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Saturday, February 7, 2009

तीसरी कसम उर्फ मेरी प्रेम कहानी

(भाग- नौ)- तमाम ब्लागरों को हाज़िर-नाजिर मानते हुए शपथपूर्वक कहता हूं कि जो कहूंगा सच कहूंगा और सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा। इसके साथ ही अपनी पत्नी और दो प्यारे-प्यारे बच्चों से क्षमा भी मांगना चाहूंगा। दरअसल, इन सबकी जरूरत नहीं होती अगर पत्नी ने उकसाया न होता। अपनी गांव यात्रा की पिछली किस्त में मैने अपनी पहली प्रेम कहानी का ज़िक्र क्या कर दिया, मेरी पत्नी ने मुझे ब्लाग पर सबकुछ पूरा-पूरा कह सुनाने की चुनौती दे डाली। उनका कहना है कि ब्लागरों को क्या पता कि आपने क्या-क्या गुल खिलाए हैं। सो, इस गांव यात्रा में ही अपना कबूलनामा घुरपेट रहा हूं। तो मित्रों, मुंगेर में जिस लड़की को मैने ग़ुलाब या कहें कि बिना पंखुड़ियों वाले ग़ुलाब के नाम पर केवल ठूंठ भर भेंट करने की कोशिश की, उसने किसी से भी मेरी शिकायत नहीं की (शुक्र है)। ये जो लड़की थी, इसे लेकर मुझे भ्रम हो गया था। मगर मुझे लेकर उसे कोई भ्रम नहीं था। जाहिर तौर पर वो मुझे कतई पसंद नहीं करती थी..मगर मुझे देखती थी। यही मेरी गफलत का सबब बना। इससे पहले, अहले सुबह एक ख़ास वक्त पर वो अपने दरवाजे के बाहर ब्रश करती और मैं छत पर दातुन करने के बहाने घंटो देखा करता था। कई महीने बस ऐसे ही चलता रहा। इस सिलसिले का भी दर्दनाक अंत हुआ। एकदिन ब्रश करते हुए वो भी ताक रही थी और मैं भी। अचानक लड़की जो है सो उसकी भाव-भंगिमा बदल गई और एक झटके में वो अंदर भाग गई। मैं परेशान होकर उसके घर की तरफ देखने लगा। दो-चार सेकेंड के बाद पीछे से हवाई स्लीपर दनदनाता हुआ मेरे सिर पर पड़ा। घूमकर देखा तो मेरी दीदीया (बड़ी बहन) बड़ी देर से मेरे तमाशे को देख रही थी। और मेरी कारस्तानी पकड़ ली गई थी तो वो आगबबूला हो रही थीं। न तो उसने कुछ कहा और न ही मेरे लिए कोई सफाई देने की गुंजाईश रह गई थी। इसी बीच एक दिलचस्प घटना हुई। उस लड़की को तेज बुखार आया और वो बेहोश हो गई। ...अफरातफरी में उसे रिक्शे में बिठाकर उसकी मां अस्पताल ले गई, जहां वो दो दिनों तक रही। वो अस्पताल जा रही थी, मैं बेचैन हो रहा था। ख्वामख़ाह। मै भी उसके साथ अस्पताल जाना चाहता था...जो संभव नहीं था। कुछ घंटे बाद मेरे नाना और नानीजी भी उसे देखने अस्पताल गए। देर रात लौटे। मैं उनके लौटने के इंतजार में जगा रहा। नानाजी से तो कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई मगर नानीजी से डरते-डरते कहा कि उसे देखने गए थे?...क्या एबार्शन करना पड़ा। नानीजी हैरान। मुझसे पूछा कि एबार्शन का मतलब क्या होता है? मैने कहा कि औरतों को जो बीमारी होती है। नानीजी ने मुझे शांति से समझाया कि एबार्शन क्या होता है....और उस लड़की को एबार्शन नहीं बल्कि तेज बुखार की वजह से गश लगा था। दरअसल, उस वक्त मैं दसवीं में पढ़ता था और पता नही मेरी ये धारणा बन गई कि औरतों को होने वाली तमाम बिमारियों को एबार्शन ही कहते हैं। यानी एबार्शन ही महिलाओं के लिए समस्या की जड़ है। अब सोचकर सिहर जाता हूं कि अगर मैं लड़की की मां से अस्पताल में जाकर ये पूछ बैठता कि एबार्शन संपन्न हो गया....तो क्या होता? खैर, इस लड़की के दिल तोड़ देने की वजह से पूरी उम्र के लिए मेरा आत्मविश्वास डोल गया। लड़कियों से आंखों में आंखें डालकर बात नहीं कर सकता। ....बीबी से जरूर कर लेता हूं।

1 comment:

निखिल आनन्द गिरि said...

बढिया आलेख....
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