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Friday, February 27, 2009

अब एक नया किस्सा

मित्रों, पत्रकारिता में पिछले कुछ वर्षों से हूं। इच्छा थी कि कभी पत्रकारिता के पूरे चरित्र पर आपसे बात करूं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों के बारे में जो कुछ समझा उसे किस्से वाले फ्लेवर के साथ आपसे कहूं...। आपको इन चमकते- दमकते मीडिया हाउसेज के भीतर ले जाकर सबसे आपकी मुलाकात कराऊंगा। अंदाज कुछ ऐसा रखने की कोशिश करूंगा जिससे ग़ैर पत्रकारों को भी इसे पढ़ते हुए उतना ही मजा आए। हां, एक और बात... ये किसी मीडिया हाउस के ख़िलाफ कोई ख़ुलासा नहीं है। इसलिए पत्रकारों और संस्थान के नाम का उल्लेख जानबूझकर नहीं किया जाएगा। लेकिन घटनाएं बिल्कुल सच्ची होंगी...इतनी गारंटी है। एकाध दिनों के भीतर इस किस्से की पहली किस्त आप पढ़ सकेंगे। धन्यवाद।

4 comments:

अंशुमाली रस्तोगी said...

जल्द दें हम इंतजार में हैं।

संगीता पुरी said...

लेकिन घटनाएं बिल्कुल सच्ची होंगी...इतनी गारंटी है .... इंतजार है सच्‍ची घटनाओं का।

uday said...

ummid ba ki hamaro kahani raura ke yad jaroor aye...raura ham ego media house ke sachchi ghatana se rubaru karawale rahin..ummid ba sachi ghatama men uho sumar jaroor hoi...baki raura likhe la suroo karin..jaroor majedar hoi..hamara ora se raura advance men badhai

kundan shashiraj said...

जल्द लिखें सर, बड़ी बेसब्री से इंतज़ार है हमें....