल्म है जिसमें गजब की मिठास है.गौरव सोलंकी

Tuesday, August 4, 2009

भोर के बेरौशन जुगनू

(भाग- दो) श्रीकांत और मुझमें शेरों को लेकर अजीब तरह की खींचतान चलती रहती थी। श्रीकांत इस मामले में ज्यादा धनी था और शेरों की समझ और पसंद दोनों ही उसके विद्वान होने का भ्रम पैदा करती। वो शायर तो नहीं मगर श्रोता अच्छा था। मुझे शेर पसंद थे लेकिन वे मुझे याद नहीं रहते...दूसरी दिक्क़त थी कि मुझे सीधे समझ में आने वाले शेर ही पसंद पड़ते। इसलिये श्रीकांत अक्सर मुझे ट्रक के पीछे लिखे शोरों का हवाला देते हुए मेरी पसंद को थकी हुई बताता। मसलन, अकेला हूं सफ़र में कोई नहीं, दुल्हन सजी है बाराती कोई नहीं- या फिर – रहा गुलशन तो फूल खिलेंगे, रही ज़िंदगी तो फिर मिलेंगे- टाइप की लाइनें बोलकर मुझे शर्मिंदा करने की कोशिश करता। मेरी पसंद इतनी वाहियात नहीं थी...और कई बार मैं श्रीकांत को कड़ी टक्कर देने की कोशिश करता। इधर- उधर पढ़ी लाइनों को मैं श्रीकांत पर किसी हथियार की माफ़िक दे मारता। मुझे याद है एकबार रिपोर्टर ने हिंदूवादी संगठनों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से रुष्ट होकर सभा की। इसमें एक हिंदूवादी नेता ने वाजपेयी के लिए शेर की लाइनें पढ़ी थी और सभा को कवर करने गए रिपोर्टर ने उन्हीं पंक्तियों से अपने ख़बर की शुरुआत की थी। मैं फर्स्ट पेज पर जब उसकी ख़बर पढ़ी तो शेर की लाइनें श्रीकांत पर रोब ग़ालिब करने की मंशा से उसे पहुंच गया। लाइनें थीं- हद-ए-ग़म हस्ती से गुजर क्यों नहीं जाते, जीना नहीं आता तो मर क्यों नहीं जाते, मंजिल को अगर पाना है तो तूफ़ां भी मिलेंगे, डर अगर लगता है तो किश्ती से उतर क्यों नहीं जाते।
मेरे हिसाब से लाइनें बड़ी ख़ास थी लेकिन श्रीकांत ने सुनते ही तपाक से कहा कि – इसकी अगली लाइनें सुनाऊं क्या ?... मैने सोचा मजाक कर रहा है। लेकिन उसका प्रवचन जारी था... इन लाइनों में कैसे जीने- मरने की बात कही गई है, मेरी लाइनें सुनो...कैसे उसमें जीवन की बात है... अगर मैं वाजपेयी होता तो इन्हीं लाइनों से जवाब देता- मौसम को इशारों से बुला क्यों नहीं लेते, रूठा है तो उसे मना क्यों नहीं लेते, दीवाना है तेरा कोई ग़ैर नहीं, मचला है तो सीने से लगा क्यों नहीं लेते ?... मैं हैरान- परेशान होकर बगलें झांकने लगा।
उर्दू जुबान को लेकर श्रीकांत एक हद तक जुनूनी था। उसने उर्दू –हिंदी डिक्शनरी ले रखी थी जिसमें बेशुमार शब्द थे...। श्रीकांत बिहार से मेरठ आया था... लेकिन मैं पक्के तौर पर नहीं जानता कि शायरी का श़ौक उसे कबसे था। मेरठ में होने वाले मुशायरे में थोड़ी देर के लिए ही सही, मगर जाता था। एकबार मुझे भी जबरन ले गया। मैं तभी राजी हुआ जब मुझे मेरा कोटा उसने पिलवा दिया... नशे के आलम में मुझे सिर्फ इतना भर याद है कि कोई खूबसूरत –सी मोहतरमा थीं जो शायरी कर रही थीं या फिर जाने क्या कर रही थीं। दूसरे दिन, श्रीकांत ने मुशायरे का पूरा वाक़या सुनाया तो मुझे अपने नशे में होने का अफसोस हुआ। दरअसल, ये मुशायरा 1857 की क्रांति के सौ वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था, जिसमें नामीगिरामी शायरों के साथ गीतकार गोपालदास नीरज भी आए थे। लेकिन मुशायरे में मौके की मर्यादा का खास ख्याल नहीं रखा गया था...।
मेहमान-ए- खुसूसी के शमां रौशन करते ही संचालक ने ये कहते हुए एक शायरा को बुलाया कि हाज़रीन...अब ऐसी शायरा को बुला रहा हूं जो ख़ुद में ग़ज़ल हैं और उन्हें सुनिये कम और देखिये जियादा। शायरा जब मंच पर आईं तो उन्होंने संचालक को लक्ष्य करते हुए कहा कि फलां भाई मुझसे मजाक कर रहे हैं इसलिये उनके लिए एक शेर। शेर का मतलब था कि मुझे इठराती नदी मत समझना, समुंदर हूं, गिरोगे तो डूब जाओगे। ... इसे सुनकर संचालक ने उसका जवाब ऐसा दे दिया जिससे वहां सन्नाटा छा गया और मंच पर बैठे गोपालदास नीरज परेशां। कुछ झुंझलाहट में उन्होंने मंच से उठकर जाने की कोशिश की। ख़ैर संचालक महोदय ने तुरंत माइक पर कहा- नीरज साहब की तबियत अचानक नासाज हो गई है और वे तत्काल जाना चाहते हैं... लिहाजा, आप सब कहें तो नीरज साहब को तुरंत पढ़वाकर उन्हें होटल भेज दूं। सबने सोचा, ये बूढ़ा ऐसी महफिल में क्या कर पाएगा जहां इस गिरे स्तर की शायरी हो रही हो। ख़ैर... नीरज आए तो पहले एक शेर पढ़ा और उसका असर ये हुआ कि अगले दो घंटे तक अनवरत लोगों ने केवल उन्हें ही सुना। शुरू में कहा गया उनका शेर था- अब न वो साज, न वो सोज, न वो गाने रहे/ अब न वो दर्द, न वो दिल, न वो दीवाने रहे/ साक़ी, अब भी तू यहां किस लिये बैठा है/ अब न दो जाम, न वो मय, न वो पैमाने रहे।– भीड़ पागल हुई जाती थी और नीरज पूरे तरन्नुम में जारी रहे। ( जारी)

Sunday, August 2, 2009

...राखी तुम टीआरपी हो


(पुरखे कह गए कि नारी तुम श्रद्धा हो.. राखी के स्वयंवर पर सरसरी निग़ाह डाली तो विश्वास हो गया।...राखी के बहाने नारी चर्चा ः संजीव)
राखी तुम आसक्ति हो। राखी तुम विरक्ति हो।
राखी तुम फ़साना हो। राखी तुम हक़ीकत हो।
राखी तुम जीवन हो। राखी तुम नाटक हो।
राखी तुम नज़ीर हो। राखी तुम बेनज़ीर हो।
राखी तुम असली हो। राखी तुम नक़ली हो।
राखी तुम गंगाजल हो। राखी तुम काला जल हो।

राखी तुम उष्मा हो। राखी तुम ठिठुरन हो।
राखी तुम ताजा झोंका हो। राखी तुम तपिश हो।
राखी तुम हिंदी हो। राखी तुम उर्दू हो।
राखी तुम सच्चाई हो। राखी तुम शिगूफ़ा हो।
राखी तुम शर्मीली हो...राखी तुम विद्रोही हो।
राखी तुम सनातनी हो। राखी तुम बिंदास हो।
राखी तुम विवाद हो। राखी तुम निर्विवाद हो।
राखी तुम आम हो। राखी तुम ख़ास हो।
राखी तुम परंपरा हो। राखी तुम विद्रोह हो।
राखी तुम वर्तमान हो। राखी तुम भविष्य हो।
राखी तुम बेबाक हो। राखी तुम बे-बात हो।
राखी तुम मासूम हो। राखी तुम मौक़ापरस्त हो।
राखी तुम हिट हो। राखी तुम फ्लॉप हो।
राखी तुम समस्या हो। राखी तुम समाधान हो।
राखी तुम विश्वास हो। राखी तुम अविश्वास हो।
राखी तुम भरोसा हो। राखी तुम झूठ हो।
राखी तुम इस पार हो। राखी तुम उस पार हो।
राखी तुम आंसू हो। राखी तुम हंसी हो।
राखी तुम दर्शन हो। राखी तुम मिथ्या हो।
राखी तुम आग़ाज हो। राखी तुम अंजाम हो।
राखी तुम चतुर हो। राखी तुम मासूम हो।
राखी तुम जवाब हो। राखी तुम लाजवाब हो।
राखी तुम मिसाल हो। राखी तुम बेमिसाल हो।
राखी तुम सवाल हो। राखी तुम जवाब हो।

(अब कुछ नये तथ्य ः क्षमा याचनाओं के साथ)
राखी तुम बाईस्कोप हो। राखी तुम सिनेमास्कोप हो।
राखी तुम चढ़ता हुआ सेंसेक्स हो। राखी तुम टीआरपी हो।

Friday, July 31, 2009

...तुम्हीं चल दिये दास्तां कहते- कहते

31 जुलाई 1981... आपके लिए थोड़ा अजीब होगा, लेकिन मुझे याद है। वो उमस भरी दोपहर... बिहार के छपरा शहर के विश्वेश्वर सेमिनरी हाईस्कूल के परिसर का सन्नाटा... मेरे नानाजी रिटायर हो रहे थे। उनका विदाई समारोह था। ये स्कूल उनके नाम पर नहीं था लेकिन संयोग था कि उनका भी नाम यही था... ये न भी हो तो भी इस स्कूल के जर्रे- जर्रे में उनके व्यक्तित्व का असर साफ था.. इसी स्कूल में तक़रीबन अट्ठारह वर्षों की सेवा के बाद यहां के प्रिंसिपल साब यानी, आचार्य विश्वेश्वर रिटायर हो गए थे। मेरे नानाजी और इस स्कूल के प्रिंसिपल साब की हनक का आख़िरी दिन। वही प्रिंसिपल साहब जो कभी भी किसी भी क्लास में अचानक घुस जाते और छात्रों के साथ शिक्षकों से भी सवाल पूछ बैठते। मेरे जेहन में वह तस्वीर ज़िंदा है... जब अपने यहां से छपरा जाकर मेरा नाम नानाजी के स्कूल में लिखवाया गया था। पांचवीं कक्षा में... मैं अपने मम्मी- पापा की याद में जार- जार आंसू बहाया करता था। स्कूल में खोया- खोया रहता था। धीरे- धीरे खुला... तो क्लास में अपने नानाजी के प्रिंसिपल होने की धौंस ग़ालिब करता क्लास को हलकान रखता। न होमवर्क करता न क्लास में किसी सवाल का जवाब देता। एकदिन क्लास मॉनीटर ...उसका उपनाम हमने भुआल ( एक ऐसा कीड़ा जो शरीर के किसी भी हिस्से को छू जाए तो दिन भर खुजली होती है)... रखा था, उसे ही नाक पर दे मारा और पेश्तर उसकी नाक के खून निकल आया... थोड़ा डरा और ख़ामोश बैठ गया। मॉनीटर ने मेरा नाम तत्कालीन प्रथा के मुताबिक ब्लैक बोर्ड पर लिख दिया... संजीव कुमार। क्लास मॉनीटर का काम ही यही था, कि शिक्षक की ग़ैर मौजूदगी में शैतानी करने वाले बच्चों का नाम ब्लैक बोर्ड पर लिख दे... और जो भी शिक्षक आए, वो शैतानों की फेहरिस्त पर निगाह डालकर यथासंभव दंडित करे। ख़ैर क्लास में शिक्षक आए..सबसे पहले मेरा नाम, उसके बाद पांच और नाम भी थे। उन्होंने डांट –फटकार करके बिठा दिया...औरों को छड़ी लगी। इतने में प्रिंसिपल साब आए तो उन्होंने नए सिरे से ब्लैक बोर्ड पर निगाह डाली... मैं शेखी भरी नज़रों से क्लास रूम को देख रहा था कि मेरे नाम के बाद के नामों पर प्रिंसिपल साब निगहबान होंगे और उनपर रहमतों की बारिश करेंगे। मगर मुझे तब काठ मार गया जब प्रिंसिपल साब ने जोर से चिल्लाकर मेरा नाम पुकारा.. मैं थोड़ी सकपकाई मुद्रा में खड़ा हो गया... उन्होंने चपरासी से बेंत लेकर मुझपर जमकर बरसाया... हालांकि दो बेंत में ही पैंट में ही शू- शू हो गया... मुझे कूटने के बाद प्रिंसिपल साब फ़ौरन कक्षा से चले गए, ये मेरे लिये दोहरी मार थी।
प्रिंसिपल साब से मैने इतनी मार खाई... लेकिन आदमी कभी नहीं बन पाया। वे मुझे राम गोज़ और आई गो का अंतर नहीं समझा पाए... मैं राम को भी गो ही कहता और खुद को भी गो... मुझे लगता कि भला राम ने क्या ग़लती कर दी कि उसके नाम के आगे इतना भारी- भरकम शब्दों का बोझ डालूं.. जबकि गो भर कह देने से सब समझ लेते हैं। तो परिणाम निकलता कि प्रिंसिपल साहब बेसाख्ता बिफर पड़ते। ख़ैर, प्रिसिंपल साब की सत्ता उर्फ अपने ननिहाल में मैं कंचे नहीं खेल सकता था... क्योंकि ये लफंगों का खेल है। मैं गोलगप्पे नहीं खा सकता था क्योंकि गोलगप्पे वाले का नाखून बड़ा होता है और उसमें बेशुमार गंदगी भरी होती थी। मैं पतंग नहीं उड़ा सकता था क्योंकि लोफड़ों का शग़ल है और इसमें छत के गिरने की आशंका होती है। नानाजी के लिए खेल बस फुटबॉल था... जो स्कूल के मैदान में खेलने वाले बड़ी उम्र के लड़के मुझे खिलाने को कतई तैयार नहीं होते।
प्रिंसिपल साहब के लिए उनके स्कूल के बच्चे ही उनके लिये सबकुछ थे... हम तो बेकार हैं... किसी काम के लायक नहीं (जैसा यदा-कदा कहते भी थे, और हम खुद को वैसा ही समझते भी थे... न भी समझें तो बाद में चलकर इसकी पुष्टि भी हो गई)। बोर्ड का इम्तिहान देने वाले छात्रों के घर लगभग हर शाम छह- सात बजे खुद पहुंच जाते... सबके घर का पता उनके पास होता था। छात्र को पढ़ते नहीं देखते तो उसके साथ- साथ मां- बाप की भी दुर्गति अलग होती। रिजल्ट आता और उनके स्कूल के बच्चे जिले भर में धूम मचाते तो जैसे कई दिनों तक प्रिंसिपल साहब खुशी से सो नहीं पाते। वाद- विवाद प्रतियोगिता के लिए अपने स्कूल के छात्रों का खुद चयन करते और उसे मंच पर बोलवाने की प्रैक्टिस कराते। एक दीपक था जिसे नानाजी कुलदीपक कहते... एक जगजीत सिंह था... सरदार... दोनों ने वाद-विवाद प्रतियोगिता में जिले स्तर पर कामयाब होने के बाद राज्य स्तर पर इनाम हासिल किया था। दोनों नानाजी के लिए बेहद प्रिय थे।... उनके स्कूल का अनुशासन ऐसा कि किसी भी छात्र की हिम्मत नहीं कि साइकिल पर बैठकर परिसर के भीतर आ जाए... किसी छात्र की हिम्मत नहीं कि परिसर के बाहर बिकने वाले गोलगप्पे खा ले। सिनेमा देखना तो दूर... किसी के बारे में जानकारी भी मिल जाए तो जैसे पिल पड़ते।
प्रिंसिपल साब फिल्मों के सख़्त ख़िलाफ़ थे। मैं अपनी बड़ी बहन के साथ नानाजी के यहां रहता था और हम दोनों भाई बहन फिल्में देखने के लिए नानीजी से चिरौरी करते। कभी- कभी नानाजी पटना जाते काम से तो हमारी बांछें खिल उठतीं... दोपहर में नानीजी हमें रिक्शे में लेकर फिल्म दिखाने ले जातीं... बैजू बावरा... भक्त प्रह्लाद, कोहिनूर जैसी कुछ फिल्में मुझे याद हैं... नानीजी नई फिल्में दिखाने में परहेज करतीं। घर लौटकर रिक्शे पर भगवान से प्रार्थना करता कि नानाजी अबतक घर न पहुंचे हों... देर रात जब नानाजी घर पहुंचते तो मुझे बड़ी मायूसी होती।
लेकिन 1996 आते- आते परिदृश्य बदल गया। मैं अगर किसी के बहुत क़रीब था तो नानाजी। तब वे प्रिंसिपल साब नहीं थे। मैं मुजफ्फरपुर में नौकरी करता था.. और विश्वकर्मा पूजा के दिन केवल इसलिये नानाजी के यहां पटना आ गया क्योंकि अख़बार में विश्वकर्मा पूजा की छुट्टी थी। दोपहर में एक ही समय में दोनों नाना- नाती ने भोजन किया... इधर- उधर की बातें हुई। दोपहर में सो गया... शाम पांच बजे नानाजी ने मेरे घुटने को हिलाकर बताता कि घूमने जा रहे हैं... मैं सोकर उठा तो नानाजी के इंतजार में कुछ देर बैठा रहा। नानाजी नहीं आए... देर शाम खबर आई कि किसी स्कूटर सवाल ने नशे की हालत में नानाजी को टक्कर मार दी। नानाजी कॉमा में चले गए। ...सात दिनों तक उसी स्थिति में रहने के बाद उनके प्राण छूट गए। सितंबर का महीना था। उनके कमरे में अक्सर एक प्रशस्ति पत्र टंगा मिलता था, जो उन्हें विश्वेश्वर सेमिनरी से रिटायरमेंट के समय किसी शिक्षक ने दिया था- बड़े शौक़ से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं चल दिये दास्तां कहते- कहते।

Monday, July 20, 2009

भोर के बेरौशन जुग़नू

मित्रों, जैसा कि मैंने आपसे वायदा किया था... एक कहानी की शुरुआत कर रहा हूं। एकबार फिर से आग्रह करूंगा कि इसे किसी की आत्मकथा न समझी जाए तो मुझे अच्छा लगेगा। कहानी लिखने की एक ईमानदार कोशिश भर है- संजीव
रात तक़रीबन साढ़े दस बज चुके थे। अभी- अभी मेरठ से लौटकर दिल्ली आया हूं। जहां मैं खड़ा हूं या यूं कहिये दारू पी रहा हूं... ये दिल्ली और ग़ाजियाबाद का बॉर्डर है। सामने आनंद विहार बस अड्डा है। यहां एक सरकारी ठेका है...सब खुले मैदान में जाम टकरा रहे हैं। अंग्रेजी- देसी... अमीर –ग़रीब सब। मेरे पास से एक अधेड़ उम्र का शराबी लड़खड़ाता हुआ आया... न हाथ में गिलास न पानी की बोतल ...बस एक देसी का पौव्वा... आसपास दूसरे लोगों के फेंके गए गिलास ढूंढ़ता रहा.. जब जल्दी से नहीं मिला तो अंजुली लगाकर बिना पानी के ही गटगटा गया.. मेरा जी मितला गया।...मैं मेरठ गया था...बस से अभी दस मिनट पहले ही लौटा हूं। मेरठ में दिनभर वहां रेडलाइट एरिया कबाड़ी बाज़ार में रहा। लोकेशन देखे और रेडलाइट में रहने वाली महिलाओं से भी बातचीत की। यहां के रेडलाइट एरिया पर मैं एक डॉक्युमेंट्री बनाने की कोशिश में हूं... महिलाओं तो न कहें, यहां के अभागे बच्चों को लेकर ये डॉक्युमेंट्री होगी।
असल में डॉक्युमेंट्री बनाने का आइडिया मेरा नहीं था। एक मेरे मित्र थे, श्रीकांत। तक़रीबन साल भर पहले सड़क हादसे में गुजर गए। अपने पीछे दो छोटे- छोटे बच्चों को छोड़ गए हैं। न्यूज़ चैनल में काम करते थे... और चैनल की गाड़ी से वापस घर लौटते समय हादसा हुआ। मौके पर ही मौत हो गई। श्रीकांत से मेरा काफ़ी पुराना ताल्लुक है। हम मेरठ में ही एक अख़बार के लिए काम करते थे। चौबीस घंटे में हमारा तक़रबन सोलह घंटे का साथ होता था। उस वक़्त उसकी शादी नहीं हुई थी... और हम देर रात गए उसके घर पर ही बैठकी लगाते थे। तब वो तो पीता नहीं था... और मुझे कोई ऐसा ठीया चाहिये होता था जहां बैठकर पी जा सके और घंटों बकैती की जा सके। शुरू में वो किसी उजबक़ की नाईं मुझे स्टील के गिलास में ओल्ड मॉंक रम ढालते हुए देखता। मैं उससे कहता कि कांच के गिलास मंगवा लो... लेकिन मेरी बात उसने कभी नहीं मानी। उसे गिलास का फ़र्क नहीं पता था। उसके यहां कोई नमकीन भी नहीं होती थी..... श्रीकांत ढाबे में चार तंदूरी रोटियां और दाल लेकर आता था... मैं उसी में अपनी शराब भी पी लेता था। मेरे पी लेने के बाद श्रीकांत अच्छे श्रोता की भूमिका में आ जाता। उसके लिए ये थोड़ा असहज होता था लेकिन पीने के बाद मेरी बदतमीजियों से वो वाक़िफ़ था। सो, मेरी हवाई बातों... चुगली... दूसरे साथियों को दी गई गालियां, सबकुछ जब्त कर लेता। उसके साथ सुविधा ये थी कि इसका ज़िक्र वो दूसरे दिन किसी से न करता, खुद मुझसे भी नहीं। पीने वाले के लिए श्रीकांत किसी आदर्श मित्र की तरह था। मैं देर रात गए उसे गले से लगाकर भाई- भौजाई करता हुआ... अपना स्कूटर स्टार्ट कर अपने शास्त्रीगनर वाले घर की तरफ़ निकल लेता। मुझे तो अपने घर पहुंचने का पूरा भरोसा होता लेकिन श्रीकांत अक्सर इसे लेकर सशंकित होता। ख़ैर, लगभग सात- आठ वर्षों तक अनवरत ये चलता रहा। जाड़ा-गर्मी बरसात... मौसम का इस मुलाकात पर कोई असर नहीं पड़ता। कई बार वो पीछा छुड़ाने की मुद्रा में आता तो दिनभर उसे खुला छोड़ने के बाद रात निकलने वक़्त मैं उसे धर लेता। अपने स्कूटर पर उसे पीछे बिठाकर दिल्ली चुंगी पर फ़ौरन पहुंचता... जब ठेका बंद होने को आता। फौरन से पेश्तर मैं अपना कोटा लेकर आता... इसी दौरान श्रीकांत बगल के ढाबे से अपनी रोटी। कई बार होता कि काम करते-करते उसे देर होती तो मैं बीच में ही स्कूटर से अपना कोटा लेकर दोबारा दफ़्तर में जाकर उसका इंतजार करता। पीता उसके यहां ही था...और कहीं भी नहीं।
मेरठ में रहते हम दोनों की कई बाईलाइन स्टोरीज धड़ल्ले से छपी। श्रीकांत का मिज़ाज कुछ अलग था... सोशल इश्यूज़ उसके पसंद के क्षेत्र थे। वहां कई बार रेडलाइट एरिया के बारे में उसने रिपोर्ताज लिखे थे... कई बार उसने मुझे इसके बारे में बताया भी था... कि कैसे तंग कमरों में ज़िंदगियां धधकती हैं। ...कि कैसे एक ही बिस्तर पर वेश्या और ग्राहक होते हैं और वेश्या के दूध पीते बच्चे की नींद कैसे टूट जाती है... ग्राहक बच्चे को एक हाथ धकेल देता है। उसकी मां चुप। खामोशी उसकी नियति होती है। बच्चे का फेंका जाना उसकी नियति। रेडलाइट एरिया के एक बच्चे के बारे में श्रीकांत ने बताया था कि अक्सर ग्राहक अपने साथ दारू की बोतल लेकर आता है। सौदा तय होने के बाद ग्राहक खुद और उस वेश्या को दारू पिलाता है। ये तय फॉर्मूला है... किसी भी रेडलाइट एरिया का। ग्राहकों का ये ट्रेंडनुमा शौक़ है। लेकिन कबाड़ी बाजार की एक वेश्या का बच्चा महज आठ साल की उम्र में ही शराबी बन गया...उसकी जब भी आंखें खुलती तो वो दारू की मांग करता था...। एकबार श्रीकांत ने इस बच्चे से बातचीत की उसके बारे में पूछा तो वो खुद तो कुछ नहीं बता पाया लेकिन उसकी मां ने श्रीकांत से बताया कि ग्राहक जब आते थे तो बच्चा बहुत तंग करता था... एक-दो बार ग्राहक ने शराब की एकाध ढक्कन बच्चे के मुंह में डाल दिया तो वो फ़ौरन परेशान करना छोड़ गाढ़ी नींद में सो गया। बच्चा अपनी मां के बेहद क़रीब था... ग्राहक जब भी आता तो बच्चा परेशान करता। इसलिये ग्राहकों ने बच्चे की नींद के लिए यही तरीक़ा आजमाया। आगे चलकर शराब बच्चे की जरूरत बन गई। बच्चे की मां की शिकायत थी कि दूसरे कोठे के बच्चों को ग्राहक चाट-पकौरी के लिए पैसे देकर बाहर भेज देते हैं तो बच्चे मान जाते हैं...मगर ये कलमुहां बग़ैर दारू के बिल्कुल ही न माने...अब तो उसके सब ग्राहक जानते हैं... आते ही बच्चे को थोड़ी –सी शराब दे देते हैं तो बौराता हुआ कोठे के सीढ़ी से नीचे चला जाता है।... बच्चे की मां पूरा मुंह खोलकर हंसती है तो उसके दांतों के बीच जमी काली परतें साफ दिखती हैं। ...तो श्रीकांत इन बच्चों पर ही डॉक्युमेंट्री बनाना चाहता था। उसे लगता था कि रंडियों पर फिल्में तो बहुत बनीं... लेकिन इन स्याह गलियारों के जुगुनूओं पर भी फिल्म बननी चाहिये। वो ख़ुद इसके लिए पूरी तैयारी कर रहा था। चूंकि मैं इसमें दिलचस्पी ले रहा था इसलिये उसने मुझे भी इसके बारे में बताया और चाहता था कि मैं भी इसमें उसकी मदद करूं। वो फिल्म बनाकर शोहरत चाहता था... पैसा चाहता था और सबसे ज्यादा एक पत्रकार के तौर पर एक इत्मीनान। वो दिल्ली भी गया तो ये डॉक्युमेंट्री उसके दिल में रही, किसी माशूक की तरह। न्यूज़ चैनल में गया तो प्रोडक्शन का काम उसने बखूबी समझा।...उसके दिल में इस डॉक्युमेंट्री को ज़िंदा करने की उम्मीद बनी रही। वो सड़क चलते उन ग़रीब बच्चों को ग़ौर से देखता –सुनता था जो भीख़ मांगने के लिए गीत गुनगुनाते...वो ऐसे ही किसी गीत से अपनी डॉक्युमेंट्री की शुरुआत करना चाहता था। उसने वॉयस ओवर करना सीखा, सिर्फ डॉक्युमेंट्री के वास्ते। उसने कई बार बताया था कि कैसे वो बोलेगा... स्क्रिप्ट क्या होगी। वो अपनी पत्नी मयूरी को भी इसके बारे में बहुत कुछ बताता था... बाक़ायदा पका देता था हमसबको। मैं दारू के नशे में होता तो श्रीकांत मुझे जाने क्या- क्या लगता। समाज सुधारक... एक जुनूनी और एक चिरकुट पत्रकार... जो कभी जीवन में पैसा नहीं बना पाया..चुतियापे की बात पर ज़िंदगी निकाल दी...उसके किताबों के ढेर मुझे बकवास लगते। उसका शायराना मिजाज़ और फक्कड़ तबियत से तब घिन होती जब मैं उससे दारू के लिए कुछ रुपये मांगता और वो शर्तिया कहता कि नहीं हैं..न तो अपनी गाड़ी ख़रीद पाया और न ही जीवन बीमा करा पाया। बीमा को लेकर उसका तर्क अलहदा था... उसे ये सब बकवास लगता था।..इसी चुतियापे को जीता हुआ आख़िरकार बीच सफ़र में ही दुनिया को अलविदा कह दिया... एक साल पहले भेजा गया उसका मैसेज मेरे मोबाइल के मैसेज बॉक्स में अब भी पड़ा है। मैने संभालकर रखा है... क्योंकि जवाब देने का भी वक़्त उसने नहीं दिया... मैं कई दिनों से न उससे बात कर पाया था और न ही मुलाकात हो पाई थी। मैं भी अपने चैनल के काम में मशरूफ़ था और वो उससे भी कहीं ज्यादा। सो, एकदिन उसका मैसेज आया- सांसों का पिंजरा किसी दिन टूट जाएगा, फिर मुसाफ़िर किसी राह में छूट जाएगा, अभी साथ हो तो बात कर लिया करो, क्या पता कब ये दोस्त तुम्हारी ख़ामोशी से रूठ जाएगा।
(जारी)

Wednesday, July 15, 2009

...फिर से कुछ किस्से

मित्रों, मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि कहानियों और उपन्यासों का दौर चला गया। मैं इस बात को मान नहीं सकता कि किस्सागोई थम गई है और लोगों की इसमें दिलचस्पी नहीं रह गई है। मैं असहमत हूं कि कहानियां मर रही हैं।... यह अलग बात है कि कहानियां सुनने या पढ़ने की बजाय कहानियां देखने में लोगों की दिलचस्पी अधिक है। टीवी सीरियल्स से लेकर न्यूज चैनल्स तक को देख लें... सब जगह कहानियां ही कहानियां हैं। उन्हें कहानियों की तरह की दिखाया जाता है और लोग कहानियों की तरह ही देखते हैं। ख़ासतौर पर न्यूज़ चैनल्स में शिगूफ़ेबाजी की तरह ( वह चाहे फिल्मी हो या सियासी या फिर सामाजिक मसले के तौर पर फिज़ा, मटुकनाथ, पांडा...आदि अनादि) परोसे जाने वाली ख़बरें। इसमें न्यूज़ वेल्यू ढूंढ़ें तो कहां हैं लेकिन इसे लोग इसलिये देखते हैं क्योंकि उसमें कथा है... कहानी का फ्लेवर है... किस्से का तत्व है। लोग देखते हैं इसलिये उसमें टीआरपी भी है।... यह भी न हो तो आप सड़क चलते देखें... एक लड़का- लड़की आपस में गर्मजोशी से मिलते हुए दिख जाएं तो भीड़ थम जाती है... सरेराह चलते आपस में झगड़ने लगें तो तमाशबीनों की भीड़ दुगुनी हो जाती है।... कोई पियक्कड़ नशे के आलम में बेजा हरकतें करता है तो तमाशबीनों को मजा आ जाता है। सास- बहु का झगड़ा हो तो पड़ोसियों के कान खड़े हो जाते हैं। ...ये सब क्या है?... ज़िदगी की बिखरी हुई कहानियां ही तो हैं जिसमें लोगों की दिलचस्पी है। तो कहानियां न तो ख़त्म हुई है और न ही इसके श्रोता, पाठक और दर्शक कम हुए।
मैं अख़बारों में तो छपता रहा हूं लेकिन कभी कहानियां छपवाने जैसा सामर्थ्य नहीं रहा। ...एक बेहतर पाठक जरूर रहा हूं। सब पढ़ लेता हूं... अच्छा- बुरा। लेकिन ब्लॉग जैसा जरिया मिला है तो मुझे भी वर्षों पुरानी इच्छा बलवती हुई है। कहानियां लिखने का साहस जुटा पाया हूं। मैं ऑन लाइन ही यह प्रयोग करना चाहता हूं... पता नहीं पूरा कर भी पाऊंगा या नहीं लेकिन शुरू करने का इरादा जरूर है। तीन- चार दिनों में एक-एक पन्ने आपको पढ़वाना चाहूंगा। कहानी बहुत लंबी हो सकती है और छोटी भी... कोई गारंटी नहीं दूंगा क्योंकि कहानी को बेहद स्वभाविक ढंग से अंत करना चाहूंगा... कहानी पर कुछ थोपूंगा नहीं। हां, इसके किरदारों को समझते हुए उसे मेरी आत्मकथा नहीं मानने की गुजारिश भी करूंगा... क्योंकि कहानी हमारे- आपके जैसों की होगी।... वैसे, इसे मेरी आत्मकथा मानकर ही पढ़ने में आपको ज्यादा दिलचस्प लगे तो भला मैं आपको रोक भी कैसे सकता हूं। ...तो दो- तीन दिनों के भीतर इसकी शुरुआत कर दूंगा। इतनी लंतरानियों के लिए आपने वक़्त दिया, शुक्रगुजार हूं।

Tuesday, July 14, 2009

इस जवानी की कोई उम्र है क्या?

संसद में इस बात पर चर्चा सरगर्म है कि किसने सबसे ज्यादा युवाओं को सियासत में भागीदारी दी। कांग्रेस कह रही है कि राहुल बाबा ताजा हवा के झोंके की तरह हैं... जिन्हें कलावती की मुफ़लिसी का बखूबी अहसास है। सो, जिम से लेकर तमाम जगहों पर वर्जिश करने का अभिनय करते- करते भी बुजुर्ग आडवाणी नकार दिये गए। युवा भागीदारी के नाम पर बीजेपी के पास वरुण गांधी हैं। लेकिन युवाओं को भागीदारी के मसले पर बीजेपी की अपनी राय है। उसका दावा है कि उसने सबसे ज्यादा संख्या में युवाओं को टिकट थमाए और सबसे ज्यादा संख्या में युवा उसके पाले में हैं। सुषमा स्वराज मीडिया से आहत हैं कि ख़्वामखाह युवा नेतृत्व के नाम पर कांग्रेस को हवा दी जा रही है... जबकि इसका श्रेय तो बीजेपी को जाना चाहिये था। लालू यादव जैसे नेता भी मानने को राजी नहीं हैं कि वे बूढ़े हो गए। संसद में बजट पर बहस के दौरान एक सांसद ने उनकी उम्र को लेकर टीका- टिप्पणी की तो लालू अपने अंदाज में बोल बैठे कि वे यादव हैं... और यादवों में कहा जाता है कि साठा तो पाठा। यानी लालू बूढ़े नहीं हैं... चाहे साठ पार के हों मगर खुद को पट्ठा बता रहे हैं।
उसी तरह क्रिकेट में। क्रिकेट हिंदुस्तान की रगों में धड़कता है। सो, इस खेल के खिलाड़ी भी बुढ़ाने से घबराते हैं। बूढ़े होने के बाद भी मानते नहीं। कहते हैं कि फिटनेस से क्या होता है... तजुर्बा चाहिये। आंकड़े गिनाते हैं कि फलां- फलां पिचों पर विपरीत परिस्थितयों में इतने रन बटोरे। अपना रन औसत बताते नहीं अघाते हैं। और तब भी सिलेक्शन कमेटी उन्हें बूढ़ा मानते हुए चयन करने से मना कर दे तो अंत में सौरव दादा की तरह युवा कप्तान के कंधों पर सवार होकर मैदान से तक़रीबन फेंके जाते हैं। अभी तो शुरुआत है... दादा की तरह ही कई और भी इसी तरह क्रिकेट गति को प्राप्त होंगे।
ठीक उसी तरह फिल्मों में भी। देवानंद से लेकर सैफ़ अली ख़ान तक देख लीजिये। देव साहब तो सदाबहार हो गए। अमिताभ ने सफेद दाढ़ी के साथ अपने उम्र को तो स्वीकार कर लिया लेकिन फिल्मों को लेकर अपनी दावेदारी नहीं छोड़ी... सैफ़ और सलमान का तो फिर भी क्या कहना। इन्हें बुढ़ाती उम्र का सितारा भले कौन और कैसे कहे भाई... एक-से- एक बिजलियां भला जिस पर गिर रही हों तो बुढ़ापा कैसा।
इतनी भूमिका का आशय यह था कि जवान हिंदुस्तान में युवाओं की बातें इतनी ज्यादा हो रही हैं कि ऐसा लगता है कि तमाम उम्रदराजों ...बूढ़ों को तो अरब सागर में डूबकर जान दे देनी चाहिये। नौकरियों में उम्र एक बड़ा फैक्टर हो रहा है। दुनिया के तमाम सौंदर्य प्रसाधन आपको जवान दिखाने का दावा कर रहे हैं। घरों में उम्र पहले से ही अहम तथ्य है जिसने सास- बहू में झगड़े की पटकथा लिख दी। जिसने बाप और बेटे में फर्क पैदा कर दिया। जिसने वृद्धाश्रम जैसी बेहूदा परिकल्पना को जन्म दिया। सवाल इतना भर है कि क्या हिंदुस्तान हमेशा के लिए ऐसा ही जवान बना रहेगा या फिर इसकी जवानी की भी कोई उम्र है। अभी एक आकलन था कि आने वाले तीस वर्षों में मौजूदा पीढ़ी वृद्धावस्था की ओर बढ़ेगी और जनसंख्या नियंत्रण के उपाय कारगर होंगे तो साठ फीसदी आबादी बूढ़ी होगी। इसलिये हर उम्र की अपनी जरूरत होती है और दुनिया को भी हर उम्र के लोगों की जरूरत होती है।

Sunday, July 12, 2009

...ई नीतीशे बदलेगा बिहार!

दोस्तों, ऑफिस से लौटते वक़्त शाम में अक्सर नोयडा के सेक्टर सोलह में इंडिया टीवी के कोने पर खड़ा होने वाले भुट्टा वाले के यहां रुककर एकाध भुट्टा जरूर खाता हूं। उसके ठेले पर एक टीन का बड़ा ड्रम है जिसपर लिखा है छिल्ला... यानी मक्के के उबले हुए दाने। पांच रुपये में एक भुना हुआ भुट्टा देता है... नमक और नींबू निचोड़कर। तबीयत खुश हो जाएगी। और उसकी बातें जरा सुन लें तो ग़जब का बोध होता है। पहले मैं अपने काम से काम रखता था... एकदिन खुद उसने टोका तो बातचीत शुरू हुई। पूछा कहां काम करते हैं... तो बताया। उसने कहा कि उस चैनल में उसका कोई रिश्तेदार इलेक्ट्रीशियन है ...कोई महतो जी। बिहार का रहने वाला है। जब बताया कि मैं भी बिहार का हूं तो पूछा कितना कमा लेते हैं?... मैने कहा कि बस परिवार चल रहा है... पूछा कि दस हजार तो मिल ही जाता होगा?... मैने कहा कि हां पंद्रह साल से नौकरी कर रहा हूं तो इतना तो मिल ही जाएगा। फिर बात निकली बिहार पर। उसने कहा कि नीतीश सरकार ठीक काम कर रही है... मैने हामी भरी। ...मगर नितीश सरकार से उसे भी शिकायत है कि ...मध्यमा पास लोगों को टीचर की नौकरी दे दी। क्या करेगा ऐसा टीचर?... जब खुदै नहीं पढ़ा है तो बच्चों को तो चौपट ही कर देगा न ? उसने कहा कि अगर कुछ साल और रह गया नितीश तो हम सबको यहां परदेस में बात- बोली सुनने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी... मगर कहीं फिर लालू आ गए तो मुश्किल हो जाएगी। उसकी माने तो पिछले पंद्रह साल से इसी इलाके में भुट्टा बेचता रह गया... कभी मेन रोड पर ठेला लगाता था... पुलिस वाले को रोजाना सौ रुपये देता था मगर अब पैसा लेकर भी मेन रोड पर ठेला लगाने नहीं देता है और मारकर भगाता भी है... कईबार उसके ठेले को पलट भी दिया गया। सामान का नुकसान हुआ और उसका मान आहत हुआ। नितीश के बिहार को लेकर वह उम्मीदों से भरा हुआ है। उसे नहीं मालूम की बिहार में विकास दर कैसा है लेकिन उसे अहसास है कि बिहार बदल रहा है। मैने कहा कि तुम्हारे हिसाब से कितने साल बाद बिहार पूरी तरह से बदल जाएगा... उसने कहा कि नितीश को अगर दूसरी बार भी शासन मिल गया तो जरूर बदलेगा... हम भी यहीं हैं और आप भी यहीं हैं... देख लेना।... क्या वाक़ई ऐसा है?

Sunday, July 5, 2009

बस में हो तो खुशी से पीछे हट जाऊं, पर ये नामुमकिन है

बिनायक सेन का इंटरव्यू तहलका के ताजा अंक में छपा है। इसे पढ़ाना एक अनुभव से भी गुजरना भी हैः संजीव

जेल के अनुभव और अपने सरोकारों पर हाल ही में रिहा हुए मानवाधिकारकर्ता बिनायक सेन की शोमा चौधरी से बातचीत
अपनी आजादी खो देने के अनुभव ने आपको किस तरह से प्रभावित किया?
(एक लंबी चुप्पी) मानवाधिकारों के लिए लड़ते हुए अगर आप कभी जेल नहीं गए तो आपका बायोडेटा अच्छा नहीं लगता. (हंसते हैं). मगर मुझे लगा कि ये बस 10-15 दिन की बात होगी. यदि मुझे ये पता होता कि वहां दो साल बिताने हैं तो मैं कुछ कम खुश होता. जेल में आपको दूसरों से अलग कोई सहूलियत नहीं मिलती और इस मायने में यहां रहने वाले सभी लोग बाहरी दुनिया के उलट आपस में बराबर होते हैं. जेल का अनुभव अक्सर खराब ही होता है मगर मेरे लिए ये दिलचस्प था. वहां की स्थितियां खुशनुमा तो बिल्कुल नहीं थीं और मुझे गर्मी, मच्छरों और गंदे खाने से जूझना पड़ा. मगर सिर्फ मैं ही नहीं बल्कि सभी इनसे जूझ रहे थे इसलिए मुङो इससे कोई समस्या नहीं थी. जेलतंत्र भ्रष्टाचार पर चलता है. लेकिन कुछ मायनों में यह भ्रष्टाचार सकारात्मक है क्योंकि इससे वह मानवीय भावना दिखती है जिसका व्यवस्था ने पूरी तरह से दमन कर दिया है. जेल में स्टोव रखना अवैध है लेकिन यहां लगभग हर कैदी के पास अपना स्टोव था और सुबह छह बजे आपको हर कोई दाल बनाता हुआ मिलता था.
आप लंबे समय के लिए भीतर रहे. इस दौरान क्या आपने कभी खुद को भावनात्मक रूप से टूटा हुआ महसूस नहीं किया?
इन हालात में आपकी मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ता है. जेल में कुछ समय रहने के बाद मैं लोगों के नाम, शब्द आदि भूलने लगा. इससे मैं घबरा जाता था. यहां तक कि मैं अपने कुत्तों के नाम भी भूल गया था. रोजमर्रा की बातचीत न हो पाए तो ऐसा ही होता है. मैं अक्सर अवसादग्रस्त हो जाता था. मेरे दिमाग में तरह-तरह के नए विचार थे लेकिन मैं उन्हें लिख नहीं पाता था. जेल में आपको मानवीय प्रकृति के कई रूप और परिस्थितियां देखने को मिलती हैं. इस सब ने मुझे कानून के बारे बहुत गहराई से सोचने पर मजबूर किया. जैसे कि दफा 302 हत्या के मामले में लगाई जाती है. लेकिन इसे मनगढंत मुकदमों से लेकर आत्मरक्षा की कार्रवाई, गैंग-वार और सुपारी लेकर काम करने के मामले में भी लगाया जा सकता है. जेल में 25 साल का एक लड़का मेरा काफी अच्छा दोस्त बन गया था. जब ये लड़का 19 साल का था तब उसने अपने पिता की चाकू मारकर हत्या कर दी थी क्योंकि वो शराब के नशे में उसकी मां को बुरी तरह से पीट रहा था. अपनी मां को मरने से बचाने के लिए उसके पास यही आखिरी विकल्प था. इस लड़के को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. लेकिन सबसे भयावह बात थी.
अधिकारियों के दिल में ऐसे कैदियों के लिए कोई इज्जत न होना. उन्हें वह बुनियादी गरिमा भी नहीं मिलती थी जिसका हर इंसान हकदार होता है. हर शाम को जेल के लंबरदार कैदियों को लाठियों और चप्पलों से पीटते थे. एक आदमी पर 10 लोग झपटते थे. इसके अलावा और भी कई बुरी चीजें थीं. यदि मैं इसकी शिकायत करता तो अधिकारी मुझे ऐसे देखते जैसे मुझमें अक्ल नाम की कोई चीज न हो. वहां कई लोग हैं जो निर्दोष हैं. मगर व्यवस्था की बर्बरता को झेलते रहने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं. इसलिए मैं यहां खुद को असहाय महसूस करता था. अपने शुभचिंतकों को दूर से देखना, आधे घंटे की मुलाकात के लिए मेरी पत्नी (इलीना) का हर सप्ताह ट्रेन से यहां आना और जाना बेहद भयभीत कर देने वाला अनुभव था.
सरकार आपको खामोश करना चाहती थी. इन दो सालों में क्या कभी आपको लगा कि अब इस विरोध को खत्म किया जाए?
मैं बुनियादी रूप से महत्वाकांक्षी व्यक्ति नहीं हूं. यदि मैं इन हालात से मुंह मोड़ सकता तो खुशी-खुशी ऐसा कर लेता. मेरी बेटियां इस समय अपनी उम्र के सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर हैं. अपनी पत्नी इलीना का मैं बेहद सम्मान करता हूं. मगर मध्य भारत के इस इलाके में हालात बेहद खराब हैं. यहां युद्ध के हालात हैं. इस पर ध्यान देने और स्थितियों को सुधारने की दिशा में काम करने की जरूरत है. मुझे लगता है कि मैं ऐसा करने की स्थिति में हूं. हालांकि मैं इस समय कुछ दुविधा में हूं कि इस मसले पर किस तरह से आगे बढ़ा जाए. मेरा हमेशा से मानना रहा है कि हिंसा कभी आखिरी विकल्प नहीं हो सकती. बल्कि हिंसा का चक्र तो कभी खत्म नहीं होता और एक बार इसमें घुसने के बाद आप इससे बाहर नहीं निकल पाते. माओवादी और सरकार दोनों ही इस चक्र में शामिल हो चुके हैं और इस वजह से लाखों लोगों की जिंदगियों पर इसका बुरा असर पड़ रहा है. डॉक्टर और खासकर बाल चिकित्सक होने के नाते हर कुपोषित बच्चे को देखकर मेरे मन में रोष पैदा होता है. ये चीजें आपको परेशान करती हैं. ये असमानताएं और समस्याएं अपने आप पैदा नहीं हुईं बल्कि किसी ने इन्हें बना कर रखा है. किसी न किसी को तो माओवादियों और सरकार के बीच जारी सैन्य संघर्ष को खत्म कराने और दोनों पक्षों को राजनीतिक विरोध या राजनीतिक समाधान के लिए तैयार कराना होगा. इसके अलावा राज्य में जारी उस संगठनात्मक हिंसा पर सवाल उठाने की जरूरत है जिसकी वजह से गरीबी दूर नहीं हो पा रही. यदि बस में हो तो खुशी से पीछे हट जाऊं, पर अब ये और भी नामुमकिन लगता है.
अपने समर्थन में चले व्यापक अभियान से क्या आप हैरान हुए?
मेरा मानना था कि हम छोटे-मोटे लोग हैं. लेकिन अब लगता है कि ऐसा नहीं है. ये अभिभूत कर देने वाला अनुभव था. इससे सच्चाई के पक्ष में आवाज उठाने की हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है. अभी तक हमने जो काम किया है वह न के बराबर है. दुविधा यह है कि जिन रास्तों पर चलकर इन मुद्दों को बेहतर ढंग से हल किया जा सकता है उन पर चलने का मतलब है सरकार की नाराजगी मोल लेना. लेकिन हम अपने काम में कमी नहीं कर सकते.
क्या आपको जेल में नारायण सान्याल से मुलाकातों का कोई अफसोस है?नहीं, मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि इसका ये नतीजा होगा. मैंने सान्याल के लिए जो भी किया उस सब के लिए पुलिस और सरकार से पूर्व अनुमति ली गई थी. इसके अलावा मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते आप उस व्यक्ति की मदद करते हैं जिसे कानूनी और चिकित्सा सहायता की जरूरत है, इसमें आप सीमारेखा आखिर कहां खीचेंगे?

Sunday, June 21, 2009

तुम्हारी ही मुट्ठी में आकाश- तारा

दोस्तों, बहुत दिनों बाद आपसे बात हो रही है। एक सूचना के साथ बात शुरू करता हूं कि मेरे बड़े बेटे स्वप्निल और भतीजे अमर्त्य का एडमीशन उस स्कूल की पहली क्लास में हो गया जहां मेरा भाई चाहता था। उस स्कूल में हुआ जहां दोनों बच्चों के साथ दोनों की मम्मियों ने दो- दो दफे इंटरव्यू और लिखिति परीक्षा दी थी। उस स्कूल में बच्चों का दाखिला हो गया जहां मेरे पिता जी यानि बच्चों के दादाजी का सपना था। वे तो अभी से ही छठवीं क्लास के बाद दोनों बच्चों को दून स्कूल में एडमीशन के लिए हम सबको मानसिक रूप से तैयार करने में लगे हुए हैं। ख़ैर... अभी उस स्कूल में ये एडमीशन हुआ जहां एक बच्चे का सत्तर हजार रुपये सिर्फ दाखिले के लिए वसूला गया और हर माह का ख़र्च मेरी हैसियसत से ज्यादा है। आप पूछेंगे कि क्या मैं नहीं चाहता था। कौन नहीं चाहता है अपने बच्चों का भला। लेकिन मुझे उन बच्चों का ध्यान आ जाता है जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। मुझे उन बच्चियों की याद आ जाती है जो कई किलोमीटर पैदल गांव की पगडंडियों पर चलकर स्कूल पहुंचती हैं। कॉलेज इसलिये नहीं जा पाती क्योंकि आसपास सुविधा नहीं होती... आसपास कॉलेज हो भी तो किसान पिता की बेबसी आड़े आ जाती है। मुझे गांधी जी याद आते हैं जो एक असफल पिता साबित हुए- ऐसा सोचा-समझा जाता है। दौलतमंद नेहरू परिवार और बाद में बिरला घराने गांधी जी के बेहद क़रीब थे... लेकिन गांधी जी फ़क़त संत। जिन्होंने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल की शिक्षा दिलाई। गांधी जी की आंखों में पूरे हिंदुस्तान के बच्चे थे। मुझे गांधी जी की याद इसलिए आ रही है क्योंकि दोनों बच्चों के दाखिले के बाद जब अपने घर आया तो मेरे साढ़ू की बेटी भी थी... और उसके मम्मी –पापा भी। बच्चों के दाख़िले की सूचना पर उस बच्ची को ख़्वामखाह ही मन लगाकर पढ़ने की सलाह दी जाने लगी। सिर झुकाए बच्ची सुनती रही। उसके पास विकल्प ही क्या था। बच्चों के एडमीशन का मेरा थोड़ा बहुत उत्साह भी जाता रहा। मुझे अपने दिन भी याद आने लगे जब घर में कोई बच्चा अच्छा करता तो हमारे खाते में नसीहतों की फेहरिस्त होती। ख़ैर इन सबको दरकिनार करते हुए मैं अपने साढ़ू की इस प्यारी सी बच्ची के कान में कहना चाहता हूं- बेटे... तुम सफलता की उन- उन ऊंचाइयों को छूओगी ... जिसकी रौशनी में हम सब चौंधिया जाएंगे... बच्चे खूब पढ़ो....।

Sunday, May 31, 2009

एक मरीज़...दस घंटे और हलकान भीड़

शनिवार को अपने रिश्तेदार को फिर दिल्ली के एम्स में लेकर गया था। सुबह चार बजे जागे और पौने पांच बजे घर से निकलकर साढ़े छह बजे एम्स पहुंच गए। लाइन इसबार भी लंबी थी। लाइन की शुरुआत में मेरठ के एक सज्जन खड़े थे जिनके हाथ में एक्सरे रिपोर्ट वाला बैग था। बैग पर लिखा था- मेरठ स्कैन सेंटर, इव्ज चौराहा, पूर्वी कचहरी रोड, मेरठ। उनके पीछे पीठ खुजा रहा बिहार से था। उसकी बोली से लगा। एक उत्तरांचल साइड की महिला थी। एक पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक बुजुर्ग। हरियाणा के लोग भी लाइन में थे तो पंजाब के भी इक्का- दुक्का लोग शामिल थे। मतलब, हर सूबे से कोई न कोई यहां था... एम्स का मारा। तो साहब साढ़े आठ बजे खिड़की खुली तो मैने अपने रिश्तेदार का नंबर जानने के लिए मुंडी गिनना शुरू कर दिया...एक..दो...तीस..चालीस...लगभग पैंसठवां नंबर था। लाइन में लगभग ढाई सौ लोग खड़े थे। थोड़ी देर बाद एक पर्ची लगी.. जिसपर लिखा था कि रूम नंबर 34 के डॉक्टर छुट्टी पर हैं। छुट्टी मारने वाले उस डॉक्टर के मरीजों में गुस्सा... नाराजगी और मायूसी साफ थी। सुबह से लाइन लगे थे। लाइन से हट गए। मजबूर और बेबसी में वापस घर की तरफ जाने लगे। लगभग डेढ़ घंटे बाद हमारा भी नंबर आया। पर्ची कटी तो डॉक्टर वाले चैंबर की तरफ गए। बड़े से हॉल में चार- पांच सौ लोग बैठे थे। कुछ घंटे इंतजार के बाद डॉक्टर के चैंबर में मरीजों को भेजे जाने का सिलसिला शुरू हुआ तो कंपाउंडर ज्यादा सक्रिय हो गए। एम्स के कर्मचारी,,, और उनके नाते-रिश्तेदार कानाफूसी कर अपना नंबर पहले लगवाने में सफल रहे। सबसे पहले जिस महिला ने सुबह साढ़े चार बजे एम्स आकर नंबर लगाकर पर्ची कटवाई थी... लगभग ढाई घंटे बाद उसका नंबर आया। इस ढाई घंटे में विशुद्ध रूप से एम्स के कर्मचारियों के रिश्तेदारों को ही डॉ.रणदीप गुलेरिया के पास भेजा गया। बेहद सुनियोजित तरीके और संगठित तरीके से एम्स के कर्मचारी इसे अंजाम देते हैं। आपने जरा भी चूं-चपड़ की तो उन्हें गिरेबां पकड़ते देर नहीं लगती। मेरे सामने भी ऐसा नजारा कई दफे आया। एक ने कहा कि सारे रिश्तेदारों कू आज ही दिखवा लेगा क्या... अपने रिश्तेदारों के लिए अलग से एम्स क्यों न खुलवा लेता... किसी ने कहा कि तेरे रिश्तेदारों को तो एम्स की दवा भी असर नहीं करेगी। इतना सुनना था कि एक कर्मचारी ने टिप्पणी करने वाले पर ठुकाई शुरू कर वहां से भगा दिया।...एक मरीज जान –बूझकर मारने वाले उस कर्मचारी की चिरौरी करने लगा। सो, ये सब देखते –सुनते साढ़े तीन बजे गए। तब हमारा नंबर आया। मैं तो सोच रहा था कि आज यहां ताला लगाने की जिम्मेदारी भी हमारी ही होगी। ...चलिये छोड़िये भाई.. एक गुड न्यूज़। हमारे रिश्तेदार को डॉ. गुलेरिया ने अब स्वस्थ बताया। दवा भी कम कर दी। यानी, घंटो की मेहनत सफल रही ...और हम भूखे- प्यासे शाम लगभग साढ़े चार बजे घर पहुंच गए।

Wednesday, May 27, 2009

एम्स में आप आदमी नहीं फ़क़त मरीज़ हैं

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में स्वास्थ्य की नियमित जांच के लिए गए थे। एम्स के डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने उनकी जांच की। सुबह ख़बरों में इसका ज़िक्र था। डॉ।गुलेरिया का नाम सुनकर थोड़ा हैरान हुआ। ये वही डॉ।गुलेरिया हैं जो मेरे एक रिश्तेदार का भी इलाज़ कर रहे हैं। बिहार से तक़रीबन हर चार- पांच महीने बाद मेरे रिश्तेदार आते हैं और डॉ।गुलेरिया को अपनी रिपोर्ट दिखाने तड़के चार बजे जागकर एम्स के लिये रवाना हो जाते हैं। मौसम से कोई फर्क नहीं पड़ता... जाड़ा, गर्मी...बरसात। हर मौसम में वे एम्स जा चुके हैं। हाड़ कंपाती सर्दी हो या चमड़ी झुलसाने वाली गर्मी... बेचारे अपने भाई को लेकर आते हैं और दो- तीन सप्ताह की जद्दोजहद के बाद बिहार के लिए रवाना हो जाते हैं। इलाज का फायदा साफ दिखता है। हालांकि उनके दिल्ली आने से मेरे घर में बड़ी मौज आ जाती है। बढ़िया- बढ़िया चीजें खाने को मिलती हैं...और हंसी- ठठा भी खूब होता है। ससुराल के रिश्तेदार हैं। लेकिन उनकी एम्स जाने की तक़लीफ़ देखी नहीं जाती। और बार आते थे तो उनके बड़े भाई साथ होते थे और दोनों भाई एम्स जाते थे... अपने राम को ख़बर नहीं रहती थी। इसबार अकेले आए तो मै ही उनके साथ एम्स चला गया। पहली बार लगा कि बेचारे ने बीमारी के साथ- साथ कितना कष्ट अबतक उठाया है। कितनी जलालत झेली है। कितना अपमान सहा है। हम सुबह पांच बजे मोहननगर से ऑटो से एम्स के लिए चले। हमारे रिश्तेदार...उनकी पत्नी और मैं। एम्स पहुंचे तो बाहर से ही लंबी लाइन दिखी... हमारे रिश्तेदार की पत्नी ने कहा कि लेट हो गए। ख़ैर। अंदर गए तो लगभग सौ लोगों की लाइन लगी थी...सुबह पौने छह बजे। हम दोनों मर्द खड़े- खड़े आपस में बात करने लगे और मेरे रिश्तेदार की पत्नी लाइन में लग गईं.... । बैठने की कोई जगह नहीं थी सो मरीजों को भी खड़े रहने की अनिवार्यता थी। मेरे रिश्तेदार ...औरों के भी मरीज रिश्तेदार ऐसे ही खड़े थे... कुछ तो मरीज ही लाइन में लगे हुए थे। अजब नजारा था। सुबह साढ़े सात बजने तक लाइन में खड़े रहने के बाद पैरों पर खड़े रह पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा था। लेकिन अचानक एक महिला लाइन में खड़े होने को लेकर पड़ोस की एक महिला से झगड़ पड़ी। झगड़ने और ताने मारने की उसकी अदा से भीड़ का खूब मनोरंजन हुआ। भीड़ बढ़ चुकी थी। लाइन में अब डेढ़ से पौने दो सौ लोग लगे थे। हालांकि रोजाना सौ पर्चियां ही काटे जा ने की व्यवस्था है लेकिन लेकिन सिर्फ भरोसे की पूंजी के साथ लोग लाइनों में खड़े थे। साढ़े आठ बजा तो पर्ची वाली खिड़की खुल गई। यहां से पर्ची लेकर डॉक्टरों के चैंबर के आगे नंबर लगाने की व्यवस्था है। खिड़की पर केवल सौ टिकट ही जारी किये जाते हैं रोजाना... लेकिन भीड़ दो सौ को भी पार कर चुकी थी। एकाध पर्ची कटने के बाद खिड़की के ऊपर एक कागज चस्पा था जिसपर लिखा था रूम नंबर ३२ के डॉक्टर साहब आज नहीं आएंगे... यही तो डॉक्टर गुलेरिया का चैंबर है। उन्हीं से तो मेरे रिश्तेदार को दिखलाना था जिसके लिए तीन घंटे से लाइन में खड़े थे। तीन घंटे बाद पता चला कि डॉक्टर साहब शनिवार को आएंगे। मेरे रिश्तेदार परेशान तो थे लेकिन हैरान नहीं... क्योंकि डेढ़ साल में उनके साथ दसियों दफ़े ऐसा हो चुका है। आखिरी कोशिश के रूप में उन्होंने वहां बने एक काउंटर पर जाकर कुछ पूछना चाहा तो वार्ड ब्वॉय जैसी वर्दी में खड़े व्यक्ति ने उन्हें झिड़क दिया। मेरे रिश्तेदार बिहार के एक बड़े कॉलेज में अच्छे पद पर हैं। लेकिन ये कॉलेज नहीं था... अस्पताल में वे फ़क़त एक मरीज थे... जिन्हें कुछ पूछने की इजाजत नहीं थी। आपने अगर ऐसी कोशिश की तो डॉक्टर भले आपको बख़्श दें... वार्ड ब्वॉय जैसा ओहदेदार आपको नहीं बख्शेगा... मैं थोड़ा नाराज होने लगा तो मेरे रिश्तेदार ने अपने चेहरे की बेचारगी को थोड़ा दबाते हुए मुझे बाहर की ओर ले जाने लगे कि शनिवार को फिर आ जाएंगे।

Thursday, May 21, 2009

सर्दभरी रात, लालू और लोगों का हुजूम


लालू यादव का बदला हुआ अंदाज आजकल आप भी देख रहे होंगे। ..बुझे- बुझे से। अनमनाए। कुछ- कुछ बौखलाए। कभी आवेग में तो कभी अफसोस जताने की मुद्रा में। लालू यादव इन दिनों खुद भी नहीं हंसते हैं। उनकी बातचीत में कोई शिगूफ़ा भी नहीं होता है जो लोगों हंसाए। एक तो...मीडिया से मिलते ही बहुत कम हैं। भले ही बोल रहे हों कि मंत्रीपद की कोई चाहत नहीं है। लेकिन ये भी कहते हुए दिल्ली दरबार में घूम रहे हैं कि बहुतों को बनते- बिगड़ते देखा है। ये भी कहते हैं कि मेरा अपमान हो रहा है... फिर कहते हैं कि गांधी परिवार के बारे में मुंह नहीं खोलेंगे। साथ में ये भी जोड़ते हैं कि खुद पीएम ने उन्हें फोन कर छुटभैये कांग्रेसी नेताओं के बयानों के लिए अफसोस जताया। लालू अब समझ गए हैं। नेता बड़ा नहीं होता... उसके पीछे खड़े लोगों की संख्या उसे ताक़तवर बनाती है। लालू जी अबतक खुद को ताकतवर माने बैठे थे। तभी तो अपने एक रसोइये के खाने पर रीझ गए तो उसे भी टिकट देकर जितवा दिया। लालूजी को पता नहीं याद भी हो या न हो... कभी बिहार में उनका ऐसा जलवा था कि जिधर निकल जाते दस-बीस हजार लोग ऐसे ही इकट्ठा हो जाते। पटना के पीरमुहानी इलाके में सर्द भरी रात में लालूजी एकबार निकल गए तो गरीब- गुरबों का मानो सैलाब सड़कों पर निकल आया। उतनी भीड़ ...कि रैली में जिस तरह से बसों का इंतजाम करके राजनीतिक दल भीड़ जुटाते हैं। यहां लालू को देखने के लिए सैलाब उमड़ा पड़ा था। मुख्यमंत्री रहते हुए लालूजी ने एक अभियान चलाया था- साफ-सफाई और नहाने –धोने का। खुद कुर्सी लगाकर बैठ जाते और नाई से बच्चों के बाल बनवाते। कई बस्तियों में साड़ी बंटवाते...और अपने खास अंदाज में साड़ी के लिए मारा-मारी करती महिलाओं को जोर से कहते कि शंतिया तू फिर आ गईली रे... भीड़ में कोई न कोई शांति होती ही या लालूजी जो भी नाम लेते उस नाम की महिला चौंककर दांत निपोर देती। खुश हो जाती कि लालूजी उन्हें जानते हैं। अपने उड़नखटोला पर जाते-जाते अचानक कहीं भी उसे उतारकर किसानों से बतियाने लगते। छठ पूजा में जब गंगाघाट पर जाते तो जैसे मजमा लग जाता। फिर अपनी कोठी में ही छठ का इंतजाम हुआ। लाइट- कैमरा और दुनिया भर की मीडिया के सामने लाइव पूजा- पाठ की नफासत लालूजी में आ गई। लालूजी और आगे गए। चारा घोटाले के बाद भी लालू का करिश्मा जैसे लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा था। केंद्र की राजनीति में ऐसे लटपटाए कि बिहार भूल गए। यहां शाहरुख ख़ान के शो में आए... या फिर किसी और मीडिया हाउस के शो में...जबर्दस्त टीआरपी मिली। पाकिस्तान तक में उनकी शोहरत का डंका बजा। उनके साथ पाक़िस्तान यात्रा पर गए रामविलास पासवान पूरी यात्रा में कुनमुनाए ही रहे। फिर सत्ता में आए तो क्या कहने। बेतरतीब खिचड़ी बाल शेप में आ गए। मीडिया ने उन्हें प्रबंधन गुरू का नाम दे दिया। मंतर मारकर रेल को घाटे से उबारकर फायदे में बदल दिया।...सब तरफ लालू का ही जलवा रहा। सो, उनकी जुबान बदल गई। पटना में कैमरे के सामने मटर की पत्तियां चबाने वाले लालूजी मीडिया वालों को दुत्त- दुत्त कर भगाने लगे। पब्लिक को बुड़बक कहकर भगाने लगे।...उन्हें भ्रम था कि जीत का समीकरण उनके पास है तो पब्लिक की जरूरत नहीं। तभी तो चुनाव के समय भी कहते फिरे कि विकास- उकास कुछ नहीं होता है... जातीय समीकरण से फायदा होता है तो क्यों न फायदा उठाएं। नतीजा देख लिया। लालू की लोकप्रियता वाले गुब्बारे से पब्लिक नाम की हवा निकल चुकी है। सो, लालूजी की शोहरत का गुब्बारा भी फ़क़त कहने का गुब्बारा रह गया है। लेकिन लालूजी ने कोई सबक नहीं सीखी। एकदिन पहले ही एक चैनल से बातचीत करते हुए एंकर ने जब पूछा कि बिहार से तो इसबार किसी के मंत्री बनने की उम्मीद नहीं है तो उनका लहजा कुछ ऐसा था जैसे बिहार की जनता ने उन्हें हराकर कोई बड़ी भारी ग़लती की है। उन्हें अबतक अपने चुनावी जीत के फार्मूले के पिट जाने का विश्वास नहीं हुआ है। लालूजी इसी इंटरव्यू में कहते मिले कि विकास- उकास कोई मुद्दा नहीं रहा ...सब जाति का समीकरण है। पता नहीं लालूजी जिस जनादेश के बल पर फूले नहीं समाते थे... आज उसी जनादेश का सम्मान करना क्या वाक़ई भूल चुके हैं?