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Tuesday, January 20, 2009

..चूरा- दही और अचार का नाश्ता

भाग-चार
बढ़िया से दांतों की सफाई करने के बाद लगे हाथों हैंडपंप के पानी से नहा भी लिया...भीषण जाड़े के बावजूद इसका पानी गीजर जैसा था। खैर, मेरी मां मेरा पसंदीदा तो क्या मिथिला के तकरीबन हर घर का नाश्ता चूरा- दही परोसकर बैठी थी। साथ में आलू का अचार। इस तरह का अचार भी शायद बिहार में ही बनता है। ...बड़ा आसान है इसे बनाना। उबले हुए आलू को छीलकर और उसके चार टुकड़े करने के बाद उसमें नमक, लाल मिर्च का पाउडर और थोड़ी- सी हल्दी डाली जाती है। इसमें थोड़ा सरसों तेल मिलाने के बाद दो-चार घंटे के लिए धूप में डाल दिया जाता है। ...आपका अचार तैयार है। लेकिन इसका जायका सिर्फ जाड़े के मौसम में ही मिलता है। आप भी चखकर बताइए कैसा लगा? उसी दौरान मां से थोड़ी गपशप हुई। दीन-दुनिया की बातें। उसने शिकायत भी की.... अब आए हो तो सब नया साल का खर्चा मांगेंगे...ज्यादा लुटाने की जरूरत नहीं है... वैसे तो ये कोई लिहाज करते नहीं हमारा। कोई काम कह दो तो सुनते ही नहीं....कोई पंचायत सदस्य बन गया है तो कोई मास्टर। ..अब पहले वाली कोई बात तो है नहीं। चप्पल पहने दुआर पर चढ़ जाते हैं। शादी में दो-तीन मारुति कार ले जाते हैं।...घरे-घरे टीवी हो गया है और सब जेनरेटर का लाइन ले लिया है। ...पूरा टोला रात दस बजे तक अंजोर (रौशन ) रहता है।दरअसल, बिहार के गांवो में बिजली की समस्या बहुत ज्यादा है। सो, वहां जेनरेटर का धंधा शहरों में केबिल के धधे जैसा चल निकला है। एक प्वाइंट का साठ रुपये महीना और शाम छह बजे से रात नौ बजे तक जेनरेटर की सुविधा पाइए। पिताजी बता रहे थे कि भारी कुहासा के बावजूद सुबह छह बजे ही नंदकिशोर मास्टर अपने टोला के बच्चों को बजरंग बली मंदिर के बाहर खुले में पढ़ाता है। हमारे पिताजी को लगता है गांवो की दुनिया बदल रही है....वास्तव में अंजोर होने वाला है।...देश के साथ-साथ बिहार भी तरक़्की जरूर करेगा।....लेकिन पिताजी अपने कुनबे को लेकर ही निराश दिखे। असल में मेरे कुनबे के लड़कों को अच्छी पढ़ाई के बावजूद नौकरी नहीं मिली...और खेती करने लायक वो रह नहीं गए थे। पिताजी बता रहे थे कि दिनभर कोट-पैंट झाड़कर फिरंट्ट रहता है...बीबी-बच्चों का कोई ख्याल नहीं...न लाज न इज्जत। रोज पीने लगा है। ...शाम होते- होते मेरे कुनबे के एक सदस्य लौटे...मुंह में पान की गिलौरी दबाने के बावजूद ताड़ी की महक आ रही थी। ...कहने लगे - खुशी में आज जरा सा....। मैनें उनके चेहरे को ग़ौर से देखा...पता नहीं उसपर कमतरी के निशान थे। (जारी)

5 comments:

विनय said...

बहुत सुन्दर, बधाई

---आपका हार्दिक स्वागत है
चाँद, बादल और शाम

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा लिखते हैं-क्या क्या न याद दिला दिया. आगे इन्तजार है.

mamta said...

आज पहली बार ही पढ़ा है और आगे इंतजार रहेगा ।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अरे वाह ! ये आलु का अचार पहली बार सुना !! इँतज़ार रहेगा आगे भी ...

Jayant said...

सच में... उम्मीद अभी जिन्दा है.... मुझे उम्मीद है कि रात के अंधेरों को काटते हुए सुबह का उजाला केवल आपके गांव में ही नहीं
बाल देश के तमाम गांवों में आ रहा होगा...
उम्मीद है कि राजधानी की तमाम मैनर्स वाली बेशर्मियों को ठेंगा दिखाती गांव की बसों की सहज प्रवित्तियां यूंही बरकरार रहेंगी....
उम्मीद है कि लोगों की पैट्रोल और पैसों की बचत के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल की सहजता यूंहीं जारी रहेगी....
जाहिर है कि उम्मीदें बहोत हैं.... औऱ आम भारतीय या फिर महाकवि बच्चन की तरह और आप की तरह मैं भीयही मानता हूं कि उम्मीद अभी ज़िन्दा है....।।।

शहर में पैदा होकर मैने गांव को किताबों में ही देखा समझा है... आपके साथ बेगूसराय की यात्रा में सचमुच बड़ा मजा आ रहा है... बिल्कुल फणीश्वर नाथ रेणु के मैला आंचल जैसा मज़ा...
लिखते रहिए...
शुभकामनाएं........।।।