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Saturday, January 24, 2009

क्या ओबामा विश्व के नए भाग्य विधाता हैं?

टीवी जर्नलिस्ट कुंदन शशिराज हमारे साथी हैं। अभी हिंदुस्तानी मीडिया को ओबामामय होते देख उन्होंने मेल के जरिये एक टिप्पणी भेजी। जिसमें उन्होंने मीडिया के ऐसे नजरिये की आलोचना करते हुए हिटलर को एक राष्ट्रभक्त के रूप में याद किया है। हिटलर को लेकर कुंदन के नजरिये से निजी तौर पर मैं कतई सहमत नहीं हूं। पढ़कर देखिये...आप कितने सहमत हैं। -
शायद, आठवीं क्लास में...इतिहास की क़िताब में पहली बार हिटलर के बारे में पढ़ा था। बालपन में, जैसा उस क़िताब में लिखा था और जैसा कि गुरुजी ने पढ़ाया था...मैंने तय मान लिया कि हिटलर विश्व इतिहास का सबसे बड़ा ख़लनायक था। गुरुजी ने हमें पढ़ाया था कि नाज़ीवाद एक अभिशाप की तरह है और उसकी पार्टी का स्वास्तिक से मेल खाते प्रतीक चिह्न से तानाशाही की बू आती है। मासूम मन था...इसलिए जैसा पढ़ाया गया, मान लिया। लेकिन जब तन और मन परिपक्व हुआ तो दूसरों के निर्णयों को तर्क की कसौटी पर कसकर देखने की आदत हो गई...आदत बुरी थी इसलिए आवेग पैदा कर रहे सवालों के चलते हिटलर की जीवनी दोबारा पढ़ी। आप भले ही सोचें ...दोबारा पढ़ने पर हिटलर मुझे बदले हुए रूप में नजर आया।...तानाशाह भले रहा होगा लेकिन उसकी देशभक्ति और राष्ट्र सम्मान की उसकी भावना सीखने लायक थी। ...आज मुझे पता नहीं क्यों हिटलर की याद आ रही है। मुझे उसकी जीवनी के उन पलों की याद आ रही है जब उसने जर्मनी के आत्मसम्मान के लिए पूरी दुनिया से जंग ठान ली। उसने पूरी दुनिया को ठेंगे पर रखा और सबको बता दिया कि जर्मनी के आत्मसम्मान से बढ़कर उसके लिए कुछ भी नहीं। लेकिन हिटलर के कट्टर राष्ट्रवाद की याद मुझे इस वक्त क्यों आ रही है? ...दरअसल, इस वक्त मैं अपने देश के तमाम टीवी चैनलों और अन्य समाचार माध्यमों को ओबामामय होते देख रहा हूं। ओबामा को दुनिया का नया अवतार ठहराया जा रहा है। ओबामा की छोटी-छोटी चीजों पर विशेषज्ञ टिप्पणियां आ रही हैं...ओबामा क्या खाते- क्या पहनते और ऐसा होता तो कैसा होता ओबामा का लुक। ...जी हां, इसी वज़ह से मुझे हिटलर की याद आ रही है। स्क्रीन पर ओबामा झूम-झूम के घूम रहे हैं ...और मेरे दिमाग में हिटलर की जीवनी के पन्ने घूम रहे हैं। वैसे, मुझे अपने शब्दों को थोड़ा दुरुस्त करने दें...मुझे हिटलर के राष्ट्रवाद की याद आ रही है। मुझे कोफ़्त हो रही है कि हम क्यों नहीं हिटलर की तरह राष्ट्रवादी होकर सोचते -समझते हैं। हिटलर की तरह राष्ट्रसम्मान का जज़्बा हमारे दिलों में क्यों नहीं जाग पाता है? ..हमें अपने चापलूसी भरे लहजे पर शर्म भी नहीं आती।...ओबामा के राष्ट्रपति बनने पर अमेरिका गर्व करे, क्योंकि किसी अश्वेत का सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच जाना उसके लिए नई परिघटना हो सकती है लेकिन भारत के लिए ये कतई नया नहीं है। ...अमेरिका झूम-झूमकर बताए कि उसके काले दिन ख़त्म हो गए और उजले महल पर एक अश्वेत का राज़ होगा। ..यकीनन ओबामा का राष्ट्रपति बनना एक बड़ी घटना तो है लेिन ओबामा को हम विश्व के भाग्य विधाता के तौर पर क्यों पेश कर रहे हैं? क्यों हम ओबामा की तरफ टकटकी भरी नजरों से देख रहे है? ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह के लाइव टेलीकास्ट के दौरान हमारी जबान रिरियाने जैसी क्यों हो जाती है? ओबामा को बिना जाने अति उत्साही होकर उनका गुणगान करने वाले चैनलों की तो छोड़िए ...शपथग्रहण के बाद उनके डांस, उनकी एक-एक हरकत ...एक-एक मुस्कान पर रीझे मीडिया कर्मी ऐसा दिखा रहे थे जैसे, ओबामा अपनी इन अदाओं से पूरे विश्व पर अहसान कर रहे हों। सबकुछ छोड़-छाड़कर चैनल्स ओबामा भजन गाने में लगे थे। ...पूरे हिंदस्तानी मीडिया में कोई दूसरी ख़बर नहीं थी। ...ख़बर की भी छोड़िये क्या हममें इतना भी आत्मसम्मान नहीं बचा कि जिस ओबामा का रुख भारत को लेकर अबतक बहुत साफ नहीं है...हम उसकी चरण वंदना करने से थोड़ा परहेज करें। निश्चय ही ओबामा को लेकर मीडिया का जो रूप हम सबने देखा ...शर्मनाक था।

3 comments:

Alok Nandan said...

मैं अपनी जिंदगी में सिर्फ दो बार रोया था, एक बार जब मेरी मां मरी थी और दूसरी बार जब प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी में हारा था.
हिटलर
(मीन कैंफ से)

Udan Tashtari said...

उम्मिदें तो ऐसी ही हैं.

Jayant said...

ज़रा याद करिए वो दृश्य...,

ओबामा शपथ ले रहे हैं.... और समारोह को देखने लाखों-लाख अमेरिकी जमा हैं.... उधर शपथ के वाक्य उच्चारित हो रहे हैं और इधर लोगों के चेहरे पर भावों के उतराव-चढाव को महसूस किया जा रहा है..... कोई रो रहा है.... कोई नाच रहा है.... हर चेहरे पर गर्व है, खुशी है....।
अब आप सोचिए कि क्या आपने, अपनी पूरी ज़िन्दगी में इस तरह के दृश्य किसी भारतीय नेता के लिए देखे हैं..... मुर्गा, दारू औऱ पैसा खर्च करने के बाद भी रैलीयों में भीड़ का आंकड़ा लाख क्रास करते देखा है आपने....????
शायद अब इस मसले को पूरी तरह से समझा जा सकता है... मामला केवल एक ओबामा का नही था.... बल्कि था लाखों-लाख अमेरिकियों की देशभक्ति का.... एक ऐसे मास लीडर का था... जिस पर विश्वास है लोगों को कि वो अच्छा आदमी है.... वो जनता के लिए कुछ करेगा....।
सुना था बड़े बूजुर्गों से कि कभी नेहरू और इंदिरा ऐसे ही मास लीडर हुआ करते थे.... पढा है किताबों में कि हमारे देश ने कभी ऐसे भी देशभक्त पैदा किए हैं जो हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए....?

खबर ओबामा नहीं है.... लाखों अमेरिकियों का विश्वास है.... वो मास लीडर है जिसे सुनने लाखों आते है... वो आंसू हैं जो खुशियों का आगाज हैं....। और यकीन मानिए... खबर यही है....।
जय हिन्द।