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Wednesday, February 11, 2009

हा हन्त, यह कैसा वसंत

प्रभात जी, दैनिक भास्कर ग्रुप में बड़े पद पर हैं। साथ ही, प्रभात जी हम सबके लिए ऐसे पत्रकार भी हैं जिन्होंने अपने दौर की पत्रकारिता पर एक ख़ास छाप छोड़ी है। उन्होंने आदिवासी इलाकों में जाकर थारुओं पर काफी कुछ किया है। वैसे, प्रभात जी फोटोग्राफी की दुनिया में भी खूब चीन्हे जाते हैं। एक ऐसे फोटोग्राफर जो कैमरे को अपनी दृष्टि देते हैं। आईए पढ़ें दैनिक भास्कर में छपा उनका एक आलेख- सुना है कल पतंगें उड़ी, लीज़र वैली में दुपट्टे लहराए, गूंजती रही खिलखिलाहटें। ऋतुराज आए हैं न। सो उनके स्वागत में खिले-खिले फिरते रहे लोग। हवाओं ने जरूर इसकी इत्तला की मगर मौसम इस क़दर धमाचौकड़ी का है कि बहुतों को इसकी ख़बर तक न हुई। यहां तो लोग कई दिन से फिजा-फिजा कर रहे थे, कल वे ही लोग ख़िजां- ख़िजां कहते सुने गए। बेचारी का वसंत पीले वसन के बजाय नीले में रंगा दिखाई दिया टीवी पर। मम्मी ने मीडिया वालों से कहा, तुम सब जाओ। आज बेबी का मूड नहीं है, सो बात नहीं करेगी। टीवी वालों का सारा टीआरपी प्लान फुस्स हो गया। दो दिनों से बेबी के बूते ही झूम रहे थे। मगर धन्य है बेबी भी। अगले रोज़ ही मीडिया वालों को न्योता भेज दिया कि आ जाओ। न सही इस बार मगर पुराने वसंत की दिलकश यादें तो हैं, उसी को ताज़ा कर लें। दो बरस से सहेजकर रखे हुए एसएमएस काम आ गए। ज़माने भर ने कालका- पंचकूला के वोटरों ने भी टीवी की मार्फत अपने नुमाइंदे की निजी ज़िंदगी के ख़ास राज़ जाने-सुने। कुछ ने बेबीजी के हौसले की तारीफ़ की, कुछ ने नेताजी के कौशल की। छोटे पर्दे पर कई दिनों से चल रही इस कहानी से बड़े पर्दे पर मसाले के तिजारती ख़ासे मुतासिर हुए हैं- कुछ करोड़ रुपये का ऑफर भेजा है बेबी को। उनकी ज़िंदगी पर फिल्म बनाएंगे। आख़िर बसंत आया। जय हो बेबी की।देश के तमाम बड़े नेताओं को भी ऋतुराज के स्वागत का मौक़ा नहीं मिल पाया। इन दिनों सारे नेता खासे व्यस्त चल रहे हैं। उनके इम्तहान भी सिर पर हैं, सो ख़ूब मेहनत कर रहे हैं। कर्नाटक में नेताओं को अचानक ध्यान आया कि बंगलूर- मंगलूर में इत्ते सारे पब हैं। पब हैं तो बेवड़ा है, बेवड़ेबाज भी हैं। ये बेवड़ेबाज़ ही लड़कियों के हाथ में हाथ डालकर घूमते हैं। इससे हमारी भारतीय संस्कृति पर बुरा असर पड़ता है। हमारी छवि ख़राब होती है और लड़कियों का दिमाग़ भी। नेता ऐसा हरगिज नहीं होने देना चाहते। दिमागी तंदुरुस्ती रहेगी तभी तो वे कंधे से कंधा मिलाकर तरक्की करने के लायक बन पाएंगी। सो अभी पहले चरण में उनकी सेना के जवाब पब में घुसकर लोगों की ठुकाई कर रहे हैं (भय बिनु होए न प्रीत)। कोट-टाई धारण करके टीवी पर अवतरित हो रहे हैं और अपने इस सामाजिक हित के नज़रिये का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। अगले चरण में यही जवान इन पब की जगह दूध- लस्सी की दुकान खोलकर बैठ सकते हैं। केवड़े वाली लस्सी और रोग़न बादाम शीरीन वाला दूध।दुध का कुल्हड़ इस क़दर गर्म होता है कि साथ- साथ आएंगे तो भी हाथ में हाथ डालकर नहीं चल पाएंगे। बिना लाइसेंस वाले ढेरों पब से निज़ात भी और तेज़ दिमाग़ नस्ल अलग से। जिन लोगों को समाज सफाई की इस मुहिम पर ऐतराज़ है, वे अनजान और भोले-भाले हैं। अपने इतिहास और संस्कृति के बारे में कुछ नहीं जानते। अरे, रामजी सेना है। तोड़-फोड़ और मार- पिटाई तो इस सेना की परंपरा रही है। न यक़ीन हो तो तुलसी बाबा से पूछ लें- खाएसि फल और बिटप उपारे, रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे। अभी बिटप उखाड़ने और रच्छकों की ठुकाई का टैम है। इससे फुर्सत पाकर फल भी खा लेंगे। सो रोज़ -रोज नया जांच दल भेजने का कोई फायदा है नहीं।बड़ी सी बिंदी वाली नेता पता नहीं क्यों कर्नाटक वालों की इस योजना के ख़िलाफ हैं- कहती हैं कि अपने घर की लड़कियों का डाइट चार्ट बनाने का ज़िम्मा हम लोग पब कल्चर की मुख़ालिफत करने वाले इन नेताओं को नहीं दे सकते। बात में उनकी भी दम है। अरे, इतने कॉलेज खुल गए हैं- डाइटीशियन की पढ़ाई करने आने वालों को भी रोज़गार देना होगा कि सारे काम सिर्फ नेता ही करेंगे। उधर, राजस्थान में अलग बवाल है। वर्षों तक सत्ता से बाहर रहकर दूसरों का सांस्कृतिक चिंतन सुनते- सुनते कांग्रेसी इस क़दर मुतासिर भये कि कुर्सी पर बैठते ही शराब की दुकानों को बंद करने का फ़मान सुना दिया। यानी मय बुरी शै नहीं, मयख़ाना बुरी चीज़ है। मय बुरी चीज़ होती तो इसके कारखाना मालिकों को नेता अपने साथ लिए थोड़े घूमते, अपने साथ बैठाते थोड़े ही। आसल बात तो कल्चर की है और कल्चर की चिंता सिर्फ मध्य प्रदेश या कर्नाटक वालों का हक़ नहीं, दिल्ली- राजस्थान वाले भी इसी मिट्टी में जन्मे हैं।इलेक्शन मेनिफेस्टो अपनी जगह मगर कितनी समानता लगती है इन नेताओं के विचारों में। हालांकि बिग फाइट में मिले सबके सब तो ख़ूब मुक्के ताने एक-दूसरे पर। टीवी शो के नाम की लाज भी तो रखनी होती है न। अपने मुक्केबाज हीरो मगर बड़े खिन्न हैं। जब से चीन से लौटे हैं कांसा लेकर, पूरा देश बलैया ले रहा है। मल्लिका शेहरावत डेट पर साथ जाने की ख़्वाहिश में चिट्ठी भेज रही हैं, रोहित बल अपने कुर्ते में लपेटकर बिल्लियों के बीच कदमताल करा रहे हैं, फोटुएं खिंच रही हैं दनादन, सरकारें नज़र उतार रही हैं, युवतियां आहें भर रही हैं मगर इन सबमें उनका मन ज़रा भी नहीं रमा। दस्ताने उतारकर खूंटी पर टांग दिए और चारपाई पर पड़े-पड़े खुली आंखों से छत निहारते रहे। २६ जनवरी अभी आई नहीं थी, बसंत अभी दूर था। असली अरमान तो अभीतक आंखों में ही थे। मगर यह कैसा वसंत, हा हन्त। अरमान धरे के धरे रह गए। पद्म तो वह एक आंख से निशाना लगाने वाला ले गया। कोई शातिर, कोई गवैया ले गया। नीली आंखों वाली भौजाई को भी मिल गया। है इनमें से किसी में मुक्का मारने का शऊर या फिर मुक्का खाने का दम। मर्दानगी की, बहादुरी की क़द्र अगर थोड़ी भी बची है इस देश में तो इसबार न सही, चलो अगली बार सही- कोई जुगाड़ लगाके थोड़ा पद्मश्री इन्हें भी दिलवा दो न।

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