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Sunday, February 1, 2009

दुर्गा माय को खस्सी की बलि



(भाग- सात)------इसबार गांव गया था तो घर पर पहले से इसकी सूचना नहीं दी। मां भौंचक रह गई थी मगर उसने जोर दिया- सुबह से आंगन में कौआ बहुत बोल रहा था तो लगता था कि कोई आने वाला है। दिल्ली से चलते वक्त सोचा किसी ने नहीं देखा मगर कौए ने शायद देख लिया था।...दिल्ली में कौए। दिखते कहां हैं। ऐसे तमाम पक्षी और परिंदे तो बस गांवों की शोभा बनकर रह गए हैं। तो जनाब, कौओं ने हमारे आगमन की पूर्व सूचना दे दी थी। एक रोज गांव में सुबह-सुबह घूमने निकले। गांवों की सुबह शहरों के मुकाबले बिल्कुल अलग होती है। यहां जागिंग करते लोग नहीं मिलेंगे। कुत्तों को दिशा-मैदान कराने वाले पशु प्रेमी भी नहीं मिलेंगे। यहां तो भीषण सर्दी और कोहरे में महज एक मोटी चादर लपेटकर लोटा लिए ठिठुरते लोगों का जत्था देखने को मिलेगा। या फिर खेतों की ओर जा रहे किसान...पशुओं को चारा-पानी देते लोग। वातावरण में कुछ-कुछ गोबर की गंध भी मिलेगी। या फिर कुछ संपन्न घरों के बाहर गोल घेरकर आग सेंकते लोगों का जमावड़ा देखने को मिलेगा। आग सेंकने की ये सामुदायिक व्यवस्था होती है। आग बुझने लगे तो जिसके हाथ में आसपास पड़ी लकड़ी या बेकार पड़े खरपतवार नजर आ जाए...उसे ही जलाकर आग सेंकने की व्यवस्था की जाती है। यहां बैठने वालों की बातें भी बड़ी दिलचस्प होती है। बिल्कुल स्थानीय किस्म की मजेदार गप्पें। एक-दूसरे की लगाई-बुझाई से लेकर जनवितरण प्रणाली के तहत मिलने वाले राशन तक की चिंता यहीं होती है। सुबह आठ बजते-बजते ये मजलिश कब खत्म हो जाती है, शायद ही किसी को पता चलता हो। सब अपने-अपने काम पर निकल पड़ते हैं...आग भी धीरे-धीरे बुझकर राख में तब्दील हो जाती है। सुबह घूमने के समय नीलकंठ पर नजर पड़ी। ताड़ के पेड़ पर तीन-चार नीलकंठ शोर मचा रहे थे। नीलकंठ एक चिड़िया है जिसे नीलकंठ महादेव का प्रतिनिधि माना जाता है। इसे देखना काफी शुभ होता है...इसके गले के पास सुर्ख नीला रंग होता है और इसकी आवाज बड़ी तीखी होती है। कोई शुभ काम करने के लिए घर से निकलते नीलकंठ दिख जाए तो काम पूरा होने की तक़रीबन गारंटी हो जाती है- ये लोक मान्यता है। आज वर्षों बाद इस परिंदे को देख दिल वाकई हरा-भरा हो गया। वैसे, हमारे इलाके कई जानवर हैं जो अब तो शायद ही कहीं दिखते हैं। गीदड़ की शक्ल का खिखीर...उदबिलाव, गोह्य, बिज्जी ऐसे ही जानवर हैं। गिलहरी भी बहुत ज्यादा होती है...एक घुमतूं जाति के लोग इस गिलहरी को मारकर खाते भी हैं...मन बड़ा भिनक जाता है। तो इलाके में इस घमंतु जाति ने गिलहरियों की तादाद जरूर कम कर दी है। वैसे, हमारे इलाके में बड़े विषधर सांप भी पाए जाते हैं। कहते हैं कि हमारा गांव सांपों के डीह (ठीया) पर बना है इसलिए बड़े-बड़े बिषधर सांप मिलते हैं। मगर कमाल देखिये सांप ने कभी भी गांव वालों का कुछ नहीं बिगाड़ा...गांववालों ने भले ही बड़े-बड़े सांपों को माप दिया हो। मान्यता है कि इलाके में नागपंचमी होने की वजह से नाग बाबा की खास कृपा लोगों पर है। नागपंचमी का उत्सव भी देखने लायक होता है....जिस मंदिर में इसका उत्सव होता है, उसके पुजारी यानी भगत पर भूत आता है (भूत-प्रेत दिखाने वाले खबरिया चैनलों के लिए यहां एक बढ़िया स्क्रिप्ट तैयार है।) -वहीं पूजा संपन्न कराते हैं। यहां मेला लगता है जिसमें दंगल होता है। डंके की चोट पर स्थायनीय पहलवान ताल ठोंकते हैं...कई तो बस लोगों के चढ़ाने पर अखाड़े में कूद जाते हैं। सामने मजबूत पहलवान हुआ तो ऐसों को भरदम मारता है।...पब्लिक का उत्साह बढ़ता है और शोर मचाती है। ईनाम में दस-बीस टका देने की घोषणा कर देती है। मंदिर के बाहर बलि पड़ती है। बलि के दो मौके आते हैं। एक दुर्गा मेला में और दूसरे नागपंचमी पर। मुराद पूरी होने पर खस्सी (बकरे) की बलि दी जाती है। कभी-कभी अब लगता है कि भगवानों की भी अपनी टीआरपी होती है। कभी संतोषी माता...कभी बजरंग बलि तो कभी शनि और अब साईं। मगर हमारे गांव और इलाके का हाल दूसरा है। यहां के भगवानों की टीआरपी जमाने में खास नहीं है और न ही पुजारी के नाम पर इन भगवानों के अलग-अलग विशेषज्ञ। हमारे यहां देवियों की पूजा ज्यादा होती है। महादेव, गणेश, श्रीराम जैसे देवताओं को लेकर श्रद्धा तो खूब है लेकिन काली, दुर्गा, कामा माय, संतोषी माता जैसी देवियों को लेकर ख़ासी श्रद्धा देखने को मिलती है। हमें गर्व होता है सोचकर कि हमारा समाज देवी पूजक है...यहां कन्या भ्रूण हत्या जैसे मामले शायद कभी नहीं हुए। न ही लड़की भगा ले जाने जैसी घटनाएं आम हैं। ...हमारे समाज में यौन अपराध किसी का खून करने से बड़ा जुर्म है। ...अब देखना ये है कि हमारी ये सामाजिक चाल कबतक व्यवस्थित रह पाती है। (जारी)

3 comments:

सतीश पंचम said...

रोचक विवरण।

Brijesh Dwivedi said...

मजा आ गया.. आपकी पोस्ट बहुत अच्छी लगी...।
ब्रजेश द्विवेदी

rajan said...

कई दिन से आपको पढ़ रेरा हू आप बहुत अच्छा लिखते हैं१ गाओं की यात्रा का वर्णन बहुत अच्छा लग रहा है१ आज पहली बार ही मैं कुछ भी लिख रहा हू इसलिये इसे मेरी तरफ से शुभकामना समझिए १ और उस खास बात के लिए बधाई जो आपने मुझे नही बताई
राजन अग्रवाल