Pages

Monday, January 12, 2009

....बड़े धोखे हैं इस राह में

रोहित कुमार टीवी जर्नलिस्ट हैं और न्यूज़ एंकर भी हैं। कई अच्छे संस्थानों में काम कर चुके हैं। इसके बावजूद एक रीअल जर्नलिस्ट बनने की उनमें छटपटाहट है। टीवी की दुनिया के वो तमाम लोग इस बेचैनी को शिद्दत के साथ महसूस कर सकते हैं जो लाइट, कैमरा और लकदक चेहरों के बीच एक पत्रकार के रूप में खुद को अकेला महसूस करते हैं।
मेरी कहानी..या यूं कि उन लोगों की कहानी जिन्होंने टीवी पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की है। इस सफर में कभी मैं अपने को हिंदी फिल्मों के उस नायक की तरह पाता हूं जो तमाम मुश्किलों से पार पाकर आखिरकार विजेता बनता है। ...लेकिन कभी-कभी सोचता हूं ऐसा तो सिर्फ फिल्मों में ही होता है...जिसकी स्क्रिप्ट हम-आप जैसा ही कोई आदमी लिखता है। लेकिन हकीकत में क्या ऐसा होता है? लेकिन उम्मीद है कि टूटती नहीं। उम्मीदों के भरोसे ही जवान हुए। बचपन में अच्छे नंबरों की उम्मीद...कालेज में अच्छी गर्लफ्रेंड और सिर्फ पास होने की उम्मीद...विश्वविद्यालय में अच्छे कोर्स में दाखिले की उम्मीद...फिर अच्छी नौकरी की उम्मीद। टीवी पर हाथ में माइक थामे कुछ जुझारू लोगों को देखकर ये तय कर लिया गया कि टीवी पत्रकार ही बनना है। खैर, शुरूआत भी हो गई। अब गांव में लोग कहते हैं कि लड़का पत्रकार बन गया। गांव में कभी-कभार इज्ज्त भी मिल जाती है इसी बहाने। शाबाशी लेते हुए हमेशा अच्छा लगता है। लेकिन न जाने क्यों इस शाबासी को लेते हुए थोड़ी झेंप होती है कि लड़का टीवी पत्रकार बन गया। गांव में कई बार बड़े-बूढ़े बड़े-बड़े मसलों पर चर्चा करते हैं...बातों पर खूब गौर किया जाता है कि। बेवजह मान लिया जाता है कि मेरी बातें प्रामाणिक हैं। ...लेकिन सच्चाई तो मैं जानता हूं। हर रोज यही सोचकर दफ़्तर जाता हूं कि आज जरूर कुछ ऐसा करना है जिससे खुद मुझे भी अहसास हो कि वाकई मैं पत्रकार बन गया हूं। लेकिन न तो मेरे साथ या मेरे आसपास किसी के साथ ऐसा सुखद हादसा होता पाया हूं। बास टीआरपी और साथी आर्थिक मंदी के बाद उपजे हालात का हवाला देकर डराते हैं। खैर, मंदी का दौर कभी तो खत्म होगा ही, ऐसे में इंतजार है फिर पत्रकार बनने का। कई बार इस इंतजार में कोफ्त होती है। ...ऐसे में दफ्तर में कुछ लोगों को इकट्ठा कर ज्ञान की उल्टियां कर लेता हूं। इन उल्टियों के दम पर ही करियर चल रहा है। लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया में जिस तरह से भाषाई और कंटेट को लेकर प्रयोग हो रहे हैं उससे थोड़ी निराशा जरूर होती है। इन हताशा के क्षणों में ही मैं पत्रकारिता के भगवान यानी ब्रह्माण्ड के पहले रिपोर्टर नारद मुनी से प्रार्थना करता हूं कि बनाना तो असली पत्रकार एक-न-एक दिन बना देना। ...बस साहब, कुछ ऐसा ही चल चल रहा है अपने करियर का सेंसेक्स।

1 comment:

PN Subramanian said...

हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं. हम तो बस ब्लॉगर बन कर ही खुश हैं.