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Thursday, February 19, 2009

कौआ हंस की चाल चला



बंधु, बहुत दुखी हूं। अभी पिछली पोस्ट में मैने जानवरों पर केंद्रित कुछ मुहावरों का ज़िक्र करते हुए कुछ लिखा था। उसे आजतक उसी जगह पर लगा छोड़ दिया। इस उम्मीद से कि उसकी सबसे बड़ी ग़लती आप पकड़ लें। अफसोस, किसी ने इसे नहीं पकड़ा। तो लीजिए, मैं ही अपनी ग़लती न केवल पकड़ता हूं बल्कि इसके लिए माफी भी मांगता हूं। मैंने उसमें लिख दिया कि धोबी का गधा, न घर का न घाट का। कितनी बड़ी गलती है...आपमें से कोई इसे पकड़कर मेरी ऐसी- तैसी न कर सका। भाई, मुहावरा है धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का। धोबी का गधा तो बेचारे धोबी की ज़िंदगी ही है। वो तो उसके लिए घर के लिए भी काम का है और घाट का तो है ही।


कुत्तों को लेकर मुझे काफी अफसोस है। बेचारे को मुहावरों की दुनिया में ज्यादा तरजीह नहीं दी गई...ऐसे ही जैसे इधर- उधर मुंह मारते हुए हमारे घरों में आने पर हम उसे दुरदुराकर भगा देते हैं। गधों की तरह कुत्ते मुहावरों की दुनिया में क्लिक नहीं कर सके...शायद मुहावरा गढ़ने वालों को कुत्तों का चेहरा ज्यादा कैची न लगा हो...या फिर गली का खुजलीवाला कुत्ता इनमें से किसी मुहावरेबाज को सुनसान गली में दौड़ा लिया हो। उसी का खामियाजा बाकी कुत्ते अबतक भुगत रहे हैं। हां, एक ही मुहावरे में कुत्ते जो हैं सो मुहावरों की दुनिया में अजर-अमर हो गए। इस मुहावरे को हम दिन-रात भूकते रहते हैं अगर घर का बच्चा बिगड़ गया तो। मुहावरा है - कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती।


गाय- भैंसों पर भी मुहावरे गढ़े गए। जैसे हर बाप अपनी कुंवारी बेटी को हमेशा से गाय जैसी बताता फिरा है। ये अलग बात है कि भैंसों के मुकाबले गाय ज्यादा आक्रमक होती है। भैंसों के साथ वैसे, बड़ी नाइंसाफी हुई है। भैंसों को कभी देखा है...हमेशा चैतन्य भाव में पगुराती हुई...दिन-रात॥ जाड़ा-गर्मी- बरसात। भैंसों को कभी सोते हुए नहीं देखा...आपने देखा है क्या। नहीं न...लेकिन इन मुहावरे बाजों ने पहले तो ये साबित किया कि भैंसें सोती भी हैं, दूसरे ये भी दावा कर दिया कि उसकी नींद कुंभकर्ण से ज्यादा गहरी होती है...इसलिए तो हर बाप अपने नालायक बेटे को सोता हुआ देखकर यही कहता है कि- भैंस की तरह सोया रहता है। वैसे, गहरी नींद के कारण घोड़े वाला भी कम बदनाम नहीं हुआ...ये अलग बात है कि वो जब घोड़े को बेच लेता है तब सोता है और बेखबर सोता है। इसलिए तो घोड़ा बेचकर सोना मुहावरा बन गया। हां, मुहावरों की दुनिया में मुर्गियों की कोई बख़त नहीं। इसलिए तो मुर्गियों को लेकर कहा गया कि घर की मुर्गी दाल बराबर। पता नहीं इस वक्त मुझे एक फिल्मी गीत याद आ रहा है- कौआ हंस की चाल चला, लंगड़ाकर थोड़ा-थोड़ा एक गधे ने कोशिश की वो फिर बन जाए घोड़ा, देखो चाल न छूटे, देखो चाल न छूटे।

3 comments:

Archana said...

kahi suna hai--"apani gali me to kutte bhi sher hote hai."aur "kutto ke muh koun lage".

Udan Tashtari said...

चलिए, बिना दुखी हुए जो हुआ उसे भूल जायें और आगे चलें..लंगड़ा कर थोड़ा थोड़ा. हा हा..सिर्फ मुहावरा प्रयोग उद्देश्य है..:)

परमजीत बाली said...

अब भैस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा....चलो अच्छा है आपने गलती सुधार ली।वैसे हमनें भी कौन-सी पकड़ ली थी:)