Pages

Monday, February 16, 2009

गधे न होते तो क्या होता


गधों पर ग़ौर करते हुए कई बार सोचता हूं कि ये गधे न होते तो क्या -क्या होता। हमारे मुहावरे कितने बेनूर हो गए होते। उन लोगों का क्या होता जिन्हें हम गधे का उपनाम देकर आसानी से काम चलाया करते हैं। या फिर जिन्हें हम कहते हैं कि यार ये तो बिल्कुल गधा है- ऐसे लोग तो बेसबब ही बिना नाम के फिरा करते। ..तो गधों ने हमारे मुहावरों और लोकोक्तियों में ख़ास रंग भरे है। अब ग़ौर कीजिए- धोबी के पास गधा न होता तो आख़िरकार कौन ऐसा होता, जिसे हम कहते कि ये न तो घर का है न घाट का। कोई अगर अचानक ग़ायब हो जाता तो उस स्थिति में क्या कहते। अभी तो कह देते हैं कि ऐसे ग़ायब हुआ जैसे गधे के सिर से सींग। ये दीगर है कि गधे के सिर से सींग किस काल में ग़ायब हुए इसपर विस्तृत शोध की जरूरत है। अब जैसे काबुल को हम सिर्फ टैगोर के काबुलीवाला के रूप में ही नहीं जानते। गधों के कारण भी कम नही जानते। आपको शायद पता हो, काबुल में भी किसी काल में एकाधा गधे न हुए कि भाइयों ने उड़ा दिया- क्या काबुल में गधे नहीं होते। गधे नहीं होते देश के विभिन्न प्राथमिक विद्यालयों में चलने वाली कक्षाओं की कार्यशैली पर क्या प्रभाव पड़ता। गुरुजी भला अपने शिष्यों को क्या कहकर डांटते। हमें तो गुरुजी ने ज्ञान तो दिया नहीं लेकिन गधे का उपनाम देकर जीवन भर के लिए उपकृत कर दिया।...शायद अन्य भाइयों का भी यही ख़याल हो, तो आश्चर्य नहीं। आपसी झगड़े के दौरान हम आखिरकार किसका हवाला देकर झगड़ते। अभी तो कह देते हैं कि क्या हमें गधा समझ रखा है। मुहावरे बनाने वालों ने गधों के साथ नाइंसाफी भी कम नहीं की है। एक तरफ तो उन्हें धोबी का गधा कहकर न घर का न घाट का बताते फिरे हैं...जरूरत पड़ने पर यही गधा सबसे ज्यादा काम करने वाला भी हो जाता है- गधे की तरह खटना (काम करना) पड़ता है जी। क्या सुविधाजनक ढंग से हम गधों के नाम पर सवारी करते रहे हैं। गधों के साथ एक और नाइंसाफी देखिये- जरूरत के समय गधों को भी बाप कहना पड़ता है। कई भाई तो इस लोकोक्ति पर चलते हुए सफलता के गंतव्य तक पहुंचे। गधे की तरह पिटाई कोई मुहावरा तो नहीं लेकिन किसी को गधे की तरह धुनकर इसे महसूस किया जा सकता है...उससे भी समझ मेंन आए तो गधे की तरह पिट- पिटाकर इसका अहसास किया जा सकता है (कोई भाई इस प्रयोग से गुजरें तो किसी को बताने की ग़लती न करें।)। मेरी दीदी मुझे डांटते हुए अक्सर कहती थी- गधे रह जाओगे गधा। यानी मैं गधा तो हूं ही...गधे का उपनाम और चस्पां कर दिया गया मेरे साथ। भाई, मुझे तो गधे उपनाम का लाभ भी नहीं दिया गया। कहते हैं न कि यहां तो गधे पंजीरी खा रहे हैं। मैं यहां साफ करना चाहता हूं कि न तो मैने न ही किसी गधे ने कभी पंजीरी खाई...मुहावरेबाज ख़ामख्वाह इसे लिए फिर रहे हैं...जरा कोई समझाओ भाई। गधे न होते तो राजू श्रीवास्तव का काम तो जैसे गाय- भैंसों से चल रहा है, चल भी जाता मगर मूर्धन्य साहित्यकार कृशन चंदर का क्या होता, जिन्होंने एक गधे की आत्मकथा लिखकर गधों को साहित्य में भरसक कद-काठी दी।...लेकिन गधों के नाम तक में कंफ्यूजन पैदा करने की कोशिश की गई।...कोई उन्हें गदहा कहता है तो कोई गधा। कल को कोई गदहा ही अपने अधिकारों की लड़ाई शुरू करेगा...मैने अपनी तरफ़ से तो शुरू ही कर दिया है। (अगली किस्त में कुछ अन्य जानवरों से जुड़े मुहावरों और लोकोक्तियों पर।)

5 comments:

हरि said...

ये गधा भी कैसे टिपिया रहा होता। बहुत खूब।

Anonymous said...

Naya thaur Naye daur me

rakesh mishra said...

hum bhi gadhe hain

ramanuj said...

aaj ke jamane me gadha hona...bahut jaruri hai....kiyon ki gadhe ki tarah khatna parta hai...bina munh khole jo BOSS kahe... karte rahna padta hai.....is liye har kisi se meri salah hai MANDI KE DAUR ME NAUKRI BACHANE KE LIYE GADHE KI TARAH KAM KREN...........

uday said...

raur e lekh aur lekh men gadha ke kail gail badai ke jitana bhi prashansha kar sakal ja sakela kam hoi...ego gadha ke raura jahan-jahan aur jaun-jaun roop me pesh kaile bani ekara khatir raura prashansha ke patra bani...raura hamara hamara dada ji ke yad dilawa dihani..bachapan men kauno galti par u kahat rahani gadahe ka raha jaibe re..tora kuchho na bujha hau..kaha hiau kuchh aur kara he kuchh..u samay dada ji ke dant sunakae bada dukha hot rahe..lekin aaj raur in lekha padhake..dada ke prati man men je gubar rahe u nikal gail...
raura apan lekh men gadha ke mahata je batawale bani okara khatir hamara dane se raura der badhai...
lagal rahin aur hamani gadaha ke bhi kuchh buddi tet rahin