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Friday, February 13, 2009

...आ अब लौट चलें

(भाग- दस)-दोस्तों, आज ऐन वेलेंटाइन डे के दिन अपने प्रेम का पन्ना बंद करता हूं... सदा के लिए। साथ ही अपनी गांव यात्रा का अंत भी। मेरे लिए दोनों ही मायूस कर देने वाली बात है। गांव आए दस दिन हो चुके थे। दिल्ली में नौकरी की चिंता सताने लगी। जैसे-तैसे रिजर्वेशन लिया। लौटने से एकदिन पहले मुझे दस्त लग गए...शायद दिल्ली लौटने की बात सोचकर घबराहट में। ख़ैर जी, सुबह से ही मैं बुझा-बुझा था। सामान सहेजना क्या..बस बैग में सबकुछ जैसे-तैसे ठूंस लिया। मां ने खाने को दिया...दो-चार कौर से ज्यादा खाया नहीं गया। दोपहर बाद पिताजी ने टैक्सी मंगवा दी (आश्चर्य)। ...कहा, आराम से दोनों भाई जाना और पहुंचकर समाचार देते रहना। जाते व हमारे शहर में एक जीरो माइल जगह है। मेरी टैक्सी उसी होकर गुजर रही थी। ...मैनें इस जगह का ज़िक्र इसलिए किया क्योंकि शायद ये पहला ऐसा चौराहा मैं देखता आ रहा हूं जहां किसी कवि की आदमकद प्रतिमा लगी थी। कवियों को चौराहों पर प्रतिष्ठित करने की परंपरा हमारे देश में कहां-कहां है, मुझे नहीं पता।मगर यहां है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर। ओज के कवि। बगल के सिमरिया गांव के रहने वाले थे। समय का सूर्य हूं मैं। दिनकर जी राष्ट्रकवि तो थे ही...आप यहां महसूस कर सकते हैं कि दिनकर जनकवि भी थे। जीरो माइल पर दिनकर जी की इस आदमकद प्रतिमा का अनावरण ख्यातिलब्ध हिंदी आलोचक डा. नामवर सिंह ने किया था। प्रतिमा के नीचे लिखा हुआ है। स्थानीय लोग और दिनकर जी के गांव वाले आज भी उनकी जन्मतिथि बिना किसी सरकारी सहायता के धूमधाम से मनाते हैं। धूमधाम माने, अच्छे वक्ताओं को बुलाते हैं...उनकी जुबान से अपने गांव के इस महान कवि के बारे में सुनते हैं तो उनका दिल बाग- बाग हो उठता है। आज इस प्रतिमा को देख मुझे भी गर्व हो रहा था..अपने शहर पर। अपने इस महान कवि पर। टैक्सी बहुत आगे बढ़ चुकी थी और स्टेशन नजदीक था। शाम हो चुकी थी तो ट्रेन में बैठते ही सोचा कि खा- पीकर सो जाया जाय। बैग से खाना निकाला...भाई ने खाने से अनिच्छा जाहिर की। उसका तनाव समझ सकता था। मां ने सत्तू भरी पूड़ियां दी थी.... बिना प्याज वाली आलू की सूखीसब्जी। एक डब्बे में अंकुरे हुए चने... तीन-चार मिठाई के टुकड़े। जानता हूं, अचार जानबूझकर नहीं दिया...हमारे यहां धारणा है कि यात्रा में अचार नहीं देना चाहिए, इससे यात्रा बिगड़ने का खतरा रहता है- पता नहीं ट्रेनों या बसों के चलने में अचार का क्या योगदान है? जिद करने पर भाई ने भी एकाध पूड़ियां खाई। खा-पीकर लंबलेट हो गया। सुबह नींद खुली तो ट्रेन मुरादाबाद स्टेशन पहुंच चुकी थी...टीटी किसी पांड़ें जी से बहस कर रहा था। पांडे जी जोर- जोर से बता रहे थे कि उनका नाम गौरीनाथ पांड़े है...लखनऊ में चढ़े हैं और दिल्ली जा रहे...विकलांग हैं इसलिए विकलांगों को सरकार की तरफ से दी गई रेलवे की सुविधा ले रहे हैं...इसमें टीटी उनपर कोई अहसान नहीं कर रहा। टीटी कह रहा था कि अगर विकलांग हैं तो ये तो बताइए कि आपको कौन सी शारीरिक परेशानी है...पांडे जी का कहना था कि शरीर अकड़कर रह गया है, देखते नहीं हैं क्या? ...ई तो सीएमओ का सर्टिफिकेट में भी लिखा है...ई भी देख लीजिये। बहुत बकझक और यात्रियों की हस्तक्षेप से मामला खत्म हुआ। पांड़े जी लगातार बोलते रहे। हालांकि वो न तो टीटी को बता पाए कि उन्हें दिक्कत क्या है और न ही यात्रियों को...वैसे, भले- चंगे लग रहे थे। किनारे वाली बर्थ पर एक जोड़ा था...युवती जींस- शर्ट में और लड़का कुछ फंकी लुक वाला था। दोनों को किनारे वाली एक बर्थ मिली थी। दीन-दुनिया से बेखबर दोनों ऐसे पड़े थे जैसे समुंदर के किनारे सनबाथ ले रहे हों। उसे लेकर हमारी बोगी के तमाम महिलाओं में खुसुर- फुसुर हो रही थी...अधेड़ किस्म के लोग डांटने के अंदाज में दोनों को घूर रहे थे। और बाकी लड़के जो थे...बस मजे ले रहे थे। देर रात गए ही किसी स्टेशन पर दोनों चढ़े थे और उसी समय से उन्हें संदिग्ध मान लिया गया था। मुझे लगता है कि किसी को संदिग्ध मान लेने का भी अपना मजा है...उसे अगर स्वभाविक मान लिया जाय तो उसमें फिर मजे का रस कहां रह जाएगा? तो जी, लोग बातें बनाते रहे और सफर कटता रहा। इसी बीच ट्रेन रुकी हुई थी...एक बच्चा घुस आया। हाथों में दो पत्थर के टुकड़े लेकर उन्हें आपस में बजाता। उसका ये वाद्ययंत्र किसी भी वाद्ययंत्र का मुकाबला कर सकता था। उससे निकली ध्वनि, उसका रिदम मुझे लाजवाब कर गया। उससे भी प्यारी उसकी आवाज थी- चल हट जा ताऊ पाछे णे। पांच रुपये दिये और चल हट जा ताऊ को बार-बार उससे सुना। ट्रेन दिल्ली स्टेशन पर पहुंच चुकी थी। अब फिर से मैं दिल्ली की बेशुमार भीड़ का हिस्सा था। उसी रेलमपेल में बाहर निकला। लगा दस -पंद्रह दिनों में ही दिल्ली मुझसे और आगे निकल गई। ...जाने भी दो ससुरी इस दिल्ली को...खुदै भाग- भाग के एकदिन थक लेगी तो कलेजा हाथ में लेकर बैठकर सोचेगी...आ अब लौट चलें।

5 comments:

Bhuwan said...

behtareen.....

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर विवरण.....

prabhat said...

travelogue ka ant to theek magar yeh prem ka panna kyon band, pyare. mana ki dilli shahar sach mein in feelings ki quadr nahi karta magar iske chakkar mein apne prem ka panna band na karo.
it's fascinating narrative. everyone having roots in rural india can corelate with your description.

ramanuj said...

yatra vritant ati sundar...lakin ZERO MAILE chauk par hi DINKER ki pratima kiyon? mere vichar se kisi chij ki shuruat ZERO se hoti hai.....Isliye shyad DINKAR ke charnaon se BIHAR ki shahitya nikli ho!

manas mishra said...

संजीव जी शब्दों के माध्यम से आपने यात्रा का अच्छा विवरण प्रस्तुत किया। ऐसा लग रहा था कि मैं ही यात्रा कर रहा हुँ।