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Wednesday, January 28, 2009

तनिक मुस्कुराईए हुजूर...


वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में नौकरियों पर किस-किस तरह से बन आई है, उसी पर बात कर रहे हैं टीवी जर्नलिस्ट नीरजः मंदी का दौर जारी है...यहां भी मंदी, वहां भी मंदी...मंदी में हम भूल गए मुस्कान ...मंदी में छिन रही हैं नौकरियां..क्या चपरासी और क्या अधिकारी। मंदी सब पर भारी। नौकरी खोने की कई वजहें हैं तो बेवजह भी लोगों की नौकरियां जा रही हैं। ...इस दौर में इंकलाब की बातें बेनूर हो चुकी हैं। साथियों, आखिर हम या आप जैसा बेचारा मुलाजिम इसकी बात सोच भी कैसे सकता है। लेकिन आगाह तो कर ही सकते हैं कि - साथियों ऐसे भी जा रही है नौकरी। सो, पहले से सावधान रहें। ऑस्ट्रेलिया के एक शहर मेलबोर्न की ख़बर आप सब की नज़र है- टॉयलेट में पानी इस्तेमाल करने पर ऑस्ट्रेलियाई फर्म ने अपने कर्मचारी को निकाला। जी हां। ये उस ख़बर का शीर्षक है, जो एक अंग्रेजी दैनिक में छपा है। ख़बर की तफ़सील ये है कि टाउंसविले इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज में काम करने वाले मशीन ऑपरेटर बरनाबे को इसलिए नौकरी से हाथ धोनी पड़ी क्योंकि बार-बार समझाने के बावजूद उसकी आदत सुधर नहीं रही थी। फिलिपींस का ये कर्मचारी वॉशरूम में टॉयलेट पेपर की जगह पानी का इस्तेमाल करता था। कंपनी के मैनेजर ने कर्मचारी की इस आदत को दूसरे कर्मचारियों के लिए सीरियस हेल्थ रिस्क बताया। हेल्थ और हाईजीन को इश्यू बताते हुए बेचारे कर्मचारी को फर्म से विदा कर दिया गया। कर्मचारी फिलिपींस का था, मगर पता नहीं वॉशरूम में पानी के इस्तेमाल की -ग़लत - आदत उसे कैसे पड़ गई। मगर मेरा आपसे सवाल है। क्या आप टॉयलेट पेपर से काम चला सकते हैं। क्या पानी के बिना दिव्य निबटान कर सकते हैं। मुझे याद आता है नीरद सी चौधरी जैसे एलीट ने भी हम हिंदुस्तानियों की इस बिनाह पर खिंचाई की थी कि हम संडास में उकड़ूं होकर बैठते हैं। तब भी मेरे मन में ये सवाल उठा था कि जनाब उकाड़ूं न बैठें तो क्या करें। नीरद चौधरी जैसी कलाकारी कहां से लाएं। ...नीरद चौधरी बैठे..या फिर खड़े-खड़े भी वो सब कर लें। बहरहाल, फिलिपींस के बरनाबे की नौकरी गंवाने की वजह बताने और उसका पूरा ब्योरा पेश करने का मकसद बस इतना था- मंदी का हम कुछ नहीं कर सकते...हम मुस्कुरा तो सकते हैं। अब तनिक मुस्कुरा तो दीजिये जनाब।...चाहे अपनी या फिर हमारी किस्मत पर ही सही।

3 comments:

Jayant said...

बिल्कुल नहीं....
भगवान करे कि मुस्कुराने की और हजार-लाख वजहें हो जाएं लेकिन किसी की किस्मत पर मुस्कुराना.... हरगिज नहीं....। और जनाब दौर तो मंदी का ही है इस लिए ये नाचीज भी ये ही चाहेगा कि भगवान और मालिक न करे कि मेरी किस्मत पर भी किसी को मुस्कुराने का मौका मिले और ये भी कि.....
कफस में मुझसे रुदादे-ए-चमन कहते न डर हमदम..
गिरी है जिस पे कल बिजली वो मेरा आशियां क्यों हो.......।।।
रही बात नौकरी से निकालने के अहमकाना बहानों पर तो ऐसे लोगों के बारे में, मैं यही सोचता हूं कि... न हो जब दिल ही सीने में.... तो मुंह में जबां क्यों हो....??????

तो मुस्कुराइए ज़रूर लेकिन किसी की किस्मत पर हर्गिज नहीं....।
शुभकामनाएं....।

Udan Tashtari said...

मुस्करा तो यूँ नहीं पायेंगे महाराज..बस, मुस्करा कर अपने गम पर परदा डाल सकते है हालातों को देखते हुए.

सतीश पंचम said...

ऐसे वाकये जिसमें वाशरूम में पानी का इस्तेमाल करने पर नौकरी जाये, यदि भारत में हो तो श्री राम सेना (और इस जैसे) तो तैयार ही है मौज लेने के लिये...बस एक न्यूज चलानी होगी :)

अच्छी पोस्ट।