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Monday, January 26, 2009

...वो प्रणय राय और विनोद दुआ की जोड़ी


( भाग- छह) मां ने काफी हुलसकर बताया कि मेरे पिताजी ने रंगीन टीवी मंगवाया है। दिखाया, पैनासोनिक का बड़ा टीवी मेरे घर में लगा था। हालांकि कई-कई दिनों पर कुछेक घंटे के लिए टीवी चल पाता है। यानी, रात- दिन जब कभी बिजली आ जाए तो उस समय आ रहे कार्यक्रम को देखा जा सकता है। वैसे, मेरे घर में टीवी...आश्चर्य का सबब भी था। पिताजी टीवी-ऊवी को झमेला मानते आए हैं और इस झमेले में वो कभी पड़े नहीं। हमारी कभी हिम्मत नहीं हुई कि उनसे इसबारे में बोल भी दें। उनके लिए अबतक ( बचपन से देखता आया हूं) फिलिप्स का ट्रांजिस्टर है, चमड़े का कवर लगा। टीवी से दूरी के बावजूद पिताजी में समाचारों की उत्कंठा जबर्दस्त है। इसी ट्रांजिस्टर पर शाम साढ़े सात बजे प्रादेशिक समाचार और (शायद) पौने 9 बजे बीबीसी हिंदी सेवा की ख़बरें पिताजी सुनते आए हैं। सुबह भी हिंदी -संस्कृत में प्रसारित होने वाली खबरें। प्रस्तोता की भारी मगर थरथराती आवाज सुबह में गूंजती है- इयं आकाशवाणी...संप्रति वार्ताह सोयंताम..प्रवाचकः फलां। टीवी आ जाने के बाद भी पिताजी के लिए समाचारों को जानने का इकलौता माध्यम ट्रांजिस्टर है। मां से पूछा कि आखिरकार पिताजी टीवी लाने को तैयार कैसे हो गए। ...तो पता चला कि मां की जिद पर एकतरह से जबरन टीवी खरीद देने को पिताजी राजी हुए। इस टीवी को देखकर मुझे १९८५ में हमारे कुनबे में आए पहले टीवी की याद हो आई। हमारे चचेरे भाई साहब की शादी हुई थी...और उसी वक्त टीवी खरीदी गई थी। रंगीन टीवी ...क्रेज इतना कि शाम में कृषि दर्शन से लेकर रात ढाई-तीन बजे शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम के वक्त भी डटे रहते और भाई साहब- भाभी दोनों शायद कुढ़ते रहे होंगे। क्योंकि नई शादी और उसी कमरे में टीवी। कोढ़ में ख़ाज ये कि हम जैसे बेशर्म टीवी दर्शकों की फ़ौज। उस वक्त बिजली भी रहती थी...ऑस्ट्रेलिया में बेंसन एंड हेजेज खेलने गई भारतीय टीम के तमाम मैच देखे...जबकि सुबह तक़रीबन चार बजे से ही मैच शुरू हो जाता था। गाढ़ी नींद से भाई साहब को जगाते-जगाते श्रीकांत या तो आउट हो चुके होते या कुछेक चौके- छक्के ठोक डालते। टीवी का तब मजा था। चित्रहार सबसे पसंदीदा कार्यक्रम था ....आधे घंटे के चित्रहार में चार-पांच गाने कब निकल जाते और कार्यक्रम का समापन हो जाता , पता भी नहीं चलता। चुनाव के वक्त तो जैसे उत्सव जैसा माहौल रहता हमारे घर में। मेरे पिताजी, चाचा- ताऊ से लेकर मेरे चचेरे भाइयों की जमात। सबके-सब टीवी के आगे जमे रहते। विनोद दुआ और प्रणय राय का जादुई अंदाज में चुनाव विश्लेषण और योगेन्द्र यादव के आंकड़े। विश्लेषण के बीच विनोद दुआ- प्रणव राय की जोड़ी अगर किसी नेता को खींच डालती तो दर्शकों की हमारी भीड़ को जैसे मजा आ जाता। लोग मुदित अंदाज में मीडिया की ताक़त को पहली बार देख रहे थे कि एक हार - मांस का आदमी ताकतवर मंत्रियों की धज्जियां उड़ा रहा था। ...चुनाव विश्लेषण किसी बड़े जलसे या ट्वेंटी-ट्वेंटी से कम रोमांचक नहीं थे। बीच-बीच में पान और चाय का अलग दौर चलता। बाद के दिनों में रामायण और महाभारत ने तो महफिल ही लूट ली...गांव भर के छोटे-बड़े से लेकर घूंघट काढ़े आई महिला दर्शक। पूरा बरामदा दर्शकों से फुल। उसबार बाढ़ भी आई तो भी रामायण -महाभारत का कोई एपीसोड नहीं छूटा...ट्रैक्टर की बैट्री खोलकर टीवी से जोड़ दिया। पब्लिक की जबर्दस्त डिमांड थी। वही हाल वन डे क्रिकेट मैच का भी होता था। एक दिलचस्प किरदार से आपको मिलवाऊं। पिताजी के चचेरे भाई मदन चाचा क्रिकेट के घनघोर दीवाने हैं। वकालत भी करते हैं और स्थानीय कॉलेज में प्रवक्ता भी हैं। लेकिन ये सब हैं क्रिकेट के बाद...क्रिक्टे के दर्शक पहले हैं। ...तो सुबह जतरा बनाकर विधि-विधान से मैच देखने टीवी के आगे बैठते। मजेदार बात ये है कि दिन भर छोटे-छोटे बच्चे भी प्रार्थना करते कि इंडिया जीत जाए। ऐसा नहीं था कि वे क्रिकेट समझते थे या बड़े भारी राष्ट्रभक्त थे। ...वो तो सिर्फ इसलिए भारत को जितवाना चाहते थे क्योंकि हारने पर मदन चाचा इन बच्चों को शर्तिया रूप से पढ़ाने बैठ जाते और फिर बच्चों को जमकर लतियाते। ...भगवान ने बच्चों की ये दर्दनाक प्रार्थना सुन भी ली और भारत मैच जीत गया। फिर क्या था....मदन चाचा अपना दोनाली बंदूक या अपने कर्नल ससुर की तरफ से दी गई पिस्तौल से फ़ायर करने पर आमदा हो जाते। ...बच्चों को उस रात पढ़ने से अघोषित रूप से छूट मिल जाती। ...टीवी पर अकेले मैच ही या सीरियल्स ही नहीं देखते बल्कि सुबह तक़रीबन सात बजे दूरदर्शन पर आने वाला व्यायाम कार्यक्रम के भी कम दर्शक नहीं थे।निरमा सहित कुछेक विज्ञापन भी दर्शकों की जुबान पर हुआ करते थे। समाचारों का तो ख़ैर क्या कहना....शमी नारंग साहब और मंजरी जोशी की बड़ी हिट जोड़ी हुआ करती थी। साड़ी-सूट से लेकर टिकुली पर भी बहस होती थी। आंखों में बेशुमार सुरमा डाले नलिनी सिंह के आंखों -देखी कार्यक्रम के अपने दर्शक हुआ करते थे। ख़बरों को लेकर ये नही था की इसे देख कर आप परेशां हो जायेंगे । या हैरान रह जायेंगे। तब ख़बरों को सच बताने का कोई दावा नहीं था मगर दर्शक उसे सच्ची खबरे ही मानते थे। (जारी )

6 comments:

kundan shashiraj said...

सर, बहुत बढ़िया... वाकई मुझे तो अपना बचपन ही याद आ गया ... मजा आ गया सर...

Udan Tashtari said...

बहुत दूर ले गये अपने संग यादों में बहा कर. वाह!! बेहतरीन शैली में लिखे संस्मरण का यही अंदाज होता है. जारी रहें.

आपको एवं आपके परिवार को गणतंत्र दिवस पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

ranjan said...

bahut achchaa lagaa... hamaari bhi yaade taajaa ho gaye..

Jayant said...

बिल्कुल...... हिन्दुस्तान में अपने जन्म से लेकर आज तक इस बुद्धु बक्से ने अपने कई रंग दिखाए हैं...... चाहे समाचारों का क्षेत्र हो फिल्मों का या खेल या राजनीति का... हर रंग हर क्षेत्र में इसकी दखल जगजाहिर है....। दूरदर्शन के स्वर्णिम या यूं कहें कि दर्शकों की मजबूरी के काल से लेकर मुनाफे और भौकाली यानी आज तक (समाचार चैनल नहीं वर्तमान तक) इस बुद्धु बक्से के रंगों ने अच्छे-अच्छों को रतौंधी और सावन के अंधेपन का शिकार बनाया....। हमारी यानि पत्रकारों की बिरादरी के भी कई बेचारों को टीवी के उजले अंधेरे ने कूछ यूं काटा कि बेचारे आज तक खुद का माथा पीटते हैं कि साला क्या सोचकर पत्रकार बनने की धुन सवार हुई....।
बहरहाल संसमरण लिखने की शैली और साथ-साथ किस्सागोई का फ्लेवर... मजे को दोगुना कर देता है...।
लिखते रहें.... अगली किश्त का इंतजार रहेगा.....।

Brijesh Dwivedi said...

sir bahut khoob....

atit ki yaade bahut mithi hoti hai... aur usme bachpan ki baat ho to kahna hi kya....

सतीश पंचम said...

वह दौर जब प्रणव राय और विनोद दुआ का होता था, अब भी याद आ रहा है ... इस कार्यक्म की लोकप्रीयता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है।