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Thursday, January 22, 2009

...बड़ा भारी बुरबक है जी

(भाग- पांच) बिहारी एक-दूसरे को बुड़बक कहते हैं। बिहारी लोग जमाने को भी बुड़बक कह देते हैं। मगर पूरा जमाना बिहारियों को बेवकूफ़ कहता है। जबकि बिहारी भी होशियार है और जमाना तो खैर स्याना है ही। इतनी भूमिका सिर्फ ये बताने के लिए कि बिहार की अलग-अलग बोलियों के कुछ अपने शब्द हैं जो वाक़ई बेहद खूबसूरत हैं। मैं भाषा विज्ञानी नहीं हूं इसलिए इन बोलियों को लेकर मेरा कोई व्याकरणीय दावा नहीं है। हालांकि मुझे लगता है कि इन बोलियों की भी अपनी वर्तनी होनी चाहिए और उसका भी अपना व्याकरण हो तो हिंदी इससे और भी सजेगी। ख़ैर, आज मैं अपनी जुबान की कुछ दिलचस्प चीजें परोस रहा हूं। ...शायद आपको भी इसका मजा आएगा। ये लालू यादव जो हमेशा कहते रहते हैं धुर बुड़बक...इसका मतलब है धत्त बेवकूफ़ या अहमक। कई बार धुत्त की बजाय फट्ट भी बोला जाता है। शायद फटकार शब्द वहीं से बना है। शादी होने के शुरूआती वर्षों में जब मेरी पत्नी शुद्ध बिहारी हुआ करती थी तो अक्सर बोला करती थी- धुत्त आप भी गजबे करते हैं। हमारी बोली में कुछ गालियां भी हैं जो तनावों की गर्मागर्मी में स्थानीय लोग एक-दूसरे पर उछालते हैं। मजेदार बात ये है कि उन गालियों का कोई मतलब ही नहीं होता। ...चूंकि ये गाली मान ली गई है तो गाली है। मसलन, बरगाही। ...बरगाही भाय। पता नहीं इसका मतलब क्या है। अगर इसे तोड़ें तो कुछ-कुछ मतलब निकलता है- बारह और गाही ( स्थानीय लोगों के लिए गाही एक इकाई है जिसे शायद दर्जन भर के लिए इस्तेमाल किया जाता है। एक दर्जन यानी एक गाही)। इसके बावजूद इस गाली का कोई मतलब नहीं निकलता। उसी तरह एक गाली है चोट्टा। ...फलां भारी चोट्टा आदमी है...यानी बड़ा भारी कमीना है। एक और गाली है लफुआ। इसका भी कोई मतलब नहीं निकलता लेकिन आवारा के वैकल्पिक शब्द के तौर पर इसका इस्तेमाल होता है।थेथर भी एक गाली है...जिसे पतित या सख़्तजान के रूप में प्रयोग में लाया जाता है।चलिये गालियों को रहने दीजिये। हमारी जुबान में बोले जाने वाले उर्दू और फ़ारसी के शब्दों का कमाल देखिए- इलम (इल्म)। लोग खूब बोलते हैं कि फलां तो पंपिंग सेट ठीक करने का इलम जानता है। उसी तरह किसी क़त्ल होने पर उसे कतल या ख़ून कहते हैं। कोई बुजुर्ग से पूछो तबियत कैसी है तो शायद कह दें किअब आफ़ियत है। यह भी सुन सकते हैं कि मैं तुम्हारा तबेदार नहीं। ...बड़े-बुजुर्ग कई बार कहते हैं मेरे सामने फ़ाजिल बात मत करो...माने, फ़िजूल की बातें मत करो। बकरे के मीट को अक्सर लोग गोश्त ही कहते हैं। कोई अगर परेशान हो जाए तो कहेगा बहुत हरान हूं। शहरों में जैसे सर बोला जाता है, हमारे यहा उसकी जगह - हजूर- यानी हुजूर का इस्तेमाल किया जाता है। -मेहरबानी- का भी इस्तेमाल खूब होता है।परवरिश शब्द भी बोला जाता है। नाइंसाफी होने पर कहते हैं बड़ा भारी जुलुम (जुर्म) है। इस बोली में शब्दों का देसज रूप साफ झलकता है। जैसे, मिट्टी को -माटी- बोला जाता है। द्वार को -दुआर- और ओसारे को -ओसरा- बोला जाता है। हां, रसोईघर को -भंसाघर - बोला जाता है और रसोई बनाने को -भंसा। खाने के समय सब्जी को - तिअन- बोला जाता है और नाश्ते को -पनपियाय- कहा जाता है। शायद पानी के साथ कुछ हल्का खाने वाला। खलिहान हमारी बोली में उसे कहा जाता है जहां अस्थायी तौर पर फसल काटकर आने के बाद रखा जाता है। रुपये को रूपा कहते हैं। ...या बंगाल का प्रभाव होने की वज़ह से - टका- भी कहते हैं। किसी पागल को देखकर कहते हैं- सनक- गया है। सवेरा को भोर या बिहान तो कहते ही हैं इंजोर भी कहते हैं। महिलाओं को -जनाना- कहते हैं। दुल्हन को -कनिया- (शायद कन्या) कहते हैं या फिर फलां की -लोग- भी कहते हैं। मां को -माय- और पिता को -बाऊ- कहा जाता है। मोटरसाइकिल को धड़ल्ले से फटफटिया बोला जाता है और ट्रेन को रेलगरी।हमारी जुबान में कुछ ऐसे शब्द हैं जिसे समझने के लिए किसी भाषा विज्ञानी की जरूरत होगी। मसलन, ज्यादा तीरगो ( उत्तेजित) मत। दर्द के मारे फलां बपराहाएट (कराहना या बाप- बाप करना ) काट रहा है। फलां महिला के साथ फलां जरा लटपटा (अंतरंगता) गया है। ...ज्यादा बोलो मत नहीं तो हिस्सक (पस्त कर देना) छुड़ा दूंगा। ...मिजाज -बम- हो गया...हारा-बाजी (बाजी) लगाओगे। ...बाल-बुतरू- (बाल-बच्चे) को भी देखना पड़ता है।...हमारे सामने दांत मत -चियारो- (फाड़ो)। ...अभीए लटुआ (पस्त) गए जी। ॥ हमारी बोली में -ई-ऊ-गो और ठो का अलग किस्म का महात्म है। -ई- का प्रयोग ये के लिए होता है जबकि -ऊ- का प्रयोग उसके लिए होता है। -गो- और -ठो- का प्रयोग किसी संख्या मसलन, चार ठो या चार गो के रूप में होता है।हमारी बोलचाल के कुछ काले पक्ष भी हैं...अक्सर नाम के साथ -बा- जोड़ देते हैं। अपने से कमतर लोगों के लिए ऐसा किया जाता है। हमारे यहां ललित हमेशा ललितबा हो जाता है...प्रकाश हमेशा परकसबा हो जाता है...लेकिन दबंगों के नाम के साथ -बा- की जगह अनिवार्य रूप से बाबू या फिर जी जोड़ा जाता है।...ये चुनौती है भाई...अगर बोली की वर्तनी ऐसी ही है तो कोई -जुआन- या तो दबंगों के नाम में भी -बा- जोड़कर दिखलाए या फिर इस परंपरा को भी हमारी बोली से बेदखल कर दिया जाए।...(जारी...)

7 comments:

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर। लिखते रहें हम पढ़ना शुरू किये हैं आपको।

PD said...

badhiya..
kitne hi shabd bhool gaye the yaad dila diye.. aaj phirse iska pyayog chaloo..
oo kahte hain na.. mijaj ekdamme se bamm ho gaya.. :)

शाश्‍वत शेखर said...
This comment has been removed by the author.
शाश्‍वत शेखर said...

निक लगा इ सब पढ़कर| अच्छा याद दिलाये| अंग्रेजी के शब्द भी बहुत यूज होते हैं , जैसे की मैनिया....मैनिया हो गइल एकरा...| फोकस....ढेर फोकस मत मार| एक शब्द है..धरहरी....देख के धरहरी छुट गइल|

एक वाकया याद आया| बक्सर स्टेशन पर एक बुढिया SHUTTLE ट्रेन का इन्तेजार कर रही थी| बिहारी लोग श को भी स ही बोलते हैं, जब ट्रेन आती दिखाई पड़ी ओ एक लड़के ने बुढिया से कहा जो प्लेटफोर्म पर बैठी थी,...ऐ बूढी हट जा, सटल आवा ता| बुढिया बिदक गई.....कवन नतिया के बेटा सटल आवा ता रे|!!!!

सुप्रतिम बनर्जी said...

मजा आ गईल। रौआ लिखत रहीं।

डॉ .अनुराग said...

बहुत खूब हमारे पश्चिम उत्तर प्रदेश में ."मका "इन्घे ,ऊँघे ....ओर एक शब्द ओर है जो ख़ास मेरठी है."चिबलना ".जिसका अर्थ है अकड़ना .....
आपकी शैली गजब है ओर लिखने का अंदाज दिलचस्प

manish said...

लिखने का अंदाज़ बहुत अच्छा | जहाँ तक मुझे पता है बरगाही भाई मतलब होता है ,वैसा भाई जिसकी बहन की पांच पति हो |