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Monday, February 9, 2009

मानस बदले, तो बिहार बदले !!

श्री हरिवंश जी प्रभात ख़बर के संपादक हैं । आज सुबह प्रभात ख़बर में उनका लेख पढ़कर तकरीबन १३ वर्षों बाद फोन किया और इसे ब्लॉग पर प्रकाशित करने की इजाजत ली।

यह निष्कर्ष पढ़ते हुए बीस वर्ष पहले का एक दृश्य मन में घूम गया. मुंबई की बात है. मित्र राहल देवजी, जनसत्ता (मुंबई) में संपादक थे. वे, धर्मयुग के दिनों के पुराने हमसफ़र अनुराग और हम, साथ बैठ कर चाय पी रहे थे. वहीं पहली बार बीमारू राज्यों को लेकर लंबी चर्चा हई. बीमारू यानी जो बीमार है. साथ ही बीमारू को अंगरेजी शब्दों में लिखें (इखचअठण), तो इसका अर्थ निकलेगा बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तरप्रदेश. तब इस अवधारणा के जनक प्रो आशीष बोस की किताब आयी थी. राहलजी ने ही पुस्तक का उल्लेख किया. आज पत्रकारों का पढ़ाई से त्तीस का परश्ता है, पर राहलजी या अनुरागजी अपने समय के प्रति अत्यंत सजग रहे हैं. पढ़नेवाले. दुनिया में हो रही नयी चीजों से ताल्लक रखनेवाले. उस बैठक से उठ कर तुरंत वह पुस्तक खरीदी. शायद ऑक्सफ़ोर्ड से छपी थी. वषाब बाद राहलजी से उस पुस्तक पर बात हई. कहा, नारायणदत्त तिवारी भारत सरकार के वित्त मंत्री थे, तो वह पुस्तक मुझसे ले गये. नहीं लौटायी. पर इस विषय पर िहदी पट्टी के राजनेताओं को ‘अवेयर व एडूकेट’ (जागरूक करने, प्रशिक्षित करने) करने का काम हआ. ले मैन लैंग्वेज (जनभाषा) में कहें, तो बीमार राज्य, जो पिछड़ेपन के दुश्चक्र में फ़ंस कर बीमार हैं, बढ़ नहीं पा रहे. इस दुश्चक्र से निकल नहीं पा रहे. तब से इस विषय पर लगातार सुनना, संवाद व जानना होता रहा. 1990 के आसपास सूचना आयी कि योजना आयोग के अनुसार मध्यप्रदेश और राजस्थान बीमारू अवधारणा से निकल गये हैं. बचे हैं, बिहार और उत्तरप्रदेश. जो बंट कर फ़िर चार हो गये, बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश और उत्तरांचल. विशेषज्ञ कहते हैं कि ये चारों बीमार ही हैं. 80 के दशक में ही महाराष्ट- और केरल के सेकुलर बुद्धिजीवी और विचारक सवाल उठाते थे कि आगे बढ़ते राज्य या संपन्न मुंबई, गरीब राज्यों का खर्च क्यों उठायें? सेंट-ल पूल (आयकर वगैरह से होनेवाली आमद) से गरीबी के आधार पर क्यों केंद्र गरीब राज्यों को विकास के लिए अधिक धन दे? चंद्रबाबू नायडू जब मुख्यमंत्री थे, तो उन्होंने नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल की बैठक में बार-बार यह सवाल उठाया कि जो राज्य अपने सुशासन या प्रगति के कारण अधिक कमाई कर रहे हैं या राजस्व उगाह रहे हैं, केंद्र उसे लेकर गरीब राज्यों को विकास के लिए क्यों देता है? उनके कहने का आशय साफ़ था. कमाई हमारी, खर्च दूसरों के विकास पर क्यों? उन्होंने बीमारू राज्यों का नाम लिया (बिहार का भी). कहा कि जो राज्य शासन में इफ़िशियेंट नहीं हैं, जो अपनी जनसंख्या नियंत्रित नहीं कर पा रहे, जो गरीबी रेखा से नीचे रहे लोगों को उठा नहीं पा रहे, जो अपने यहां विकास नहीं कर पा रहे, भ्रष्टाचार नहीं रोक पा रहे, उनके कुशासन की कीमत हम विकसित या आगे बढ़ते राज्य क्यों दें? शिवसेना के बाल ठाकरे या अब राज ठाकरे के पूरे आंदोलन का मर्म यही है. ये दोनों क्रूड (भदेस) हैं, नहीं तो सुसंस्कृत शब्दों में यह सवाल बार-बार उठते रहे हैं कि इन बीमार राज्यों के विकास की जिम्मेदारी जिन राजनेताओं के कंधे पर रही है, अगर वे अपनी अक्षमता, अकुशलता और इनइफ़िशियेंसी से कुछ नहीं कर पा रहे हैं, तो उसकी कीमत दूसरे राज्य क्यों चुकायें? 1980 के आसपास मराठी के जानेमाने संपादक और विचारक, माधव गडकरी ने मराठी के सबसे बड़े समाचार पत्र में किस्तों में लेख लिख कर यह सवाल उठाया था. आज महाराष्ट- या असम से लगातार बिहारी-झारखंडी भगाओ आंदोलन की खबरें आती हैं. इस गंभीर सवाल का मूल्यांकन, दो दृष्टि से होना चाहिए. पहला, भारत संघ की एकता की दृष्टि से. गरीब राज्यों के प्रति इस दृष्टि से, देश की एकता और अखंडता पर सवाल उठ सकते हैं. यह भी सच है कि उत्तरप्रदेश, बिहार और बंगाल समेत पूर्वी राज्यों के विकास के बगैर भारत आगे नहीं बढ़ सकता. इसलिए इन राज्यों का विकास ही भारत के हित में है. पर दूसरी दृष्टि,खुद इन राज्यों के हित में है, अपना विकास करना. अपनी तकदीर खुद बनानी होगी. यथार्थ यह है कि कोई राज्य एक सीमा से आगे, दूसरे राज्य के लोगों को शरण नहीं दे सकता. यह व्यावहापरक नहीं है. हर राज्य खुद आगे बढ़े, ताकि उस राज्य के लोग कहीं शरणार्थी न माने जायें. यह भारत संघ की एकता के लिए सबसे अनिवार्य शर्त है. इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में एसोचेम की रपट का मूल्यांकन होना चाहिए. बिहार, बीमारू राज्यों के दायरे से निकला या नहीं निकला, इस बहस के पहले यह देखना चाहिए कि छह दशकों में पहली बार बिहार को बीमारू से बाहर माना गया. यह निष्कर्ष किसी साधारण व्यक्ति या संस्था का नहीं है. यह एसोचेम परसर्च ब्यूरो द्वारा तैयार रपट है. इसे तैयार किया है नुसरत अहमद और एसोचेम परसर्च ब्यूरो ने. यह परपोर्ट है ‘एसोचेम इन्वेस्टमेंट मीटर’ (एसोचेम निवेश सूची). परपोर्ट के नीचे उल्लेख है, शिफ्टिंग इनवेस्टमेंट डेस्टीनेशंस (निवेश के बदलते गंतव्य). यह एक तिमाही के निवेश पैटर्न (पद्धति) का आकलन है. अगर हम सचेत नहीं रहे, हड़ताल, बंद, अव्यवस्था जैसी चीजें चलती रहीं, तो यह पैटर्न, अगले तिमाही में बदल सकता है. बिहार, फिर बीमा ब्रैकेट में ही रहेगा. यह चेंज एक अवसर है, अपनी नियति बदलने का. यह निवेश आंकड़ा फ्रेजाइल (अस्थिर) तत्व है. अगर हम जी-जान से अपनी तकदीर संवारने में लगें, तो यह स्थायी भी बन सकता है.एसोचेम का निष्कर्ष वित्तीय वर्ष 2008-09 के तीसरे तिमाही का है. इसलिए यह संकेत भर (फ्रेजाइल) है. अगर यह स्थिति लगातार बनी रही, वषाब बनी रही, तब बिहार बीमारू ब्रैकेट (समूह) से बाहर निकलेगा. एसोचेम की इस परपार्ट का सारांश है कि वर्ष 2008-09 के तीसरे तिमाही में सिर्फ़ चार राज्यों ने पोजिटिव ग्रोथ (सकारात्मक प्रगति) की है. इसमें राजस्थान, पहले स्थान पर है, 245 फ़ीसदी के साथ. बिहार दूसरे नंबर पर है, 100 फ़ीसदी के साथ. फ़िर पंजाब (41.6 फ़ीसदी) और उत्तरप्रदेश (26.8 फ़ीसदी) हैं. परपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि बुनियादी संरचनाओं से रहित राज्य बिहार पिछले वित्तीय वर्ष (2007-08) के तीसरे तिमाही तक कारपोरेट निवेश आकर्षित नहीं कर पा रहा था. पर राज्य सरकार के विकासोन्मुख प्रयासों के कारण, भारतीय उद्योगपति शिक्षा, आइटी वगैरह क्षेत्रों में 304 करोड़ के आसपास राशि चालू वित्तीय वर्ष के तीसरे तिमाही में निवेश करने की तैयारी में हैं. यह परपोर्ट और निष्कर्ष अपने आप में बिहार के लिए गौरव का विषय होना चाहिए. पहली बार बिहार को बीमारू नहीं कहने की बात, अपने आप में प्रेरक है. जश्न और उत्सव का विषय है. बिहार बदल सकता है, बिहार बढ़ सकता है और बिहार विकसित हो सकता है. कम से कम इसकी झलक तो मिली. दरअसल बिहार के खिलाफ़ महाराष्ट- और असम वगैरह में हो रहे आंदोलनों का रचनात्मक जवाब बिहार का यह विकास ही है. भारत को संदेश देना, अपने रचनात्मक कमाब से यह साबित करना कि हम भी बढ़ सकते हैं. विकसित हो सकते हैं, यह बिहार का जवाब होना चाहिए. दुनिया के जो मुल्क आज प्रगति की सीढ़ी पर सबसे आगे खड़े हैं, उनका अतीत देखिए. जिन लोगों ने अत्यंत विपरीत पपरस्थितियों में सफ़लता की चोटी पर पहंच कर यश अर्जित किया है, उनका इतिहास पलटिए. रामायण का प्रसंग याद कपरए, जब हनुमानजी को यह अहसास कराया गया कि उनकी क्षमता क्या है, वह कैसे समुद्र लांघ सकते हैं. ऐसे अनंत प्रकरण हैं. इन सबमें कॉमन फ़ैक्टर (समान कारक) एक है. वह है, मोटिवेशन (प्रेरणा). ‘हम होंगे कामयाब’ गाने का मर्म क्या है? जिसने देशों का इतिहास बदला, निजीजिंदगियों में विश्वास और आस्था भरा. नयी राह दिखायी. इसलिए बिहार और बिहापरयों को इस निष्कर्ष को गहराई से समझना चाहिए. नयी पहल की कोशिश करनी चाहिए. बिहार बीमारू के घेरे से निकल सकता है, लगभग चार दशकों में यह पहली बार साबित हआ है. यह घटना बिहापरयों को रोमांचित करे, नयी उड़ान के लिए ऊर्जा भरे, नये उत्साह से लोग अपने कर्म में लगें, यह होना चाहिए. इस स्थिति का बुनियादी Þोय नीतीश कुमार की सरकार को है. पर एक महत्वपूर्ण घटना बिहार में हो रही है, जिस पर बिहापरयों को गौर करना चाहिए. वह घटना क्या है? यह कंपटीटिव पालिटिक्स (स्पर्धात्मक राजनीति) का दौर है. बिहार की राजनीति का एजेंडा अब विकास बन गया है. और बिहार के तीनों बड़े नेता लालूजी, रामविलासजी और नीतीशजी ने पिछले कुछेक वषाब में बिहार के विकास के जितने प्रयास किये हैं, उनको एक जगह जोड़ कर देखना चाहिए. लालूजी ने जितनी रेलें चलायीं. रामविलासजी ने बरौनी में कारखाना खुलवाया. झारखंड-बिहार में अनेक बड़े प्रोजेक्ट शुरू करवाये. हेल्थ कैंप लगवाया. इन सबका असर भविष्य में दिखायी देगा. नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति का एजेंडा ही बदल दिया है. विकास अब नारा या मुद्दा नहीं भूख है. एसोचेम की परपोर्ट को गहराई से देखें, तो स्पष्ट होगा कि नीतीश सरकार ने बिहार को एजुकेशनल हब बनाने की जो कोशिश की, उसके सुखद पपरणाम कैसे दिखने लगे हैं? एसोचेम की परपोर्ट के अनुसार निवेश में विकास की दृष्टि से चार टॉप स्टेट (इस वित्तीय वर्ष के तिमाही में) हैं. उनमें बिहार दूसरे नंबर पर है. जो झारखंड खनिज संपदा की दृष्टि से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में माना जाता है, उसकी क्या दुर्गति है? वहां निवेश में -98.78 फ़ीसदी की गिरावट की स्थिति है. यही झारखंड अक्तूबर-दिसंबर 2007-08 में, देश में पांचवें स्थान पर था. पर इसकी दुर्गति को, यहां के मंत्रियों की लूट, भ्रष्टाचार से जोड़ कर देखिए, तो तसवीर साफ़ होगी. अब झारखंड पांचवें नंबर से खिसक कर 2008-09 (अक्तूबर-दिसंबर) में 15वें पर पहंच गया है. बिहार, अक्तूबर-दिसंबर 2007-08 में 21वें स्थान पर था, अब वह 2008-09 (अक्तूबर-दिसंबर) में 14वें स्थान पर पहंच गया है. जब बिहार बंटा, तो यह गाना चला, बिहार के लोग बालू फ़ांकेंगे. आज वह बिहार कहां और किस स्थिति में है, और खनिज संपदा से भरपूर झारखंड की क्या दुर्दशा है! यह राजनीतिक नेतृत्व का फ़र्क है. पर सबसे कठिन और मौलिक यक्ष प्रश्न है कि क्या बिहारी बदलना चाहते हैं? क्योंकि बिहार को बदलना है, तो बिहापरयों को बदलना पड़ेगा. आत्मसम्मान के लिए. अपनी प्रतिभा और श्रम के लिए. अपनी दुनिया बेहतर और समृद्ध बनाने के लिए. संवारने के लिए. पिछले दो-तीन दशकों से अकेले मशहर अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और समाजविज्ञानी डॉ शैबाल गुप्ता और आद्री, बिहारी उपराष्ट-ीयता की बात करते रहे हैं. इसे यथार्थ में सिर्फ़ बिहारी ही उतार सकते हैं. जीवन में ढाल सकते हैं. बिल गेट्स ने एक जगह कहा है, ‘..चीनियों के बाद दक्षिण भारतीय, दुनिया में स्मार्टेस्ट लोग हैं’. क्या यह चुनौती बिहार रचनात्मक ढंग से स्वीकार नहीं कर सकता? बिहार के युवा प्रतिभा और श्रम में किसी से कम नहीं. गांधीजी कहा करते थे, काम स्वत बोलता है. क्या हम अपने आचरण और काम से दुनिया और देश में अपनी छाप नहीं छोड़ सकते? क्या हम स्वत आगे बढ़ कर बिहार में सामाजिक बदलाव और विषमता दूर करने का माहौल नहीं बना सकते? अंतत राज्य समृद्ध होगा, विकसित होगा, तभी बिहार गरीबी के अभिशाप से और बीमारू राज्य के अभिशाप से मुक्त होगा. यह बड़ी घटना है कि बिहार का राजनीतिक एजेंडा बदला है. यह राजनीतिक एजेंडा अब विकास है. पर अंतत हर बिहारी को इसे आचरण में तब्दील करना होगा. जात-पात छोड़ कर. अत्यंत पिछड़े, दलितों, महिलाओं और गरीबों को प्राथमिकता के आधार पर आगे लाकर. अगर यह जनमानस बन जाये और साथ में विकास राजनीतिक एजेंडा बना रहे, तो बिहार छलांग लगा सकता है. देश और दुनिया को राह दिखा सकता है. पर इसके लिए सरकार और समाज दोनों को कठोर कदमों के लिए तैयार रहना पड़ेगा. बिहार में 30 दिनों से हड़ताल चल रही है. क्या ये सरकारी कर्मचारी कभी बिहार के बारे में भी सोचते हैं? बिहार की कुल आबादी है 9.72 करोड़. राज्य सरकार के कुल कर्मचारी हैं 3.5 लाख. हड़ताल पर हैं, लगभग 2.5 लाख. राज्य सरकार के सभी कर्मचापरयों को पपरवार समेत जोड़ दें, तो यह संख्या दो फ़ीसदी के आसपास है. पर इनके वेतन और भत्ते पर खर्च है, सकल घरेलू उत्पाद का 10 फ़ीसदी. यह विषमता! फ़िर भी कर्मचारी हड़ताल पर! बिहार की प्रतिव्यक्ति आय है, 481 रुपये. गरीबी रेखा से नीचे की आबादी है, लगभग 5 करोड़ 65 लाख. जबकि सरकारी महकमे में तीसरे और चौथे पायदान पर काम करनेवालों की मासिक आय 11000 से 20000 रुपये. ये सरकारी कर्मचारी नये युग के सामंत, जमींदार और राजा हैं. ये संगठित क्षेत्र के लोग हैं. प्रतिवर्ष योजना व्यय, जिस पर राज्य का विकास निर्भर है, साढ़े नौ करोड़ लोगों का भविष्य निर्भर है, वह 13500 करोड़ का है. पर आबादी के दो फ़ीसदी लोगों के वेतन और पेंशन मद पर 16000 करोड़ खर्च! भारत में संगठित क्षेत्र कैसे असंगठित लोगों पर जुल्म कर रहा है, उसका यह एक नमूना है. बिहार ने छठा वेतनमान लागू किया है. पर सूचना है कि पश्चिम बंगाल, केरल, त्रिपुरा ने छठा वेतनमान लागू ही नहीं किया है. विकसित और धनी राज्य तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश ने भी छठा वेतनमान लागू नहीं किया है. असम, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब ने भी छठा वेतनमान लागू नहीं किया है. जो राज्य सबसे धनी माने जाते हैं, प्रतिव्यक्ति आमद में भी सबसे ऊपर माने जाते हैं, उस महाराष्ट- और गुजरात में भी छठा वेतनमान लागू नहीं है. पर बिहार सरकार के कर्मचारी छठा वेतनमान लागू होने के बाद भी हड़ताल पर हैं? ये बिहार का विकास चाहते हैं या विनाश? इसी तरह के आचरण के कारण बिहार बीमारू बने रहने को अभिशप्त है. बिहार बीमार रहा, तो बिहारी अवसर की तलाश में दर-दर भटकेंगे, अपमानित होते रहेंगे. इसी तरह जाने-अनजाने हम बिहारी ही बिहापरयों के अपमान के मूल में हैं. राज ठाकरे तो बाह्य कारण हैं. कर्मचारी संघ के नेता इस विषमता का कैसे जवाब देते हैं? यह जानना और रोचक है. ये कर्मचारी नेता आइएएस अफ़सरों और मंत्रियों की वेतन वृद्धि और सुविधाओं के उद्धरण देकर अपनी मांगों को जायज साबित करना चाहते हैं. होना तो यह चाहिए था कि ये मजदूर नेता कहते कि हमारे वेतन और पेंशन मद पर खर्च घटायें. नेताओं और मंत्रियों पर खर्च घटायें और बिहार के असंगठित क्षेत्र के लोगों के विकास पर खर्च करें, ताकि बिहार बढ़े. बिहारी न भटकें. इन्हें राज ठाकरे से अपमानित न होना प़ड़े. ये सरकारी कर्मचारी परश्वतखोरी के खिलाफ़ अभियान चलाते. बिहार के विकास की बात करते, तो एक नयी बात होती. राज ठाकरे को माकूल जवाब मिलता. बिहार विकसित होता. क्या आनेवाले 10 वषाब में बिहार को विकसित राज्यों की Þोणी में खड़ा देखना आत्मगौरव का विषय नहीं है? 1991 में भारत की अर्थनीति बदल गयी. इन बदली पपरस्थितियों में जिन राज्यों ने खुद को विकसित किया, वे आगे निकल गये. आज कर्नाटक 70,000 करोड़ का आइटी का कारोबार करता है और हिंदी राज्य? लगभग शून्य. इंडिया टूडे प्रतिवर्ष इंडिकस नाम की संस्था से राज्यों की माली हालत, विकास स्थिति या ओर्थक स्थिति पर सर्वे कराता है. इंडिकस के ’90-’91 के ओर्थक सर्वे को याद करें, तो देश के सबसे पिड़े राज्यों में हिंदी राज्यों के साथ-साथ आंध्र भी था. वह भी वर्षो से अत्यंत पिड़ा था. अब काफी आगे है. शासन चाहे चंद्रबाबू नायडू का हो या कांग्रेस के राजशेखर रेड्डी का. आंध्र, राज्यों की विकास सीढ़ी में नीचे से लांग लगा कर ऊपर के ब्रैकेट में पहुंच गया. जानेमाने ब्रिटिश पत्रकार डेनियल लेक ने भारत पर किताब लिखी मंत्राज ऑफ चेंज (परपोर्टिग इंडिया इन ए टाइम ऑफ फ्लक्स). वर्ष 2005 में पेंग्विन/विकिंग ने इसेोपा. उस पुस्तक में बीमारू राज्यों पर एक बड़ा अध्याय है, ब्रेकफास्ट विथ बोस. प्रो आशीष बोस भारत सरकार के डेमोग्राफर इन चीफ रहे हैं. बीमारू अवधारणा के भी जनक और भाष्यकार. उसी डॉ बोस ने डेनियल लेक से बीमारू अवधारणा पर लंबी बातचीत की. 80 के दशक के मध्य में यह अवधारणा उन्होंने विकसित की. डेनियल लेक ने लिखा है कि भारत से बीमारू राज्यों को अलग कर दें (शब्द है, इंडिया माइनस बीमारू, भारत - बीमारू = मध्य वर्ग का देश), तो भारत विकास और अर्थव्यवस्था में मध्य Þोणी का देश बन जायेगा. बीमारू राज्यों के साथ भारत गरीब है. दुनिया के संदर्भ में भारत को देखें, तो सबसे नीचे के पायदानवाले देशों में इन्हीं बीमारू राज्यों के कारण भारत शुमार होता है. अन्य सभी राज्यों को धकेल कर पीे खींच लेते हैं. डेनियल लेक ने कहा है कि ये राज्य विकास के सभी सूचकांकों पर भारत के अन्य राज्यों से पिड़े और पीे हैं. जनसंख्या वृद्धि यहां अनियोजित है. भारत के आधे अशिक्षित यहां रहते हैं. औरतों के मामले में सबसे खराब हैं ये. इनमें सबसे बुरी स्थिति में हैं, बिहार और उत्तरप्रदेश, जहां भारत की 1/5वीं जनसंख्या रहती है. यहां भयानक हिंसा है. लोगों का आपस में विभाजन है. घोर जातिप्रथा है. कुशासन है. आशीष बोस ने डेनियल लेक से कहा, दक्षिण भारत में विकास के इशू पर जाति व्यवस्था अप्रभावी हो गयी है. पर बीमारू, खास तौर से उत्तरप्रदेश और बिहार में यह स्थिति बदतर हुई है. जातिवादी नेता अत्यंत सीमित जनाधार बनाते हैं. औरतों की उपेक्षा करते हैं. इसलिए इनकी यह स्थिति है. 1991 में ही राजस्थान और मध्यप्रदेश बीमारू ब्रैकेट से बाहर निकल रहे थे. प्रो आशीष बोस ने डेनियल लेक से कहा कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कु समय पहले आये थे. उन्होंने मुझसे कहा, आंकड़े देखिए, मध्यप्रदेश में चीजें बेहतर हो रही हैं. विकास हो रहा है. इसलिए अब हमारे राज्य को बीमारू ब्रैकेट से बाहर निकालें. बिहार व अन्य ऐसे बीमारू राज्यों के बारे में इस पुस्तक में लंबा वर्णन है. उसी डेनियल लेक ने वर्ष 2008 में नयी पुस्तक लिखी, इंडिया एक्सप्रेस (द फ्यूचर ऑफ ए न्यू सुपर पावर). यह भी पेंग्विन/ विकिंग नेोपी है. यह ताजा किताब है. इस पुस्तक में भी लगभग 10 पन्न्ो बीमारू प्रसंग में हैं. वह कहते हैं कि इंडियन डेमोग्राफी और सांख्यिकी विेषण के आधार पर डॉ आशीष बोस का सबसे बड़ा अवदान है, बीमारू राज्य की अवधारणा. 80 के दशक में जब प्रो बोस सेंसस के पुराने आंकड़ों का विेषण कर रहे थे, तो उन्होंने पाया कि बीमारू राज्य विकास के सभी मापदंडों पर सबसे पीे थे. मसलन शिक्षा, मातृ मृत्यु दर, जन्म दर, बाल मृत्यु दर, प्रति वर्गमील डॉक्टरों की उपस्थिति वगैरह. पर सबसे खतरनाक संकेत था कि भारत के अन्य राज्यों के लिए यह सूचकांक लगातार बेहतर हो रहे थे, विकास हो रहा था. पर बीमारू राज्य के लिए या तो इन आंकड़ों में (प्रगति) ठहराव आ गया था या वे और बदतर हो रहे थे. प्रो बोस ने बीमारू राज्यों को सब-सहारा अफ्रीका बास्केट केस माना था. महिलाओं और बच्चों की बदतर स्थिति इन राज्यों में थी. इस अवधारणा के बाद बीमारू राज्य के राजनीतिज्ञों ने प्रो बोस की कटु आलोचना की. निंदा की. पर उनकी अवधारणा सही थी. डेनियल लेक इस किताब को लिखने के संदर्भ में बिहार भी आये. वह बिहार के गांवों में गये. जहानाबाद की ओर. उनकी यात्रा जहानाबाद में जेल तोड़ने के कु रोज पहले हुई. वह बोध गया तक गये. नालंदा औैर राजगीर भी देखा. बिहार के संदर्भ में उनकी टिप्पणी-निष्कर्ष अत्यंत गंभीर, सटीक, पर बिहापरयों के झूठे अहं को ठेस पहुंचानेवाले भी हैं. एक जगह वे कहते हैं, बिहार का मुख्य विश्वविद्यालय पटना एक राजनीतिक मजाक था. हथियारबंदोत्रसंघों की जगह. भयभीत अध्यापक जो भय से डिग्री देते हैं. उनकी दृष्टि में बिहार आधुनिक भारत का शर्म है. वह यह भी कहते हैं, कभी प्राचीन बिहार भारत का बौद्धिक और ओर्थक पावरहाउस भी था. वह लिखते हैं कि गंगा के किनारे अच्ी तरह सिंचित होनेवाली उर्वर धरती में आज भी भारत के एक तिहाई लोग रहते हैं. पर आज इसके पवित्र जल के बावजूद यहां दुख, भ्रष्टाचार से ग्रस्त सम्मान व मर्यादा से वंचित जीवन है. वह प्राइमरी स्कूलों के बारे में टिप्पणी करते हैं. मानते हैं कि बिहार को बेहतर करने के लिए बहुत कु किया जाना है और तत्काल किया जाना है. क्या हम बिहारी सिर्फ राजनीतिज्ञों के भरोसे बिहार को ोड़ देंगे? क्या बिहार गढ़ने में जनता की हिस्सेदारी नहीं होगी? हम कब बिहार को एक नयी ऊंचाई पर ले जाने की भूख और भावना से प्रेपरत होंगे? कितने अपमान के बाद? ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़े और फाइनेंसियल टाइम्स के जानेमाने पत्रकार एडवर्ड लूस ने भी भारत के संदर्भ में चर्चित पुस्तक लिखी. इंस्पाइट ऑफ द गॉड (द स्ट-ेंज राइज ऑफ मॉडर्न इंडिया). वर्ष 2006 में यह पुस्तक पी. ग्रेट ब्रिटेन के प्रकाशक लिटिल ब्राउन ने इसेोपा. इस पुस्तक में भी बिहार की चर्चा है. वह कहते हैं कि बिहार उत्तर भारत का सबसे गरीब राज्य है. वे बिहार की घूसखोरी और कुव्यवस्था का उल्लेख करते हैं. स्कूलों में बिजली न होने, अध्यापक न होने और बाथम न होने की चर्चा करते हैं. लूस ने भी बिहार की यात्रा की. वह हैदराबाद से सीधे पटना पहुंचे थे. वह दोनों राज्यों का बहुत जीवंत तुलनात्मक चित्रण करते हैं. बोपरंग रोड का उल्लेख करते हैं कि कैसे एक ब्रिटिश अफसर के नाम पर इसका नाम पड़ा. फिर बिहार की कुव्यवस्था का उल्लेख करते हैं. वह लालू प्रसाद और राबड़ी जी से भी मिले. बिहार के पिड़ने का उन्होंने अपनी पुस्तक में प्राय: उल्लेख किया है. भारत के विकास के संदर्भ में थॉमस एल फ्रिडमैन ने अपनी विश्व चर्चित किताब लिखी, द वर्ल्ड इज फ्लैट (ए ब्रीफ हिस्ट-ी ऑफ द ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी). वर्ष 2005 में न्यूयार्क के फरार, स्ट-ॉस एंड गिरॉक्स ने इस पुस्तक कोोपा. मूलत: दक्षिण के राज्यों में आयी प्रगति व बदलाव के संदर्भ में यह पुस्तक है, पर बीमा राज्यों का इसमें जिक्र नहीं है.बिहार बदलने के लिए जरूरी है कि बिहारी बदलें. कोई सरकार या राजनीति एक सीमा तक विकास का माहौल उपलब्ध करा सकती है, पर बदलना खुद को पड़ेगा.

7 comments:

रंजना said...

बहुत बहुत सही कहा है.......

बिहार के खिलाफ़ महाराष्ट- और असम वगैरह में हो रहे आंदोलनों का रचनात्मक जवाब बिहार का यह विकास ही है. भारत को संदेश देना, अपने रचनात्मक कमाब से यह साबित करना कि हम भी बढ़ सकते हैं. विकसित हो सकते हैं, यह बिहार का जवाब होना चाहिए........

शीर्ष सत्ता ही नही सर्वसाधारण जबतक जागकर जाती पांति और भेद भाव की भावना से उठकर क्षेत्र के विकाश के लिए नही उठेगी...स्थिति नही बदल सकती...

बहुत ही सार्थक और सारगर्भित आलेख है......इसे बिहार की राजनीती दशा और दिशा पर निचोड़ कह सकते हैं इसे... विचारणीय सुंदर आलेख हेतु बहुत बहुत आभार.

संगीता पुरी said...

सही तथ्‍यों और पूरे आंकडों के साथ इस आलेख में सटीक बातें कही गयी हैं......बहुत ही सारगर्भित बातें....धन्‍यवाद इतने सुंदर आलेख के लिए।

शाश्‍वत शेखर said...

बिहार से सम्बंधित एक सटीक, संतुलित लेख| सच्चाई उडेल दी है आपने| सच है बिहारियों को सामने आना ही होगा| बहुत हो चुकीं पिछडेपन की बातें| बाकी भाइयों का समर्थन भी मिल जाए तो क्या कहने|

कुंदन शशिराज said...

सर, आपके ब्लॉग का नया कलेवर आज ही देखा... नए लेख भी पढ़े.... आपका ब्लॉग वाकई हर रोज़ निखर रहा है... नयी जगह पर जाकर लगता है जैसे आपके जोश में भी नवीनता आ गई है.....

Sanjaya Kumar said...

सुधरने वाले बिहारी कहां बचे हैं बिहार में

हरिवंश जी की इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं कि बिहारी सुधरें तो बिहार सुधरेगा। मेरा मानना है कि बरसों से पिछड़े बिहार के लिए जो कोई भी थोड़ा बहुत कर सकता था उसने पहले तो अपने बच्चों को बाहर पढ़ाया और वे सब अब अनिवासी बिहारी हो गए हैं। इन अनिवासी बिहारियों के साथ उनके माता-पिता भी बिहार से बाहर सारी दुनिया में फैल गए हैं। उन्हें न पहले बिहार की परवाह थी और न अब है। जो लोग अब भी बिहार में रह रहे हैं वे या तो घोर मजबूरी में या फिर आकंठ सुविधाओं में डूबे होने के कारण, जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। कुछेक अपवाद हैं इससे इनकार नहीं किया जा सकता और इसीलिए कुछ काम हो रहा है। सामान्य नौकरी पेशा लोगों को मैं इस श्रेणी में नहीं रखता। पर बिहार में रह गए आम मजदूर जैसे, बिजली मिस्त्री, ड्राइवर, रिक्शा वाले आदि काम कम बातें बनाने में ज्यादा विश्वास करते हैं। ऐसे तमाम लोग जो सामान्य पढ़े लिखे हैं और छोटा-मोटा काम करके रोजी रोटी चला सकते हैं, सिर्फ सरकारी नौकरी के फेर में रहते हैं और इंतजार करते- कइयों की उम्र निकल गई। कुल मिलाकर, सुधरने या सुधर सकने वाले बिहारी बिहार में हैं ही नहीं। उनकी ओर से कहूं तो - काहे के लिए सुधरना।

वर्षों से बिहार से बाहर रह रहा बिहारी हूं आना-जाना लगा रहता है। जब भी जाता हूं, यही सोचता हूं कि वहां उपलब्ध सुविधाओं का भरपूर उपयोग करूं ताकि वहां के लोगों को दिल्ली से कमाया कुछ पैसा दे सकूं। पर काम करके पैसे लेने में विश्वास करने वाले वहां आमतौर पर नहीं मिलते। मोबाइल फोन शुरू होने से पहले की बात है और अब भी लगभग जारी है, कोई भी टैक्सी वाला हो, कहीं से भी लिया हो, जिस भी दर पर लिया हो, पटना में जहां कहीं रहूं, रात नौ बजते-बजते ड्राइवर के किसी करीबी की तबियत अचानक खराब हो जाने की खबर आ जाती है और उसका जाना जरूरी हो जाता है। पाठकों को शायद विश्वास न हो पर ऐसा कई बार हुआ है। मोबाइल के बाद तो यह समस्या और बढ़ गई है। समस्या यह है कि टैक्सी ठीक करने से पहले यह तो नहीं पूछा जा सकता है कि रात नौ बजे के बाद तुम्हारा कोई करीबी बीमार तो नहीं पड़ेगा।

यह तो हुई छोटे-मोटे काम करने वाले सामान्य जन मानस की। अब आते हैं बिहार सरकार पर। बिहार की हालत खराब है। नए रोजगार नहीं बन रहे, कल कारखाने नहीं खुल रहे, पुराने बंद हैं, निजी निवेश आने में दिक्कत (नीतीश सरकार द्वारा किए गए प्रयासों और उसके सकारात्मक परिणामों को छोड़कर) है। ऐसे में पर्यटन कम खर्च में रोजगार और राज्य के लोगों की कमाई बढ़ाने का अच्छा साधन हो सकता है। राजस्थान, हरियाणा और गोवा इसके उदाहरण हैं। राजस्थान और गोवा में तो घूमने-देखने लायक चीजें हैं भी लेकिन हरियाणा भी पर्यटन से अच्छी कमाई कर रहा है। बिहार में बाहर रहने वाले लोग भिन्न कारणों से अपने बच्चों की शादी बिहार जाकर करना पसंद करते हैं। यह वहां के लोगों के लिए कमाई का अच्छा जरिया है पर बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम इसका लाभ उठाने की बजाय ऐसे लोगों का उत्साह चूर करने में ही लगा हुआ है।

बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम का होटल कौटिल्य भिन्न कारणों से दूसरे शहरों से पटना जाकर शादी करने वालों में लोकप्रिय है। यहां बारात ठहराने से लेकर शादी के मंडप आदि की सुविधा मुहैया कराई जाती है और लोग-बाग इसे शादी के लिए बुक करते रहे हैं। यह सब सालों से चला आ रहा है और मांग बढ़ने के साथ-साथ इसका किराया भी बढ़ता जा रहा है पर सुविधाएं न के बराबर हैं। हालत यही रही तो इसकी बदनामी बढ़ती जाएगी और बिहार में पर्यटकों के लिए उपलब्ध सुविधा का अंदाजा इसी से लगाने वाले लोग बिहार घूमने जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे।

पिछले साल नवंबर में यहां दो शादियों में शामिल होने का मौका मिला। एक में मैं बाराती था और दूसरे में सराती। पहले में सिर्फ बारात यहां ठहराई गई थी और दूसरे में इसके विस्तार वातायन में लड़की की शादी हुई और कौटिल्य में सरातियों को ठहराया गया। पहली दफा दिल्ली से हम बाराती सुबह करीब छह बजे होटल कौटिल्य पहुंचे तो इस सरकारी होटल की दुर्दशा देखकर दंग रह गए। सुविधा के नाम पर यहां कुछ भी नहीं था। हमारा इरादा दो-तीन घंटे सोकर शादी के लिए तैयार हो जाने का था पर नौ बजे तक बाथरूम साफ नहीं हो पाया। एक कमरे का तो फ्लश काम नहीं कर रहा था पर उसे भी बुक कर दिया गया था। किसी भी कमरे के गीजर प्वाइंट में बिजली नहीं थी।

बाथरूम की सफाई और गीजर ऑन कराने की हमारी मांग पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और जब हममें से ज्यादातर लोगों की गर्म पानी की आवश्यकता खत्म हो गई तो थोड़ी देर गीजर चले और शाम में फिर बंद हो गए। कर्मचारियों के रुख का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बाथरूम साफ कराने के लिए कहने पर एक ने पूछा, ढेरे गंदा है का। कमरे में साबुन, तौलिया कुछ भी नहीं मिला। चौथी मंजिल के हमारे कमरों के फोन काम नहीं कर रहे थे और शिकायत करने पर भी ये हमारे रहने तक ठीक नहीं हो पाए। दूसरी बार गया तब भी काम नहीं कर रहे थे।

होटल कौटिल्य के Eò¨ÉÇSÉÉ®úÒ/+ÊvÉEòÉ®úÒ शायद यह भांप चुके थे कि हम लड़की वालों से कौटिल्य की सेवा के संबंध में शिकायत लड़की वालों पर बोझ नहीं बनना चाहते थे (इसका सीधा मतलब होता हमें किसी दूसरे अच्छे या महंगे होटल में ठहराया जाता)। इसका लाभ उठाते हुए एक सज्जन ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पहले तो लोग कहते हैं कि इज्जत बचा लीजिए, लड़की की शादी है कहकर कमरा बुक करा लेते हैं और जब हमने मरम्मत के इंतजार में बंद कर दिए गए कमरे बुक कर दिए तो आप लोग हमपर नाराज हो रहे हैं। होटल के एक कर्मचारी की इस बात पर यकीन नहीं करने का कोई कारण नहीं था क्योंकि कमरे वाकई रहने लायक नहीं हैं और पैसे देकर शायद ही कोई इनमें रहे। होटल कर्मचारी की बात सुनकर कमरा बुक कराने वाले और ठहरने का इंतजाम होने का दावा करके बारात ले जाने वाले लोगों पर गुस्सा आना स्वाभाविक था। पर परंपरागत किस्म के बाराती नहीं होने के कारण हम मन मसोस कर रह गए।

होटल कर्मचारी की चाल का पता अगली शादी में लगा। हालांकि दूसरी बार जब मुझे पता चला कि सरातियों के रहने का प्रबंध होटल कौटिल्य के उन्हीं कमरों में है तो मैंने जेब से पैसे खर्च कर दूसरे होटल में ठहरने में ही भलाई समझी। हालांकि यहां ठहरे दूसरे लोगों से मिलने कई बार जाना पड़ा और सुविधाएं यहां इस बार भी नहीं थीं। हालांकि इस दफा पैसे देने वाला भी वहीं रह रहा था। ऐसे में यह बात साफ हो गई कि पिछली बार होटल कर्मचारी ने कमरा बुक कर अहसान करने का नाटक अपनी खाल (या नौकरी बचाने) के लिए किया था। पता चला कि घटिया और सुविधाहीन कमरे खूब बुक किए जा रहे हैं तीन-चार महीने पहले ही बुक कर दिए गए थे। लगन (शादियों के मौसम) के दिनों की बुकिंग दूने किराए पर की गई थी सो अलग।

इसके बावजूद होटल कौटिल्य के कर्ता-धर्ता कमरों में बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने की भी जरूरत नहीं समझते। होटल में सुविधाएं नदारद हैं। कमरे में पर्दे नहीं हैं, खराब हैं या अपर्याप्त हैं, खिड़कियों के शीशे टूटे हैं, मच्छरों की भरमार है (इनसे मुकाबले के लिए एक मच्छर अगरबत्ती जरूर मिली थी) पर एक कमरे का ट्यूब खराब था और आग्रह करने के बावजूद न तो ट्यूब बदली गई और न बल्ब लगाया गया। दीवारों पर सीलन, घिस और गिर चुके रंग - कुल मिलाकर देखने लायक हैं ये कमरे जिनसे बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम पैसे कमाता जा रहा है।

कर्मचारियों की कर्तव्य निष्ठा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रेस्त्रां में एक ही कमरे से दुबारा ऑर्डर देने पर कहा गया कि जो भी मंगाना है एक साथ मंगा लिया जाए !

होटल कौटिल्य की दशा-दिशा का चित्रण करने के बाद यह बताना भी वाजिब होगा कि हमारे पूरे प्रवास के दौरान किसी ने भी बिहार में पर्यटन को बेचने की कोई कोशिश नहीं की। हमें आस-पास की जगहों के बारे में बताने या उन जगहों तक जाने के लिए बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई जबकि दिल्ली से परिवार के साथ पहली बार पटना गए कई लोग आस-पास की जगहें घूमने के इच्छुक थे। हालत यही रही तो बिहार में पर्यटन का कबाड़ा कर देगा बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम।
- संजय कुमार सिंह

निशाचर said...

अभी हाल ही में कोसी नदी में आई बाढ़ के दौरान कई मल्लाहों ने लोगों द्वारा मुह माँगा किराया चुकाने के बावजूद नाव पर बैठे लोगो को लूट लिया. सरकार द्वारा राहत और बचाव के लिए भेजी गयी नावों पर गुंडों ने कब्जा कर लिया और खाली हो चुके गावों को लूटने लगे. बिहार के कुछ लोगों ने अपने ही लोगो के साथ जो व्यवहार किया उसी से पता लग जाता है की बिहार का ही नहीं उसके जनमानस का भी कितना नैतिक पतन हो चुका है. जब तक लोग नहीं बदलेंगे बिहार और उत्तर प्रदेश नहीं बदलने वाले.

shambhu goel said...

आपको बताना चाह रहा हूँ की किस तरह एक कर्ज़दार बिहार राज्य वित्तीय निगम के क़र्ज़ के साथ खिलवाड़ कर पुरे स्थानीय प्रशासन के अपने मिडिया में होने के नाते ठेंगा दिखला कर इस क़र्ज़ के पैसे से गुलछर्रे उड़ा रहा और पूरा पुलिस और सिविल प्रशासन मूक दर्शक बन इसे देख रहा है |बिहार में सुशासन की हवा तो बह रही है और शायद इसी को सुशासन कहतें भी हैं की कोई कितना भी क़र्ज़ ले ले , क़र्ज़ को वापस करना एक तो तौहीन की बात है ,दुसरे कब क्या ठिकाना सुशासन के वीर नेता कब इस क़र्ज़ को कभी कर्ज़दार को अल्पसंख्यक समुदाय, तो कभी दलित ,कभी महादलित ,अतिपिछड़ा ,पिछड़ा वर्ग के होने के कारण माफ ही कर दे |तो क़र्ज़ लौटाने से फायदा |
यहाँ फारविसगंज जिला अररिया की एक मिशाल है |एक व्यक्ति जिसका नाम शब्बीर आलम था श्री सरयू मिश्रा ,तत्कालीन विधायक और बाद में अध्यक्ष बिहार राज्य वित्तीय निगम (डाक्टर जगन्नाथ मिश्र जी के मुख्य मंत्रित्व काल में)के बहुत नजदीकी सलाहकारों, किचन केबिनेट का आदमी था |इसने तीन बार BSFC से क़र्ज़ लिया और १९८८ तक इस क़र्ज़ की राशि करीबन ३० लाख रुपैये हो गयी थी जो कुछ सालों पहले तक व्याज जोड़ कर २ करोड से ऊपर पहुँच गयी थी |इनके जीवित अवस्था में BSFC की क़र्ज़ अदायगी की नोटिस आती थी , यह व्यक्ति BSFC के उस मेसेंजर को मारता था और नोटिस फाड के फेंक देता था |इसके मरने के उपरान्त इसका लड़का फरहत शब्बीर और लड़की नौशाबा शब्बीर भी कोई भी नोटिस आने पर मेसेंजर को भला बुरा कह कर लौटा देते थे |निगम के अफसरों पर आफत आ गयी और फलस्वरूप जिस नाम से क़र्ज़ लिया गया था मेसर्स शीन सेरामिक्स प्रा. लिमिटेड नाम की फैक्ट्री थी जिनके साबिर आलम मुख्य प्रवर्तक थे , को BSFC ने इस फैक्ट्री के क़र्ज़ के बावत बंधक रखी गयी जमीन ,मकान ,मील मशीनरी आदि को नीलामी में बेच दिया |
बेचने के बाद खरीदार को इनके लड़के फरहत शब्बीर ने जमीन पर जाने से तरह तरह के हथकंडे अपना कर और अपने को मडिया में होने के नाते स्थानीय प्रशासन के अफसरों को मिडिया का भय दिखला कर दखल दिलवाने की कार्यवाही से आज तक रोके रखा है |खरीददार बेचारी एक महिला है वो कभी उप समाहर्ता भू -राजस्व विभाग , कभी अनुमंडल पदादिकारी , फारविसगंज के यहाँ ,कभी पुलिस के यहाँ घूम रही है लेकिन अभी तक माननिय फरहत शब्बीर इस महिला को अपने वाजिब हक से दूर रखें हुए हैं |कभी इसकी बहन अररिया कोर्ट में न्यालसी करती है की बंधक जमीन में इसका भी हिस्सा है , तो कभी उच्च न्यायालय ,पटना में यह व्यक्ति खुद writ करता है की इसके साथ गैर इंसाफी हुई है और निगम ने गलत तरीके से इसको बेचा है |
यह इनकी आँख कब खुली जब इनके पिताद्वारा क़र्ज़ लिया गया और क़र्ज़ का वापस भुगतान तो दूर ,निगम के अफसरों पर इसके पिता खुद धौंस जमाते थे और यह फरहत शब्बीर अब अपनी धौंस जमा कर इस महिला को इनकी खरीदी हुई परिसंपत्ति से परे किये हुए है |याने की सुशासन , क़र्ज़ लो और कम्बल ओढ़ कर घी पियो और सुरा और सुंदरी पर लुटाओ |यही रहा है हमारे शब्बीर साहब का जीवन | सुशासन की हवा बिहार में बह रही है , जाने अब आगे क्या क्या होगा |फरहत शब्बीर इस फैक्ट्री की सारी मशीन बेच चुके हैं |और वही मशीन ,टिन , ईंट बची हुई है जिसका बाजार में कोई मूल्य नहीं है |सुशासन का इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है |