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Wednesday, February 4, 2009

यहां आना न दोबारा

(भाग- आठ)- गांव आए कई दिन हो गए थे। सोचा, थोड़ा वक्त निकालकर मुंगेर चला जाय। मुंगेर यानी ननिहाल। मुंगेर यानी अपने जीवन के कई अहम वर्ष गुजारे। मुंगेर जहां पहली मोहब्बत हुई। लेकिन मुंगेर अबतक मेरे जेहन में इसलिए ज़िंदा है क्योंकि नानाजी की कोई याद अबतक नहीं भूली। मेरे नानाजी छपरा शहर के विश्वेश्वर सेमिनरी स्कूल के प्रिंसिपल के पद पर तक़रीबन अट्ठारह वर्षों की सेवा के बाद रिटायर हुए और बाद में आकर मुंगेर में बस गए। उन्होंने अपना पेशन बेचकर (शायद ऐसा कोई कानूनी प्रावधान है) अपने ख़्वाबों के महल (चार कमरों का एक बड़ा घर) की तामीर की थी। मुंगेर का नयाटोला मोहल्ला। कोई आ जाए तो उत्साह से भरे नानाजी एक -एक कमरा, यहां तक कि शौचालय और पिछवाड़े में खुदवाया कुआं भी दिखाते। बाहर लान में नाना ने खुद ही खुरपी लेकर साफ -सफाई की। वहां अलग-अलग रंगों वाले गुलाब लगाए। मुझे याद है कि इन ग़ुलाबों को लेकर मेरा मन बड़ा ललचाया करता था। घर से थोड़ी दूर रहने वाली एक लड़की कुछेक वर्षों से मुझे देख रही थी...और मै सिर्फ और सिर्फ उसे देख रहा था। लेकिन उससे कुछ कहने की हिम्मत ही न पड़े...नानाजी के कठोर अनुशासन में बंधे होने के बाद भी जब मैट्रिक का रिजल्ट निकला तो कुछ करने की ठान ली। भरोसा था कि फर्स्ट डिविजन से पास हुआ था और लड़की तो न केवल फर्स्ट डिविजन बल्कि भारी-भरकम अंकों से पास हुई थी। मैने एकदिन दोपहर में नानाजी किसी काम से कचहरी गए थे। उनके लान वाला एक ग़ुलाब का फूल एक झटके में तोड़ लिया...फिर लगा इसे रखूं कहां क्योंकि हाथ में गुलाब लेकर उसके यहां जाने की सोच भी नहीं सकता था। इध-उधर देखा। कुछ समझ में नहीं आया तो गुलाब को अपनी हाफपैंट में कमर के पास खोंसकर ऊपर से शर्ट से ढंक लिया। तो जनाब मैं उसके यहां पहंचा तो ग्रिल लगी हुई थी। कालबेल बजाया तो संयोग से वही निकली। आमतौर पर जैसा करती थी...ग्रिल खोलकर अंदर आने को कहती। लेकिन आज में सकपकाया हुआ था। अंदर से हिम्मत जवाब दे रही थी। उसने जब दोबारा अंदर आने का इशारा किया तो मै भी झटके से अंदर नामूदार हो गया। जबतक वो दोबाा ग्रिल बंद करती मैने एक झटके के साथ बिगड़े शाहजादे की तरह गुलाब को निकाल कर उसके सामने कर दिया...हालांकि गुलाब की तमाम पत्तियां झड़ चुकी थी...वो गुलाब तो क्या एक ठूंठ भर रह गया था। मेरे अप्रत्याशित व्यवहार से वो इस कदर नाराज हुई कि मुझे खूब झाड़ लगाई....कहा- अभी तो जैसे-तैसे पास किए हो। पढ़ाई में तुम्हारा दिल लगता नहीं ...लड़कियों को फूल भेंट करते रहते हो। अभी तुम्हारे नानाजी को मैं बताती हूं। ...मेरे लिए तो लगा कि जमीं फट जाए कि आस्मां... मुझपर ऐसा कुदरती कहर टूटे कि मेरा अस्तित्व खत्म हो जाए। भारी मन और नानाजी से शिकायत किए जाने के डर से तुरंत घर लौट आया। तो जनाब, तब से मेरी हिम्मत ऐसी टूटी कि मोहब्बत के नाम पर जीवन में कुछ कर नहीं पाया। अब फिर आते हैं नानाजी पर। नानाजी का स्कूल में कड़ा अनुशासन था। घर में उनकी ऐसी हनक थी कि कई बार उनके सामने मैने पैंट में ही शू-शू कर दिया। मैं जानता था कि राम जाता है का अंग्रेजी अनुवाद राम गोज़ होगा मगर उनके सामने पता नहीं मुंह से निकल जाता राम गो। ...बोलते ही नानाजी फट पड़ते। नानाजी स्कूल और घर में समान रूप से अनुशासन पसंद करते। नानाजी जयप्रकाश नारायण के सहकर्मी रह चुके थे। ...उस वक्त रविवार का शायद संपूर्ण क्रांति अंक छपा था...जिसमें एक पूरे पेज पर जेपी के बगल में एक सभा के दौरान नानाजी की तस्वीर छपी थी। रविवार का ये अंक अबतक हमारे पास है...पता नहीं क्यों? नानाजी का लेख छपा करता था नियमित रूप से प्रदीप में...हम कुछ समझते तो नहीं थे मगर लगता था कि नानाजी बड़े आदमी है। और ऐसे बड़े आदमी से हमेशा डरकर रहन चाहिए। तो साहब, हम और मेरे मामाजी से लेकर नानीजी। तक उनसे पूरी जिंदगी डरते रहे। मगर जब ग़ुजर गए तो हमें पहली बार अहसास हुआ कि हमारे ख़ानदान और मेरे नाते-रिश्तेदारों में (जिनमें बड़े-बड़े पदधारी भी हैं) नानाजी जैसा कद्दावर आदमी दूसरा नहीं था और उनके जैसा ऊंचाईवाला शायद ही कोई हो। सोचते-सोचते काफी देर हो चुकी थी। पिताजी को अपनी इच्छा बताई कि मुंगेर जाना चाहता हूं...उन्होंने भारी मन से कहा कि अब वहां क्या है....न नानाजी न ननिहाल। (जारी)

4 comments:

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छी अच्‍छी यादों को समेटा है.....अच्‍छा संस्‍मरण लिखा है।

ashish said...

humko pata nahi chala kabhi ki aap itna achcha likhte hain, har article pehle wale se behtar hota ja raha hai, isko choriyega nahi

Jayant said...

यादों के गलियारे मे चहलकदमी करना कभी खुशी देता है तो कभी गम.... लेकिन अपनी कमजोरियों को लोगों के सामने खुल्लमखुल्ला कबूल करना और उन यादों को याद कर खुद पर ही मुस्कुराना निश्चित ही बड़ा काम है.... इसके लिए बधाई.....।
अगली कड़ी का इंतजार रहेगा.... जानना हम भी चाहेगें कि कैसी रही मुंगेर यात्रा.... क्या सामने वाली लड़की ने सचमुच कर दी थी नानाजी से शिकायत.... और क्या फिर से कभी मुलाकात हुई अपने पहले प्यार से.....।।।।

manish said...

आपके जीवन के मधुर अनुभव को जानने को मिल रहा है|आपकी सच्चाई ही आपका लेखनी है|बस लिखते रहे|