Pages

Wednesday, January 14, 2009

...पेशाब का पैसा

बेरोजगारी के दिनों में बस अड्डों पर...रेलवे स्टेशनों पर और भी इधर-उधर एक पतली- सी पुस्तिका खूब बिका करती थी- पैसे कमाने के सौ तरीके। पता नहीं इसमें तरीका कौन-कौन सा हुआ करता था लेकिन अब अगर इस पुस्तक के लेखक महोदय मिल जाएं तो मैं उन्हें एक सौ एक वां तरीका भी बता सकता हूं। मैं तो खैर क्या बताऊंगा, हमारे साथी टीवी जर्नलिस्ट मनीष ठाकुर दरअसल इसी एक सौ एक वें तरीके के शिकार होते-होते बचे। सो, हमारे अनुरोध पर उन्होंने उस अनुभव के बारे में लिख बताया जो आफिस-आफिस सीरियल से कम दिलचस्प नहीं। खुद मनीष ठाकुर आपको मुसद्दीलाल के किरदार में नजर आएंगे-मैं तेरह जनवरी को दोपहर तक़रीबन बारह बजे अंतर्राज्यीय बस अड्डा कश्मीरी गेट गया था। हरियाणा रोडवेज की बसें जिस गेट से होकर बाहर निकलती है, उसी गेट से बाहर आते समय एक शौचालय दिखा जिसपर निःशुल्क सेवा का बोर्ड लगा था। मैं उस बढ़ा ही था कि वहां बैठी कुछेक औरतों में से एक ने कहा पैसे....मैं उसकी तरफ प्रश्नवाचक नजरों से देख ही रहा था कि उसने कहा दो रुपये। मैंने कहा- भई, ये तो निःशुल्क है। उसने कहा- ये सरकारी नहीं है। काफी हील-हुज्जत के बाद मैं इस बात पर राज़ी हुआ कि ये निःशुल्क वाला बोर्ड हटाओ तो दो रुपये तुरंत लो। आखिरकार न मैं राजी हुआ न वो बोर्ड हटाने को राजी हुईं। मैंने थोड़ी दूर पर एक कांस्टेबल को पाया तो उससे शिकायत की। उसने कहा कि ये हम नहीं देखते, चौकी में जाकर कहो। वहां की चौकी में जाकर मैने शिकायत करनी चाही। वहां कोई सिंह साहब हैं जिन्होंने कहा कि ये कोई क्राइम का मामला तो है नहीं...ये पेशाब का मामला है तो बस अड्डे के अधिकारी से कहो। मैं भी ठान चुका था कि आज पेशाब का हिसाब करूंगा जरूर। सो, आईएसबीटी के दूसरे माले के शिकायत केंद्र पर चला गया। वहां पूरा रामराज था। कर्मचारी धूप सेंक रहे थे या इधर-उधर थे। मैने कहा- शिकायत लिखवानी है। तफ़्सील से बताया कि समस्या पेशाब की है। उसने कहा कि किस केंद्र पर हुआ तो मैने कहा कि केंद्र संख्या तो देखा ही नहीं। उसने कहा जाकर देख आईए, तभी शिकायत लिखेंगे। मैं झल्लाया...उन्हें मजा आया। मैंने सोचा अब फिर इतनी दूर जाकर बूथ नंबर क्या देखना..उसके बड़े अधिकारी को बताया। कोई त्यागी जी थे.....जूनियर इंजीनियर। उन्होंने कहा- हम कार्रवाई करेंगे। मैने कहा कि मैं लिखित में शिकायत करना चाहता हूं। उन्होंने कहा कीजिये जी। उन्होंने जो प्रोफार्मा दिया, उसपर अपनी शिकायत लिख (४०१३) दी वहां से जब बाहर आया तो सोचा पिशाब तो कर ही लूं। उसी केंद्र पर गया लेकिन वहां की महिलाओं ने कहा कि- जी भर गया। लेकिन दो रुपये दिए बिना नहीं जाने देंगे। मैं भागा-भागा त्यागी जी के पास गया और कहा कि साहब अब तो आपको ही चलना होगा...वो आए और औरतों को वहां से भगा दिया। मैने कहा कि हुजूर ये सेंटर नंबर क्या है...इधर उधर देखकर उन्होंने कहा कि इन बदमाशों ने सेंटर का नंबर ही मिटा दिया है...इनपर तो जरूर कार्रवाई होगी। त्यागी जी मुझे पिशाब करवाने के बाद अपने साथ ही लिवा ले गए। फिर भरोसा दिया कि इनका अबके इलाज करूंगा। कुछेक समय बाद त्यागी जी के चैंबर से लौटने के बाद दोबारा उसी शौचालय में के पास गया तो महिलाएं उसी तरह बैठीं मिलीं ...लोगों से दो रुपये वसूलते हुए मुझे देखकर भन्नाईं...कहा तसल्ली कर ली...क्या होगा शिकायत करके...यहां अट्ठारह शौचालय हैं आईएसबीटी में जहां से हर महीने हजार-हजार रुपये की बख्शीश जाती है अधिकारियों को ...किस मुंह से करेंगे कार्रवाई? ...अब मैं बगलें झांकने लगा। दोस्तो, अब जब भी आपके साथ कम-से-कम- आईएसबीटी में ऐसा कोई वाकया तो तो समय मत गंवाना...इधर-उधर मत भटकना...चुपचाप दो रुपये देकर स्स्स्सु।

2 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

ऐसे में तो सविनय अवज्ञा आन्दोलन करके बस अड्डे के अधिकारियों के दफ्तर और उससे निकलने के सारे रास्ते को डुबोना पडेगा. १८००० रुपये महीने की रिश्वत तो वही लेते हैं न!

Arvind said...

sanjeev ji apka blog mene pehli baar dekha hai...bahut acha hai....vaki aapki himmat aur jajba tarif ke kabil hai... laga ki mujhi bhi kuch na kuch aapke blog per likhna chayhye...
arvind sharma mh one news