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Sunday, January 18, 2009

...दीदी जी लजा गईं

( भाग-तीन )
गांव में सुबह चार बजे ही नींद खुल गई। संभव है, जल्दी सो जाने की वज़ह से ऐसा हो या फिर भोर में अपने गांव को देखने की ललक। छह- सात बजे नीम का दातुन और हथेली पर थोड़ा सा वैद्यनाथ लाल दंत मंजन लेकर छत पर चला गया। ...पुराने दिनों की तरह ही कसकर दांत मांजा। वहां से ग़ौर किया कि साव जी के घर के पास एक जामुन का पेड़ था...बड़ा ऊंचा। अब नहीं है...पता चला बाढ़ में सब दहा गया। जामुन का पेड़ बड़ा टुनकाह ( नाज़ुक) होता है। फुनंगी पर चढ़ने की बाजी लगाकर एकबार हरिया डीलर का भाई उसपर चढ़ा तो औंधे मुंह गिरा...बड़ी मुश्किल से जान तो बच गई लेकिन एक हाथ पूरी तरह से टूट गया। जिंदगी भर अब उसी टूटी बांह के भरोसे है। ...तो ये जामुन का पेड़ कुछ अन्य वजहों से भी उस गांव में हमारी नस्ल के लौंडों के बीच लोकप्रिय था। ( ईमानदारी से ) मैं इस पेड़ का मजा नहीं ले पाया। ...जिसका अब अफसोस भी है। होता ये था कि इस पेड़ से तो तकरीबन आधा गांव और घरों के आंगन तक दिख जाते थे। ...अचानक ये पेड़ उस वक्त के लड़कों के बीच काफी चर्चित हो गया। आपस में पेड़ को लेकर काफी खुसुर-फुसुर होने लगी। पता चला कि पेड़ के पास एक घर था...जिसमें रहने वाली एक नई कनिया ( दुल्हन ) उघाड़ होकर नहाती है....माने शरीर पर कोई कपड़ा नहीं...दिगंबरावस्था में। पेड़ की फुनंगी से उस वक्त का ये चर्चित सीन साफ तौर पर दिखता था जिसे केवल मैटिनी शो में देखा जा सकता था। इस चक्कर में कई लड़के सुबह से ही पेड़ पर चढ़कर इंतजार करते रहते। ...जाड़ा, गर्मी या बरसात। नायिका उसी मुद्रा में नहाती ...और अक्सर दोपहर तकरीबन एक - दो बजे तक ये संभव हो पाता।शो देखने वाले हर बार ये चाहते कि सीन लंबा से लंबा हो। वो जब कभी मायके चली जाती तो महीने भर तक सब इंतजार करते। उसके गांव पहुंचते ही लड़कों के चेहरे पर रौनक लौट आती। इस बीच कई मायूसी की स्थायी मुद्रा में रहते। नंगे नहाने का कारण ये नहीं था कि वो कोई बौराई हुई या फैशनपरस्त औरत थी...शायद उसके पास इतने कम कपड़े थे कि जो कपड़े उतारकर नहाती थी, दोबारा उसी साड़ी को पहन लेती। ...तो ये सिलसिला इतना लोकप्रिय हो गया कि दोपहर तक बीस - पच्चीस लड़के पेड़ पर लुधके ( लटके ) रहते थे। चें-पों करते हुए। ...एक खास डाली के पास बैठने के लिए कभी-कभार झंझट भी हो जाता था आपस में। क्योंकि यहां से दिख तो साफ जाता था लेकिन ये इतना घना था कि दूर से इसपर बैठे लड़के किसी को दिखते नहीं थे। अब एकदिन उस महिला के ससुर लड़कों पर पिल पड़े....जो पकड़ में आए उन्हें चपत लगाई और उट्ठा-बैठी करवाकर छोड़ा। दिलचस्प बात ये है कि ससुर जी को ये पता ही नहीं था कि माजरा क्या है...वो तो दिन भर और जामुन का मौसम न होने के बावजूद पेड़ पर लौंडों के कोलाहल से परेशान थे। इसके बावजूद लड़के कहां मानने वाले थे। फिर दूसरे दिन पहुंच गये....मना करने पर लगे थेथरई करने। दो-चार देखने के बाद ससुर जी ने गांव की पंचायत बुला ली। रात दस बजे पंचायत लगी...बूढ़े का कहना था कि गांव भर के लौंडे उनके घर के पास जामुन के पेड़ पर लुधके रहते हैं। पंचायत ने कहा कि ये तो कोई ऐसा जुर्म है नहीं कि पंचायत इसमें दखल दे। और अगर पंचायत ऐसे मामलों में दखल देने लगे तो हो गया....। खैर, लौंडों के लिए पंचायत का सुखद अंत हो गया...और फिर दूसरे दिन से उनका बाईस्कोप शुरू। पता नहीं ये सिलसिला कबतक चला लेकिन आपकी सूचना के लिए बता दूं कि महिला के चार बच्चे हुए और अब काफी बड़े होकर दिल्ली- पंजाब कमाने चले गए हैं। चूंकि जामुन का पेड़ अब नहीं रहा तो बता पाना कठिन है कोई दूसरी महिला उसी तरह नहाती है या नहीं...क्योंकि ग़रीबी को अब भी है। तो बाढ़ से नई नस्ल के लौडों को एक बड़ा नुकसान ये भी हुआ।गांव में भी ताका-झांकी और नैन- मटक्का खूब होता है...मगर उसका अंदाज दूसरा होता है। मसलन, एक किर्तनियां ( भजनीक) था जो हमारी क्लास की एक बच्ची पर मर मिटा। बच्ची कुछ समझे ही न...और ये महोदय दिन भर उसकी फिराक में स्कूल के चक्कर लगाते। ये महाशय लगभग अधेड़ हो चुके थे। लेकिन जब भी लड़की की फिराक में आते तो नील ( कपड़े धोने के समय इस्तेमाल होने वाला, हमारे इधर के भजनीक इसे टीके के तौर पर इस्तेमाल करते देखे गए हैं) का लंबा टीका लगा लेते ...धोती को तहमद की तरह बांधकर और ऊपर लाल रंग की फुल बाजू की शर्ट...मोटे तौर पर यही उनकी भौतिक दशा थी। वो हमेशा एक कागज में लेमनचूस (पच्चीस पैसे में पांच) लेकर आते और कोशिश करते किसी भी लड़के के जरिये उस खास लड़की तक पहुंच जाए....कुछेक बार आते-जाते गाछी में हाथ भी पकड़ लिया...तो लड़की को डर लगने लगा और वह अपने गांव की कुछेक और लड़कियों के साथ आने लगी थी...कुछ ही दिन के बाद उसने स्कूल आना बंद कर दिया...भजनीक महोदय देवदास की मुद्रा में उसकी एक झलक पाने के लिए दिनभर स्कूल के आसपास भटकते...पता चला कि लड़की का ब्याह हो गया। जो वास्तव में बाल-विवाह था।अब जब स्कूल आ ही गया हूं तो आपको एक और दिलचस्प वाकया। हमारे स्कूल के हेडमास्टर साहब सदाव्रत बाबू काफी सख्त थे...कभी-कभार किसी भी क्लास में घुस जाते और पढ़ाना शुरू कर देते। स्कूल में व्यवस्था कि अगली तीन बेंचों पर लड़कियां और बाकी लड़के। शंभुआ बेहद शैतान था और पहली बेंच पर बैठने वाली पुनमियां दांत फाड़ने में माहिर। हेडमास्टर साहब के साथ दिक्कत ये थे कि वे धोती-कुर्ता पहनते थे लेकिन कुर्सी पर दोनों पैर चढ़ाकर बैठते। धोती के साथ या तो अंडरवेयर पहना नहीं जाता है या वे पहनते नहीं थे। सो, जैसे ही टांग चढ़ाकर बैठते पूरा क्लास फिस्स-फिस्स करने लगता...लड़कियों में खलबली मच जाती। एकदिन शायद हेडमास्टर साहब समझ गए और कोने में पड़ी झाड़ू से शंभुआ की खूब पिटाई कर क्लास छोड़कर चले गए....एक मास्टरनी थी जिसे सब दीदीजी कहते, उसने जार-जार रोते शंभुआ से पूछा कि मारा क्यों तो शंभुआ आखिरकार बताए तो क्या....वो और जोर-जोर से रोने लगता। तब हिम्मत करके एक और बच्चे ने बताया कि असल में हेडमाट साब का -गंदा बात - देखकर शंभुआ हंस दिया था इसलिए मार पड़ी...दीदीजी भी खिखियाती हुई लजा गईं।

1 comment:

manish said...

बहुत मस्त लिखे है |लगे रहिये |