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Thursday, January 29, 2009

संस्कृति की आड़ में पीढ़ियों का टकराव


रात में टीवी देखते हुए पत्नी ने पूछ लिया कि पब क्या होता है? टीवी चैनलों पर पब के बहाने नैतिक पहरेदारी पर बहस चल रही थी। जिसमें पब के विजुअल्स आ रहे थे। शायद पत्नी का सवाल वहीं से उपजा होगा। ...अब क्या और कैसे बताऊं। तो बोल दिया कि होटल जैसा होता है जिसमें दारू-ऊरू पी जाती है...नाच-गाना होता है। और क्या? ...वास्तव में इस ख़बर को लेकर उसी वक्त थोड़ा संजीदा हुआ। वेलेंटाइंस डे ...फ्रैंडशिप डे सहित यदा-कदा और देश में यहां-वहां होने वाली घटनाओं के बाद भारतीय सस्कृति की दुहाई देकर ऐसे मामलों में बल प्रयोग पर जोर दिया जाता रहा है। ऐसी दलीलें देने वालों को शायद भरोसा होता है कि सख़्ती शायद इस मर्ज की दवा है। या फिर उन्हें हिंदुस्तानी संस्कृति की ताकत का वाक़ई अंदाजा नहीं है। उन्हें लगता है कि हमारी संस्कृति इतनी कमजोर...रीढ़विहीन और रूई के फहे की तरह नाजुक है कि पश्चिम से आने वाले झोंके में छिन-भिन्न हो जाएगी। उन्हें शराब और लड़के-लड़कियों का एक साथ घूमना या फिर पब और पार्कों में जाना अश्लीलता की पराकाष्ठता लगता है। उन्हें लगता कि हमारी संस्कृति शराब के दरिया में बहकर उनके हाथ से निकल जाएगी। इसे बहुत ग़ौर से देखने की जरूरत है। यह पूरा मामला इतना सरल और साफ नहीं है। वे एक ऐसा सामाजिक ढांचा गढ़ना चाहते हैं जहां ये सुनिश्चित हो सके कि धर्म की जय हो। जिस समाज में सती और दहेज प्रथा का बड़ा महात्म हो लेकिन मोहब्बत, खुलापन और महिलाओं की आजादी सबसे बड़ा ग़ुनाह । मजेदार बात ये है कि ऐसे सामाजिक ढांचे की हिमायत उस दौर में हो रही है जब सबकुछ बाजार तय कर रहा है। हमारे जज्बात भी बाजार के भरोसे है। हमारी खुशी-हमारे ग़म। प्रेम-मुहब्बत और हमारे संताप। सबकुछ। ऐसे में समाज पर नैतिक पहरेदारी की कोशिशें कहां तक जायजा हैं और उसका कितना असर भी होगा? नैतिकता न तो कोई ठोस वस्तु है कि जिसे हाथों में रख लेने से आदमी नैतिक हो जाएगा...और न ही शासन ही किसी समाज की नैतिकता को नियंत्रित कर सकता है। नैतिकता का मानक व्यक्ति -व्यक्ति पर निर्भर करता है। और शासन तंत्र की तरफ से जब भी समाज को नैतिक बनाने की कोशिशें होंगी....अव्वल तो वो कामयाब नहीं होंगी। दुर्भाग्य से अगर कामयाब हुई तो उसकी शक्ल बहुत हद तक तालिबानी होगी। दूसरे, सत्ता पक्ष को ऐसे समाज के निर्माण के लिए खुद को भी एक आदर्श के रूप में रखना होगा। ...थोथे भाषण से वोट तो हासिल किए जा सकते हैं मगर लोगों का भरोसा नहीं। वोट और भरोसे के अंतर को भी समझना जरूरी है। शराब का मामला ही है। येदुरप्पा साहब से लेकर गेहलौत साहब शराब को लेकर कूद रहे हैं। लेकिन उन्हें भी पता होगा हरियाणा और आंध्र प्रदेश का उदाहरण। इन राज्यों में बंशीलाल और एनटी रामाराव की कोशिशें शराबबंदी को कबतक लागू कर पाईं...उसका क्या नतीजा निकला? इन राज्यों में शराबबंदी तो कारगर नहीं हुई लेकिन दूसरे राज्यों से शराब की तस्करी बढ़ गई। ..इन राज्यों को शराबबंदी से हुए आर्थिक नुकसान अलग से हुए। रामाराव और बंसी लाल ने कम-से-कम शराबबंदी लागू कर शराब की बिक्री के खिलाफ कदम उठाए। लेकिन अब तो पब और बार के लिए बाकायदा सरकार लाइसेंस भी जारी करती है....और पब्लिक में पब संस्कृति की वजह से भारतीय संस्कृतिक को खतरा भी बताती है। ...खैर। ये मामला नफा-नुकसान का भी नहीं है। ये बहुत हद तक पीढ़ियों का भी टकराव हो सकता है जो संस्कृति के टकराव के नाम पर खेला जा रहा है। देश की नवजात पीढ़ी इतनी अधकचरी और अपरिपक्व नहीं है...जितना हमारे सियासी तंत्र उन्हें समझते-देखते हैं। इस पीढ़ी ने जिस खुली हवा में आंखें खोली हैं...अलग-अलग क्षेत्रों में इस नवजात पीढ़ी का जैसा प्रदर्शन देखने को मिला है, निश्चय ही लाजवाब है। हा. बाजार के दबाव में उनका व्यक्तित्व जैसा दिखता है, वैसा है नहीं। आने वाले वर्षों में इस पीढ़ी का पूरा व्यक्तिव खुलकर सामने आएगा...ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

Wednesday, January 28, 2009

तनिक मुस्कुराईए हुजूर...


वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में नौकरियों पर किस-किस तरह से बन आई है, उसी पर बात कर रहे हैं टीवी जर्नलिस्ट नीरजः मंदी का दौर जारी है...यहां भी मंदी, वहां भी मंदी...मंदी में हम भूल गए मुस्कान ...मंदी में छिन रही हैं नौकरियां..क्या चपरासी और क्या अधिकारी। मंदी सब पर भारी। नौकरी खोने की कई वजहें हैं तो बेवजह भी लोगों की नौकरियां जा रही हैं। ...इस दौर में इंकलाब की बातें बेनूर हो चुकी हैं। साथियों, आखिर हम या आप जैसा बेचारा मुलाजिम इसकी बात सोच भी कैसे सकता है। लेकिन आगाह तो कर ही सकते हैं कि - साथियों ऐसे भी जा रही है नौकरी। सो, पहले से सावधान रहें। ऑस्ट्रेलिया के एक शहर मेलबोर्न की ख़बर आप सब की नज़र है- टॉयलेट में पानी इस्तेमाल करने पर ऑस्ट्रेलियाई फर्म ने अपने कर्मचारी को निकाला। जी हां। ये उस ख़बर का शीर्षक है, जो एक अंग्रेजी दैनिक में छपा है। ख़बर की तफ़सील ये है कि टाउंसविले इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज में काम करने वाले मशीन ऑपरेटर बरनाबे को इसलिए नौकरी से हाथ धोनी पड़ी क्योंकि बार-बार समझाने के बावजूद उसकी आदत सुधर नहीं रही थी। फिलिपींस का ये कर्मचारी वॉशरूम में टॉयलेट पेपर की जगह पानी का इस्तेमाल करता था। कंपनी के मैनेजर ने कर्मचारी की इस आदत को दूसरे कर्मचारियों के लिए सीरियस हेल्थ रिस्क बताया। हेल्थ और हाईजीन को इश्यू बताते हुए बेचारे कर्मचारी को फर्म से विदा कर दिया गया। कर्मचारी फिलिपींस का था, मगर पता नहीं वॉशरूम में पानी के इस्तेमाल की -ग़लत - आदत उसे कैसे पड़ गई। मगर मेरा आपसे सवाल है। क्या आप टॉयलेट पेपर से काम चला सकते हैं। क्या पानी के बिना दिव्य निबटान कर सकते हैं। मुझे याद आता है नीरद सी चौधरी जैसे एलीट ने भी हम हिंदुस्तानियों की इस बिनाह पर खिंचाई की थी कि हम संडास में उकड़ूं होकर बैठते हैं। तब भी मेरे मन में ये सवाल उठा था कि जनाब उकाड़ूं न बैठें तो क्या करें। नीरद चौधरी जैसी कलाकारी कहां से लाएं। ...नीरद चौधरी बैठे..या फिर खड़े-खड़े भी वो सब कर लें। बहरहाल, फिलिपींस के बरनाबे की नौकरी गंवाने की वजह बताने और उसका पूरा ब्योरा पेश करने का मकसद बस इतना था- मंदी का हम कुछ नहीं कर सकते...हम मुस्कुरा तो सकते हैं। अब तनिक मुस्कुरा तो दीजिये जनाब।...चाहे अपनी या फिर हमारी किस्मत पर ही सही।

Monday, January 26, 2009

...वो प्रणय राय और विनोद दुआ की जोड़ी


( भाग- छह) मां ने काफी हुलसकर बताया कि मेरे पिताजी ने रंगीन टीवी मंगवाया है। दिखाया, पैनासोनिक का बड़ा टीवी मेरे घर में लगा था। हालांकि कई-कई दिनों पर कुछेक घंटे के लिए टीवी चल पाता है। यानी, रात- दिन जब कभी बिजली आ जाए तो उस समय आ रहे कार्यक्रम को देखा जा सकता है। वैसे, मेरे घर में टीवी...आश्चर्य का सबब भी था। पिताजी टीवी-ऊवी को झमेला मानते आए हैं और इस झमेले में वो कभी पड़े नहीं। हमारी कभी हिम्मत नहीं हुई कि उनसे इसबारे में बोल भी दें। उनके लिए अबतक ( बचपन से देखता आया हूं) फिलिप्स का ट्रांजिस्टर है, चमड़े का कवर लगा। टीवी से दूरी के बावजूद पिताजी में समाचारों की उत्कंठा जबर्दस्त है। इसी ट्रांजिस्टर पर शाम साढ़े सात बजे प्रादेशिक समाचार और (शायद) पौने 9 बजे बीबीसी हिंदी सेवा की ख़बरें पिताजी सुनते आए हैं। सुबह भी हिंदी -संस्कृत में प्रसारित होने वाली खबरें। प्रस्तोता की भारी मगर थरथराती आवाज सुबह में गूंजती है- इयं आकाशवाणी...संप्रति वार्ताह सोयंताम..प्रवाचकः फलां। टीवी आ जाने के बाद भी पिताजी के लिए समाचारों को जानने का इकलौता माध्यम ट्रांजिस्टर है। मां से पूछा कि आखिरकार पिताजी टीवी लाने को तैयार कैसे हो गए। ...तो पता चला कि मां की जिद पर एकतरह से जबरन टीवी खरीद देने को पिताजी राजी हुए। इस टीवी को देखकर मुझे १९८५ में हमारे कुनबे में आए पहले टीवी की याद हो आई। हमारे चचेरे भाई साहब की शादी हुई थी...और उसी वक्त टीवी खरीदी गई थी। रंगीन टीवी ...क्रेज इतना कि शाम में कृषि दर्शन से लेकर रात ढाई-तीन बजे शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम के वक्त भी डटे रहते और भाई साहब- भाभी दोनों शायद कुढ़ते रहे होंगे। क्योंकि नई शादी और उसी कमरे में टीवी। कोढ़ में ख़ाज ये कि हम जैसे बेशर्म टीवी दर्शकों की फ़ौज। उस वक्त बिजली भी रहती थी...ऑस्ट्रेलिया में बेंसन एंड हेजेज खेलने गई भारतीय टीम के तमाम मैच देखे...जबकि सुबह तक़रीबन चार बजे से ही मैच शुरू हो जाता था। गाढ़ी नींद से भाई साहब को जगाते-जगाते श्रीकांत या तो आउट हो चुके होते या कुछेक चौके- छक्के ठोक डालते। टीवी का तब मजा था। चित्रहार सबसे पसंदीदा कार्यक्रम था ....आधे घंटे के चित्रहार में चार-पांच गाने कब निकल जाते और कार्यक्रम का समापन हो जाता , पता भी नहीं चलता। चुनाव के वक्त तो जैसे उत्सव जैसा माहौल रहता हमारे घर में। मेरे पिताजी, चाचा- ताऊ से लेकर मेरे चचेरे भाइयों की जमात। सबके-सब टीवी के आगे जमे रहते। विनोद दुआ और प्रणय राय का जादुई अंदाज में चुनाव विश्लेषण और योगेन्द्र यादव के आंकड़े। विश्लेषण के बीच विनोद दुआ- प्रणव राय की जोड़ी अगर किसी नेता को खींच डालती तो दर्शकों की हमारी भीड़ को जैसे मजा आ जाता। लोग मुदित अंदाज में मीडिया की ताक़त को पहली बार देख रहे थे कि एक हार - मांस का आदमी ताकतवर मंत्रियों की धज्जियां उड़ा रहा था। ...चुनाव विश्लेषण किसी बड़े जलसे या ट्वेंटी-ट्वेंटी से कम रोमांचक नहीं थे। बीच-बीच में पान और चाय का अलग दौर चलता। बाद के दिनों में रामायण और महाभारत ने तो महफिल ही लूट ली...गांव भर के छोटे-बड़े से लेकर घूंघट काढ़े आई महिला दर्शक। पूरा बरामदा दर्शकों से फुल। उसबार बाढ़ भी आई तो भी रामायण -महाभारत का कोई एपीसोड नहीं छूटा...ट्रैक्टर की बैट्री खोलकर टीवी से जोड़ दिया। पब्लिक की जबर्दस्त डिमांड थी। वही हाल वन डे क्रिकेट मैच का भी होता था। एक दिलचस्प किरदार से आपको मिलवाऊं। पिताजी के चचेरे भाई मदन चाचा क्रिकेट के घनघोर दीवाने हैं। वकालत भी करते हैं और स्थानीय कॉलेज में प्रवक्ता भी हैं। लेकिन ये सब हैं क्रिकेट के बाद...क्रिक्टे के दर्शक पहले हैं। ...तो सुबह जतरा बनाकर विधि-विधान से मैच देखने टीवी के आगे बैठते। मजेदार बात ये है कि दिन भर छोटे-छोटे बच्चे भी प्रार्थना करते कि इंडिया जीत जाए। ऐसा नहीं था कि वे क्रिकेट समझते थे या बड़े भारी राष्ट्रभक्त थे। ...वो तो सिर्फ इसलिए भारत को जितवाना चाहते थे क्योंकि हारने पर मदन चाचा इन बच्चों को शर्तिया रूप से पढ़ाने बैठ जाते और फिर बच्चों को जमकर लतियाते। ...भगवान ने बच्चों की ये दर्दनाक प्रार्थना सुन भी ली और भारत मैच जीत गया। फिर क्या था....मदन चाचा अपना दोनाली बंदूक या अपने कर्नल ससुर की तरफ से दी गई पिस्तौल से फ़ायर करने पर आमदा हो जाते। ...बच्चों को उस रात पढ़ने से अघोषित रूप से छूट मिल जाती। ...टीवी पर अकेले मैच ही या सीरियल्स ही नहीं देखते बल्कि सुबह तक़रीबन सात बजे दूरदर्शन पर आने वाला व्यायाम कार्यक्रम के भी कम दर्शक नहीं थे।निरमा सहित कुछेक विज्ञापन भी दर्शकों की जुबान पर हुआ करते थे। समाचारों का तो ख़ैर क्या कहना....शमी नारंग साहब और मंजरी जोशी की बड़ी हिट जोड़ी हुआ करती थी। साड़ी-सूट से लेकर टिकुली पर भी बहस होती थी। आंखों में बेशुमार सुरमा डाले नलिनी सिंह के आंखों -देखी कार्यक्रम के अपने दर्शक हुआ करते थे। ख़बरों को लेकर ये नही था की इसे देख कर आप परेशां हो जायेंगे । या हैरान रह जायेंगे। तब ख़बरों को सच बताने का कोई दावा नहीं था मगर दर्शक उसे सच्ची खबरे ही मानते थे। (जारी )

Saturday, January 24, 2009

क्या ओबामा विश्व के नए भाग्य विधाता हैं?

टीवी जर्नलिस्ट कुंदन शशिराज हमारे साथी हैं। अभी हिंदुस्तानी मीडिया को ओबामामय होते देख उन्होंने मेल के जरिये एक टिप्पणी भेजी। जिसमें उन्होंने मीडिया के ऐसे नजरिये की आलोचना करते हुए हिटलर को एक राष्ट्रभक्त के रूप में याद किया है। हिटलर को लेकर कुंदन के नजरिये से निजी तौर पर मैं कतई सहमत नहीं हूं। पढ़कर देखिये...आप कितने सहमत हैं। -
शायद, आठवीं क्लास में...इतिहास की क़िताब में पहली बार हिटलर के बारे में पढ़ा था। बालपन में, जैसा उस क़िताब में लिखा था और जैसा कि गुरुजी ने पढ़ाया था...मैंने तय मान लिया कि हिटलर विश्व इतिहास का सबसे बड़ा ख़लनायक था। गुरुजी ने हमें पढ़ाया था कि नाज़ीवाद एक अभिशाप की तरह है और उसकी पार्टी का स्वास्तिक से मेल खाते प्रतीक चिह्न से तानाशाही की बू आती है। मासूम मन था...इसलिए जैसा पढ़ाया गया, मान लिया। लेकिन जब तन और मन परिपक्व हुआ तो दूसरों के निर्णयों को तर्क की कसौटी पर कसकर देखने की आदत हो गई...आदत बुरी थी इसलिए आवेग पैदा कर रहे सवालों के चलते हिटलर की जीवनी दोबारा पढ़ी। आप भले ही सोचें ...दोबारा पढ़ने पर हिटलर मुझे बदले हुए रूप में नजर आया।...तानाशाह भले रहा होगा लेकिन उसकी देशभक्ति और राष्ट्र सम्मान की उसकी भावना सीखने लायक थी। ...आज मुझे पता नहीं क्यों हिटलर की याद आ रही है। मुझे उसकी जीवनी के उन पलों की याद आ रही है जब उसने जर्मनी के आत्मसम्मान के लिए पूरी दुनिया से जंग ठान ली। उसने पूरी दुनिया को ठेंगे पर रखा और सबको बता दिया कि जर्मनी के आत्मसम्मान से बढ़कर उसके लिए कुछ भी नहीं। लेकिन हिटलर के कट्टर राष्ट्रवाद की याद मुझे इस वक्त क्यों आ रही है? ...दरअसल, इस वक्त मैं अपने देश के तमाम टीवी चैनलों और अन्य समाचार माध्यमों को ओबामामय होते देख रहा हूं। ओबामा को दुनिया का नया अवतार ठहराया जा रहा है। ओबामा की छोटी-छोटी चीजों पर विशेषज्ञ टिप्पणियां आ रही हैं...ओबामा क्या खाते- क्या पहनते और ऐसा होता तो कैसा होता ओबामा का लुक। ...जी हां, इसी वज़ह से मुझे हिटलर की याद आ रही है। स्क्रीन पर ओबामा झूम-झूम के घूम रहे हैं ...और मेरे दिमाग में हिटलर की जीवनी के पन्ने घूम रहे हैं। वैसे, मुझे अपने शब्दों को थोड़ा दुरुस्त करने दें...मुझे हिटलर के राष्ट्रवाद की याद आ रही है। मुझे कोफ़्त हो रही है कि हम क्यों नहीं हिटलर की तरह राष्ट्रवादी होकर सोचते -समझते हैं। हिटलर की तरह राष्ट्रसम्मान का जज़्बा हमारे दिलों में क्यों नहीं जाग पाता है? ..हमें अपने चापलूसी भरे लहजे पर शर्म भी नहीं आती।...ओबामा के राष्ट्रपति बनने पर अमेरिका गर्व करे, क्योंकि किसी अश्वेत का सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच जाना उसके लिए नई परिघटना हो सकती है लेकिन भारत के लिए ये कतई नया नहीं है। ...अमेरिका झूम-झूमकर बताए कि उसके काले दिन ख़त्म हो गए और उजले महल पर एक अश्वेत का राज़ होगा। ..यकीनन ओबामा का राष्ट्रपति बनना एक बड़ी घटना तो है लेिन ओबामा को हम विश्व के भाग्य विधाता के तौर पर क्यों पेश कर रहे हैं? क्यों हम ओबामा की तरफ टकटकी भरी नजरों से देख रहे है? ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह के लाइव टेलीकास्ट के दौरान हमारी जबान रिरियाने जैसी क्यों हो जाती है? ओबामा को बिना जाने अति उत्साही होकर उनका गुणगान करने वाले चैनलों की तो छोड़िए ...शपथग्रहण के बाद उनके डांस, उनकी एक-एक हरकत ...एक-एक मुस्कान पर रीझे मीडिया कर्मी ऐसा दिखा रहे थे जैसे, ओबामा अपनी इन अदाओं से पूरे विश्व पर अहसान कर रहे हों। सबकुछ छोड़-छाड़कर चैनल्स ओबामा भजन गाने में लगे थे। ...पूरे हिंदस्तानी मीडिया में कोई दूसरी ख़बर नहीं थी। ...ख़बर की भी छोड़िये क्या हममें इतना भी आत्मसम्मान नहीं बचा कि जिस ओबामा का रुख भारत को लेकर अबतक बहुत साफ नहीं है...हम उसकी चरण वंदना करने से थोड़ा परहेज करें। निश्चय ही ओबामा को लेकर मीडिया का जो रूप हम सबने देखा ...शर्मनाक था।

Thursday, January 22, 2009

...बड़ा भारी बुरबक है जी

(भाग- पांच) बिहारी एक-दूसरे को बुड़बक कहते हैं। बिहारी लोग जमाने को भी बुड़बक कह देते हैं। मगर पूरा जमाना बिहारियों को बेवकूफ़ कहता है। जबकि बिहारी भी होशियार है और जमाना तो खैर स्याना है ही। इतनी भूमिका सिर्फ ये बताने के लिए कि बिहार की अलग-अलग बोलियों के कुछ अपने शब्द हैं जो वाक़ई बेहद खूबसूरत हैं। मैं भाषा विज्ञानी नहीं हूं इसलिए इन बोलियों को लेकर मेरा कोई व्याकरणीय दावा नहीं है। हालांकि मुझे लगता है कि इन बोलियों की भी अपनी वर्तनी होनी चाहिए और उसका भी अपना व्याकरण हो तो हिंदी इससे और भी सजेगी। ख़ैर, आज मैं अपनी जुबान की कुछ दिलचस्प चीजें परोस रहा हूं। ...शायद आपको भी इसका मजा आएगा। ये लालू यादव जो हमेशा कहते रहते हैं धुर बुड़बक...इसका मतलब है धत्त बेवकूफ़ या अहमक। कई बार धुत्त की बजाय फट्ट भी बोला जाता है। शायद फटकार शब्द वहीं से बना है। शादी होने के शुरूआती वर्षों में जब मेरी पत्नी शुद्ध बिहारी हुआ करती थी तो अक्सर बोला करती थी- धुत्त आप भी गजबे करते हैं। हमारी बोली में कुछ गालियां भी हैं जो तनावों की गर्मागर्मी में स्थानीय लोग एक-दूसरे पर उछालते हैं। मजेदार बात ये है कि उन गालियों का कोई मतलब ही नहीं होता। ...चूंकि ये गाली मान ली गई है तो गाली है। मसलन, बरगाही। ...बरगाही भाय। पता नहीं इसका मतलब क्या है। अगर इसे तोड़ें तो कुछ-कुछ मतलब निकलता है- बारह और गाही ( स्थानीय लोगों के लिए गाही एक इकाई है जिसे शायद दर्जन भर के लिए इस्तेमाल किया जाता है। एक दर्जन यानी एक गाही)। इसके बावजूद इस गाली का कोई मतलब नहीं निकलता। उसी तरह एक गाली है चोट्टा। ...फलां भारी चोट्टा आदमी है...यानी बड़ा भारी कमीना है। एक और गाली है लफुआ। इसका भी कोई मतलब नहीं निकलता लेकिन आवारा के वैकल्पिक शब्द के तौर पर इसका इस्तेमाल होता है।थेथर भी एक गाली है...जिसे पतित या सख़्तजान के रूप में प्रयोग में लाया जाता है।चलिये गालियों को रहने दीजिये। हमारी जुबान में बोले जाने वाले उर्दू और फ़ारसी के शब्दों का कमाल देखिए- इलम (इल्म)। लोग खूब बोलते हैं कि फलां तो पंपिंग सेट ठीक करने का इलम जानता है। उसी तरह किसी क़त्ल होने पर उसे कतल या ख़ून कहते हैं। कोई बुजुर्ग से पूछो तबियत कैसी है तो शायद कह दें किअब आफ़ियत है। यह भी सुन सकते हैं कि मैं तुम्हारा तबेदार नहीं। ...बड़े-बुजुर्ग कई बार कहते हैं मेरे सामने फ़ाजिल बात मत करो...माने, फ़िजूल की बातें मत करो। बकरे के मीट को अक्सर लोग गोश्त ही कहते हैं। कोई अगर परेशान हो जाए तो कहेगा बहुत हरान हूं। शहरों में जैसे सर बोला जाता है, हमारे यहा उसकी जगह - हजूर- यानी हुजूर का इस्तेमाल किया जाता है। -मेहरबानी- का भी इस्तेमाल खूब होता है।परवरिश शब्द भी बोला जाता है। नाइंसाफी होने पर कहते हैं बड़ा भारी जुलुम (जुर्म) है। इस बोली में शब्दों का देसज रूप साफ झलकता है। जैसे, मिट्टी को -माटी- बोला जाता है। द्वार को -दुआर- और ओसारे को -ओसरा- बोला जाता है। हां, रसोईघर को -भंसाघर - बोला जाता है और रसोई बनाने को -भंसा। खाने के समय सब्जी को - तिअन- बोला जाता है और नाश्ते को -पनपियाय- कहा जाता है। शायद पानी के साथ कुछ हल्का खाने वाला। खलिहान हमारी बोली में उसे कहा जाता है जहां अस्थायी तौर पर फसल काटकर आने के बाद रखा जाता है। रुपये को रूपा कहते हैं। ...या बंगाल का प्रभाव होने की वज़ह से - टका- भी कहते हैं। किसी पागल को देखकर कहते हैं- सनक- गया है। सवेरा को भोर या बिहान तो कहते ही हैं इंजोर भी कहते हैं। महिलाओं को -जनाना- कहते हैं। दुल्हन को -कनिया- (शायद कन्या) कहते हैं या फिर फलां की -लोग- भी कहते हैं। मां को -माय- और पिता को -बाऊ- कहा जाता है। मोटरसाइकिल को धड़ल्ले से फटफटिया बोला जाता है और ट्रेन को रेलगरी।हमारी जुबान में कुछ ऐसे शब्द हैं जिसे समझने के लिए किसी भाषा विज्ञानी की जरूरत होगी। मसलन, ज्यादा तीरगो ( उत्तेजित) मत। दर्द के मारे फलां बपराहाएट (कराहना या बाप- बाप करना ) काट रहा है। फलां महिला के साथ फलां जरा लटपटा (अंतरंगता) गया है। ...ज्यादा बोलो मत नहीं तो हिस्सक (पस्त कर देना) छुड़ा दूंगा। ...मिजाज -बम- हो गया...हारा-बाजी (बाजी) लगाओगे। ...बाल-बुतरू- (बाल-बच्चे) को भी देखना पड़ता है।...हमारे सामने दांत मत -चियारो- (फाड़ो)। ...अभीए लटुआ (पस्त) गए जी। ॥ हमारी बोली में -ई-ऊ-गो और ठो का अलग किस्म का महात्म है। -ई- का प्रयोग ये के लिए होता है जबकि -ऊ- का प्रयोग उसके लिए होता है। -गो- और -ठो- का प्रयोग किसी संख्या मसलन, चार ठो या चार गो के रूप में होता है।हमारी बोलचाल के कुछ काले पक्ष भी हैं...अक्सर नाम के साथ -बा- जोड़ देते हैं। अपने से कमतर लोगों के लिए ऐसा किया जाता है। हमारे यहां ललित हमेशा ललितबा हो जाता है...प्रकाश हमेशा परकसबा हो जाता है...लेकिन दबंगों के नाम के साथ -बा- की जगह अनिवार्य रूप से बाबू या फिर जी जोड़ा जाता है।...ये चुनौती है भाई...अगर बोली की वर्तनी ऐसी ही है तो कोई -जुआन- या तो दबंगों के नाम में भी -बा- जोड़कर दिखलाए या फिर इस परंपरा को भी हमारी बोली से बेदखल कर दिया जाए।...(जारी...)

Tuesday, January 20, 2009

..चूरा- दही और अचार का नाश्ता

भाग-चार
बढ़िया से दांतों की सफाई करने के बाद लगे हाथों हैंडपंप के पानी से नहा भी लिया...भीषण जाड़े के बावजूद इसका पानी गीजर जैसा था। खैर, मेरी मां मेरा पसंदीदा तो क्या मिथिला के तकरीबन हर घर का नाश्ता चूरा- दही परोसकर बैठी थी। साथ में आलू का अचार। इस तरह का अचार भी शायद बिहार में ही बनता है। ...बड़ा आसान है इसे बनाना। उबले हुए आलू को छीलकर और उसके चार टुकड़े करने के बाद उसमें नमक, लाल मिर्च का पाउडर और थोड़ी- सी हल्दी डाली जाती है। इसमें थोड़ा सरसों तेल मिलाने के बाद दो-चार घंटे के लिए धूप में डाल दिया जाता है। ...आपका अचार तैयार है। लेकिन इसका जायका सिर्फ जाड़े के मौसम में ही मिलता है। आप भी चखकर बताइए कैसा लगा? उसी दौरान मां से थोड़ी गपशप हुई। दीन-दुनिया की बातें। उसने शिकायत भी की.... अब आए हो तो सब नया साल का खर्चा मांगेंगे...ज्यादा लुटाने की जरूरत नहीं है... वैसे तो ये कोई लिहाज करते नहीं हमारा। कोई काम कह दो तो सुनते ही नहीं....कोई पंचायत सदस्य बन गया है तो कोई मास्टर। ..अब पहले वाली कोई बात तो है नहीं। चप्पल पहने दुआर पर चढ़ जाते हैं। शादी में दो-तीन मारुति कार ले जाते हैं।...घरे-घरे टीवी हो गया है और सब जेनरेटर का लाइन ले लिया है। ...पूरा टोला रात दस बजे तक अंजोर (रौशन ) रहता है।दरअसल, बिहार के गांवो में बिजली की समस्या बहुत ज्यादा है। सो, वहां जेनरेटर का धंधा शहरों में केबिल के धधे जैसा चल निकला है। एक प्वाइंट का साठ रुपये महीना और शाम छह बजे से रात नौ बजे तक जेनरेटर की सुविधा पाइए। पिताजी बता रहे थे कि भारी कुहासा के बावजूद सुबह छह बजे ही नंदकिशोर मास्टर अपने टोला के बच्चों को बजरंग बली मंदिर के बाहर खुले में पढ़ाता है। हमारे पिताजी को लगता है गांवो की दुनिया बदल रही है....वास्तव में अंजोर होने वाला है।...देश के साथ-साथ बिहार भी तरक़्की जरूर करेगा।....लेकिन पिताजी अपने कुनबे को लेकर ही निराश दिखे। असल में मेरे कुनबे के लड़कों को अच्छी पढ़ाई के बावजूद नौकरी नहीं मिली...और खेती करने लायक वो रह नहीं गए थे। पिताजी बता रहे थे कि दिनभर कोट-पैंट झाड़कर फिरंट्ट रहता है...बीबी-बच्चों का कोई ख्याल नहीं...न लाज न इज्जत। रोज पीने लगा है। ...शाम होते- होते मेरे कुनबे के एक सदस्य लौटे...मुंह में पान की गिलौरी दबाने के बावजूद ताड़ी की महक आ रही थी। ...कहने लगे - खुशी में आज जरा सा....। मैनें उनके चेहरे को ग़ौर से देखा...पता नहीं उसपर कमतरी के निशान थे। (जारी)

Sunday, January 18, 2009

...दीदी जी लजा गईं

( भाग-तीन )
गांव में सुबह चार बजे ही नींद खुल गई। संभव है, जल्दी सो जाने की वज़ह से ऐसा हो या फिर भोर में अपने गांव को देखने की ललक। छह- सात बजे नीम का दातुन और हथेली पर थोड़ा सा वैद्यनाथ लाल दंत मंजन लेकर छत पर चला गया। ...पुराने दिनों की तरह ही कसकर दांत मांजा। वहां से ग़ौर किया कि साव जी के घर के पास एक जामुन का पेड़ था...बड़ा ऊंचा। अब नहीं है...पता चला बाढ़ में सब दहा गया। जामुन का पेड़ बड़ा टुनकाह ( नाज़ुक) होता है। फुनंगी पर चढ़ने की बाजी लगाकर एकबार हरिया डीलर का भाई उसपर चढ़ा तो औंधे मुंह गिरा...बड़ी मुश्किल से जान तो बच गई लेकिन एक हाथ पूरी तरह से टूट गया। जिंदगी भर अब उसी टूटी बांह के भरोसे है। ...तो ये जामुन का पेड़ कुछ अन्य वजहों से भी उस गांव में हमारी नस्ल के लौंडों के बीच लोकप्रिय था। ( ईमानदारी से ) मैं इस पेड़ का मजा नहीं ले पाया। ...जिसका अब अफसोस भी है। होता ये था कि इस पेड़ से तो तकरीबन आधा गांव और घरों के आंगन तक दिख जाते थे। ...अचानक ये पेड़ उस वक्त के लड़कों के बीच काफी चर्चित हो गया। आपस में पेड़ को लेकर काफी खुसुर-फुसुर होने लगी। पता चला कि पेड़ के पास एक घर था...जिसमें रहने वाली एक नई कनिया ( दुल्हन ) उघाड़ होकर नहाती है....माने शरीर पर कोई कपड़ा नहीं...दिगंबरावस्था में। पेड़ की फुनंगी से उस वक्त का ये चर्चित सीन साफ तौर पर दिखता था जिसे केवल मैटिनी शो में देखा जा सकता था। इस चक्कर में कई लड़के सुबह से ही पेड़ पर चढ़कर इंतजार करते रहते। ...जाड़ा, गर्मी या बरसात। नायिका उसी मुद्रा में नहाती ...और अक्सर दोपहर तकरीबन एक - दो बजे तक ये संभव हो पाता।शो देखने वाले हर बार ये चाहते कि सीन लंबा से लंबा हो। वो जब कभी मायके चली जाती तो महीने भर तक सब इंतजार करते। उसके गांव पहुंचते ही लड़कों के चेहरे पर रौनक लौट आती। इस बीच कई मायूसी की स्थायी मुद्रा में रहते। नंगे नहाने का कारण ये नहीं था कि वो कोई बौराई हुई या फैशनपरस्त औरत थी...शायद उसके पास इतने कम कपड़े थे कि जो कपड़े उतारकर नहाती थी, दोबारा उसी साड़ी को पहन लेती। ...तो ये सिलसिला इतना लोकप्रिय हो गया कि दोपहर तक बीस - पच्चीस लड़के पेड़ पर लुधके ( लटके ) रहते थे। चें-पों करते हुए। ...एक खास डाली के पास बैठने के लिए कभी-कभार झंझट भी हो जाता था आपस में। क्योंकि यहां से दिख तो साफ जाता था लेकिन ये इतना घना था कि दूर से इसपर बैठे लड़के किसी को दिखते नहीं थे। अब एकदिन उस महिला के ससुर लड़कों पर पिल पड़े....जो पकड़ में आए उन्हें चपत लगाई और उट्ठा-बैठी करवाकर छोड़ा। दिलचस्प बात ये है कि ससुर जी को ये पता ही नहीं था कि माजरा क्या है...वो तो दिन भर और जामुन का मौसम न होने के बावजूद पेड़ पर लौंडों के कोलाहल से परेशान थे। इसके बावजूद लड़के कहां मानने वाले थे। फिर दूसरे दिन पहुंच गये....मना करने पर लगे थेथरई करने। दो-चार देखने के बाद ससुर जी ने गांव की पंचायत बुला ली। रात दस बजे पंचायत लगी...बूढ़े का कहना था कि गांव भर के लौंडे उनके घर के पास जामुन के पेड़ पर लुधके रहते हैं। पंचायत ने कहा कि ये तो कोई ऐसा जुर्म है नहीं कि पंचायत इसमें दखल दे। और अगर पंचायत ऐसे मामलों में दखल देने लगे तो हो गया....। खैर, लौंडों के लिए पंचायत का सुखद अंत हो गया...और फिर दूसरे दिन से उनका बाईस्कोप शुरू। पता नहीं ये सिलसिला कबतक चला लेकिन आपकी सूचना के लिए बता दूं कि महिला के चार बच्चे हुए और अब काफी बड़े होकर दिल्ली- पंजाब कमाने चले गए हैं। चूंकि जामुन का पेड़ अब नहीं रहा तो बता पाना कठिन है कोई दूसरी महिला उसी तरह नहाती है या नहीं...क्योंकि ग़रीबी को अब भी है। तो बाढ़ से नई नस्ल के लौडों को एक बड़ा नुकसान ये भी हुआ।गांव में भी ताका-झांकी और नैन- मटक्का खूब होता है...मगर उसका अंदाज दूसरा होता है। मसलन, एक किर्तनियां ( भजनीक) था जो हमारी क्लास की एक बच्ची पर मर मिटा। बच्ची कुछ समझे ही न...और ये महोदय दिन भर उसकी फिराक में स्कूल के चक्कर लगाते। ये महाशय लगभग अधेड़ हो चुके थे। लेकिन जब भी लड़की की फिराक में आते तो नील ( कपड़े धोने के समय इस्तेमाल होने वाला, हमारे इधर के भजनीक इसे टीके के तौर पर इस्तेमाल करते देखे गए हैं) का लंबा टीका लगा लेते ...धोती को तहमद की तरह बांधकर और ऊपर लाल रंग की फुल बाजू की शर्ट...मोटे तौर पर यही उनकी भौतिक दशा थी। वो हमेशा एक कागज में लेमनचूस (पच्चीस पैसे में पांच) लेकर आते और कोशिश करते किसी भी लड़के के जरिये उस खास लड़की तक पहुंच जाए....कुछेक बार आते-जाते गाछी में हाथ भी पकड़ लिया...तो लड़की को डर लगने लगा और वह अपने गांव की कुछेक और लड़कियों के साथ आने लगी थी...कुछ ही दिन के बाद उसने स्कूल आना बंद कर दिया...भजनीक महोदय देवदास की मुद्रा में उसकी एक झलक पाने के लिए दिनभर स्कूल के आसपास भटकते...पता चला कि लड़की का ब्याह हो गया। जो वास्तव में बाल-विवाह था।अब जब स्कूल आ ही गया हूं तो आपको एक और दिलचस्प वाकया। हमारे स्कूल के हेडमास्टर साहब सदाव्रत बाबू काफी सख्त थे...कभी-कभार किसी भी क्लास में घुस जाते और पढ़ाना शुरू कर देते। स्कूल में व्यवस्था कि अगली तीन बेंचों पर लड़कियां और बाकी लड़के। शंभुआ बेहद शैतान था और पहली बेंच पर बैठने वाली पुनमियां दांत फाड़ने में माहिर। हेडमास्टर साहब के साथ दिक्कत ये थे कि वे धोती-कुर्ता पहनते थे लेकिन कुर्सी पर दोनों पैर चढ़ाकर बैठते। धोती के साथ या तो अंडरवेयर पहना नहीं जाता है या वे पहनते नहीं थे। सो, जैसे ही टांग चढ़ाकर बैठते पूरा क्लास फिस्स-फिस्स करने लगता...लड़कियों में खलबली मच जाती। एकदिन शायद हेडमास्टर साहब समझ गए और कोने में पड़ी झाड़ू से शंभुआ की खूब पिटाई कर क्लास छोड़कर चले गए....एक मास्टरनी थी जिसे सब दीदीजी कहते, उसने जार-जार रोते शंभुआ से पूछा कि मारा क्यों तो शंभुआ आखिरकार बताए तो क्या....वो और जोर-जोर से रोने लगता। तब हिम्मत करके एक और बच्चे ने बताया कि असल में हेडमाट साब का -गंदा बात - देखकर शंभुआ हंस दिया था इसलिए मार पड़ी...दीदीजी भी खिखियाती हुई लजा गईं।

Friday, January 16, 2009

...कोई लाट साहब हो कि मोटर में बैठे हो

भाग -2
दोस्तो, मैं बिहार के बेगूसराय के एक गांव में अपने घर पहुंच गया। बेगूसराय से हम दो भाई टैक्सी की बजाय बस की भीड़ में झेलते-झालते किसी तरह पहुंच थे...मगर घर पहुंचने का जोश इतना था कि दिक्कतों का पता ही नहीं चला। टैक्सी से गांव नहीं जाने की एक ठोस वजह थी। मेरे पिताजी...किसान हैं। गाड़ी में बैठा देखकर निश्चित ही चिढ़ जाते और अपना गुस्सा जाहिर करने से अपने को रोक नहीं पाते- कोई लाट साहब तो हो नहीं कि गाड़ी में बैठकर घर आए हो...क्या जरूरत थी पांच सौ रुपये खर्च करने की...बस से आ जाते आठ- दस रुपये में। पिताजी खुद भी बहुत जरूरी न हो तो यात्रा का सबसे कम खर्च वाला रास्ता चुनते हैं...चाहें इसमें दिक्कत कितनी भी हो। और अगर पंद्रह-बीस किलोमीटर हो तो पैदल भी चलना उन्हें ज्यादा सुविधाजनक लगता है। ऐसा वे कई बार कर भी चुके हैं।बस से उतरकर अपने घर की तरफ जाने लगे तो देखा बस स्टैंड पर कुछेक दुकानें खुल गई हैं। मसलन, चैतु पान भंडार....एक बिना नाम का सैलून ( बांस- पुआल की छत वाली इस नामालूम सैलून में एक अदद कुर्सी थी और सामने एक सामान्य साइज का शीशा जिसके कोने झड़ चुके थे।) ...नाई की शक्ल देखी तो पता चला परकसबा है...बहुत कम उम्र में वो असम के कोकराझाड़ चला गया था....अब तो बुड्ढा़ सा दिखता है। नजदीक आकर प्रणाम किया तो पूछा बर्षों बाद आए हैं। उसने बताया कि असम में बोडो उग्रवादियों ने भगा दिया तो अब यहीं दुकान चलाता है। रास्ते में एक मैदान और उसके बाद एक प्राथमिक विद्यालय- उससे लगा एक खंडहर हालत में एक पुस्तकालय हुआ करता था। ये स्कूल और पुस्तकालय मेरे बाबा ने बनवाया था...हम सबने पढ़ाई की शुरुआत यहीं से की थी...सुविधा ये थे कि स्कूल बाबा ने बनवाया था और मास्टर हमेशा इस बात का खास ख्याल रखते थे कि इस परिवार के बच्चों को जरा भी न छेड़ा जाए...बाकी पूरे स्कूल के बच्चों को मार के बोखार छोड़ा देते थे...माटसाब। कोई बच्चा अगर स्कूल न पहुंचे तो चार बच्चों का दस्ता भेजा जाता था उसके घर जो मिट्टी के घरों के किसी कोने से उसे ढूंढ़ निकालता और दस्ते का एक-एक सदस्य दोनों हाथ और एक-एक सदस्य दोनों पैर पकड़कर झुलाने के अंदाज में उसे पकड़कर माटसाब के चरणों में ला पटकता। इस दौरान आरोपी छात्र- बाप- बाप करता रहता तो दस्ते के सदस्यों का खासा मनोरंजन होता। माटसाहब के पास पहुंचकर आरोपी छात्र कतई बेदम हो जाता। लेकिन माटसाहब जबतक बीस-पच्चीस छड़ी लगा न लें तो न उनका मनोरंजन होता और न ही क्लास के अन्य लड़कों का।लेकिन इसबार स्कूल का भवन काफी अच्छा हो गया था...पता चला पंचायत चुनाव के बाद बना हैऔर इसे अब हाईस्कूल के रूप में मान्यता मिलने वाली है। मिड डे मील की व्यवस्था है...और छात्रों की संख्या भी काफी बढ़ गई है। मैदान में देखा कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे थे...कड़ाके की सर्दी में भी ये बच्चे तकरीबन नंग-धड़ंग हालत में आउट-आउट कहकर चिल्लाते तो हिंदुस्तान में क्रिकेट की असली तस्वीर दिखती। ...मुझे याद है इसी मैदान पर हमसबका सबसे पसंदीदा खेल हुआ करता था फुटबाल। एक फुटबाल खरीदने के लिए गांव भर से चंदा होता था। मैं खुद गोलकीपर हुआ करता था....और जब कभी आस-पड़ोस के गांव से मैच होता तो मार हो जाता था। हम आराम से जीत गए तो ठीक नहीं तो बेईमानी करो और आपत्ति करने पर मार कर लो...मोटे तौर पर हमारी यही रणनीति रहती थी। मैच के दिन गांव के उस-उस आदमी की खासी पूछ होती जिसके पास थ्री-नट्टा ( देसी तमंचा) होता था क्योंकि मारपीट के समय असली खिलाड़ी वही होते जो तमंचा चलाने की बजाय केवल वहां चमका देते। मैच के पहले बाकायदा मुनादी होती थी कि दिन फलां ...फलां मैदान में मैच होगा। उस ग्राउंड पर आज क्रिकेट हो रहा था। सारे अनजान बच्चे। फुटबाल शायद सदा-सदा के लिए यहां मर चुका है।हमारा घर सामने था। कुछ लड़के-बच्चे गाय चराकर घर वापस आ रहे थे... ज्यादातर भैंसें थीं। गाय के पेट वाले हिस्से पर लाल रंग से कुछ कलाकृतियां बनाई गई थी और उसकी सींगों पर तेल में सने चटक सिंदूर लेप दिए गए थे। बेचारी भैसो की कोई साज- सज्जा इसलिए नहीं की गई थी कि उनका रंग काला था और उसपर कोई दूसरा रंग चढ़ने की गुंजाइश नहीं थी। ....भैंसे मस्त भाव से पगुराती हुई चली जा रही थी और उसकी पीठ पर बैठा बच्चे की देह भैंस की चाल के साथ हिचकोले खा रही थी। कुछ महिलाएं हाथ भर का घोघ ( घूंघट) काढ़े लोटा लेकर शायद शौच के लिए खेतों की ओर जा रही थीं। हमें देखकर पता नहीं क्या सोचा कि चार-पांच हाथ का किनारा करके आगे निकल गईं। ( दोस्तो गांव के बारे में अभी और लिखने का इरादा है। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा... धन्यवाद।)

Thursday, January 15, 2009

हम तो जाते अपने गाम, सबको राम-राम-राम

भाग १
अभी पंद्रह दिनों पहले घर गया था। बिहार के बेगूसराय जिले के एक गांव का रहने वाला हूं। दिल्ली से बुरी तरह से ऊबा हुआ, जैसे-तैसे छुट्टियां मैनेज कर तक़रीबन सवा तीन साल बाद घर गया था। बेवजह पटना स्टेशन पर ही ट्रेन से उतर गया। हम दोनों भाई पटना स्टेशन के हनुमान मंदिर भी गए और ढेर सारा वहां का प्रसाद नैवेद्यम भी खरीदकर घर के लिए रख लिया। बाहर निकलते लोगों का रेला था...एक रिक्शेवाले ने नजदीक आकर कहा- रेक्सा होगा सॉर। रिक्शे पर बैठकर हम दोनों भाई रिक्शा वाले के पूछने के अंदाज पर ठठाकर हंसते रहे..अब लग गया था, आ गए अपने घर। बोरिंग रोड में अपने बहन के घर जा रहा था। बीच में ही रिक्शा रुकवाकर उतर गया। सड़क के किनारे लिट्टी- चोखा भी खाया और बाद में तिलकुट भी। कई दिनों से दाढ़ी बढ़ी हुई थी। सो, हम दोनों ने दाढ़ी बनवाई। सैलून में सूचना लिखी हुई थी- बैट्री चार्ज करने पर पांच रुपये देना होगा। हम दोनों के दाढ़ी बनाने के सैलून वाले ने पंद्रह रुपये लिए। वहां से निकलकर एक बढ़िया जर्दे वाला पान मुंह में दबाया ...जो दीदी के घर पहुंचने तक एकदम से लाल टूस हो गया...दांतों को भी लाल किए देता था। बहन से लगभग पांच साल बाद मिल रहा था। रात में दीदी-जीजा जी से बातचीत हुई। जीजा जी हैदराबाद से ट्रांसफर लेकर बिहार अपने राज्य में हाल ही में आए हैं...अब उन्हें थोड़ा अफसोस और सूबे की सरकारों को लेकर थोड़ा गुस्सा है...बिहार लौटने को अपने निर्णय पर पछता रहे हैं कि बेकारे में घर के मोह में यहां लौट आए। यहां न तो बिजली है और न पानी...बाढ़ आता है तो लगता है पटनो डूब जाएगा। अपहरण और गुंडागर्दी का वही हाल है। बाहर से हमेशा कोई न कोई डेलीगेशन आता है और कहता है कि बिहार में निवेश करेंगे...मगर जाने के बाद लौटकर कोई आता ही नहीं...क्या खाक निवेश करेगा।खैर, तड़के हम पटना स्टेशन आ गए। पहली जनवरी थी। हनुमान मंदिर में उस घने कोहरे के बावजूद श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी। हम इंटर सिटी में सवार हो गए। ...रास्ते में झाल मूढ़ी और चना का मजा तो लिया ही...बाढ़ की लाई से तो पैसे ही वसूल हो गए भाई। इतना कुछ खाने के बाद भी कुल खर्चा आया लगभग बीस रुपये। पानी की बोतल साथ थी...बोतल वाला पानी पीते देखकर यात्रियों ने हमें अजीब नजरों से देखा। हम वाकई सकपका गए और बोतल को हमने जब खिड़की के बाहर फेंक दिया और कुछ यात्री ज्यादा अचंभे में थे। क्योंकि उसमें थोड़ा पानी बचा था। दरअसल मुझे लोगों की नजरों की वजह से थोड़ा अपराध बोध सा हुआ और उसी शर्मिंदगी की हड़बड़ाहट में पानी खिड़की के बाहर फेंका था। बाद में लोगों को रेलवे स्टेशनों पर चुरू से पानी पीते देखा तो मुझे खुद पर और भी शर्मिंदगी हुई। जो पानी पीकर पूरा बिहार जीता है बल्कि दौड़ता है, वही पानी क्या किसी को भी बीमार बना सकता है। मैने भी उतरकर बाकायदा अंजुलि से पानी पीकर अपने धत्कर्मों का पश्चाताप किया...पानी में थोड़ा आइरन ज्यादा लगा लेकिन स्वाद वही जाना-पहचाना था। बरौनी स्टेशन पर कुछ पुलिस वाले दो मजदूरों को जैसे-तैसे बेहोश हालत में घसीटकर ले जा रहे थे...पता चला पंजाब से कमाकर लौट रहा था ..रास्ते में नशाखुरानी गिरोह का शिकार हो गया। बेगूसराय स्टेशन आया तो लगा चलती ट्रेन से कूदकर गांव पहुंच जाऊं। स्टेशन के बाहर थोड़ा बदला-बदला सा था। टैक्सी भी काफी संख्या में लगी हुई थी और बाहर में स्टेट बैंक का एक एटीएम दिख गया। सोचा, गांव जाने से पहले कुछ पैसे निकाल लूं। लेकिन एटीएम के भीतर पांच-छह लोग घुसे हुए थे...मैं बाहर वेट करने लगा। दरवाजा हालांकि लोगों ने ही खोलकर रखा था। उनकी आपस की बातचीत अद्भुत थी...उनमें से सभी आपस में परिचित भी नहीं थे। एक पैसे निकाल रहा था तो कुछ लोग उसे बता रहे थे कि ( अपनी स्थानीय भाषा में) हिंदी वाला बटन दबा दो...बाद में एक ने बताया कि पासवर्ड जल्दी डाल दो नहीं तो फिर से करना पड़ेगा। हड़बड़ी में वो गलत दबा गया तो दूसरे वाला खुद से आपरेट करने लगा...पहले वाला जोर-जोर से अपना पासवर्ड भी बताता जा रहा था। जब उसके पैसे निकल गए तो तीन लोगों का गुट भी उससे अनुरोध करने लगा कि उसके भी पैसे निकाल दे... चूंकि उसने सफलता पूर्वक पैसे निकाल लिए थे इसलिए बोला- हां, बताईए पासवर्ड....और वो बताने लगा। तो इस तरह से सामूहिक रूप से पैसे निकालकर सभी विजयी भाव से बाहर निकले। उनका आपस का भरोसा वाकई सीखने लायक था।हम जानबूझकर बस में बैठकर गांव गए। थोड़ी दूर चलने के बाद बस में एक परिचित मिल गए। वे सीट पर बैठे थे और बहुत आग्रह कर हम दोनों भाईयों को उसी में जैसे-तैसे एडजस्ट करने लगे...जो हुआ नहीं तो उन्हें काफी परेशान देखा। दो आदमियों की सीट में भला चार कैसे आते। गौर किया बस में कोई महिला खड़ी नहीं थी और ज्यादातर युवक गेट पर मौज में लटके हुए बस की बॉडी को रह-रहकर ठोक रहे थे। मेरे लिए ये भी बड़ा अजीब था। देश की राजधानी में जहां बड़े-बड़े लोगों की भीड़ वाली मेट्रो रेल में भी बार-बार अपने शमी नारंग साहब उद्घोषणा करते हैं कि कृपया महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों को जगह दें- उसे भी लोग अनसुना कर लोग बैठे रहते हैं...लेकिन इस घनघोर देहात की बस में ऐसी किसी उद्घोषणा की जरूरत भी नहीं है, लोग महिलाओं को बगैर कहे-सुने जगह दे देते हैं। हाल के बाढ़ में सड़कें टूट जाने की खबर पिताजी बता रहे थे लेकिन पाया कि सड़कें बिल्कुल ठीक हालत में हैं....बल्कि ताजा ही बनी लगती थी। खैर, आराम से गांव पहुंच गए। ( दोस्तो, इसपर बहुत कुछ लिखूंगा लेकिन अगली किस्त में)

Wednesday, January 14, 2009

...पेशाब का पैसा

बेरोजगारी के दिनों में बस अड्डों पर...रेलवे स्टेशनों पर और भी इधर-उधर एक पतली- सी पुस्तिका खूब बिका करती थी- पैसे कमाने के सौ तरीके। पता नहीं इसमें तरीका कौन-कौन सा हुआ करता था लेकिन अब अगर इस पुस्तक के लेखक महोदय मिल जाएं तो मैं उन्हें एक सौ एक वां तरीका भी बता सकता हूं। मैं तो खैर क्या बताऊंगा, हमारे साथी टीवी जर्नलिस्ट मनीष ठाकुर दरअसल इसी एक सौ एक वें तरीके के शिकार होते-होते बचे। सो, हमारे अनुरोध पर उन्होंने उस अनुभव के बारे में लिख बताया जो आफिस-आफिस सीरियल से कम दिलचस्प नहीं। खुद मनीष ठाकुर आपको मुसद्दीलाल के किरदार में नजर आएंगे-मैं तेरह जनवरी को दोपहर तक़रीबन बारह बजे अंतर्राज्यीय बस अड्डा कश्मीरी गेट गया था। हरियाणा रोडवेज की बसें जिस गेट से होकर बाहर निकलती है, उसी गेट से बाहर आते समय एक शौचालय दिखा जिसपर निःशुल्क सेवा का बोर्ड लगा था। मैं उस बढ़ा ही था कि वहां बैठी कुछेक औरतों में से एक ने कहा पैसे....मैं उसकी तरफ प्रश्नवाचक नजरों से देख ही रहा था कि उसने कहा दो रुपये। मैंने कहा- भई, ये तो निःशुल्क है। उसने कहा- ये सरकारी नहीं है। काफी हील-हुज्जत के बाद मैं इस बात पर राज़ी हुआ कि ये निःशुल्क वाला बोर्ड हटाओ तो दो रुपये तुरंत लो। आखिरकार न मैं राजी हुआ न वो बोर्ड हटाने को राजी हुईं। मैंने थोड़ी दूर पर एक कांस्टेबल को पाया तो उससे शिकायत की। उसने कहा कि ये हम नहीं देखते, चौकी में जाकर कहो। वहां की चौकी में जाकर मैने शिकायत करनी चाही। वहां कोई सिंह साहब हैं जिन्होंने कहा कि ये कोई क्राइम का मामला तो है नहीं...ये पेशाब का मामला है तो बस अड्डे के अधिकारी से कहो। मैं भी ठान चुका था कि आज पेशाब का हिसाब करूंगा जरूर। सो, आईएसबीटी के दूसरे माले के शिकायत केंद्र पर चला गया। वहां पूरा रामराज था। कर्मचारी धूप सेंक रहे थे या इधर-उधर थे। मैने कहा- शिकायत लिखवानी है। तफ़्सील से बताया कि समस्या पेशाब की है। उसने कहा कि किस केंद्र पर हुआ तो मैने कहा कि केंद्र संख्या तो देखा ही नहीं। उसने कहा जाकर देख आईए, तभी शिकायत लिखेंगे। मैं झल्लाया...उन्हें मजा आया। मैंने सोचा अब फिर इतनी दूर जाकर बूथ नंबर क्या देखना..उसके बड़े अधिकारी को बताया। कोई त्यागी जी थे.....जूनियर इंजीनियर। उन्होंने कहा- हम कार्रवाई करेंगे। मैने कहा कि मैं लिखित में शिकायत करना चाहता हूं। उन्होंने कहा कीजिये जी। उन्होंने जो प्रोफार्मा दिया, उसपर अपनी शिकायत लिख (४०१३) दी वहां से जब बाहर आया तो सोचा पिशाब तो कर ही लूं। उसी केंद्र पर गया लेकिन वहां की महिलाओं ने कहा कि- जी भर गया। लेकिन दो रुपये दिए बिना नहीं जाने देंगे। मैं भागा-भागा त्यागी जी के पास गया और कहा कि साहब अब तो आपको ही चलना होगा...वो आए और औरतों को वहां से भगा दिया। मैने कहा कि हुजूर ये सेंटर नंबर क्या है...इधर उधर देखकर उन्होंने कहा कि इन बदमाशों ने सेंटर का नंबर ही मिटा दिया है...इनपर तो जरूर कार्रवाई होगी। त्यागी जी मुझे पिशाब करवाने के बाद अपने साथ ही लिवा ले गए। फिर भरोसा दिया कि इनका अबके इलाज करूंगा। कुछेक समय बाद त्यागी जी के चैंबर से लौटने के बाद दोबारा उसी शौचालय में के पास गया तो महिलाएं उसी तरह बैठीं मिलीं ...लोगों से दो रुपये वसूलते हुए मुझे देखकर भन्नाईं...कहा तसल्ली कर ली...क्या होगा शिकायत करके...यहां अट्ठारह शौचालय हैं आईएसबीटी में जहां से हर महीने हजार-हजार रुपये की बख्शीश जाती है अधिकारियों को ...किस मुंह से करेंगे कार्रवाई? ...अब मैं बगलें झांकने लगा। दोस्तो, अब जब भी आपके साथ कम-से-कम- आईएसबीटी में ऐसा कोई वाकया तो तो समय मत गंवाना...इधर-उधर मत भटकना...चुपचाप दो रुपये देकर स्स्स्सु।

Monday, January 12, 2009

....बड़े धोखे हैं इस राह में

रोहित कुमार टीवी जर्नलिस्ट हैं और न्यूज़ एंकर भी हैं। कई अच्छे संस्थानों में काम कर चुके हैं। इसके बावजूद एक रीअल जर्नलिस्ट बनने की उनमें छटपटाहट है। टीवी की दुनिया के वो तमाम लोग इस बेचैनी को शिद्दत के साथ महसूस कर सकते हैं जो लाइट, कैमरा और लकदक चेहरों के बीच एक पत्रकार के रूप में खुद को अकेला महसूस करते हैं।
मेरी कहानी..या यूं कि उन लोगों की कहानी जिन्होंने टीवी पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की है। इस सफर में कभी मैं अपने को हिंदी फिल्मों के उस नायक की तरह पाता हूं जो तमाम मुश्किलों से पार पाकर आखिरकार विजेता बनता है। ...लेकिन कभी-कभी सोचता हूं ऐसा तो सिर्फ फिल्मों में ही होता है...जिसकी स्क्रिप्ट हम-आप जैसा ही कोई आदमी लिखता है। लेकिन हकीकत में क्या ऐसा होता है? लेकिन उम्मीद है कि टूटती नहीं। उम्मीदों के भरोसे ही जवान हुए। बचपन में अच्छे नंबरों की उम्मीद...कालेज में अच्छी गर्लफ्रेंड और सिर्फ पास होने की उम्मीद...विश्वविद्यालय में अच्छे कोर्स में दाखिले की उम्मीद...फिर अच्छी नौकरी की उम्मीद। टीवी पर हाथ में माइक थामे कुछ जुझारू लोगों को देखकर ये तय कर लिया गया कि टीवी पत्रकार ही बनना है। खैर, शुरूआत भी हो गई। अब गांव में लोग कहते हैं कि लड़का पत्रकार बन गया। गांव में कभी-कभार इज्ज्त भी मिल जाती है इसी बहाने। शाबाशी लेते हुए हमेशा अच्छा लगता है। लेकिन न जाने क्यों इस शाबासी को लेते हुए थोड़ी झेंप होती है कि लड़का टीवी पत्रकार बन गया। गांव में कई बार बड़े-बूढ़े बड़े-बड़े मसलों पर चर्चा करते हैं...बातों पर खूब गौर किया जाता है कि। बेवजह मान लिया जाता है कि मेरी बातें प्रामाणिक हैं। ...लेकिन सच्चाई तो मैं जानता हूं। हर रोज यही सोचकर दफ़्तर जाता हूं कि आज जरूर कुछ ऐसा करना है जिससे खुद मुझे भी अहसास हो कि वाकई मैं पत्रकार बन गया हूं। लेकिन न तो मेरे साथ या मेरे आसपास किसी के साथ ऐसा सुखद हादसा होता पाया हूं। बास टीआरपी और साथी आर्थिक मंदी के बाद उपजे हालात का हवाला देकर डराते हैं। खैर, मंदी का दौर कभी तो खत्म होगा ही, ऐसे में इंतजार है फिर पत्रकार बनने का। कई बार इस इंतजार में कोफ्त होती है। ...ऐसे में दफ्तर में कुछ लोगों को इकट्ठा कर ज्ञान की उल्टियां कर लेता हूं। इन उल्टियों के दम पर ही करियर चल रहा है। लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया में जिस तरह से भाषाई और कंटेट को लेकर प्रयोग हो रहे हैं उससे थोड़ी निराशा जरूर होती है। इन हताशा के क्षणों में ही मैं पत्रकारिता के भगवान यानी ब्रह्माण्ड के पहले रिपोर्टर नारद मुनी से प्रार्थना करता हूं कि बनाना तो असली पत्रकार एक-न-एक दिन बना देना। ...बस साहब, कुछ ऐसा ही चल चल रहा है अपने करियर का सेंसेक्स।

Sunday, January 11, 2009

स्टिंग आपरेशन बना सबूत

कुंदन शशिराज, एमएचवन न्यूज के जर्नलिस्ट हैं। उन्होंने स्टिंग आपरेशन और उसके कानूनी साक्ष्य बनने के बारे में लिखा है। कुंदन, काफी समय कोबरा पोस्ट की टीम में भी रह चुके हैं और उसके एक स्टिंग आपरेशन को नजदीक से देखा-समझा है। शायद इसलिए हक़ के साथ इस मद्दे पर वो बेहतर कह पाए हैं।बीस अक्तूबर २००८ को पटियाला हाउस कोर्ट ने चंद्रशेखर को दो साल कैद की सज़ा सुनाई। हालांकि ये बेहद मुश्किल है कि आप चंद्रशेखर को जानते हों। पूरा मामला भी बेहद पुराना है। दरअसल चंद्रशेखर २००६ में दिल्ली के नबी करीम इलाके में चलने वाली बहुचर्चित संस्था -प्रयास- का केयरटेकर हुआ करता था। वही प्रयास, जिसके कर्ताधर्ता कभी दिल्ली पुलिस के शेर रह चुके आमोद कंठ साहब हैं। लेकिन मजलूम बच्चों के उत्थान का दावा करने वाली इस संस्था के असली सच को इसी संस्था में काम करने वाले चंद्रशेखर ने ही अपने काले कारनामों से सबके सामने बेपर्दा कर दिया। दरअसल, इस संस्था के उस सेंटर में चंद्रशेखर जहां काम करता था, वहां से बच्चों को बेचने का काम होता था। बच्चे बिक गए तो बिक गए वरना उन्हें भाड़े पर देने का काम भी इसी सेंटर में चंद्रशेखर किया करता था। संस्था के इस काले कारनामे का भांडा फोड़ा कोबरा पोस्ट ने अपने एक स्टिंग आपरेशन के जरिये। ये तमाम खोजबीन और स्टिंग आपरेशन करने वाले पत्रकार थे हरीश शर्मा। मै भी उस वक्त कोबरा पोस्ट में ही बतौर खोजी पत्रकार काम करता था...और इस स्टिंग आपरेशन के कुछेक महत्वपूर्ण मौकों पर मुझे भी जाने का मौक़ा मिला। खासकर तब, जब चंद्रशेखर से मुलाकातों का दौर चल रहा था। उस वक्त मैं भी कई बार चंद्रशेखर से मिला। खैर, प्रयास की पोल खोलती ये पूरी स्टोरी पूरी की गई...और फिर बाद में स्टार न्यूज़ पर इसका प्रसारण भी हुआ। खबर चलने के बाद चंद्रशेखर की गिरफ्तारी हुई और पटियाला हाउस कोर्ट में मुकदमा चला। तकरीबन दो साल की सुनवाई के बाद स्टिंग आपरेशन और गवाहों के बयानों को आधार मानते हुए कोर्ट ने चंद्रशेखर को दोषी ठहराया। ..उसे दो साल कैद की सज़ा सुनाई।स्टिंग आपरेशन की वीडियो फुटेज को कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सबूत माना। वीडियो फुटेज में जो भी सबूत पेश किए गए, उसकी तस्दीक के लिए कई गवाह कोर्ट में पेश हुए। वीडियो और आडियो की असलियत पर तकरीबन दो साल तक कोर्ट में बहस चली और आखिरकार कोर्ट ने भी स्टिंग आपरेशन के सच पर अपनी मुहर लगा दी। ये एतिहासिक तो था ही, लेकिन ऐसा नहीं था कि ये पहली बार हुआ था। इससे पहले भी कोर्ट ने स्टिंग आपरेशन को आधार मानते हुए एक बड़े मामले में ऐसा फैसला सुनाया कि कईयों की सोच बदल गई। मामला आपरेशन दुर्योधन का था। इस स्टिंग आपरेशन को पुख्ता आधार मानते हुए कोर्ट ने एतिहासिक फैसला सुनाया। लेकिन इसी फैसले के कुछ वक्त बाद उमा प्रकारण मामले से जुड़े विवाद ने स्टिंग आपरेशन की सच्चाई को काफी हद तक सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया।उमा खुराना प्रकरण के बाद भले ही एकबार स्टिग आपरेशन की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे , लेकिन चंद्रशेखर मामले में कोर्ट के फैसले ने कई चीजो को एकबारगी साफ कर दिया है। मसलन, खबरों की सही पड़ताल के बाद अगर आप सबूत जुटाने के लिए स्टिंग आपरेशन का सहारा लेते हैं तो फिर सामने आने वाला सच अपनी कहानी खुद कह देता है। स्टिंग आपरेशन को अर आप सबूत पेश करने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करेंगे तो सबूतों को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा। बहरहाल, चंद्रशेखर मामले में कोर्ट के फैसले के बाद हमारे आत्मबल को संबल मिला है। ये यकीन पुख्ता हुआ कि सच के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई अपनी जीत आखिरकार ढूंढ़ ही लेती है। कोबरा पोस्ट में उस वक्त काम कर रहे तमाम दोस्त अब अल-अलग जगहों पर काम कर रहे हैं, लेकिन कोर्ट का फैसला हम सबके लिए साझी खुशी लेकर आया।