Pages

Thursday, January 15, 2009

हम तो जाते अपने गाम, सबको राम-राम-राम

भाग १
अभी पंद्रह दिनों पहले घर गया था। बिहार के बेगूसराय जिले के एक गांव का रहने वाला हूं। दिल्ली से बुरी तरह से ऊबा हुआ, जैसे-तैसे छुट्टियां मैनेज कर तक़रीबन सवा तीन साल बाद घर गया था। बेवजह पटना स्टेशन पर ही ट्रेन से उतर गया। हम दोनों भाई पटना स्टेशन के हनुमान मंदिर भी गए और ढेर सारा वहां का प्रसाद नैवेद्यम भी खरीदकर घर के लिए रख लिया। बाहर निकलते लोगों का रेला था...एक रिक्शेवाले ने नजदीक आकर कहा- रेक्सा होगा सॉर। रिक्शे पर बैठकर हम दोनों भाई रिक्शा वाले के पूछने के अंदाज पर ठठाकर हंसते रहे..अब लग गया था, आ गए अपने घर। बोरिंग रोड में अपने बहन के घर जा रहा था। बीच में ही रिक्शा रुकवाकर उतर गया। सड़क के किनारे लिट्टी- चोखा भी खाया और बाद में तिलकुट भी। कई दिनों से दाढ़ी बढ़ी हुई थी। सो, हम दोनों ने दाढ़ी बनवाई। सैलून में सूचना लिखी हुई थी- बैट्री चार्ज करने पर पांच रुपये देना होगा। हम दोनों के दाढ़ी बनाने के सैलून वाले ने पंद्रह रुपये लिए। वहां से निकलकर एक बढ़िया जर्दे वाला पान मुंह में दबाया ...जो दीदी के घर पहुंचने तक एकदम से लाल टूस हो गया...दांतों को भी लाल किए देता था। बहन से लगभग पांच साल बाद मिल रहा था। रात में दीदी-जीजा जी से बातचीत हुई। जीजा जी हैदराबाद से ट्रांसफर लेकर बिहार अपने राज्य में हाल ही में आए हैं...अब उन्हें थोड़ा अफसोस और सूबे की सरकारों को लेकर थोड़ा गुस्सा है...बिहार लौटने को अपने निर्णय पर पछता रहे हैं कि बेकारे में घर के मोह में यहां लौट आए। यहां न तो बिजली है और न पानी...बाढ़ आता है तो लगता है पटनो डूब जाएगा। अपहरण और गुंडागर्दी का वही हाल है। बाहर से हमेशा कोई न कोई डेलीगेशन आता है और कहता है कि बिहार में निवेश करेंगे...मगर जाने के बाद लौटकर कोई आता ही नहीं...क्या खाक निवेश करेगा।खैर, तड़के हम पटना स्टेशन आ गए। पहली जनवरी थी। हनुमान मंदिर में उस घने कोहरे के बावजूद श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी। हम इंटर सिटी में सवार हो गए। ...रास्ते में झाल मूढ़ी और चना का मजा तो लिया ही...बाढ़ की लाई से तो पैसे ही वसूल हो गए भाई। इतना कुछ खाने के बाद भी कुल खर्चा आया लगभग बीस रुपये। पानी की बोतल साथ थी...बोतल वाला पानी पीते देखकर यात्रियों ने हमें अजीब नजरों से देखा। हम वाकई सकपका गए और बोतल को हमने जब खिड़की के बाहर फेंक दिया और कुछ यात्री ज्यादा अचंभे में थे। क्योंकि उसमें थोड़ा पानी बचा था। दरअसल मुझे लोगों की नजरों की वजह से थोड़ा अपराध बोध सा हुआ और उसी शर्मिंदगी की हड़बड़ाहट में पानी खिड़की के बाहर फेंका था। बाद में लोगों को रेलवे स्टेशनों पर चुरू से पानी पीते देखा तो मुझे खुद पर और भी शर्मिंदगी हुई। जो पानी पीकर पूरा बिहार जीता है बल्कि दौड़ता है, वही पानी क्या किसी को भी बीमार बना सकता है। मैने भी उतरकर बाकायदा अंजुलि से पानी पीकर अपने धत्कर्मों का पश्चाताप किया...पानी में थोड़ा आइरन ज्यादा लगा लेकिन स्वाद वही जाना-पहचाना था। बरौनी स्टेशन पर कुछ पुलिस वाले दो मजदूरों को जैसे-तैसे बेहोश हालत में घसीटकर ले जा रहे थे...पता चला पंजाब से कमाकर लौट रहा था ..रास्ते में नशाखुरानी गिरोह का शिकार हो गया। बेगूसराय स्टेशन आया तो लगा चलती ट्रेन से कूदकर गांव पहुंच जाऊं। स्टेशन के बाहर थोड़ा बदला-बदला सा था। टैक्सी भी काफी संख्या में लगी हुई थी और बाहर में स्टेट बैंक का एक एटीएम दिख गया। सोचा, गांव जाने से पहले कुछ पैसे निकाल लूं। लेकिन एटीएम के भीतर पांच-छह लोग घुसे हुए थे...मैं बाहर वेट करने लगा। दरवाजा हालांकि लोगों ने ही खोलकर रखा था। उनकी आपस की बातचीत अद्भुत थी...उनमें से सभी आपस में परिचित भी नहीं थे। एक पैसे निकाल रहा था तो कुछ लोग उसे बता रहे थे कि ( अपनी स्थानीय भाषा में) हिंदी वाला बटन दबा दो...बाद में एक ने बताया कि पासवर्ड जल्दी डाल दो नहीं तो फिर से करना पड़ेगा। हड़बड़ी में वो गलत दबा गया तो दूसरे वाला खुद से आपरेट करने लगा...पहले वाला जोर-जोर से अपना पासवर्ड भी बताता जा रहा था। जब उसके पैसे निकल गए तो तीन लोगों का गुट भी उससे अनुरोध करने लगा कि उसके भी पैसे निकाल दे... चूंकि उसने सफलता पूर्वक पैसे निकाल लिए थे इसलिए बोला- हां, बताईए पासवर्ड....और वो बताने लगा। तो इस तरह से सामूहिक रूप से पैसे निकालकर सभी विजयी भाव से बाहर निकले। उनका आपस का भरोसा वाकई सीखने लायक था।हम जानबूझकर बस में बैठकर गांव गए। थोड़ी दूर चलने के बाद बस में एक परिचित मिल गए। वे सीट पर बैठे थे और बहुत आग्रह कर हम दोनों भाईयों को उसी में जैसे-तैसे एडजस्ट करने लगे...जो हुआ नहीं तो उन्हें काफी परेशान देखा। दो आदमियों की सीट में भला चार कैसे आते। गौर किया बस में कोई महिला खड़ी नहीं थी और ज्यादातर युवक गेट पर मौज में लटके हुए बस की बॉडी को रह-रहकर ठोक रहे थे। मेरे लिए ये भी बड़ा अजीब था। देश की राजधानी में जहां बड़े-बड़े लोगों की भीड़ वाली मेट्रो रेल में भी बार-बार अपने शमी नारंग साहब उद्घोषणा करते हैं कि कृपया महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों को जगह दें- उसे भी लोग अनसुना कर लोग बैठे रहते हैं...लेकिन इस घनघोर देहात की बस में ऐसी किसी उद्घोषणा की जरूरत भी नहीं है, लोग महिलाओं को बगैर कहे-सुने जगह दे देते हैं। हाल के बाढ़ में सड़कें टूट जाने की खबर पिताजी बता रहे थे लेकिन पाया कि सड़कें बिल्कुल ठीक हालत में हैं....बल्कि ताजा ही बनी लगती थी। खैर, आराम से गांव पहुंच गए। ( दोस्तो, इसपर बहुत कुछ लिखूंगा लेकिन अगली किस्त में)

3 comments:

सतीश पंचम said...

रोचक विवरण। सुंदर मन।


लोगों के बीच पनपे आपसी विश्वास को जानकर खुशी हुई कि लोग आपस में पासवर्ड बता कर पैसे निकाल रहे है। आपसी विश्वास अच्छा लगा। खुशी तब और मिलती जब पासवर्ड बिना बताये ही हर कोई अपना पैसा खुद निकाल सकता। लेकिन जब लोग इस लायक हो जाते हैं, तब एक नया अविश्वास शुरू हो जाता है। रोचक पोस्ट।

Amit said...

jaldi likhiye..intezaar rahega....

रंजना said...

Apni matee kikhushboo mahsoosh hui,bada hi sukhad laga padhna.

Varshon baad Pichhle mahine udhar jana hua aur sadak bijlee tatha anya sthitiyon me aashateet sudhar bada hi sukhad laga.Nitishji ke liye man se badi dua nikli.