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Friday, January 16, 2009

...कोई लाट साहब हो कि मोटर में बैठे हो

भाग -2
दोस्तो, मैं बिहार के बेगूसराय के एक गांव में अपने घर पहुंच गया। बेगूसराय से हम दो भाई टैक्सी की बजाय बस की भीड़ में झेलते-झालते किसी तरह पहुंच थे...मगर घर पहुंचने का जोश इतना था कि दिक्कतों का पता ही नहीं चला। टैक्सी से गांव नहीं जाने की एक ठोस वजह थी। मेरे पिताजी...किसान हैं। गाड़ी में बैठा देखकर निश्चित ही चिढ़ जाते और अपना गुस्सा जाहिर करने से अपने को रोक नहीं पाते- कोई लाट साहब तो हो नहीं कि गाड़ी में बैठकर घर आए हो...क्या जरूरत थी पांच सौ रुपये खर्च करने की...बस से आ जाते आठ- दस रुपये में। पिताजी खुद भी बहुत जरूरी न हो तो यात्रा का सबसे कम खर्च वाला रास्ता चुनते हैं...चाहें इसमें दिक्कत कितनी भी हो। और अगर पंद्रह-बीस किलोमीटर हो तो पैदल भी चलना उन्हें ज्यादा सुविधाजनक लगता है। ऐसा वे कई बार कर भी चुके हैं।बस से उतरकर अपने घर की तरफ जाने लगे तो देखा बस स्टैंड पर कुछेक दुकानें खुल गई हैं। मसलन, चैतु पान भंडार....एक बिना नाम का सैलून ( बांस- पुआल की छत वाली इस नामालूम सैलून में एक अदद कुर्सी थी और सामने एक सामान्य साइज का शीशा जिसके कोने झड़ चुके थे।) ...नाई की शक्ल देखी तो पता चला परकसबा है...बहुत कम उम्र में वो असम के कोकराझाड़ चला गया था....अब तो बुड्ढा़ सा दिखता है। नजदीक आकर प्रणाम किया तो पूछा बर्षों बाद आए हैं। उसने बताया कि असम में बोडो उग्रवादियों ने भगा दिया तो अब यहीं दुकान चलाता है। रास्ते में एक मैदान और उसके बाद एक प्राथमिक विद्यालय- उससे लगा एक खंडहर हालत में एक पुस्तकालय हुआ करता था। ये स्कूल और पुस्तकालय मेरे बाबा ने बनवाया था...हम सबने पढ़ाई की शुरुआत यहीं से की थी...सुविधा ये थे कि स्कूल बाबा ने बनवाया था और मास्टर हमेशा इस बात का खास ख्याल रखते थे कि इस परिवार के बच्चों को जरा भी न छेड़ा जाए...बाकी पूरे स्कूल के बच्चों को मार के बोखार छोड़ा देते थे...माटसाब। कोई बच्चा अगर स्कूल न पहुंचे तो चार बच्चों का दस्ता भेजा जाता था उसके घर जो मिट्टी के घरों के किसी कोने से उसे ढूंढ़ निकालता और दस्ते का एक-एक सदस्य दोनों हाथ और एक-एक सदस्य दोनों पैर पकड़कर झुलाने के अंदाज में उसे पकड़कर माटसाब के चरणों में ला पटकता। इस दौरान आरोपी छात्र- बाप- बाप करता रहता तो दस्ते के सदस्यों का खासा मनोरंजन होता। माटसाहब के पास पहुंचकर आरोपी छात्र कतई बेदम हो जाता। लेकिन माटसाहब जबतक बीस-पच्चीस छड़ी लगा न लें तो न उनका मनोरंजन होता और न ही क्लास के अन्य लड़कों का।लेकिन इसबार स्कूल का भवन काफी अच्छा हो गया था...पता चला पंचायत चुनाव के बाद बना हैऔर इसे अब हाईस्कूल के रूप में मान्यता मिलने वाली है। मिड डे मील की व्यवस्था है...और छात्रों की संख्या भी काफी बढ़ गई है। मैदान में देखा कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे थे...कड़ाके की सर्दी में भी ये बच्चे तकरीबन नंग-धड़ंग हालत में आउट-आउट कहकर चिल्लाते तो हिंदुस्तान में क्रिकेट की असली तस्वीर दिखती। ...मुझे याद है इसी मैदान पर हमसबका सबसे पसंदीदा खेल हुआ करता था फुटबाल। एक फुटबाल खरीदने के लिए गांव भर से चंदा होता था। मैं खुद गोलकीपर हुआ करता था....और जब कभी आस-पड़ोस के गांव से मैच होता तो मार हो जाता था। हम आराम से जीत गए तो ठीक नहीं तो बेईमानी करो और आपत्ति करने पर मार कर लो...मोटे तौर पर हमारी यही रणनीति रहती थी। मैच के दिन गांव के उस-उस आदमी की खासी पूछ होती जिसके पास थ्री-नट्टा ( देसी तमंचा) होता था क्योंकि मारपीट के समय असली खिलाड़ी वही होते जो तमंचा चलाने की बजाय केवल वहां चमका देते। मैच के पहले बाकायदा मुनादी होती थी कि दिन फलां ...फलां मैदान में मैच होगा। उस ग्राउंड पर आज क्रिकेट हो रहा था। सारे अनजान बच्चे। फुटबाल शायद सदा-सदा के लिए यहां मर चुका है।हमारा घर सामने था। कुछ लड़के-बच्चे गाय चराकर घर वापस आ रहे थे... ज्यादातर भैंसें थीं। गाय के पेट वाले हिस्से पर लाल रंग से कुछ कलाकृतियां बनाई गई थी और उसकी सींगों पर तेल में सने चटक सिंदूर लेप दिए गए थे। बेचारी भैसो की कोई साज- सज्जा इसलिए नहीं की गई थी कि उनका रंग काला था और उसपर कोई दूसरा रंग चढ़ने की गुंजाइश नहीं थी। ....भैंसे मस्त भाव से पगुराती हुई चली जा रही थी और उसकी पीठ पर बैठा बच्चे की देह भैंस की चाल के साथ हिचकोले खा रही थी। कुछ महिलाएं हाथ भर का घोघ ( घूंघट) काढ़े लोटा लेकर शायद शौच के लिए खेतों की ओर जा रही थीं। हमें देखकर पता नहीं क्या सोचा कि चार-पांच हाथ का किनारा करके आगे निकल गईं। ( दोस्तो गांव के बारे में अभी और लिखने का इरादा है। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा... धन्यवाद।)

6 comments:

PN Subramanian said...

आपके मैका पहुँचने तक की दास्ताँ तो बड़ी अच्छी ही लगी अब आगे मइके का हाल चाल भी लिख ही दो.

शाश्‍वत शेखर said...

अच्‍छा लिखा आपने। गांव कि य़ाद हो आई। मेरे पिता भी ऐसे हि हैं, कुली क्युं करना, १० किलो खुद नहीं उठा सकते!

संगीता पुरी said...

आपको पढना अच्‍छा लगा...आगे की कडियों का इंतजार रहेगा।

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा आपको पढ़ना!!!

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प किस्सा गोई का अंदाज......बस थोड़ा गैप कर दे...पढने में ओर सुविधा हो जायेगी

prabhat said...

mazedaar hai pyare bhai. blogging mein thaur dhoondha, achcha kiya magar gaon ki yatra ki yeh tafsil bahut sunder hai. likh dalo...!