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Thursday, January 29, 2009

संस्कृति की आड़ में पीढ़ियों का टकराव


रात में टीवी देखते हुए पत्नी ने पूछ लिया कि पब क्या होता है? टीवी चैनलों पर पब के बहाने नैतिक पहरेदारी पर बहस चल रही थी। जिसमें पब के विजुअल्स आ रहे थे। शायद पत्नी का सवाल वहीं से उपजा होगा। ...अब क्या और कैसे बताऊं। तो बोल दिया कि होटल जैसा होता है जिसमें दारू-ऊरू पी जाती है...नाच-गाना होता है। और क्या? ...वास्तव में इस ख़बर को लेकर उसी वक्त थोड़ा संजीदा हुआ। वेलेंटाइंस डे ...फ्रैंडशिप डे सहित यदा-कदा और देश में यहां-वहां होने वाली घटनाओं के बाद भारतीय सस्कृति की दुहाई देकर ऐसे मामलों में बल प्रयोग पर जोर दिया जाता रहा है। ऐसी दलीलें देने वालों को शायद भरोसा होता है कि सख़्ती शायद इस मर्ज की दवा है। या फिर उन्हें हिंदुस्तानी संस्कृति की ताकत का वाक़ई अंदाजा नहीं है। उन्हें लगता है कि हमारी संस्कृति इतनी कमजोर...रीढ़विहीन और रूई के फहे की तरह नाजुक है कि पश्चिम से आने वाले झोंके में छिन-भिन्न हो जाएगी। उन्हें शराब और लड़के-लड़कियों का एक साथ घूमना या फिर पब और पार्कों में जाना अश्लीलता की पराकाष्ठता लगता है। उन्हें लगता कि हमारी संस्कृति शराब के दरिया में बहकर उनके हाथ से निकल जाएगी। इसे बहुत ग़ौर से देखने की जरूरत है। यह पूरा मामला इतना सरल और साफ नहीं है। वे एक ऐसा सामाजिक ढांचा गढ़ना चाहते हैं जहां ये सुनिश्चित हो सके कि धर्म की जय हो। जिस समाज में सती और दहेज प्रथा का बड़ा महात्म हो लेकिन मोहब्बत, खुलापन और महिलाओं की आजादी सबसे बड़ा ग़ुनाह । मजेदार बात ये है कि ऐसे सामाजिक ढांचे की हिमायत उस दौर में हो रही है जब सबकुछ बाजार तय कर रहा है। हमारे जज्बात भी बाजार के भरोसे है। हमारी खुशी-हमारे ग़म। प्रेम-मुहब्बत और हमारे संताप। सबकुछ। ऐसे में समाज पर नैतिक पहरेदारी की कोशिशें कहां तक जायजा हैं और उसका कितना असर भी होगा? नैतिकता न तो कोई ठोस वस्तु है कि जिसे हाथों में रख लेने से आदमी नैतिक हो जाएगा...और न ही शासन ही किसी समाज की नैतिकता को नियंत्रित कर सकता है। नैतिकता का मानक व्यक्ति -व्यक्ति पर निर्भर करता है। और शासन तंत्र की तरफ से जब भी समाज को नैतिक बनाने की कोशिशें होंगी....अव्वल तो वो कामयाब नहीं होंगी। दुर्भाग्य से अगर कामयाब हुई तो उसकी शक्ल बहुत हद तक तालिबानी होगी। दूसरे, सत्ता पक्ष को ऐसे समाज के निर्माण के लिए खुद को भी एक आदर्श के रूप में रखना होगा। ...थोथे भाषण से वोट तो हासिल किए जा सकते हैं मगर लोगों का भरोसा नहीं। वोट और भरोसे के अंतर को भी समझना जरूरी है। शराब का मामला ही है। येदुरप्पा साहब से लेकर गेहलौत साहब शराब को लेकर कूद रहे हैं। लेकिन उन्हें भी पता होगा हरियाणा और आंध्र प्रदेश का उदाहरण। इन राज्यों में बंशीलाल और एनटी रामाराव की कोशिशें शराबबंदी को कबतक लागू कर पाईं...उसका क्या नतीजा निकला? इन राज्यों में शराबबंदी तो कारगर नहीं हुई लेकिन दूसरे राज्यों से शराब की तस्करी बढ़ गई। ..इन राज्यों को शराबबंदी से हुए आर्थिक नुकसान अलग से हुए। रामाराव और बंसी लाल ने कम-से-कम शराबबंदी लागू कर शराब की बिक्री के खिलाफ कदम उठाए। लेकिन अब तो पब और बार के लिए बाकायदा सरकार लाइसेंस भी जारी करती है....और पब्लिक में पब संस्कृति की वजह से भारतीय संस्कृतिक को खतरा भी बताती है। ...खैर। ये मामला नफा-नुकसान का भी नहीं है। ये बहुत हद तक पीढ़ियों का भी टकराव हो सकता है जो संस्कृति के टकराव के नाम पर खेला जा रहा है। देश की नवजात पीढ़ी इतनी अधकचरी और अपरिपक्व नहीं है...जितना हमारे सियासी तंत्र उन्हें समझते-देखते हैं। इस पीढ़ी ने जिस खुली हवा में आंखें खोली हैं...अलग-अलग क्षेत्रों में इस नवजात पीढ़ी का जैसा प्रदर्शन देखने को मिला है, निश्चय ही लाजवाब है। हा. बाजार के दबाव में उनका व्यक्तित्व जैसा दिखता है, वैसा है नहीं। आने वाले वर्षों में इस पीढ़ी का पूरा व्यक्तिव खुलकर सामने आएगा...ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

3 comments:

AKSHAT VICHAR said...

यूनान, मिश्र रोमा सब मिट गये जहां से..उन्हें हिंदुस्तानी संस्कृति की ताकत का वाक़ई अंदाजा नहीं है। ...

Nirmla Kapila said...

aapne bilkul sahi kaha hai ki talibani andaj se kuchh nahi hone vala ye jis bajarvad ki mehar bani hai use bhi in shaskon ka hi utsah rehta hai apne bachon ko is rog se ham parivaar me hi apni sanskriti ka parichay dena hoga tabhi apni youth ko ham raah dikha sakte hai

ashish said...

ye apka sabse achcha article laga. pub aur bar ke bare mein likhna sayad asaan hai, galiyana hi to hai, lekin usko patni ke sawal se bansilal ke jawab tak achchi tarah joda apne.
nai pidhi se ummid rakhna apki swastha soch ko dikhata hai