Pages

Tuesday, February 24, 2009

कहानी की जय हो !


क्या कहानी का वज़ूद ख़त्म हो गया है? क्या कहानियां अप्रासंगिक हो गई हैं? या फिर कहानियों को पाठक नहीं मिलते? ... अंत में, क्या कहानियों के साथ-साथ कथाकार भी अपना मयार खो चुके हैं।... शायद स्लमडॉग को बेशुमार सफलता और उससे भी पहले कहानीकार विकास स्वरूप का लिखा उपन्यास –क्यू एंड ए या उसका हिंदी रूपांतरण- कौन बनेगा करोड़पति- इन तमाम सवालों का जवाब है। टीवी जर्नलिस्ट नीरज इन सवालों का ही विचार करते हुए अंत में कहते हैं- कहानी की जय हो, महाराज ! –संजीव

सुरीले रहमान ने ऑस्कर का सूखा ख़त्म कर दिया है। लॉस एंजेल्स में जय- जय की गूंज पूरी दुनिया में समा गई है। वंडर ब्वॉय रहमान पर तो हम भारतीय पहले से ही फख्र करते रहे हैं, अब पूरी दुनिया ने हमारी पसंद पर मुहर लगा दी है। गीतकार ग़ुलजार का ये बड़प्पन ही है कि वो ऑस्कर की जीत का पूरा श्रेय संगीतकार रहमान और गायक सुखविंदर को दे रहे हैं।... लेकिन ऑस्कर समारोह की पूरी चमक –दमक और मीडिया अट्रैक्शन के बीच एक बात पता नहीं कितने लोगों को खटकी। स्लमडॉग का ताना- बाना जिसने बुना।... एक जादुई यथार्थवाद पर आधारित शानदार कहानी लिखी, जिसने पहले फिल्म और बाद में ऑस्कर तक का सफ़र तय किया...वही शख़्स पूरे परिदृश्य से ग़ायब दिखा। वो हैं कहानीकार विकास स्वरूप। ऑस्कर में जीत के बाद स्लमडॉग की पूरी टीम नज़र आई। फिल्म के डायरेक्टर, कलाकार से लेकर तकनीशियन तक की प्रतिक्रिया ली गई। लेकिन विकास स्वरूप इनमें कहीं नहीं थे। फिल्म मीडियम की एक कड़वी सच्चाई के रूप में इसे आप देख सकते हैं। फिल्म के कहानीकार इस कामयाबी में कहीं नहीं हैं। ...उन्हें किसी तरह की क्रेडिट नहीं दी गई। लेकिन इसी कहानी के एडोप्शन स्क्रीन प्ले के लिए साइमन ब्यूफए को ऑस्कर से नवाजा जा चुका है। एक कहानी जो फिल्म के रूप में बेशुमार शोहरत बटोरते हुए ऑस्कर अवॉर्ड तक ले आई, उसका कहानीकार कहीं पीछे छूट गया। फ़िल्म रंग दे बसंती के लेखक कमलेश पांडे की वो बात मुझे याद आती है- फिल्म मेकर्स कहानीकारों को कंडोम की तरह इस्तेमाल करते हैं। स्लमडॉग के डायरेक्टर डैनी बॉयल ने भी संभवतः विकास स्वरूप का कुछ ऐसा ही इस्तेमाल किया हो तो मुझे पता नहीं। स्लमडाग को अवॉर्ड मिलने के तुरंत बाद निर्देशक मधुर भंडारकर की प्रतिक्रिया थी कि अच्छी फ़िल्म तभी बनती है जब कहानी बेहतर हो। लेकिन सवाल ये भी है कि अच्छा और मौलिक लिखने वालों की फ़िल्म मेकर्स ने कद्र ही कब की है। हां, बॉलीवुड में जावेद अख़्तर को आप जरूर अपवाद मान सकते हैं, जो कि ब्रांड एंडोर्समेंट में भी नज़र आ रहे हैं। लेकिन बाकी के लेखक और पटकथा लेखक फिल्म की कामयाबी के बाद कहां और कब गुम हो जाते हैं, पता भी नहीं चलता।
अब बात विकास स्वरूप साहब की। राजनयिक और लेखक विकास स्वरूप का ये पहला उपन्यास है – क्यू एंड ए। इसी पर फिल्म स्लमडॉग बनी है। हालांकि फिल्म पुस्तक से काफी अलग बनी है- ये स्वयं विकास स्वरूप भी मानते हैं। उन्होंने बीबीसी से एक साक्षात्कार के दौरान इस फिल्म के बारे में बातचीत की थी। विकास स्वरूप दक्षिण अफ्रीका में भारतीय उप उच्चायुक्त हैं और इससे पहले ब्रिटेन, अमेरिका और तुर्की में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। इलाहाबाद के रहने वाले विकास स्वरूप 2003 में लंदन में अपनी पोस्टिंग के दौरान अपना उपन्यास क्यू एंड ए लिखा था। उस वक्त हिंदुस्तान में कौन बनेगा करोड़पति की बेहद चर्चा थी और उन्होंने महज दो महीने के भीतर अपने उपन्यास को पूरा कर लिया।... उपन्यास क्यू एंड ए या उसके हिंदी संस्करण कौन बनेगा करोड़पति पढ़ने वालों को यह मानने में कतई हिचकिचाहट नहीं होगी कि ये अपने दौर की बेहद प्रयोगधर्मी और रोचक क़िताब है। इसे पढ़ने की शुरुआत के साथ ही इसे ख़त्म करने की ज़िद एक पाठक के तौर पर जरूर होगी। इसपर फिल्म बनने से काफी पहले ये उपन्यास इंटरनेशनल बेस्टसेलर की होड़ में आ गया। चालीस भाषाओं में इस उपन्यास का अनुवाद हो चुका है। कहने का मतलब ये कि विकास स्वरूप का उपन्यास अपनी शोहरत के लिए किसी फिल्म का मोहताज नहीं था। क्योंकि फिल्म तो उपन्यास की ख्याति के बाद बनी। इसलिए ऑस्कर की पूरी चमक के बीच इस महत्वपूर्ण कहानीकार का चेहरा नदारत रहना, थोड़ा मायूस करने वाला था। ख़ैर, हम सब मिलकर कहें विकास स्वरूप की जय... कहानी की जय। साथ ही विकास का दूसरा उपन्यास –सिक्स सस्पेक्ट्स- 28 जुलाई को रिलीज़ हो रहा है। हम उस उपन्यास की क़ामयाबी की भी शुभकामनाएं देना नहीं भूलेंगे।

3 comments:

नारदमुनि said...

jai hi janab jai ho. narayan narayan

vijay gaur/विजय गौड़ said...

द्रश्य और पटकथा का यह माध्यम द्रशकों की स्म्रति में भी द्रश्य के रूप में ही दर्ज हो रहा होता, लेकिन निर्देशक को चाहिए की वह अपने द्रशकों को उस वास्तविकता से बार बार अवगत कराता रहे। पर महत्वाकांछाओं का चमकीला मंजर उसे ऎसा करने से रोकता ही है यह कोई पहली बार नहीं है। पर आपकी चिन्ता वाजिब है। वैसे स्पष्ट कर दूं मित्र मै इस फ़िल्म के कंस्पट से सहमत नहीं हूं जो जनता के संघर्षों को दरकिनार कर उसकी समस्या के निदान की बजाय पूंजी की महत्ता को स्थापित करता है। हां फ़िल्मांकन के लिहाज से बेशक बहुत सी खूबसूरतियां है। यहां सवाल है कि कला कला के लिए या उसके कोई अन्य मायने है ?

rakeshmishra said...

bhoot khoob, Aapki bhi JAY HO