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Friday, February 27, 2009

अब एक नया किस्सा

मित्रों, पत्रकारिता में पिछले कुछ वर्षों से हूं। इच्छा थी कि कभी पत्रकारिता के पूरे चरित्र पर आपसे बात करूं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों के बारे में जो कुछ समझा उसे किस्से वाले फ्लेवर के साथ आपसे कहूं...। आपको इन चमकते- दमकते मीडिया हाउसेज के भीतर ले जाकर सबसे आपकी मुलाकात कराऊंगा। अंदाज कुछ ऐसा रखने की कोशिश करूंगा जिससे ग़ैर पत्रकारों को भी इसे पढ़ते हुए उतना ही मजा आए। हां, एक और बात... ये किसी मीडिया हाउस के ख़िलाफ कोई ख़ुलासा नहीं है। इसलिए पत्रकारों और संस्थान के नाम का उल्लेख जानबूझकर नहीं किया जाएगा। लेकिन घटनाएं बिल्कुल सच्ची होंगी...इतनी गारंटी है। एकाध दिनों के भीतर इस किस्से की पहली किस्त आप पढ़ सकेंगे। धन्यवाद।

Tuesday, February 24, 2009

कहानी की जय हो !


क्या कहानी का वज़ूद ख़त्म हो गया है? क्या कहानियां अप्रासंगिक हो गई हैं? या फिर कहानियों को पाठक नहीं मिलते? ... अंत में, क्या कहानियों के साथ-साथ कथाकार भी अपना मयार खो चुके हैं।... शायद स्लमडॉग को बेशुमार सफलता और उससे भी पहले कहानीकार विकास स्वरूप का लिखा उपन्यास –क्यू एंड ए या उसका हिंदी रूपांतरण- कौन बनेगा करोड़पति- इन तमाम सवालों का जवाब है। टीवी जर्नलिस्ट नीरज इन सवालों का ही विचार करते हुए अंत में कहते हैं- कहानी की जय हो, महाराज ! –संजीव

सुरीले रहमान ने ऑस्कर का सूखा ख़त्म कर दिया है। लॉस एंजेल्स में जय- जय की गूंज पूरी दुनिया में समा गई है। वंडर ब्वॉय रहमान पर तो हम भारतीय पहले से ही फख्र करते रहे हैं, अब पूरी दुनिया ने हमारी पसंद पर मुहर लगा दी है। गीतकार ग़ुलजार का ये बड़प्पन ही है कि वो ऑस्कर की जीत का पूरा श्रेय संगीतकार रहमान और गायक सुखविंदर को दे रहे हैं।... लेकिन ऑस्कर समारोह की पूरी चमक –दमक और मीडिया अट्रैक्शन के बीच एक बात पता नहीं कितने लोगों को खटकी। स्लमडॉग का ताना- बाना जिसने बुना।... एक जादुई यथार्थवाद पर आधारित शानदार कहानी लिखी, जिसने पहले फिल्म और बाद में ऑस्कर तक का सफ़र तय किया...वही शख़्स पूरे परिदृश्य से ग़ायब दिखा। वो हैं कहानीकार विकास स्वरूप। ऑस्कर में जीत के बाद स्लमडॉग की पूरी टीम नज़र आई। फिल्म के डायरेक्टर, कलाकार से लेकर तकनीशियन तक की प्रतिक्रिया ली गई। लेकिन विकास स्वरूप इनमें कहीं नहीं थे। फिल्म मीडियम की एक कड़वी सच्चाई के रूप में इसे आप देख सकते हैं। फिल्म के कहानीकार इस कामयाबी में कहीं नहीं हैं। ...उन्हें किसी तरह की क्रेडिट नहीं दी गई। लेकिन इसी कहानी के एडोप्शन स्क्रीन प्ले के लिए साइमन ब्यूफए को ऑस्कर से नवाजा जा चुका है। एक कहानी जो फिल्म के रूप में बेशुमार शोहरत बटोरते हुए ऑस्कर अवॉर्ड तक ले आई, उसका कहानीकार कहीं पीछे छूट गया। फ़िल्म रंग दे बसंती के लेखक कमलेश पांडे की वो बात मुझे याद आती है- फिल्म मेकर्स कहानीकारों को कंडोम की तरह इस्तेमाल करते हैं। स्लमडॉग के डायरेक्टर डैनी बॉयल ने भी संभवतः विकास स्वरूप का कुछ ऐसा ही इस्तेमाल किया हो तो मुझे पता नहीं। स्लमडाग को अवॉर्ड मिलने के तुरंत बाद निर्देशक मधुर भंडारकर की प्रतिक्रिया थी कि अच्छी फ़िल्म तभी बनती है जब कहानी बेहतर हो। लेकिन सवाल ये भी है कि अच्छा और मौलिक लिखने वालों की फ़िल्म मेकर्स ने कद्र ही कब की है। हां, बॉलीवुड में जावेद अख़्तर को आप जरूर अपवाद मान सकते हैं, जो कि ब्रांड एंडोर्समेंट में भी नज़र आ रहे हैं। लेकिन बाकी के लेखक और पटकथा लेखक फिल्म की कामयाबी के बाद कहां और कब गुम हो जाते हैं, पता भी नहीं चलता।
अब बात विकास स्वरूप साहब की। राजनयिक और लेखक विकास स्वरूप का ये पहला उपन्यास है – क्यू एंड ए। इसी पर फिल्म स्लमडॉग बनी है। हालांकि फिल्म पुस्तक से काफी अलग बनी है- ये स्वयं विकास स्वरूप भी मानते हैं। उन्होंने बीबीसी से एक साक्षात्कार के दौरान इस फिल्म के बारे में बातचीत की थी। विकास स्वरूप दक्षिण अफ्रीका में भारतीय उप उच्चायुक्त हैं और इससे पहले ब्रिटेन, अमेरिका और तुर्की में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। इलाहाबाद के रहने वाले विकास स्वरूप 2003 में लंदन में अपनी पोस्टिंग के दौरान अपना उपन्यास क्यू एंड ए लिखा था। उस वक्त हिंदुस्तान में कौन बनेगा करोड़पति की बेहद चर्चा थी और उन्होंने महज दो महीने के भीतर अपने उपन्यास को पूरा कर लिया।... उपन्यास क्यू एंड ए या उसके हिंदी संस्करण कौन बनेगा करोड़पति पढ़ने वालों को यह मानने में कतई हिचकिचाहट नहीं होगी कि ये अपने दौर की बेहद प्रयोगधर्मी और रोचक क़िताब है। इसे पढ़ने की शुरुआत के साथ ही इसे ख़त्म करने की ज़िद एक पाठक के तौर पर जरूर होगी। इसपर फिल्म बनने से काफी पहले ये उपन्यास इंटरनेशनल बेस्टसेलर की होड़ में आ गया। चालीस भाषाओं में इस उपन्यास का अनुवाद हो चुका है। कहने का मतलब ये कि विकास स्वरूप का उपन्यास अपनी शोहरत के लिए किसी फिल्म का मोहताज नहीं था। क्योंकि फिल्म तो उपन्यास की ख्याति के बाद बनी। इसलिए ऑस्कर की पूरी चमक के बीच इस महत्वपूर्ण कहानीकार का चेहरा नदारत रहना, थोड़ा मायूस करने वाला था। ख़ैर, हम सब मिलकर कहें विकास स्वरूप की जय... कहानी की जय। साथ ही विकास का दूसरा उपन्यास –सिक्स सस्पेक्ट्स- 28 जुलाई को रिलीज़ हो रहा है। हम उस उपन्यास की क़ामयाबी की भी शुभकामनाएं देना नहीं भूलेंगे।

Monday, February 23, 2009

ऑस्कर के बहाने हिंदुस्तान की तस्वीर


स्लमडॉग मिलिनेअर को ऑस्कर अवार्ड मिलना एक सवाल को भी जन्म देता है। इसके बाद ये बहस तेज हो गई है कि फिल्म में दिखाए गए हिंदुस्तान की तस्वीर कितनी सच्ची है। ... हिंदुस्तान के विद्रूप चेहरे पर ही आख़िरकार दुनिया क्यों रीझती है ? क्या ये मुंबई की झुग्गी बस्ती धारावी के झरोखे से विराट हिंदुस्तान को देखने की कोशिश है... या फिर ग़रीबी और भूख को जलसे की तरह देखने का प्रयास। फिल्म को भारत की छवि के साथ जोड़कर भी देखा जा रहा है। ऐसे में पूरे उल्लास के साथ हम इस फिल्म को अवॉर्ड मिलने की खुशी मनाने की स्थिति में हैं ?
फिल्म स्लमडॉग मिलिनेअर को ऑस्कर अवॉर्ड... ऐसे दौर में मिला है, जब हिंदुस्तान दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है।... ये अवॉर्ड ऐसे दौर में मिला है जब विज्ञान और तक़नीक के मामले में भारत की अलग तस्वीर बनी है। भारत में ग़रीबी और भूख को पराजित करने की छटपटाहट साफ तौर पर देखी जा सकती है। विश्व आर्थिक मंदी के दौर में जब दुनिया की कई मजबूत अर्थव्यवस्था डंवाडोल हो रही हैं, उसमें भारत ट्वेंटी- ट्वेंटी टूर्नामेंट जैसे अरबों के तमाशे का आयोजन कर रहा है। दुनिया भारत के इस नए रूप पर हैरान तो है मगर इस हक़ीकत पर भरोसा नहीं करना चाहती।... ऐसे दौर में ये फिल्म आई जब हिंदुस्तान का मिडिल क्लास विश्व का सबसे ज्यादा बाइंग कैपेसिटी वाला क्लास है।...भारत दुनिया की ताक़तवर देशों के लिए चुनौती बनकर उभर रहा है। ....लेकिन ऐसे ही दौर में आई फिल्म स्लमडॉग मिलिनेअर को दुनिया ने हाथों- हाथ लिया।... ये फिल्म हिंदुस्तान की अलग तस्वीर दुनिया के सामने रखती है। जहां ग़रीबी और भूख है। दुनिया इसी फिल्म में दिखाए गए हिंदुस्तान पर रीझ गई... ये वही तस्वीर है जिसे दुनिया देखना चाहती थी।... दूसरे, इस फिल्म के नाम को लेकर भी बड़ा स्वभाविक विरोध है। दरअसल, फिल्म का नाम बहुत कुछ प्रतिक्रिया जैसी दिखती है। कोई भी हिंदुस्तानी फिल्म मेकर दिल से इस नाम पर अपनी सहमति नहीं देता। खैर, ऑस्कर अवॉर्ड देकर दुनिया ने भारत की इसी बदनुमा तस्वीर पर अपनी मुहर लगा दी है। इसे और ठीक ढंग से समझने के लिए ऑस्कर अवॉर्ड के लिए नामित हुई अन्य भारतीय फिल्मों के हश्र को देखकर समझा जा सकता है। ... या फिर ऐसी फिल्मों को भी लिया जा सकता है जो तक़नीकी रूप से मजबूत थी और उसकी कहानी बेहद प्रभावी।... मगर ऐसी फिल्मों को ऑस्कर में तवज्जो नहीं मिली। इससे पहले केवल तीन फिल्में लगान, सलाम बांबे और मदर इंडिया फाइनल राउंड तक पहुंच पाई थी। लेकिन... रंग दे बसंती और तारे ज़मी पर जैसी फिल्में ऑस्कर के फाइनल राउंड तक भी नहीं पहुंच पाई। शायद इसलिये क्योंकि ये फिल्मे विदेशियों के उस खाके पर सटीक नहीं बैठती थीं जो उन्होंने फटे-पुराने हिन्दुस्तान के रुप में बनाया हुआ है। ख़ासतौर पर लग़ान से तो गोरे अंग्रेजों का मान- मर्दन भी कम नहीं हुआ। ऑस्कर में नामित होने वाली इन तमाम फिल्मों को मायूसी ही हाथ लगी, ऐसे में स्लमडॉग मिलिनेअर को ऑस्कर मिलना भारतीय समाज के लिए अगर सवाल बना है तो आश्चर्य नहीं।

Saturday, February 21, 2009

बूझो तो जाने का जवाब


दोस्तों, अभी पिछले दिनों दैनिक भास्कर में छपी एक तस्वीर अपने ब्लॉग पर लगाकर आपसे पूछा था- बूझो तो जानें। इसमें बहुत तो नहीं लेकिन चार टिप्पणियां आईं, जो बेहद दिलचस्प हैं। कुछ ने कहा ये चांद है... कुछ ने कहा चेहरा तेरा- जैसा जवाब है। मेरा जवाब जानने के बाद एकबार फिर आप इन टिप्पणियों पर जरूर क्लिक करें... शायद आपको ज्यादा मजा आए। दरअसल, इस तस्वीर को लेकर तहजीब के शहर लखनऊ के एक ब्लागर रौशन साहब ने सही कयास लगाया है। ये तस्वीर उन सामग्रियों की है जिसे मीठे पान के साथ खाया जाता है... हां, इलाहाबाद सहित कुछ अन्य जगहों पर इसमें तंबाकू डालकर भी खाया जाता है। ... बग़ैर तंबाकू के इसे आप भी ट्राई करके देखें, मजा आ जाएगा।

Thursday, February 19, 2009

कौआ हंस की चाल चला



बंधु, बहुत दुखी हूं। अभी पिछली पोस्ट में मैने जानवरों पर केंद्रित कुछ मुहावरों का ज़िक्र करते हुए कुछ लिखा था। उसे आजतक उसी जगह पर लगा छोड़ दिया। इस उम्मीद से कि उसकी सबसे बड़ी ग़लती आप पकड़ लें। अफसोस, किसी ने इसे नहीं पकड़ा। तो लीजिए, मैं ही अपनी ग़लती न केवल पकड़ता हूं बल्कि इसके लिए माफी भी मांगता हूं। मैंने उसमें लिख दिया कि धोबी का गधा, न घर का न घाट का। कितनी बड़ी गलती है...आपमें से कोई इसे पकड़कर मेरी ऐसी- तैसी न कर सका। भाई, मुहावरा है धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का। धोबी का गधा तो बेचारे धोबी की ज़िंदगी ही है। वो तो उसके लिए घर के लिए भी काम का है और घाट का तो है ही।


कुत्तों को लेकर मुझे काफी अफसोस है। बेचारे को मुहावरों की दुनिया में ज्यादा तरजीह नहीं दी गई...ऐसे ही जैसे इधर- उधर मुंह मारते हुए हमारे घरों में आने पर हम उसे दुरदुराकर भगा देते हैं। गधों की तरह कुत्ते मुहावरों की दुनिया में क्लिक नहीं कर सके...शायद मुहावरा गढ़ने वालों को कुत्तों का चेहरा ज्यादा कैची न लगा हो...या फिर गली का खुजलीवाला कुत्ता इनमें से किसी मुहावरेबाज को सुनसान गली में दौड़ा लिया हो। उसी का खामियाजा बाकी कुत्ते अबतक भुगत रहे हैं। हां, एक ही मुहावरे में कुत्ते जो हैं सो मुहावरों की दुनिया में अजर-अमर हो गए। इस मुहावरे को हम दिन-रात भूकते रहते हैं अगर घर का बच्चा बिगड़ गया तो। मुहावरा है - कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती।


गाय- भैंसों पर भी मुहावरे गढ़े गए। जैसे हर बाप अपनी कुंवारी बेटी को हमेशा से गाय जैसी बताता फिरा है। ये अलग बात है कि भैंसों के मुकाबले गाय ज्यादा आक्रमक होती है। भैंसों के साथ वैसे, बड़ी नाइंसाफी हुई है। भैंसों को कभी देखा है...हमेशा चैतन्य भाव में पगुराती हुई...दिन-रात॥ जाड़ा-गर्मी- बरसात। भैंसों को कभी सोते हुए नहीं देखा...आपने देखा है क्या। नहीं न...लेकिन इन मुहावरे बाजों ने पहले तो ये साबित किया कि भैंसें सोती भी हैं, दूसरे ये भी दावा कर दिया कि उसकी नींद कुंभकर्ण से ज्यादा गहरी होती है...इसलिए तो हर बाप अपने नालायक बेटे को सोता हुआ देखकर यही कहता है कि- भैंस की तरह सोया रहता है। वैसे, गहरी नींद के कारण घोड़े वाला भी कम बदनाम नहीं हुआ...ये अलग बात है कि वो जब घोड़े को बेच लेता है तब सोता है और बेखबर सोता है। इसलिए तो घोड़ा बेचकर सोना मुहावरा बन गया। हां, मुहावरों की दुनिया में मुर्गियों की कोई बख़त नहीं। इसलिए तो मुर्गियों को लेकर कहा गया कि घर की मुर्गी दाल बराबर। पता नहीं इस वक्त मुझे एक फिल्मी गीत याद आ रहा है- कौआ हंस की चाल चला, लंगड़ाकर थोड़ा-थोड़ा एक गधे ने कोशिश की वो फिर बन जाए घोड़ा, देखो चाल न छूटे, देखो चाल न छूटे।

Wednesday, February 18, 2009


दैनिक भास्कर में एक रिपोर्ट के साथ बगल वाली तस्वीर छपी है। इस बहुरंगी तस्वीर को इस उम्मीद में ब्लाग पर दे रहा हूं कि आप कम-से-कम अंदाजा तो लगाइए कि ये है तो आखिर क्या है। अंदाजा सही हुआ तो आपका जायका भी बेहद अच्छा हो जाएगाः संजीव

Monday, February 16, 2009

गधे न होते तो क्या होता


गधों पर ग़ौर करते हुए कई बार सोचता हूं कि ये गधे न होते तो क्या -क्या होता। हमारे मुहावरे कितने बेनूर हो गए होते। उन लोगों का क्या होता जिन्हें हम गधे का उपनाम देकर आसानी से काम चलाया करते हैं। या फिर जिन्हें हम कहते हैं कि यार ये तो बिल्कुल गधा है- ऐसे लोग तो बेसबब ही बिना नाम के फिरा करते। ..तो गधों ने हमारे मुहावरों और लोकोक्तियों में ख़ास रंग भरे है। अब ग़ौर कीजिए- धोबी के पास गधा न होता तो आख़िरकार कौन ऐसा होता, जिसे हम कहते कि ये न तो घर का है न घाट का। कोई अगर अचानक ग़ायब हो जाता तो उस स्थिति में क्या कहते। अभी तो कह देते हैं कि ऐसे ग़ायब हुआ जैसे गधे के सिर से सींग। ये दीगर है कि गधे के सिर से सींग किस काल में ग़ायब हुए इसपर विस्तृत शोध की जरूरत है। अब जैसे काबुल को हम सिर्फ टैगोर के काबुलीवाला के रूप में ही नहीं जानते। गधों के कारण भी कम नही जानते। आपको शायद पता हो, काबुल में भी किसी काल में एकाधा गधे न हुए कि भाइयों ने उड़ा दिया- क्या काबुल में गधे नहीं होते। गधे नहीं होते देश के विभिन्न प्राथमिक विद्यालयों में चलने वाली कक्षाओं की कार्यशैली पर क्या प्रभाव पड़ता। गुरुजी भला अपने शिष्यों को क्या कहकर डांटते। हमें तो गुरुजी ने ज्ञान तो दिया नहीं लेकिन गधे का उपनाम देकर जीवन भर के लिए उपकृत कर दिया।...शायद अन्य भाइयों का भी यही ख़याल हो, तो आश्चर्य नहीं। आपसी झगड़े के दौरान हम आखिरकार किसका हवाला देकर झगड़ते। अभी तो कह देते हैं कि क्या हमें गधा समझ रखा है। मुहावरे बनाने वालों ने गधों के साथ नाइंसाफी भी कम नहीं की है। एक तरफ तो उन्हें धोबी का गधा कहकर न घर का न घाट का बताते फिरे हैं...जरूरत पड़ने पर यही गधा सबसे ज्यादा काम करने वाला भी हो जाता है- गधे की तरह खटना (काम करना) पड़ता है जी। क्या सुविधाजनक ढंग से हम गधों के नाम पर सवारी करते रहे हैं। गधों के साथ एक और नाइंसाफी देखिये- जरूरत के समय गधों को भी बाप कहना पड़ता है। कई भाई तो इस लोकोक्ति पर चलते हुए सफलता के गंतव्य तक पहुंचे। गधे की तरह पिटाई कोई मुहावरा तो नहीं लेकिन किसी को गधे की तरह धुनकर इसे महसूस किया जा सकता है...उससे भी समझ मेंन आए तो गधे की तरह पिट- पिटाकर इसका अहसास किया जा सकता है (कोई भाई इस प्रयोग से गुजरें तो किसी को बताने की ग़लती न करें।)। मेरी दीदी मुझे डांटते हुए अक्सर कहती थी- गधे रह जाओगे गधा। यानी मैं गधा तो हूं ही...गधे का उपनाम और चस्पां कर दिया गया मेरे साथ। भाई, मुझे तो गधे उपनाम का लाभ भी नहीं दिया गया। कहते हैं न कि यहां तो गधे पंजीरी खा रहे हैं। मैं यहां साफ करना चाहता हूं कि न तो मैने न ही किसी गधे ने कभी पंजीरी खाई...मुहावरेबाज ख़ामख्वाह इसे लिए फिर रहे हैं...जरा कोई समझाओ भाई। गधे न होते तो राजू श्रीवास्तव का काम तो जैसे गाय- भैंसों से चल रहा है, चल भी जाता मगर मूर्धन्य साहित्यकार कृशन चंदर का क्या होता, जिन्होंने एक गधे की आत्मकथा लिखकर गधों को साहित्य में भरसक कद-काठी दी।...लेकिन गधों के नाम तक में कंफ्यूजन पैदा करने की कोशिश की गई।...कोई उन्हें गदहा कहता है तो कोई गधा। कल को कोई गदहा ही अपने अधिकारों की लड़ाई शुरू करेगा...मैने अपनी तरफ़ से तो शुरू ही कर दिया है। (अगली किस्त में कुछ अन्य जानवरों से जुड़े मुहावरों और लोकोक्तियों पर।)

Sunday, February 15, 2009


ये तस्वीर श्री प्रभात जी ने खीचीं है, जो उनके ब्लाग -व्यूफाइंडर पर उपलब्ध है। मुझे जिंदगी से भरा ये चेहरा अपने ब्लाग के लिए बेहतर लगा। सो, बिना उनकी अनुमति के अपने यहां चस्पां कर रहा हूं। मेरी तरह अगर आपकी भी यही राय हो तो लिखकर बताइएः संजीव

Friday, February 13, 2009

...आ अब लौट चलें

(भाग- दस)-दोस्तों, आज ऐन वेलेंटाइन डे के दिन अपने प्रेम का पन्ना बंद करता हूं... सदा के लिए। साथ ही अपनी गांव यात्रा का अंत भी। मेरे लिए दोनों ही मायूस कर देने वाली बात है। गांव आए दस दिन हो चुके थे। दिल्ली में नौकरी की चिंता सताने लगी। जैसे-तैसे रिजर्वेशन लिया। लौटने से एकदिन पहले मुझे दस्त लग गए...शायद दिल्ली लौटने की बात सोचकर घबराहट में। ख़ैर जी, सुबह से ही मैं बुझा-बुझा था। सामान सहेजना क्या..बस बैग में सबकुछ जैसे-तैसे ठूंस लिया। मां ने खाने को दिया...दो-चार कौर से ज्यादा खाया नहीं गया। दोपहर बाद पिताजी ने टैक्सी मंगवा दी (आश्चर्य)। ...कहा, आराम से दोनों भाई जाना और पहुंचकर समाचार देते रहना। जाते व हमारे शहर में एक जीरो माइल जगह है। मेरी टैक्सी उसी होकर गुजर रही थी। ...मैनें इस जगह का ज़िक्र इसलिए किया क्योंकि शायद ये पहला ऐसा चौराहा मैं देखता आ रहा हूं जहां किसी कवि की आदमकद प्रतिमा लगी थी। कवियों को चौराहों पर प्रतिष्ठित करने की परंपरा हमारे देश में कहां-कहां है, मुझे नहीं पता।मगर यहां है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर। ओज के कवि। बगल के सिमरिया गांव के रहने वाले थे। समय का सूर्य हूं मैं। दिनकर जी राष्ट्रकवि तो थे ही...आप यहां महसूस कर सकते हैं कि दिनकर जनकवि भी थे। जीरो माइल पर दिनकर जी की इस आदमकद प्रतिमा का अनावरण ख्यातिलब्ध हिंदी आलोचक डा. नामवर सिंह ने किया था। प्रतिमा के नीचे लिखा हुआ है। स्थानीय लोग और दिनकर जी के गांव वाले आज भी उनकी जन्मतिथि बिना किसी सरकारी सहायता के धूमधाम से मनाते हैं। धूमधाम माने, अच्छे वक्ताओं को बुलाते हैं...उनकी जुबान से अपने गांव के इस महान कवि के बारे में सुनते हैं तो उनका दिल बाग- बाग हो उठता है। आज इस प्रतिमा को देख मुझे भी गर्व हो रहा था..अपने शहर पर। अपने इस महान कवि पर। टैक्सी बहुत आगे बढ़ चुकी थी और स्टेशन नजदीक था। शाम हो चुकी थी तो ट्रेन में बैठते ही सोचा कि खा- पीकर सो जाया जाय। बैग से खाना निकाला...भाई ने खाने से अनिच्छा जाहिर की। उसका तनाव समझ सकता था। मां ने सत्तू भरी पूड़ियां दी थी.... बिना प्याज वाली आलू की सूखीसब्जी। एक डब्बे में अंकुरे हुए चने... तीन-चार मिठाई के टुकड़े। जानता हूं, अचार जानबूझकर नहीं दिया...हमारे यहां धारणा है कि यात्रा में अचार नहीं देना चाहिए, इससे यात्रा बिगड़ने का खतरा रहता है- पता नहीं ट्रेनों या बसों के चलने में अचार का क्या योगदान है? जिद करने पर भाई ने भी एकाध पूड़ियां खाई। खा-पीकर लंबलेट हो गया। सुबह नींद खुली तो ट्रेन मुरादाबाद स्टेशन पहुंच चुकी थी...टीटी किसी पांड़ें जी से बहस कर रहा था। पांडे जी जोर- जोर से बता रहे थे कि उनका नाम गौरीनाथ पांड़े है...लखनऊ में चढ़े हैं और दिल्ली जा रहे...विकलांग हैं इसलिए विकलांगों को सरकार की तरफ से दी गई रेलवे की सुविधा ले रहे हैं...इसमें टीटी उनपर कोई अहसान नहीं कर रहा। टीटी कह रहा था कि अगर विकलांग हैं तो ये तो बताइए कि आपको कौन सी शारीरिक परेशानी है...पांडे जी का कहना था कि शरीर अकड़कर रह गया है, देखते नहीं हैं क्या? ...ई तो सीएमओ का सर्टिफिकेट में भी लिखा है...ई भी देख लीजिये। बहुत बकझक और यात्रियों की हस्तक्षेप से मामला खत्म हुआ। पांड़े जी लगातार बोलते रहे। हालांकि वो न तो टीटी को बता पाए कि उन्हें दिक्कत क्या है और न ही यात्रियों को...वैसे, भले- चंगे लग रहे थे। किनारे वाली बर्थ पर एक जोड़ा था...युवती जींस- शर्ट में और लड़का कुछ फंकी लुक वाला था। दोनों को किनारे वाली एक बर्थ मिली थी। दीन-दुनिया से बेखबर दोनों ऐसे पड़े थे जैसे समुंदर के किनारे सनबाथ ले रहे हों। उसे लेकर हमारी बोगी के तमाम महिलाओं में खुसुर- फुसुर हो रही थी...अधेड़ किस्म के लोग डांटने के अंदाज में दोनों को घूर रहे थे। और बाकी लड़के जो थे...बस मजे ले रहे थे। देर रात गए ही किसी स्टेशन पर दोनों चढ़े थे और उसी समय से उन्हें संदिग्ध मान लिया गया था। मुझे लगता है कि किसी को संदिग्ध मान लेने का भी अपना मजा है...उसे अगर स्वभाविक मान लिया जाय तो उसमें फिर मजे का रस कहां रह जाएगा? तो जी, लोग बातें बनाते रहे और सफर कटता रहा। इसी बीच ट्रेन रुकी हुई थी...एक बच्चा घुस आया। हाथों में दो पत्थर के टुकड़े लेकर उन्हें आपस में बजाता। उसका ये वाद्ययंत्र किसी भी वाद्ययंत्र का मुकाबला कर सकता था। उससे निकली ध्वनि, उसका रिदम मुझे लाजवाब कर गया। उससे भी प्यारी उसकी आवाज थी- चल हट जा ताऊ पाछे णे। पांच रुपये दिये और चल हट जा ताऊ को बार-बार उससे सुना। ट्रेन दिल्ली स्टेशन पर पहुंच चुकी थी। अब फिर से मैं दिल्ली की बेशुमार भीड़ का हिस्सा था। उसी रेलमपेल में बाहर निकला। लगा दस -पंद्रह दिनों में ही दिल्ली मुझसे और आगे निकल गई। ...जाने भी दो ससुरी इस दिल्ली को...खुदै भाग- भाग के एकदिन थक लेगी तो कलेजा हाथ में लेकर बैठकर सोचेगी...आ अब लौट चलें।

Wednesday, February 11, 2009

हा हन्त, यह कैसा वसंत

प्रभात जी, दैनिक भास्कर ग्रुप में बड़े पद पर हैं। साथ ही, प्रभात जी हम सबके लिए ऐसे पत्रकार भी हैं जिन्होंने अपने दौर की पत्रकारिता पर एक ख़ास छाप छोड़ी है। उन्होंने आदिवासी इलाकों में जाकर थारुओं पर काफी कुछ किया है। वैसे, प्रभात जी फोटोग्राफी की दुनिया में भी खूब चीन्हे जाते हैं। एक ऐसे फोटोग्राफर जो कैमरे को अपनी दृष्टि देते हैं। आईए पढ़ें दैनिक भास्कर में छपा उनका एक आलेख- सुना है कल पतंगें उड़ी, लीज़र वैली में दुपट्टे लहराए, गूंजती रही खिलखिलाहटें। ऋतुराज आए हैं न। सो उनके स्वागत में खिले-खिले फिरते रहे लोग। हवाओं ने जरूर इसकी इत्तला की मगर मौसम इस क़दर धमाचौकड़ी का है कि बहुतों को इसकी ख़बर तक न हुई। यहां तो लोग कई दिन से फिजा-फिजा कर रहे थे, कल वे ही लोग ख़िजां- ख़िजां कहते सुने गए। बेचारी का वसंत पीले वसन के बजाय नीले में रंगा दिखाई दिया टीवी पर। मम्मी ने मीडिया वालों से कहा, तुम सब जाओ। आज बेबी का मूड नहीं है, सो बात नहीं करेगी। टीवी वालों का सारा टीआरपी प्लान फुस्स हो गया। दो दिनों से बेबी के बूते ही झूम रहे थे। मगर धन्य है बेबी भी। अगले रोज़ ही मीडिया वालों को न्योता भेज दिया कि आ जाओ। न सही इस बार मगर पुराने वसंत की दिलकश यादें तो हैं, उसी को ताज़ा कर लें। दो बरस से सहेजकर रखे हुए एसएमएस काम आ गए। ज़माने भर ने कालका- पंचकूला के वोटरों ने भी टीवी की मार्फत अपने नुमाइंदे की निजी ज़िंदगी के ख़ास राज़ जाने-सुने। कुछ ने बेबीजी के हौसले की तारीफ़ की, कुछ ने नेताजी के कौशल की। छोटे पर्दे पर कई दिनों से चल रही इस कहानी से बड़े पर्दे पर मसाले के तिजारती ख़ासे मुतासिर हुए हैं- कुछ करोड़ रुपये का ऑफर भेजा है बेबी को। उनकी ज़िंदगी पर फिल्म बनाएंगे। आख़िर बसंत आया। जय हो बेबी की।देश के तमाम बड़े नेताओं को भी ऋतुराज के स्वागत का मौक़ा नहीं मिल पाया। इन दिनों सारे नेता खासे व्यस्त चल रहे हैं। उनके इम्तहान भी सिर पर हैं, सो ख़ूब मेहनत कर रहे हैं। कर्नाटक में नेताओं को अचानक ध्यान आया कि बंगलूर- मंगलूर में इत्ते सारे पब हैं। पब हैं तो बेवड़ा है, बेवड़ेबाज भी हैं। ये बेवड़ेबाज़ ही लड़कियों के हाथ में हाथ डालकर घूमते हैं। इससे हमारी भारतीय संस्कृति पर बुरा असर पड़ता है। हमारी छवि ख़राब होती है और लड़कियों का दिमाग़ भी। नेता ऐसा हरगिज नहीं होने देना चाहते। दिमागी तंदुरुस्ती रहेगी तभी तो वे कंधे से कंधा मिलाकर तरक्की करने के लायक बन पाएंगी। सो अभी पहले चरण में उनकी सेना के जवाब पब में घुसकर लोगों की ठुकाई कर रहे हैं (भय बिनु होए न प्रीत)। कोट-टाई धारण करके टीवी पर अवतरित हो रहे हैं और अपने इस सामाजिक हित के नज़रिये का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। अगले चरण में यही जवान इन पब की जगह दूध- लस्सी की दुकान खोलकर बैठ सकते हैं। केवड़े वाली लस्सी और रोग़न बादाम शीरीन वाला दूध।दुध का कुल्हड़ इस क़दर गर्म होता है कि साथ- साथ आएंगे तो भी हाथ में हाथ डालकर नहीं चल पाएंगे। बिना लाइसेंस वाले ढेरों पब से निज़ात भी और तेज़ दिमाग़ नस्ल अलग से। जिन लोगों को समाज सफाई की इस मुहिम पर ऐतराज़ है, वे अनजान और भोले-भाले हैं। अपने इतिहास और संस्कृति के बारे में कुछ नहीं जानते। अरे, रामजी सेना है। तोड़-फोड़ और मार- पिटाई तो इस सेना की परंपरा रही है। न यक़ीन हो तो तुलसी बाबा से पूछ लें- खाएसि फल और बिटप उपारे, रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे। अभी बिटप उखाड़ने और रच्छकों की ठुकाई का टैम है। इससे फुर्सत पाकर फल भी खा लेंगे। सो रोज़ -रोज नया जांच दल भेजने का कोई फायदा है नहीं।बड़ी सी बिंदी वाली नेता पता नहीं क्यों कर्नाटक वालों की इस योजना के ख़िलाफ हैं- कहती हैं कि अपने घर की लड़कियों का डाइट चार्ट बनाने का ज़िम्मा हम लोग पब कल्चर की मुख़ालिफत करने वाले इन नेताओं को नहीं दे सकते। बात में उनकी भी दम है। अरे, इतने कॉलेज खुल गए हैं- डाइटीशियन की पढ़ाई करने आने वालों को भी रोज़गार देना होगा कि सारे काम सिर्फ नेता ही करेंगे। उधर, राजस्थान में अलग बवाल है। वर्षों तक सत्ता से बाहर रहकर दूसरों का सांस्कृतिक चिंतन सुनते- सुनते कांग्रेसी इस क़दर मुतासिर भये कि कुर्सी पर बैठते ही शराब की दुकानों को बंद करने का फ़मान सुना दिया। यानी मय बुरी शै नहीं, मयख़ाना बुरी चीज़ है। मय बुरी चीज़ होती तो इसके कारखाना मालिकों को नेता अपने साथ लिए थोड़े घूमते, अपने साथ बैठाते थोड़े ही। आसल बात तो कल्चर की है और कल्चर की चिंता सिर्फ मध्य प्रदेश या कर्नाटक वालों का हक़ नहीं, दिल्ली- राजस्थान वाले भी इसी मिट्टी में जन्मे हैं।इलेक्शन मेनिफेस्टो अपनी जगह मगर कितनी समानता लगती है इन नेताओं के विचारों में। हालांकि बिग फाइट में मिले सबके सब तो ख़ूब मुक्के ताने एक-दूसरे पर। टीवी शो के नाम की लाज भी तो रखनी होती है न। अपने मुक्केबाज हीरो मगर बड़े खिन्न हैं। जब से चीन से लौटे हैं कांसा लेकर, पूरा देश बलैया ले रहा है। मल्लिका शेहरावत डेट पर साथ जाने की ख़्वाहिश में चिट्ठी भेज रही हैं, रोहित बल अपने कुर्ते में लपेटकर बिल्लियों के बीच कदमताल करा रहे हैं, फोटुएं खिंच रही हैं दनादन, सरकारें नज़र उतार रही हैं, युवतियां आहें भर रही हैं मगर इन सबमें उनका मन ज़रा भी नहीं रमा। दस्ताने उतारकर खूंटी पर टांग दिए और चारपाई पर पड़े-पड़े खुली आंखों से छत निहारते रहे। २६ जनवरी अभी आई नहीं थी, बसंत अभी दूर था। असली अरमान तो अभीतक आंखों में ही थे। मगर यह कैसा वसंत, हा हन्त। अरमान धरे के धरे रह गए। पद्म तो वह एक आंख से निशाना लगाने वाला ले गया। कोई शातिर, कोई गवैया ले गया। नीली आंखों वाली भौजाई को भी मिल गया। है इनमें से किसी में मुक्का मारने का शऊर या फिर मुक्का खाने का दम। मर्दानगी की, बहादुरी की क़द्र अगर थोड़ी भी बची है इस देश में तो इसबार न सही, चलो अगली बार सही- कोई जुगाड़ लगाके थोड़ा पद्मश्री इन्हें भी दिलवा दो न।

Monday, February 9, 2009

मानस बदले, तो बिहार बदले !!

श्री हरिवंश जी प्रभात ख़बर के संपादक हैं । आज सुबह प्रभात ख़बर में उनका लेख पढ़कर तकरीबन १३ वर्षों बाद फोन किया और इसे ब्लॉग पर प्रकाशित करने की इजाजत ली।

यह निष्कर्ष पढ़ते हुए बीस वर्ष पहले का एक दृश्य मन में घूम गया. मुंबई की बात है. मित्र राहल देवजी, जनसत्ता (मुंबई) में संपादक थे. वे, धर्मयुग के दिनों के पुराने हमसफ़र अनुराग और हम, साथ बैठ कर चाय पी रहे थे. वहीं पहली बार बीमारू राज्यों को लेकर लंबी चर्चा हई. बीमारू यानी जो बीमार है. साथ ही बीमारू को अंगरेजी शब्दों में लिखें (इखचअठण), तो इसका अर्थ निकलेगा बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तरप्रदेश. तब इस अवधारणा के जनक प्रो आशीष बोस की किताब आयी थी. राहलजी ने ही पुस्तक का उल्लेख किया. आज पत्रकारों का पढ़ाई से त्तीस का परश्ता है, पर राहलजी या अनुरागजी अपने समय के प्रति अत्यंत सजग रहे हैं. पढ़नेवाले. दुनिया में हो रही नयी चीजों से ताल्लक रखनेवाले. उस बैठक से उठ कर तुरंत वह पुस्तक खरीदी. शायद ऑक्सफ़ोर्ड से छपी थी. वषाब बाद राहलजी से उस पुस्तक पर बात हई. कहा, नारायणदत्त तिवारी भारत सरकार के वित्त मंत्री थे, तो वह पुस्तक मुझसे ले गये. नहीं लौटायी. पर इस विषय पर िहदी पट्टी के राजनेताओं को ‘अवेयर व एडूकेट’ (जागरूक करने, प्रशिक्षित करने) करने का काम हआ. ले मैन लैंग्वेज (जनभाषा) में कहें, तो बीमार राज्य, जो पिछड़ेपन के दुश्चक्र में फ़ंस कर बीमार हैं, बढ़ नहीं पा रहे. इस दुश्चक्र से निकल नहीं पा रहे. तब से इस विषय पर लगातार सुनना, संवाद व जानना होता रहा. 1990 के आसपास सूचना आयी कि योजना आयोग के अनुसार मध्यप्रदेश और राजस्थान बीमारू अवधारणा से निकल गये हैं. बचे हैं, बिहार और उत्तरप्रदेश. जो बंट कर फ़िर चार हो गये, बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश और उत्तरांचल. विशेषज्ञ कहते हैं कि ये चारों बीमार ही हैं. 80 के दशक में ही महाराष्ट- और केरल के सेकुलर बुद्धिजीवी और विचारक सवाल उठाते थे कि आगे बढ़ते राज्य या संपन्न मुंबई, गरीब राज्यों का खर्च क्यों उठायें? सेंट-ल पूल (आयकर वगैरह से होनेवाली आमद) से गरीबी के आधार पर क्यों केंद्र गरीब राज्यों को विकास के लिए अधिक धन दे? चंद्रबाबू नायडू जब मुख्यमंत्री थे, तो उन्होंने नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल की बैठक में बार-बार यह सवाल उठाया कि जो राज्य अपने सुशासन या प्रगति के कारण अधिक कमाई कर रहे हैं या राजस्व उगाह रहे हैं, केंद्र उसे लेकर गरीब राज्यों को विकास के लिए क्यों देता है? उनके कहने का आशय साफ़ था. कमाई हमारी, खर्च दूसरों के विकास पर क्यों? उन्होंने बीमारू राज्यों का नाम लिया (बिहार का भी). कहा कि जो राज्य शासन में इफ़िशियेंट नहीं हैं, जो अपनी जनसंख्या नियंत्रित नहीं कर पा रहे, जो गरीबी रेखा से नीचे रहे लोगों को उठा नहीं पा रहे, जो अपने यहां विकास नहीं कर पा रहे, भ्रष्टाचार नहीं रोक पा रहे, उनके कुशासन की कीमत हम विकसित या आगे बढ़ते राज्य क्यों दें? शिवसेना के बाल ठाकरे या अब राज ठाकरे के पूरे आंदोलन का मर्म यही है. ये दोनों क्रूड (भदेस) हैं, नहीं तो सुसंस्कृत शब्दों में यह सवाल बार-बार उठते रहे हैं कि इन बीमार राज्यों के विकास की जिम्मेदारी जिन राजनेताओं के कंधे पर रही है, अगर वे अपनी अक्षमता, अकुशलता और इनइफ़िशियेंसी से कुछ नहीं कर पा रहे हैं, तो उसकी कीमत दूसरे राज्य क्यों चुकायें? 1980 के आसपास मराठी के जानेमाने संपादक और विचारक, माधव गडकरी ने मराठी के सबसे बड़े समाचार पत्र में किस्तों में लेख लिख कर यह सवाल उठाया था. आज महाराष्ट- या असम से लगातार बिहारी-झारखंडी भगाओ आंदोलन की खबरें आती हैं. इस गंभीर सवाल का मूल्यांकन, दो दृष्टि से होना चाहिए. पहला, भारत संघ की एकता की दृष्टि से. गरीब राज्यों के प्रति इस दृष्टि से, देश की एकता और अखंडता पर सवाल उठ सकते हैं. यह भी सच है कि उत्तरप्रदेश, बिहार और बंगाल समेत पूर्वी राज्यों के विकास के बगैर भारत आगे नहीं बढ़ सकता. इसलिए इन राज्यों का विकास ही भारत के हित में है. पर दूसरी दृष्टि,खुद इन राज्यों के हित में है, अपना विकास करना. अपनी तकदीर खुद बनानी होगी. यथार्थ यह है कि कोई राज्य एक सीमा से आगे, दूसरे राज्य के लोगों को शरण नहीं दे सकता. यह व्यावहापरक नहीं है. हर राज्य खुद आगे बढ़े, ताकि उस राज्य के लोग कहीं शरणार्थी न माने जायें. यह भारत संघ की एकता के लिए सबसे अनिवार्य शर्त है. इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में एसोचेम की रपट का मूल्यांकन होना चाहिए. बिहार, बीमारू राज्यों के दायरे से निकला या नहीं निकला, इस बहस के पहले यह देखना चाहिए कि छह दशकों में पहली बार बिहार को बीमारू से बाहर माना गया. यह निष्कर्ष किसी साधारण व्यक्ति या संस्था का नहीं है. यह एसोचेम परसर्च ब्यूरो द्वारा तैयार रपट है. इसे तैयार किया है नुसरत अहमद और एसोचेम परसर्च ब्यूरो ने. यह परपोर्ट है ‘एसोचेम इन्वेस्टमेंट मीटर’ (एसोचेम निवेश सूची). परपोर्ट के नीचे उल्लेख है, शिफ्टिंग इनवेस्टमेंट डेस्टीनेशंस (निवेश के बदलते गंतव्य). यह एक तिमाही के निवेश पैटर्न (पद्धति) का आकलन है. अगर हम सचेत नहीं रहे, हड़ताल, बंद, अव्यवस्था जैसी चीजें चलती रहीं, तो यह पैटर्न, अगले तिमाही में बदल सकता है. बिहार, फिर बीमा ब्रैकेट में ही रहेगा. यह चेंज एक अवसर है, अपनी नियति बदलने का. यह निवेश आंकड़ा फ्रेजाइल (अस्थिर) तत्व है. अगर हम जी-जान से अपनी तकदीर संवारने में लगें, तो यह स्थायी भी बन सकता है.एसोचेम का निष्कर्ष वित्तीय वर्ष 2008-09 के तीसरे तिमाही का है. इसलिए यह संकेत भर (फ्रेजाइल) है. अगर यह स्थिति लगातार बनी रही, वषाब बनी रही, तब बिहार बीमारू ब्रैकेट (समूह) से बाहर निकलेगा. एसोचेम की इस परपार्ट का सारांश है कि वर्ष 2008-09 के तीसरे तिमाही में सिर्फ़ चार राज्यों ने पोजिटिव ग्रोथ (सकारात्मक प्रगति) की है. इसमें राजस्थान, पहले स्थान पर है, 245 फ़ीसदी के साथ. बिहार दूसरे नंबर पर है, 100 फ़ीसदी के साथ. फ़िर पंजाब (41.6 फ़ीसदी) और उत्तरप्रदेश (26.8 फ़ीसदी) हैं. परपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि बुनियादी संरचनाओं से रहित राज्य बिहार पिछले वित्तीय वर्ष (2007-08) के तीसरे तिमाही तक कारपोरेट निवेश आकर्षित नहीं कर पा रहा था. पर राज्य सरकार के विकासोन्मुख प्रयासों के कारण, भारतीय उद्योगपति शिक्षा, आइटी वगैरह क्षेत्रों में 304 करोड़ के आसपास राशि चालू वित्तीय वर्ष के तीसरे तिमाही में निवेश करने की तैयारी में हैं. यह परपोर्ट और निष्कर्ष अपने आप में बिहार के लिए गौरव का विषय होना चाहिए. पहली बार बिहार को बीमारू नहीं कहने की बात, अपने आप में प्रेरक है. जश्न और उत्सव का विषय है. बिहार बदल सकता है, बिहार बढ़ सकता है और बिहार विकसित हो सकता है. कम से कम इसकी झलक तो मिली. दरअसल बिहार के खिलाफ़ महाराष्ट- और असम वगैरह में हो रहे आंदोलनों का रचनात्मक जवाब बिहार का यह विकास ही है. भारत को संदेश देना, अपने रचनात्मक कमाब से यह साबित करना कि हम भी बढ़ सकते हैं. विकसित हो सकते हैं, यह बिहार का जवाब होना चाहिए. दुनिया के जो मुल्क आज प्रगति की सीढ़ी पर सबसे आगे खड़े हैं, उनका अतीत देखिए. जिन लोगों ने अत्यंत विपरीत पपरस्थितियों में सफ़लता की चोटी पर पहंच कर यश अर्जित किया है, उनका इतिहास पलटिए. रामायण का प्रसंग याद कपरए, जब हनुमानजी को यह अहसास कराया गया कि उनकी क्षमता क्या है, वह कैसे समुद्र लांघ सकते हैं. ऐसे अनंत प्रकरण हैं. इन सबमें कॉमन फ़ैक्टर (समान कारक) एक है. वह है, मोटिवेशन (प्रेरणा). ‘हम होंगे कामयाब’ गाने का मर्म क्या है? जिसने देशों का इतिहास बदला, निजीजिंदगियों में विश्वास और आस्था भरा. नयी राह दिखायी. इसलिए बिहार और बिहापरयों को इस निष्कर्ष को गहराई से समझना चाहिए. नयी पहल की कोशिश करनी चाहिए. बिहार बीमारू के घेरे से निकल सकता है, लगभग चार दशकों में यह पहली बार साबित हआ है. यह घटना बिहापरयों को रोमांचित करे, नयी उड़ान के लिए ऊर्जा भरे, नये उत्साह से लोग अपने कर्म में लगें, यह होना चाहिए. इस स्थिति का बुनियादी Þोय नीतीश कुमार की सरकार को है. पर एक महत्वपूर्ण घटना बिहार में हो रही है, जिस पर बिहापरयों को गौर करना चाहिए. वह घटना क्या है? यह कंपटीटिव पालिटिक्स (स्पर्धात्मक राजनीति) का दौर है. बिहार की राजनीति का एजेंडा अब विकास बन गया है. और बिहार के तीनों बड़े नेता लालूजी, रामविलासजी और नीतीशजी ने पिछले कुछेक वषाब में बिहार के विकास के जितने प्रयास किये हैं, उनको एक जगह जोड़ कर देखना चाहिए. लालूजी ने जितनी रेलें चलायीं. रामविलासजी ने बरौनी में कारखाना खुलवाया. झारखंड-बिहार में अनेक बड़े प्रोजेक्ट शुरू करवाये. हेल्थ कैंप लगवाया. इन सबका असर भविष्य में दिखायी देगा. नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति का एजेंडा ही बदल दिया है. विकास अब नारा या मुद्दा नहीं भूख है. एसोचेम की परपोर्ट को गहराई से देखें, तो स्पष्ट होगा कि नीतीश सरकार ने बिहार को एजुकेशनल हब बनाने की जो कोशिश की, उसके सुखद पपरणाम कैसे दिखने लगे हैं? एसोचेम की परपोर्ट के अनुसार निवेश में विकास की दृष्टि से चार टॉप स्टेट (इस वित्तीय वर्ष के तिमाही में) हैं. उनमें बिहार दूसरे नंबर पर है. जो झारखंड खनिज संपदा की दृष्टि से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में माना जाता है, उसकी क्या दुर्गति है? वहां निवेश में -98.78 फ़ीसदी की गिरावट की स्थिति है. यही झारखंड अक्तूबर-दिसंबर 2007-08 में, देश में पांचवें स्थान पर था. पर इसकी दुर्गति को, यहां के मंत्रियों की लूट, भ्रष्टाचार से जोड़ कर देखिए, तो तसवीर साफ़ होगी. अब झारखंड पांचवें नंबर से खिसक कर 2008-09 (अक्तूबर-दिसंबर) में 15वें पर पहंच गया है. बिहार, अक्तूबर-दिसंबर 2007-08 में 21वें स्थान पर था, अब वह 2008-09 (अक्तूबर-दिसंबर) में 14वें स्थान पर पहंच गया है. जब बिहार बंटा, तो यह गाना चला, बिहार के लोग बालू फ़ांकेंगे. आज वह बिहार कहां और किस स्थिति में है, और खनिज संपदा से भरपूर झारखंड की क्या दुर्दशा है! यह राजनीतिक नेतृत्व का फ़र्क है. पर सबसे कठिन और मौलिक यक्ष प्रश्न है कि क्या बिहारी बदलना चाहते हैं? क्योंकि बिहार को बदलना है, तो बिहापरयों को बदलना पड़ेगा. आत्मसम्मान के लिए. अपनी प्रतिभा और श्रम के लिए. अपनी दुनिया बेहतर और समृद्ध बनाने के लिए. संवारने के लिए. पिछले दो-तीन दशकों से अकेले मशहर अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और समाजविज्ञानी डॉ शैबाल गुप्ता और आद्री, बिहारी उपराष्ट-ीयता की बात करते रहे हैं. इसे यथार्थ में सिर्फ़ बिहारी ही उतार सकते हैं. जीवन में ढाल सकते हैं. बिल गेट्स ने एक जगह कहा है, ‘..चीनियों के बाद दक्षिण भारतीय, दुनिया में स्मार्टेस्ट लोग हैं’. क्या यह चुनौती बिहार रचनात्मक ढंग से स्वीकार नहीं कर सकता? बिहार के युवा प्रतिभा और श्रम में किसी से कम नहीं. गांधीजी कहा करते थे, काम स्वत बोलता है. क्या हम अपने आचरण और काम से दुनिया और देश में अपनी छाप नहीं छोड़ सकते? क्या हम स्वत आगे बढ़ कर बिहार में सामाजिक बदलाव और विषमता दूर करने का माहौल नहीं बना सकते? अंतत राज्य समृद्ध होगा, विकसित होगा, तभी बिहार गरीबी के अभिशाप से और बीमारू राज्य के अभिशाप से मुक्त होगा. यह बड़ी घटना है कि बिहार का राजनीतिक एजेंडा बदला है. यह राजनीतिक एजेंडा अब विकास है. पर अंतत हर बिहारी को इसे आचरण में तब्दील करना होगा. जात-पात छोड़ कर. अत्यंत पिछड़े, दलितों, महिलाओं और गरीबों को प्राथमिकता के आधार पर आगे लाकर. अगर यह जनमानस बन जाये और साथ में विकास राजनीतिक एजेंडा बना रहे, तो बिहार छलांग लगा सकता है. देश और दुनिया को राह दिखा सकता है. पर इसके लिए सरकार और समाज दोनों को कठोर कदमों के लिए तैयार रहना पड़ेगा. बिहार में 30 दिनों से हड़ताल चल रही है. क्या ये सरकारी कर्मचारी कभी बिहार के बारे में भी सोचते हैं? बिहार की कुल आबादी है 9.72 करोड़. राज्य सरकार के कुल कर्मचारी हैं 3.5 लाख. हड़ताल पर हैं, लगभग 2.5 लाख. राज्य सरकार के सभी कर्मचापरयों को पपरवार समेत जोड़ दें, तो यह संख्या दो फ़ीसदी के आसपास है. पर इनके वेतन और भत्ते पर खर्च है, सकल घरेलू उत्पाद का 10 फ़ीसदी. यह विषमता! फ़िर भी कर्मचारी हड़ताल पर! बिहार की प्रतिव्यक्ति आय है, 481 रुपये. गरीबी रेखा से नीचे की आबादी है, लगभग 5 करोड़ 65 लाख. जबकि सरकारी महकमे में तीसरे और चौथे पायदान पर काम करनेवालों की मासिक आय 11000 से 20000 रुपये. ये सरकारी कर्मचारी नये युग के सामंत, जमींदार और राजा हैं. ये संगठित क्षेत्र के लोग हैं. प्रतिवर्ष योजना व्यय, जिस पर राज्य का विकास निर्भर है, साढ़े नौ करोड़ लोगों का भविष्य निर्भर है, वह 13500 करोड़ का है. पर आबादी के दो फ़ीसदी लोगों के वेतन और पेंशन मद पर 16000 करोड़ खर्च! भारत में संगठित क्षेत्र कैसे असंगठित लोगों पर जुल्म कर रहा है, उसका यह एक नमूना है. बिहार ने छठा वेतनमान लागू किया है. पर सूचना है कि पश्चिम बंगाल, केरल, त्रिपुरा ने छठा वेतनमान लागू ही नहीं किया है. विकसित और धनी राज्य तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश ने भी छठा वेतनमान लागू नहीं किया है. असम, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब ने भी छठा वेतनमान लागू नहीं किया है. जो राज्य सबसे धनी माने जाते हैं, प्रतिव्यक्ति आमद में भी सबसे ऊपर माने जाते हैं, उस महाराष्ट- और गुजरात में भी छठा वेतनमान लागू नहीं है. पर बिहार सरकार के कर्मचारी छठा वेतनमान लागू होने के बाद भी हड़ताल पर हैं? ये बिहार का विकास चाहते हैं या विनाश? इसी तरह के आचरण के कारण बिहार बीमारू बने रहने को अभिशप्त है. बिहार बीमार रहा, तो बिहारी अवसर की तलाश में दर-दर भटकेंगे, अपमानित होते रहेंगे. इसी तरह जाने-अनजाने हम बिहारी ही बिहापरयों के अपमान के मूल में हैं. राज ठाकरे तो बाह्य कारण हैं. कर्मचारी संघ के नेता इस विषमता का कैसे जवाब देते हैं? यह जानना और रोचक है. ये कर्मचारी नेता आइएएस अफ़सरों और मंत्रियों की वेतन वृद्धि और सुविधाओं के उद्धरण देकर अपनी मांगों को जायज साबित करना चाहते हैं. होना तो यह चाहिए था कि ये मजदूर नेता कहते कि हमारे वेतन और पेंशन मद पर खर्च घटायें. नेताओं और मंत्रियों पर खर्च घटायें और बिहार के असंगठित क्षेत्र के लोगों के विकास पर खर्च करें, ताकि बिहार बढ़े. बिहारी न भटकें. इन्हें राज ठाकरे से अपमानित न होना प़ड़े. ये सरकारी कर्मचारी परश्वतखोरी के खिलाफ़ अभियान चलाते. बिहार के विकास की बात करते, तो एक नयी बात होती. राज ठाकरे को माकूल जवाब मिलता. बिहार विकसित होता. क्या आनेवाले 10 वषाब में बिहार को विकसित राज्यों की Þोणी में खड़ा देखना आत्मगौरव का विषय नहीं है? 1991 में भारत की अर्थनीति बदल गयी. इन बदली पपरस्थितियों में जिन राज्यों ने खुद को विकसित किया, वे आगे निकल गये. आज कर्नाटक 70,000 करोड़ का आइटी का कारोबार करता है और हिंदी राज्य? लगभग शून्य. इंडिया टूडे प्रतिवर्ष इंडिकस नाम की संस्था से राज्यों की माली हालत, विकास स्थिति या ओर्थक स्थिति पर सर्वे कराता है. इंडिकस के ’90-’91 के ओर्थक सर्वे को याद करें, तो देश के सबसे पिड़े राज्यों में हिंदी राज्यों के साथ-साथ आंध्र भी था. वह भी वर्षो से अत्यंत पिड़ा था. अब काफी आगे है. शासन चाहे चंद्रबाबू नायडू का हो या कांग्रेस के राजशेखर रेड्डी का. आंध्र, राज्यों की विकास सीढ़ी में नीचे से लांग लगा कर ऊपर के ब्रैकेट में पहुंच गया. जानेमाने ब्रिटिश पत्रकार डेनियल लेक ने भारत पर किताब लिखी मंत्राज ऑफ चेंज (परपोर्टिग इंडिया इन ए टाइम ऑफ फ्लक्स). वर्ष 2005 में पेंग्विन/विकिंग ने इसेोपा. उस पुस्तक में बीमारू राज्यों पर एक बड़ा अध्याय है, ब्रेकफास्ट विथ बोस. प्रो आशीष बोस भारत सरकार के डेमोग्राफर इन चीफ रहे हैं. बीमारू अवधारणा के भी जनक और भाष्यकार. उसी डॉ बोस ने डेनियल लेक से बीमारू अवधारणा पर लंबी बातचीत की. 80 के दशक के मध्य में यह अवधारणा उन्होंने विकसित की. डेनियल लेक ने लिखा है कि भारत से बीमारू राज्यों को अलग कर दें (शब्द है, इंडिया माइनस बीमारू, भारत - बीमारू = मध्य वर्ग का देश), तो भारत विकास और अर्थव्यवस्था में मध्य Þोणी का देश बन जायेगा. बीमारू राज्यों के साथ भारत गरीब है. दुनिया के संदर्भ में भारत को देखें, तो सबसे नीचे के पायदानवाले देशों में इन्हीं बीमारू राज्यों के कारण भारत शुमार होता है. अन्य सभी राज्यों को धकेल कर पीे खींच लेते हैं. डेनियल लेक ने कहा है कि ये राज्य विकास के सभी सूचकांकों पर भारत के अन्य राज्यों से पिड़े और पीे हैं. जनसंख्या वृद्धि यहां अनियोजित है. भारत के आधे अशिक्षित यहां रहते हैं. औरतों के मामले में सबसे खराब हैं ये. इनमें सबसे बुरी स्थिति में हैं, बिहार और उत्तरप्रदेश, जहां भारत की 1/5वीं जनसंख्या रहती है. यहां भयानक हिंसा है. लोगों का आपस में विभाजन है. घोर जातिप्रथा है. कुशासन है. आशीष बोस ने डेनियल लेक से कहा, दक्षिण भारत में विकास के इशू पर जाति व्यवस्था अप्रभावी हो गयी है. पर बीमारू, खास तौर से उत्तरप्रदेश और बिहार में यह स्थिति बदतर हुई है. जातिवादी नेता अत्यंत सीमित जनाधार बनाते हैं. औरतों की उपेक्षा करते हैं. इसलिए इनकी यह स्थिति है. 1991 में ही राजस्थान और मध्यप्रदेश बीमारू ब्रैकेट से बाहर निकल रहे थे. प्रो आशीष बोस ने डेनियल लेक से कहा कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कु समय पहले आये थे. उन्होंने मुझसे कहा, आंकड़े देखिए, मध्यप्रदेश में चीजें बेहतर हो रही हैं. विकास हो रहा है. इसलिए अब हमारे राज्य को बीमारू ब्रैकेट से बाहर निकालें. बिहार व अन्य ऐसे बीमारू राज्यों के बारे में इस पुस्तक में लंबा वर्णन है. उसी डेनियल लेक ने वर्ष 2008 में नयी पुस्तक लिखी, इंडिया एक्सप्रेस (द फ्यूचर ऑफ ए न्यू सुपर पावर). यह भी पेंग्विन/ विकिंग नेोपी है. यह ताजा किताब है. इस पुस्तक में भी लगभग 10 पन्न्ो बीमारू प्रसंग में हैं. वह कहते हैं कि इंडियन डेमोग्राफी और सांख्यिकी विेषण के आधार पर डॉ आशीष बोस का सबसे बड़ा अवदान है, बीमारू राज्य की अवधारणा. 80 के दशक में जब प्रो बोस सेंसस के पुराने आंकड़ों का विेषण कर रहे थे, तो उन्होंने पाया कि बीमारू राज्य विकास के सभी मापदंडों पर सबसे पीे थे. मसलन शिक्षा, मातृ मृत्यु दर, जन्म दर, बाल मृत्यु दर, प्रति वर्गमील डॉक्टरों की उपस्थिति वगैरह. पर सबसे खतरनाक संकेत था कि भारत के अन्य राज्यों के लिए यह सूचकांक लगातार बेहतर हो रहे थे, विकास हो रहा था. पर बीमारू राज्य के लिए या तो इन आंकड़ों में (प्रगति) ठहराव आ गया था या वे और बदतर हो रहे थे. प्रो बोस ने बीमारू राज्यों को सब-सहारा अफ्रीका बास्केट केस माना था. महिलाओं और बच्चों की बदतर स्थिति इन राज्यों में थी. इस अवधारणा के बाद बीमारू राज्य के राजनीतिज्ञों ने प्रो बोस की कटु आलोचना की. निंदा की. पर उनकी अवधारणा सही थी. डेनियल लेक इस किताब को लिखने के संदर्भ में बिहार भी आये. वह बिहार के गांवों में गये. जहानाबाद की ओर. उनकी यात्रा जहानाबाद में जेल तोड़ने के कु रोज पहले हुई. वह बोध गया तक गये. नालंदा औैर राजगीर भी देखा. बिहार के संदर्भ में उनकी टिप्पणी-निष्कर्ष अत्यंत गंभीर, सटीक, पर बिहापरयों के झूठे अहं को ठेस पहुंचानेवाले भी हैं. एक जगह वे कहते हैं, बिहार का मुख्य विश्वविद्यालय पटना एक राजनीतिक मजाक था. हथियारबंदोत्रसंघों की जगह. भयभीत अध्यापक जो भय से डिग्री देते हैं. उनकी दृष्टि में बिहार आधुनिक भारत का शर्म है. वह यह भी कहते हैं, कभी प्राचीन बिहार भारत का बौद्धिक और ओर्थक पावरहाउस भी था. वह लिखते हैं कि गंगा के किनारे अच्ी तरह सिंचित होनेवाली उर्वर धरती में आज भी भारत के एक तिहाई लोग रहते हैं. पर आज इसके पवित्र जल के बावजूद यहां दुख, भ्रष्टाचार से ग्रस्त सम्मान व मर्यादा से वंचित जीवन है. वह प्राइमरी स्कूलों के बारे में टिप्पणी करते हैं. मानते हैं कि बिहार को बेहतर करने के लिए बहुत कु किया जाना है और तत्काल किया जाना है. क्या हम बिहारी सिर्फ राजनीतिज्ञों के भरोसे बिहार को ोड़ देंगे? क्या बिहार गढ़ने में जनता की हिस्सेदारी नहीं होगी? हम कब बिहार को एक नयी ऊंचाई पर ले जाने की भूख और भावना से प्रेपरत होंगे? कितने अपमान के बाद? ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़े और फाइनेंसियल टाइम्स के जानेमाने पत्रकार एडवर्ड लूस ने भी भारत के संदर्भ में चर्चित पुस्तक लिखी. इंस्पाइट ऑफ द गॉड (द स्ट-ेंज राइज ऑफ मॉडर्न इंडिया). वर्ष 2006 में यह पुस्तक पी. ग्रेट ब्रिटेन के प्रकाशक लिटिल ब्राउन ने इसेोपा. इस पुस्तक में भी बिहार की चर्चा है. वह कहते हैं कि बिहार उत्तर भारत का सबसे गरीब राज्य है. वे बिहार की घूसखोरी और कुव्यवस्था का उल्लेख करते हैं. स्कूलों में बिजली न होने, अध्यापक न होने और बाथम न होने की चर्चा करते हैं. लूस ने भी बिहार की यात्रा की. वह हैदराबाद से सीधे पटना पहुंचे थे. वह दोनों राज्यों का बहुत जीवंत तुलनात्मक चित्रण करते हैं. बोपरंग रोड का उल्लेख करते हैं कि कैसे एक ब्रिटिश अफसर के नाम पर इसका नाम पड़ा. फिर बिहार की कुव्यवस्था का उल्लेख करते हैं. वह लालू प्रसाद और राबड़ी जी से भी मिले. बिहार के पिड़ने का उन्होंने अपनी पुस्तक में प्राय: उल्लेख किया है. भारत के विकास के संदर्भ में थॉमस एल फ्रिडमैन ने अपनी विश्व चर्चित किताब लिखी, द वर्ल्ड इज फ्लैट (ए ब्रीफ हिस्ट-ी ऑफ द ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी). वर्ष 2005 में न्यूयार्क के फरार, स्ट-ॉस एंड गिरॉक्स ने इस पुस्तक कोोपा. मूलत: दक्षिण के राज्यों में आयी प्रगति व बदलाव के संदर्भ में यह पुस्तक है, पर बीमा राज्यों का इसमें जिक्र नहीं है.बिहार बदलने के लिए जरूरी है कि बिहारी बदलें. कोई सरकार या राजनीति एक सीमा तक विकास का माहौल उपलब्ध करा सकती है, पर बदलना खुद को पड़ेगा.

Saturday, February 7, 2009

तीसरी कसम उर्फ मेरी प्रेम कहानी

(भाग- नौ)- तमाम ब्लागरों को हाज़िर-नाजिर मानते हुए शपथपूर्वक कहता हूं कि जो कहूंगा सच कहूंगा और सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा। इसके साथ ही अपनी पत्नी और दो प्यारे-प्यारे बच्चों से क्षमा भी मांगना चाहूंगा। दरअसल, इन सबकी जरूरत नहीं होती अगर पत्नी ने उकसाया न होता। अपनी गांव यात्रा की पिछली किस्त में मैने अपनी पहली प्रेम कहानी का ज़िक्र क्या कर दिया, मेरी पत्नी ने मुझे ब्लाग पर सबकुछ पूरा-पूरा कह सुनाने की चुनौती दे डाली। उनका कहना है कि ब्लागरों को क्या पता कि आपने क्या-क्या गुल खिलाए हैं। सो, इस गांव यात्रा में ही अपना कबूलनामा घुरपेट रहा हूं। तो मित्रों, मुंगेर में जिस लड़की को मैने ग़ुलाब या कहें कि बिना पंखुड़ियों वाले ग़ुलाब के नाम पर केवल ठूंठ भर भेंट करने की कोशिश की, उसने किसी से भी मेरी शिकायत नहीं की (शुक्र है)। ये जो लड़की थी, इसे लेकर मुझे भ्रम हो गया था। मगर मुझे लेकर उसे कोई भ्रम नहीं था। जाहिर तौर पर वो मुझे कतई पसंद नहीं करती थी..मगर मुझे देखती थी। यही मेरी गफलत का सबब बना। इससे पहले, अहले सुबह एक ख़ास वक्त पर वो अपने दरवाजे के बाहर ब्रश करती और मैं छत पर दातुन करने के बहाने घंटो देखा करता था। कई महीने बस ऐसे ही चलता रहा। इस सिलसिले का भी दर्दनाक अंत हुआ। एकदिन ब्रश करते हुए वो भी ताक रही थी और मैं भी। अचानक लड़की जो है सो उसकी भाव-भंगिमा बदल गई और एक झटके में वो अंदर भाग गई। मैं परेशान होकर उसके घर की तरफ देखने लगा। दो-चार सेकेंड के बाद पीछे से हवाई स्लीपर दनदनाता हुआ मेरे सिर पर पड़ा। घूमकर देखा तो मेरी दीदीया (बड़ी बहन) बड़ी देर से मेरे तमाशे को देख रही थी। और मेरी कारस्तानी पकड़ ली गई थी तो वो आगबबूला हो रही थीं। न तो उसने कुछ कहा और न ही मेरे लिए कोई सफाई देने की गुंजाईश रह गई थी। इसी बीच एक दिलचस्प घटना हुई। उस लड़की को तेज बुखार आया और वो बेहोश हो गई। ...अफरातफरी में उसे रिक्शे में बिठाकर उसकी मां अस्पताल ले गई, जहां वो दो दिनों तक रही। वो अस्पताल जा रही थी, मैं बेचैन हो रहा था। ख्वामख़ाह। मै भी उसके साथ अस्पताल जाना चाहता था...जो संभव नहीं था। कुछ घंटे बाद मेरे नाना और नानीजी भी उसे देखने अस्पताल गए। देर रात लौटे। मैं उनके लौटने के इंतजार में जगा रहा। नानाजी से तो कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई मगर नानीजी से डरते-डरते कहा कि उसे देखने गए थे?...क्या एबार्शन करना पड़ा। नानीजी हैरान। मुझसे पूछा कि एबार्शन का मतलब क्या होता है? मैने कहा कि औरतों को जो बीमारी होती है। नानीजी ने मुझे शांति से समझाया कि एबार्शन क्या होता है....और उस लड़की को एबार्शन नहीं बल्कि तेज बुखार की वजह से गश लगा था। दरअसल, उस वक्त मैं दसवीं में पढ़ता था और पता नही मेरी ये धारणा बन गई कि औरतों को होने वाली तमाम बिमारियों को एबार्शन ही कहते हैं। यानी एबार्शन ही महिलाओं के लिए समस्या की जड़ है। अब सोचकर सिहर जाता हूं कि अगर मैं लड़की की मां से अस्पताल में जाकर ये पूछ बैठता कि एबार्शन संपन्न हो गया....तो क्या होता? खैर, इस लड़की के दिल तोड़ देने की वजह से पूरी उम्र के लिए मेरा आत्मविश्वास डोल गया। लड़कियों से आंखों में आंखें डालकर बात नहीं कर सकता। ....बीबी से जरूर कर लेता हूं।

Wednesday, February 4, 2009

यहां आना न दोबारा

(भाग- आठ)- गांव आए कई दिन हो गए थे। सोचा, थोड़ा वक्त निकालकर मुंगेर चला जाय। मुंगेर यानी ननिहाल। मुंगेर यानी अपने जीवन के कई अहम वर्ष गुजारे। मुंगेर जहां पहली मोहब्बत हुई। लेकिन मुंगेर अबतक मेरे जेहन में इसलिए ज़िंदा है क्योंकि नानाजी की कोई याद अबतक नहीं भूली। मेरे नानाजी छपरा शहर के विश्वेश्वर सेमिनरी स्कूल के प्रिंसिपल के पद पर तक़रीबन अट्ठारह वर्षों की सेवा के बाद रिटायर हुए और बाद में आकर मुंगेर में बस गए। उन्होंने अपना पेशन बेचकर (शायद ऐसा कोई कानूनी प्रावधान है) अपने ख़्वाबों के महल (चार कमरों का एक बड़ा घर) की तामीर की थी। मुंगेर का नयाटोला मोहल्ला। कोई आ जाए तो उत्साह से भरे नानाजी एक -एक कमरा, यहां तक कि शौचालय और पिछवाड़े में खुदवाया कुआं भी दिखाते। बाहर लान में नाना ने खुद ही खुरपी लेकर साफ -सफाई की। वहां अलग-अलग रंगों वाले गुलाब लगाए। मुझे याद है कि इन ग़ुलाबों को लेकर मेरा मन बड़ा ललचाया करता था। घर से थोड़ी दूर रहने वाली एक लड़की कुछेक वर्षों से मुझे देख रही थी...और मै सिर्फ और सिर्फ उसे देख रहा था। लेकिन उससे कुछ कहने की हिम्मत ही न पड़े...नानाजी के कठोर अनुशासन में बंधे होने के बाद भी जब मैट्रिक का रिजल्ट निकला तो कुछ करने की ठान ली। भरोसा था कि फर्स्ट डिविजन से पास हुआ था और लड़की तो न केवल फर्स्ट डिविजन बल्कि भारी-भरकम अंकों से पास हुई थी। मैने एकदिन दोपहर में नानाजी किसी काम से कचहरी गए थे। उनके लान वाला एक ग़ुलाब का फूल एक झटके में तोड़ लिया...फिर लगा इसे रखूं कहां क्योंकि हाथ में गुलाब लेकर उसके यहां जाने की सोच भी नहीं सकता था। इध-उधर देखा। कुछ समझ में नहीं आया तो गुलाब को अपनी हाफपैंट में कमर के पास खोंसकर ऊपर से शर्ट से ढंक लिया। तो जनाब मैं उसके यहां पहंचा तो ग्रिल लगी हुई थी। कालबेल बजाया तो संयोग से वही निकली। आमतौर पर जैसा करती थी...ग्रिल खोलकर अंदर आने को कहती। लेकिन आज में सकपकाया हुआ था। अंदर से हिम्मत जवाब दे रही थी। उसने जब दोबारा अंदर आने का इशारा किया तो मै भी झटके से अंदर नामूदार हो गया। जबतक वो दोबाा ग्रिल बंद करती मैने एक झटके के साथ बिगड़े शाहजादे की तरह गुलाब को निकाल कर उसके सामने कर दिया...हालांकि गुलाब की तमाम पत्तियां झड़ चुकी थी...वो गुलाब तो क्या एक ठूंठ भर रह गया था। मेरे अप्रत्याशित व्यवहार से वो इस कदर नाराज हुई कि मुझे खूब झाड़ लगाई....कहा- अभी तो जैसे-तैसे पास किए हो। पढ़ाई में तुम्हारा दिल लगता नहीं ...लड़कियों को फूल भेंट करते रहते हो। अभी तुम्हारे नानाजी को मैं बताती हूं। ...मेरे लिए तो लगा कि जमीं फट जाए कि आस्मां... मुझपर ऐसा कुदरती कहर टूटे कि मेरा अस्तित्व खत्म हो जाए। भारी मन और नानाजी से शिकायत किए जाने के डर से तुरंत घर लौट आया। तो जनाब, तब से मेरी हिम्मत ऐसी टूटी कि मोहब्बत के नाम पर जीवन में कुछ कर नहीं पाया। अब फिर आते हैं नानाजी पर। नानाजी का स्कूल में कड़ा अनुशासन था। घर में उनकी ऐसी हनक थी कि कई बार उनके सामने मैने पैंट में ही शू-शू कर दिया। मैं जानता था कि राम जाता है का अंग्रेजी अनुवाद राम गोज़ होगा मगर उनके सामने पता नहीं मुंह से निकल जाता राम गो। ...बोलते ही नानाजी फट पड़ते। नानाजी स्कूल और घर में समान रूप से अनुशासन पसंद करते। नानाजी जयप्रकाश नारायण के सहकर्मी रह चुके थे। ...उस वक्त रविवार का शायद संपूर्ण क्रांति अंक छपा था...जिसमें एक पूरे पेज पर जेपी के बगल में एक सभा के दौरान नानाजी की तस्वीर छपी थी। रविवार का ये अंक अबतक हमारे पास है...पता नहीं क्यों? नानाजी का लेख छपा करता था नियमित रूप से प्रदीप में...हम कुछ समझते तो नहीं थे मगर लगता था कि नानाजी बड़े आदमी है। और ऐसे बड़े आदमी से हमेशा डरकर रहन चाहिए। तो साहब, हम और मेरे मामाजी से लेकर नानीजी। तक उनसे पूरी जिंदगी डरते रहे। मगर जब ग़ुजर गए तो हमें पहली बार अहसास हुआ कि हमारे ख़ानदान और मेरे नाते-रिश्तेदारों में (जिनमें बड़े-बड़े पदधारी भी हैं) नानाजी जैसा कद्दावर आदमी दूसरा नहीं था और उनके जैसा ऊंचाईवाला शायद ही कोई हो। सोचते-सोचते काफी देर हो चुकी थी। पिताजी को अपनी इच्छा बताई कि मुंगेर जाना चाहता हूं...उन्होंने भारी मन से कहा कि अब वहां क्या है....न नानाजी न ननिहाल। (जारी)

Sunday, February 1, 2009

सबका आभार

"अपनी गांव यात्रा को सिलसिलेवार ढंग से लिखने का पहले इरादा नहीं था। लेकिन आपकी टिप्पणियों ने मेरा उत्साह बढ़ाया। टिप्पणी करने वालों या फिर इसे पढ़ने वालों, दोनों का तहेदिल से आभार। उम्मीद है, मेरा उत्साह बनाए रखेंगे. धन्यवाद"  - संजीव


दुर्गा माय को खस्सी की बलि



(भाग- सात)------इसबार गांव गया था तो घर पर पहले से इसकी सूचना नहीं दी। मां भौंचक रह गई थी मगर उसने जोर दिया- सुबह से आंगन में कौआ बहुत बोल रहा था तो लगता था कि कोई आने वाला है। दिल्ली से चलते वक्त सोचा किसी ने नहीं देखा मगर कौए ने शायद देख लिया था।...दिल्ली में कौए। दिखते कहां हैं। ऐसे तमाम पक्षी और परिंदे तो बस गांवों की शोभा बनकर रह गए हैं। तो जनाब, कौओं ने हमारे आगमन की पूर्व सूचना दे दी थी। एक रोज गांव में सुबह-सुबह घूमने निकले। गांवों की सुबह शहरों के मुकाबले बिल्कुल अलग होती है। यहां जागिंग करते लोग नहीं मिलेंगे। कुत्तों को दिशा-मैदान कराने वाले पशु प्रेमी भी नहीं मिलेंगे। यहां तो भीषण सर्दी और कोहरे में महज एक मोटी चादर लपेटकर लोटा लिए ठिठुरते लोगों का जत्था देखने को मिलेगा। या फिर खेतों की ओर जा रहे किसान...पशुओं को चारा-पानी देते लोग। वातावरण में कुछ-कुछ गोबर की गंध भी मिलेगी। या फिर कुछ संपन्न घरों के बाहर गोल घेरकर आग सेंकते लोगों का जमावड़ा देखने को मिलेगा। आग सेंकने की ये सामुदायिक व्यवस्था होती है। आग बुझने लगे तो जिसके हाथ में आसपास पड़ी लकड़ी या बेकार पड़े खरपतवार नजर आ जाए...उसे ही जलाकर आग सेंकने की व्यवस्था की जाती है। यहां बैठने वालों की बातें भी बड़ी दिलचस्प होती है। बिल्कुल स्थानीय किस्म की मजेदार गप्पें। एक-दूसरे की लगाई-बुझाई से लेकर जनवितरण प्रणाली के तहत मिलने वाले राशन तक की चिंता यहीं होती है। सुबह आठ बजते-बजते ये मजलिश कब खत्म हो जाती है, शायद ही किसी को पता चलता हो। सब अपने-अपने काम पर निकल पड़ते हैं...आग भी धीरे-धीरे बुझकर राख में तब्दील हो जाती है। सुबह घूमने के समय नीलकंठ पर नजर पड़ी। ताड़ के पेड़ पर तीन-चार नीलकंठ शोर मचा रहे थे। नीलकंठ एक चिड़िया है जिसे नीलकंठ महादेव का प्रतिनिधि माना जाता है। इसे देखना काफी शुभ होता है...इसके गले के पास सुर्ख नीला रंग होता है और इसकी आवाज बड़ी तीखी होती है। कोई शुभ काम करने के लिए घर से निकलते नीलकंठ दिख जाए तो काम पूरा होने की तक़रीबन गारंटी हो जाती है- ये लोक मान्यता है। आज वर्षों बाद इस परिंदे को देख दिल वाकई हरा-भरा हो गया। वैसे, हमारे इलाके कई जानवर हैं जो अब तो शायद ही कहीं दिखते हैं। गीदड़ की शक्ल का खिखीर...उदबिलाव, गोह्य, बिज्जी ऐसे ही जानवर हैं। गिलहरी भी बहुत ज्यादा होती है...एक घुमतूं जाति के लोग इस गिलहरी को मारकर खाते भी हैं...मन बड़ा भिनक जाता है। तो इलाके में इस घमंतु जाति ने गिलहरियों की तादाद जरूर कम कर दी है। वैसे, हमारे इलाके में बड़े विषधर सांप भी पाए जाते हैं। कहते हैं कि हमारा गांव सांपों के डीह (ठीया) पर बना है इसलिए बड़े-बड़े बिषधर सांप मिलते हैं। मगर कमाल देखिये सांप ने कभी भी गांव वालों का कुछ नहीं बिगाड़ा...गांववालों ने भले ही बड़े-बड़े सांपों को माप दिया हो। मान्यता है कि इलाके में नागपंचमी होने की वजह से नाग बाबा की खास कृपा लोगों पर है। नागपंचमी का उत्सव भी देखने लायक होता है....जिस मंदिर में इसका उत्सव होता है, उसके पुजारी यानी भगत पर भूत आता है (भूत-प्रेत दिखाने वाले खबरिया चैनलों के लिए यहां एक बढ़िया स्क्रिप्ट तैयार है।) -वहीं पूजा संपन्न कराते हैं। यहां मेला लगता है जिसमें दंगल होता है। डंके की चोट पर स्थायनीय पहलवान ताल ठोंकते हैं...कई तो बस लोगों के चढ़ाने पर अखाड़े में कूद जाते हैं। सामने मजबूत पहलवान हुआ तो ऐसों को भरदम मारता है।...पब्लिक का उत्साह बढ़ता है और शोर मचाती है। ईनाम में दस-बीस टका देने की घोषणा कर देती है। मंदिर के बाहर बलि पड़ती है। बलि के दो मौके आते हैं। एक दुर्गा मेला में और दूसरे नागपंचमी पर। मुराद पूरी होने पर खस्सी (बकरे) की बलि दी जाती है। कभी-कभी अब लगता है कि भगवानों की भी अपनी टीआरपी होती है। कभी संतोषी माता...कभी बजरंग बलि तो कभी शनि और अब साईं। मगर हमारे गांव और इलाके का हाल दूसरा है। यहां के भगवानों की टीआरपी जमाने में खास नहीं है और न ही पुजारी के नाम पर इन भगवानों के अलग-अलग विशेषज्ञ। हमारे यहां देवियों की पूजा ज्यादा होती है। महादेव, गणेश, श्रीराम जैसे देवताओं को लेकर श्रद्धा तो खूब है लेकिन काली, दुर्गा, कामा माय, संतोषी माता जैसी देवियों को लेकर ख़ासी श्रद्धा देखने को मिलती है। हमें गर्व होता है सोचकर कि हमारा समाज देवी पूजक है...यहां कन्या भ्रूण हत्या जैसे मामले शायद कभी नहीं हुए। न ही लड़की भगा ले जाने जैसी घटनाएं आम हैं। ...हमारे समाज में यौन अपराध किसी का खून करने से बड़ा जुर्म है। ...अब देखना ये है कि हमारी ये सामाजिक चाल कबतक व्यवस्थित रह पाती है। (जारी)