Pages

Tuesday, March 31, 2009

...एक एड्स रोगी की मौत

पत्रकारिता में कई ऐसे अवसर आते हैं जब एक आदमी के तौर पर भी आपकी पहचान होती है। मेरे साथ भी कुछेक बार ऐसा ही हुआ। मैं ऐसे समय में पत्रकारिता में आया जब बहुत सारे चेंजेज आ रहे थे। बीमारी के रूप में एड्स जैसी भयावह बीमारी भी उसी वक़्त आम होने जा रही थी... वैसे, हम सब शुरू में यही मानकर चल रहे थे कि ये कोई नाइजीरियन बीमारी है जिसका हिंदुस्तान में कोई असर नहीं होने वाला...दरअसल, हम बेहद छोटी बुद्धि और छोटे नजरिये वाले लोग थे।
(भागः पांच) – मैं जिस अख़बार में काम करता था, उसके मुख्य पृष्ठ पर एक सिंगल कॉलम की ख़बर छपी। हेडिंग थी कि एड्स रोगी मरा, इलाके में सनसनी। ख़बर की तफ्सील ये थी कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के खेकड़ा तहसील में एक युवक की मौत हो गई, जिसे एड्स था। एम्स ने इस युवक के एड्स पीड़ित होने की पुष्टि कर दी थी। ख़बर के मुताबिक युवक ट्रक ड्राईवर था और कभी बिहार गया था जहां एक्सीडेंट होने पर वहां के स्थानीय अस्पताल में उसे जब भर्ती कराया गया तो एड्स संक्रमित खून चढ़ने से युवक को एड्स हो गया और युवक की मौत हो गई।– उस वक़्त ये बहुत बड़ी ख़बर थी जिसे सिंगल कॉलम में निबटाकर तक़रीबन अपराध किया गया था। ये वह दौर था जब किसी अस्पताल में एड्स रोगी को देखकर अन्य रोगी तो क्या डॉक्टर भी दौड़कर भाग खड़े होते थे। कुछेक जगहों पर तो एड्स रोगियों को पथराव करके अस्पताल से भगा दिए जाने की भी घटनाएं सुनने को मिली थी। ...तो मैं इस खबर को पढ़कर हिल गया। मैंने रोजाना होने वाली सुबह की मीटिंग में अपने बॉस से कहा कि ये ख़बर बेहतर जगह की मांग करती थी। बॉस ने कहा कि तो अब तुम कर लो। खेकड़ा जाने के लिए एक साथी फोटोग्राफर अपनी गाड़ी लेकर आए...और हम चल पड़े बागपत की तरफ़। खेकड़ा में हमारा वही संवाददाता था जिसने ये ख़बर लिखी थी। सबसे पहले हम उसके पास गए और कहा कि उस गांव ले चलो जहां एड्स रोगी की मौत हुई... पहले तो उस संवाददाता ने काफी टालमटोल की। बहुत ज़िद करने पर कहा कि गांव के मुहाने पर वो हमें छोड़ देगा। मैने उससे कहा कि तुम उस गांव में कल गए तो आज जाने में क्या हर्ज है ? उसने नाराज होते हुए कहा कि न तो मैं कल गया ..न ही आज जाऊं... हमें एड्स न लेणा... भाईसाब, तुम्हें जाणा हो तो शौक़ से जाव। हमने तो जैसा पता लगा जी तो लिख के भेज दी।... ख़ैर हमें गांव के बाहर एक चौधरी साहब के दालान पर बिठाकर हुक्का पिलाया.... और बुजुर्गों ने बड़ी ज़िद करके भरी गर्मी में एक गिलास पानी मिला हुआ दूध पीने को दिया (ऐसा करने से बताते हैं कि लू नहीं लगती)। पूरे गांव में उसी एड्स पीड़ित युवक की चर्चा थी।
वहां से हम फोटोग्राफर को लेकर उस घर गए। उसके बड़े भाई ने जो बताया वो हैरान करने वाला था। उसके बड़े भाई ने बताया कि एड्स मरीज होने की वजह से पूरे गांव ने उनका बहिष्कार कर दिया है... अंतिम संस्कार के लिए भी कोई नहीं आया। अकेले ही उन्होंने सबकुछ जैसे भी हुआ...कर दिया। यानी अकेले आदमी ने अंतिम संस्कार किया। उसके बाद उन्होंने बताया कि उनका भाई ट्रक ड्राईवर नहीं था और न ही कभी बिहार गया... अख़बार में लिखा गलत है। ख़ैर इसी बीच उन्होंने अंदर जाकर कुछ कहा और थोड़ी देर बाद लंबा घूंघट काढ़े एक महिला थाली में मट्ठा लेकर आई..। उन्होंने बताया कि मरने वाली युवक की पत्नी हैं। मैने तो गिलास उठा लिया लेकिन मेरे फोटोग्राफर ने गिलास उठाने के बाद आहिस्ते से जमीन पर रखकर उलट दिया... और मुझे कहुनी मारते हुए आंखें दिखाई कि ...साले, पी मत लियो बस... एड्स हो जावेगा।... ईमानदारी से, मैं डरा तो जरूर लेकिन एक सांस में ही गिलास उठाकर पी गया गटागट। (जारी)

Monday, March 30, 2009

फुटेज लिये हो या नहीं

पत्रकार भुवन ने अपने ब्लॉग लूज शंटिंग पर अपना एक हाहाकारी तजुर्बा लिखा है। इस अनुभव में किसी तरह का झोल या मिलावट नहीं है। पूरी तरह मौलिक भुवन का अनुभव आप भी पढ़ें... और इस आईने में खुद को भी देखें।- संजीव

कल सुबह दफ्तर से जहांगीरपुरी मेट्रो स्टेशन की तरफ जाते वक़्त हुए एक हादसे ने अभी तक मुझे सामान्य नहीं होने दिया है. सड़क पर आने जाने वालों की कमी नहीं थी. मेट्रो स्टेशन से करीब सौ मीटर की दूरी पर मेन रोड पर एक आदमी पूरी तरह आग की लपटों से घिरा हुआ बदहवास भाग रहा था. अचानक सामने आये उस आदमी को देख कर कुछ सेकंड तक तो मैं सन्न रह गया. लेकिन फिर उसे बचने की कोशिश में लग गया. पहले ही बता दिया की सड़क पर लोगों की कमी नहीं थी... लेकिन कोई भी सामने नहीं आया. मुझे समझ में नहीं आ रहा था की करू क्या..आग कैसे बुझाऊ. मैंने उस पर मिटटी डालनी शुरू की. आग इतनी तेज थी की उसके पास जाना संभव नहीं था. इस मिटटी से आग हलकी हो रही थी लेकिन बुझ नहीं रही थी. उस आदमी को जलते देख मेरी भी हालत ख़राब हो रही थी. सड़क के किनारे लोगों का जमावडा लगा हुआ था. बसे कारें रुक गई थी. लेकिन मदद के लिए कोई नहीं आया. संयोग से एक रिक्शे वाले ने अपनी सीट के नीचे से कम्बल निकाल कर दिया. तब जाकर किसी तरह आग को बुझा सका. इस बीच मैंने कई बार लोगो से आवाज लगाई, पुलिस बुलाने को कहा लेकिन सब तमाशाई बने रहे. आग बुझने के बाद मैंने पुलिस को फ़ोन किया. उस आदमी की किस्मत अच्छी थी की पुलिस और एम्बुलेंस तुंरत आ गई और उसे अस्पताल ले गई. इधर मैंने ऑफिस में भी खबर कर दी थी. उधर से पहला सवाल था जलते हुए फुटेज लिया या नहीं... इतनी देर से मैं मन ही मन वहां खड़े लोगों की ही कोस रहा था.. लेकिन उस सवाल के बाद मेरा दिमाग सन्न रह गया. कई पुरानी बाते याद आ गई. भोपाल में कॉलेज के ठीक बगल में बन रहे मेनहाल में गिर कर मर गए बच्चे के पिता से मेरे सहयोगी ने पूछा था..कैसा लग रहा है आपको... मुझे लगा अभी ये शख्स मेरे साथी की पिटाई कर दे तो क्या बुरा हो. दूसरी घटना तब की है जब मैं एक नामी प्रोडक्शन हॉउस में इंटर्नशिप कर रहा था. वो कई न्यूज़ चैनल्स को खबरे और प्रोग्राम बना कर देता था. काम के दौरान एक बार मैंने एक फ़ोन रिसिव किया. सामने वाला रो रो के कह रहा था की उसकी बेटी से किसी ने बलात्कार कर हत्या कर दी है. आप जल्दी से आइये... मैंने उस का पता ठिकाना नोट किया और अपने बॉस को बताया. उन्होंने पूछा प्रोफाइल क्या है. मैं उनकी बात समझ नहीं पाया. उन्होंने कहा वो आदमी करता क्या है ? मैंने कहा मजदूर है... सर की तरफ से मिले जवाब ने मुझे शून्य कर दिया. उनका कहना था की मामला बहुत लो प्रोफाइल है..खबर में जान नहीं आएगी. इन दोनों बातों ने मुझे झकझोर दिया था. फिर इतने दिनों बाद हुई इस घटना से वो बाते फिर आँखों के सामने आ गई. खैर तब तक वहा भीड़ जमा हो चुकी थी... तरह तरह की बातें..कयास.. उस आदमी के अस्पताल जाते ही मैं भी वहा से निकल गया. दिमाग में कई बातें कई सवाल घूम रहे है. कभी लगता है की मेरे सहयोगियों के सवाल भी अपनी जगह ठीक थे.. आखिर प्रोफेशंलिस्म तो इसे ही कहते है..कभी लगता है की थोडी इंसानियत भी जरूरी है. दूसरी तरफ इस वाकये के बाद इस बात का यकीन हो चला है की कल को मुझे राह चलते कुछ हो जाये तो मदद करने वाला कोई नहीं होगा. शायद यही दुनिया का दस्तूर हो गया है.

Saturday, March 28, 2009

...फिर जय श्रीराम


कहते हैं कि काठ की हांडी बार- बार तो क्या, दोबारा भी नहीं चढ़ती। लेकिन बीजेपी का मुहावरों और कहावतों पर भरोसा नहीं है। बीजेपी खुद ही मुहावरे गढ़ती है और जमाने के सामने नए उदाहरण पेश करती रही है। हालांकि वरुण मामले को अगर सिलसिलेवार ढंग से देखा जाय तो ये बीजेपी का चुनावी प्रपंच भर लगता है, जिसमें जज्बातों को खूनी अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश साफ नजर आती है। आईए सिलसिलेवार ढंग से देखते हैं वरुण के बहाने खेले गए हिंदू कार्ड की-

- अपने विवादास्पद भाषण को लेकर पीलीभीत में सरेंडर करने वाले वरुण गांधी ने कानून को लेकर अपने विचार जाहिर किये। उन्होंने कहा कि कानून का सम्मान करते हुए वो सरेंडर करने आए हैं। कानून के दायरे में अपने हिंदु भाईयों और समाज के लिए लड़ाई जारी रखने का ऐलान किया। ...लेकिन यही वरुण गांधी अपने विवादास्पद भाषण में कहते हैं कि हिंदुओं पर उठने वाले हाथ को काट डालेंगे। शायद वरुण गांधी को पता नहीं था कि हिंदुस्तान में कानून का राज है और यहां आरोपी की सजा कानून के तहत तय होती है। और ये अदालत का काम है...वरुण गांधी या उनकी भगवा मंडली किसी को सजा देने के लिए अधिकृत नहीं है।... न ही उनका भड़काऊ भाषण कानून के दायरे में आता है।
- वरुण गांधी ने पहले तो अपने विवादास्पद सीडी को फर्जी बताने की हरचंद कोशिशें की... दिल्ली आकर प्रेस कांफ्रेंस के जरिये भी उन्होंने दावा किया कि सीडी के साथ छेड़छाड़ की गई है। उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मुलाकात कर यही बताया कि सीडी फर्जी है... और उन्होंने भरोसा भी कर लिया। बीजेपी ने सांसें रोककर चुनाव आयोग के रुख़ का इंतजार किया। फिर अचानक वरुण और बीजेपी ..दोनों को लगा कि चुनावी समय में यही सीडी उनकी वैतरणी पार लगा सकती है। तो इसका खंडन करना भी छोड़ दिया कि सीडी फर्जी है या उससे छेड़छाड़ की गई है।
- सीडी के जारी होने पर चारों तरफ आलोचना हुई। लेकिन शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने अपने संगठन के मुखपत्र सामना में वरुण की शान में कसीदे पढ़े। बयान में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मानते हुए वरुण की पीठ थपथपाई। बदले में वरुण ने भी बाल ठाकरे का फोन पर आभार जताया। ...अगर सीडी फर्जी थी तो आख़िरकार बाल ठाकरे के किस बात पर मिली शाबाशी को लेकर वरुण ने उनका आभार जताया। भगवान जाने।
- बीजेपी ने शुरू में वरुण गांधी के बयान से पल्ला झाड़ लिया था। बीजेपी इसे वरुण के निजी विचार बताती रही। लेकिन बाद में खुलकर समर्थन में आ गई। यहां तक कि वरुण गांधी जब पीलीभीत की अदालत में सरेंडर करने गए तो उनके साथ यूपी बीजेपी के वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र भी थे। इससे समझा जा सकता है कि बीजेपी वरुण के साथ किस तरह से खड़ी है। यूपी में जनाधार खो चुकी बीजेपी को इस मुद्दे पर दोबारा उम्मीद जगी है।
- इस मसले पर बीजेपी का अंदरूनी लोकतंत्र खुलकर सामने आ गया है... और एनडीए के घटक दल भी सवालों के घेरे में हैं। इस बयान की बीजेपी के मुस्लिम नेताओं शाहनवाज हुसैन और मुख़्तार अब्बास नक़वी ने कड़ी आलोचना की। लेकिन बाद में क्यों ये दोनों नेता ख़ामोश हो गए... या उन्हें पार्टी ने किस तरह से ख़ामोश किया। घटक दलों में बिहार की जेडीयू ने आलोचना तो की लेकिन कोई सख़्त रवैया अपनाने से परहेज किया।
- कांग्रेस अजीबोगरीब स्थिति में फंस गई। वरुण गांधी के गांधी परिवार से जुड़े होने की वजह से बहुत आक्रमक नहीं हो पाई। लेकिन बाद में कहा कि आडवाणी चाहें तो इस ड्रामे को खत्म कर सकते हैं क्योंकि इस ड्रामे की पटकथा आडवाणी जी ने ही लिखी है। ...बाकी पार्टी यूपी की मायावती सरकार की तरफ से की गई कार्रवाइयों पर भी नजर रखेगी। ...वाह।

Friday, March 27, 2009

फक़त एक ख़बर का सवाल है...बाबा

आज मैं आपको न्यूज़ रूम में ले जाना चाहता हूं... गेस्ट एडिटर बनाकर। (सिर्फ अपने वेब पेज पन्ने का ही सही)। आपको दिनभर में से सिर्फ एक ख़बर तय करनी है... जो उस दिन की सबसे बड़ी ख़बर होगी... आपको सिर्फ और सिर्फ ख़बर बतानी है...टीआरपी या विज्ञापन की चिंता किये बग़ैर। आपकी सहूलियत के लिए क्रमवार कुछ बड़ी ख़बरें भी दे रहा हूं। आपको इनमें से सिर्फ और सिर्फ एक ख़बर बतानी है जो होगी सबसे ख़ास ख़बर। आप इनमें से किसी को भी ख़बर नहीं मानने के लिए भी स्वतंत्र हैं.. और कुछ नई ख़बर भी बता सकते हैं। हां, हम इसके लिए कोई ईनाम नहीं घोषित करने जा रहे हैं... ये ख़बरों को लेकर एक नई बहस शुरू करने का तरीका है। इससे खुद मुझे भी ख़बरों को लेकर अपनी समझ बनाने का मौक़ा मिलेगा। धन्यवाद।

1. नया पैंतराः चुनावों में राममंदिर मुद्दे को भुनाने में विफल रही बीजेपी वरुण गांधी के भड़काऊ भाषण विवाद को अपना नया पैंतरा बनाने जा रही है। बीजेपी इसबार वरुण मुद्दे के बहाने हिंदू कार्ड खेलने की कोशिश करेगी। वरुण गांधी ने अपनी अग्रिम जमानत की याचिका वापस ले ली है। वरुण को किसी भी समय ग़िरफ़्तार किया जा सकता है। बीजेपी वरुण की ग़िरफ्तारी को भी चुनावों में भुनाने की ताक में है।

2. इस्तीफ़ाः गुजरात की समाज कल्याण मंत्री रहीं मायाबेन कोडनानी ने एसआईटी के सामने समर्पण सरेंडर कर दिया है। मायाबेन नरोडा पाटिया दंगों की आरोपी हैं। 2002 में गुजरात दंगों के दौरान नरोडा पाटिया में हिंसा भड़की थी जिसमें 83 लोग मारे गए थे। मायाबेन उस वक्त यहां की विधायक थीं और उनपर दंगों के दौरान खुद ही दंगाइयों के नेतृत्व करने का आरोप है। अदालत ने उनकी अग्रिम याचिका को खारिज कर दिया।

3. पाक़िस्तान में धमाकाः पाक़िस्तान के ख़ैबर के पास एक मस्जिद पर हुए आत्मघाती हमले में 80 से अधिक लोगों की मौत हो गई है। हमले में हताहतों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

4. स्विस बैंकः स्विस बैंक के इस खुलासे ने भारत के चुनावी मुद्दे को गर्मा दिया है जिसमें बताया गया था कि स्विस बैंक में भारतीयों के 72 हजार अस्सी हजार करोड़ जमा हैं। जेडीयू नेता शरद यादव का कहना है कि ये धनराशि भारत लाई जानी चाहिए... अन्यथा इसे सरकार के ख़िलाफ चुनावी मुद्दा बनाया जाएगा।

5. बैकफुट परः माही की अगुवाई में लगातार नई बुलंदियां छू रही टीम इंडिया की तात्कालिक कमान वीरेंद्र सहवाग के हाथों आते ही बैक फुट पर आ गई है। नेपियर टेस्ट में पहले तो टीम इंडिया के गेंदबाजों ने खूब रन लुटाए और अब भारतीय बल्लेबाज भी घुटनों के बल पर आते दिख रहे हैं।

Wednesday, March 25, 2009

तोड़फोड़ मामलों के विशेषज्ञ वरुण भाई की सेवा में


विरोधी कुलबुला रहे हैं। मीडिया वाले रह- रहकर चिचिया रहे हैं... कभी यहां से बाइट ले तो कभी वहां से। वीजुअल्स के नाम पर ज़हरीली सीडी जमाने को दिखा रहे हैं। देखो- देखो एक और बौरा गया। सियासत के गलियारों में एक और उन्मादी नफ़रत का नश्तर लेकर खुलेआम घूम रहा है। विरोधी कहने लगे कि निकालो इसे सियासत के गलियारों से बाहर। कहने लगे कि बीजेपी की चाल है... नया ड्रामा है। साथी दल कह रहे हैं कि संभालो भाई इसे... ये तो हमारा भी सत्यानाश कर देगा। सब तरफ से दुरदुराया जा रहा था तो पार्टी खामोश थी। ... मगर हिंदू शिरोमणि बाला साहब तो जैसे नफरत के इस नए अवतार पर फिदा हो गए। उन्होंने अभयदान देकर कहा कि –लगे रहो वरुण भाई।...अब तो बीजेपी भी चैतन्य हो गई...और बयान उछाल दिया कि पार्टी उनके साथ खड़ी है। कांग्रियों की हालत सांस- छुछुंदर –सी थी। सो, सतर्कता के साथ कह दिया कि ये तो संगत का असर है।... संगत बुरी हो तो हौले- हौले हो ही जाता है बुरा आदमी। हिंदुस्तान तो क्या पाक़िस्तानी ब्लॉगर्स भी कह रहे हैं कि मुसलमानों पर नफरत का तोप दागा जा रहा है। जयश्री राम... गीता की कसम खाकर कहता हूं, मैं उसका हाथ काट दूंगा। ...इशारे से ख़बरदार भी कर रहे हैं... अपने ही एक हाथ की कलाई पर दूसरे हाथ की उंगलियों से काट- काट डालने का इशारा करते हैं। ...बड़े गहरे संकेत हैं।... खुद वरुण के लिए। ...नाम में गांधी इसलिए नहीं लगा रहा हूं कि गांधी की आत्मा को बार- बार कलपाने का पाप नहीं लेना चाहता। ...तो मुसलमानों को जाने क्या- क्या बताते हुए गीता की कसम खाते हैं। इशारा अपनी ही कलाई को काटकर करते हैं। ...शरीर से एक हाथ को जुदा करने का इरादा है वरुण का। ...खूब थुक्का- फजीहत हुई। होनी ही थी। रातोंरात वरुण की टीआरपी आसमान छूने लगी। तुलना होने लगी संजय गांधी से... सॉरी.. गांधी परिवार के इस मूर्धन्य नेता के नाम में भी गांधी लगाने के लिए फिर- फिर क्षमा चाहूंगा। हां तो... संजय ने अपने समय में जबरन नसबंदी की मुहिम चलाई...और शिकार हुए वही। लगता है संजय की आत्मा भी बीजेपी के आसपास ही बसती रही होगी। चूंकि हिंदू हृदय सम्राटों का अपना संगठन बीजेपी उस वक़्त नहीं था... लेकिन नफ़रत की सियासत तो थी। घृणावाद तो था। सो, संजय अपने हिसाब से नफ़रत का मोर्चा संभाल रहे थे।... जाने भी दो अब संजय को, वरुण पर आते हैं। संजय विमान दुर्घटना के शिकार क्या हुए... गांधी परिवार में बहू मेनका का दम घुटने लगा... वहां शक्तिशाली सास इंदिरा का राज था। सो, मेनका अपने इसी नन्हे से वरुण को कमर पर लादे उस घर से बाहर आ गईं... उस समय रविवार के मुखपृष्ठ पर यही तस्वीर छपी थी- मां मेनका अपनी कमर पर वरुण को लादे ससुराल से बाहर आ रही हैं। गोरा –चिट्टा गुड्डा सा दिखता वरुण।... फिर एक लंबा कट।
...वर्षों बाद अचानक वरुण जमाने के सामने आए। लाल टीका लगाए बीजेपी के भगवा झंडे के साथ।... ठीक विरोधी विचारधारा वाली पार्टी के साथ खड़े होकर कोई खलबली पैदा नहीं कर सके। पार्टी ने टिकट भी नहीं दिया और न ही संगठन का कोई अहम ओहदा... शक्तिशाली इंदिरा गांधी का परपोता फ़कत एक सीट के लिए तरस गया... जब टिकट मिला तो जीत की छटपटाहट और बढ़ गई। हारने के बुरे- बुरे ख्वाब आने लगे.... कसम से। तो ऐसे में वरुण भाई का कोई सर्किट उनके कान में फुसफुसा गया- भाई ऐसे नहीं चलेगा... कहानी में कुछ झोल... कुछ सनसनी... कुछ काटा-पीटा न हो तो टीआरपी मिलेगी कहां से... राज भाई का उदाहरण दिया... मोदी भाई की नज़ीर दी... क्या चकाचक राजनीति चल रही है इनकी। वरुण भाई को बात समझ में आ गई। अब उनके ख्वाब में मोदी भाई –राज भाई की शोहरत में चमकती- दमकती दुनिया आने लगी। महत्वाकांक्षा परवान चढ़ने लगी। ... एकबार भगवाधारियों ने मंदिर के लिए राम की कसम खाई और दिल्ली की गद्दी पर राज किया। ...अबकी वरुण भाई ने गीता की कसम खाई है तो देखिये आगे- आगे होता है क्या।

Sunday, March 22, 2009

..एटीएम मशीन की क़ीमत क्या है भाई


पत्रकारिता के अनुभव के साथ इसबार उस वक़्त हुए अहम बदलावों के बारे में भी बताना चाहूंगा। हालांकि इसका पत्रकारिता से कोई लेना- देना नहीं है... लेकिन बदलाव का वह दौर हम सबके जीवन में काफी अहम था। इसलिए इसकी चर्चा कर रहा हूं। पढ़कर देखिये... शायद आप पसंद करेंगे।

(भाग- चार)- जिस अख़बार में मैं नौकरी करता था, वहां शुरु में तो कैश सैलरी दिए जाने की व्यवस्था थी। अकाउंटेंट.. एक-एक कर्मचारी को बुलता जाता और हस्ताक्षर लेकर उसकी पग़ार हाथ में थमा देता। लेकिन ये सिलसिला कुछेक वर्षों में ही ख़त्म हो गया। बैंकों के जरिये तनख्वाह दिए जाने की व्यवस्था की गई। लेकिन बैंकों से तनख्वाह लेना कम ज़िहादी काम नहीं था। होता ये था कि जिस दिन बैंक में सैलरी जाती थी, उस दिन दफ़्तर में बता दिया जाता था। सैलरी आने की ख़बर सरेबाजार होते ही दूसरे दिन सुबह- सुबह बैंक की उस शाखा में भीड़ लग जाती। बैंक अपने निर्धारित समय पर खुलता और कैश काउंटर का नजारा ऐसा होता जैसे सिनेमा की टिकट खिड़कियों में पहले अक्सर ऐसे दृश्य देखने को मिलते। सुबह में जाकर हम पहले वाउचर लेते और उसपर रक़म भरकर जमा कराते। एक टोकन मिलता जिसपर एक नंबर होता। बैठने की कोई जगह नहीं थी... न ही जिसकी बारी आती, उसका नंबर डिस्प्ले होता... बस उसका नंबर पुकारा जाता। अपना नंबर आते- आते दोपहर हो जाती और दफ़्तर जाने का वक़्त भी होने को जाता। दोपहर बाद काफी मशक्कत करते हुए भुगतान लेता... इस दौरान कई बार शर्ट के एकाध बटन तक टूट गए... औरों से जोर- आजमाईश में। कई बार झगड़ा- झंझट की स्थिति भी पैदा हो गई। खैर, वहां से निकलकर सबसे पहले हम कुछ दोस्तों के साथ रास्ते में पड़ने वाले घंटाघर पर जमा होते और वहां बनाना शेक का दौर चलता...। एक.. दो... तीसरा गिलास आते –आते बम बोल जाता। तीस- तीस रुपये देकर घर की तरफ भागते... और वहां से दफ़्तर तक हांफते- हूंफते पहुंचते।
ये सिलसिला भी ज्यादा नहीं चला। अख़बार में सबके पास सूचना भिजवाई गई कि एक विदेशी बैंक का खाता खोला जाना है और उसमें सैलरी जाएगी। हमने भी अकाउंट में अपना नाम- पता और फोटो दे दिया। हफ्ते भर बाद एक लिफाफ मिला जिसमें एक चेकबुक जो मेरे नाम से छपा था और साथ में एक कार्ड भी था। कार्ड बहुत समझ में नहीं आया तो घर पर रख दिया। ... इसबार सैलरी लेने पहुंचा दो इस बैंक को पहली बार देखा... खूबसूरत लड़कियां अलग- अलग काउंटर की जानकारी दे रही थीं... ग्राहकों के बैठने के लिए चकाचक सोफे। चेक जमा कराया और सोफे पर तनकर बैठ गए। वातावरण में खुशबू थी और बैंक के सुंदर- सुंदर चेहरे को तकते हुए कब वक्त बीत गया पता ही नहीं चला। बामुश्किल पंद्रह मिनट के भीतर कैश मिल गया और हम फिर घंटाघर पहुंच गये।
कुछ महीने बाद मेरे एक मित्र थे गंगेश जी। एकदिन रास्ते में मिले तो मैने बताया कि सैलरी लेने बैंक जा रहा हूं... उन्होंने कहा कि आपका एटीएम नहीं मिला क्या। मैने कहा मिल गया लेकिन मै इस्तेमाल नहीं करता हूं। (दरअसल मुझे एटीएम के इस्तेमाल का पता ही नहीं था...। एटीएम का दरवाजा उस समय कार्ड डालने पर खुलता और फिर भीतर से बंद हो जाता। निकलने के लिए दोबारा कार्ड डालना पड़ता।... सो अंदर जाते हुए डर लगता और कभी गया ही नहीं। लेकिन गंगेश जी पर जाहिर भी नहीं होने देना चाहता था कि मैं कितना जाहिल हूं।) उन्होंने हैरानी जताई कि क्यों आप धक्के खाने जाते हैं... मैने कहा कि मजा आता है। हंसने लगे... कहा कि आपने कभी एटीएम कार्ड का इस्तेमाल किया भी है कि नहीं... अब मैं कहूं तो क्या... मुझे चुप देखकर अपनी मोटरसाइकिल पर पहले मेरे घर ले गए जहां से लिफाफाबंद एटीएम कार्ड लिया और फिर वहां से पास के ही एटीएम में अपने साथ ले गए। ... सबकुछ बताया... पैसे जब निकल गए तो भी शुरु में तीन- चार बार गंगेश जी को ही जबरन अपने साथ एटीएम ले जाता।
ख़ैर। अजीब दौर था वो। तक़रीबन उसी समय सभी रिपोर्टरों को मोबाइल अनिवार्य कर दिया गया तो मुझे भी ख़रीदना पड़ा। ...एक फोटो देखकर अब भी हंसी फूट पड़ती है अपने जाहिलपने पर... जब देखता हूं कि मोबाइल खरीदने पर खुशी से फूला समाया मैं.. अपने दोस्तों के साथ खड़ा हूं और हाथ में मोबाइल इस स्टाइल में पकड़ रखा है जैसे कोहिनूर हीरा हाथ लग गया हो।
...तो जिंदगी में रोज नई –नई चीजें आ रही थीं। उसी समय उसी विदेशी बैंक का एक एजेंट मेरे दफ्तर में आया और कहने लगा खाता खुलवा लो। मैं और मेरे कुछ सहयोगी तफ़रीह के मूड में थे सो कहा कि क्या- क्या सुविधा दोगे। उसने कहा कि लोन ले सकते हैं ...एटीएम की सुविधा है और फलां- फलां। हमने कहा कि लोन दे सकते हो तो ये बताओ कि एटीएम मशीन की क्या कीमत है। उसने कहा कि आप समझे नहीं ...एटीएम मशीन बिकती नहीं है... उससे तो नोट निकलते हैं। हमने कहा कि बैंक में पता करो... चाहे कितने लाख हो... हमे मशीन दे दो और हम उस मशीन से रुपये निकालकर तुम्हारा लोन चुका देंगे। ... कम-से-कम दस बार समझाने के बावजूद जब हम समझने को राजी नहीं हुए तो उसने कहा कि भाई साहब ..आपलोग पढ़े- लिखे भी हो या फिर ऐसे ही चले आए। बहुत लाल- पीला होता देख मेरे एक सहयोगी ने बताया कि हम तो तुम्हारी परीक्षा ले रहे थे कि तुम अपने कस्टमर को कैसे एटीएम के बारे में बताते हो... हम सब तो तुम्हारे बैंक में खाता भी खुलवा चुके हैं। ...एजेंट सिर धुनता हुआ निकल लिया। (जारी)

Thursday, March 19, 2009

हम समझते कि वायरस कोई पिल्लू है


दोस्तों, पत्रकारिता के इतिहास में चुग़ली कला और कंप्यूटर के तकनीकी ज्ञान का अलग- अलग महात्म है। चुगली कला का ज़िक्र तो फिर कभी करेंगे लेकिन इस वक्त कंप्यूटर की बात करते हैं... जिसने पत्रकारिता की दिशा बदल दी। सूचनाओं और सुविधाओं के नए द्वार खोल दिए। ...उससे जुड़े कुछ रोचक किस्से। कैसा था अख़बारों की दुनिया में कंप्यूटर का प्रवेश।- संजीव

( भाग- तीन) बात शायद 1995 की है। जिस अख़बार में ट्रेनी की हैसियत से लगा था वहां तीन कंप्यूटर लगाए गए। ये पहला मौका था जब हिंदी पट्टी के अख़बार में कंप्यूटर के इस्तेमाल का प्रयोग शुरू हुआ। कंप्यूटर का स्क्रीन ब्लैक एंड व्हाइट था और उसमें तब माउस का प्रावधान नहीं था। की बोर्ड ही एकमात्र सहारा था। ख़ैर साहब, ये तीनों कंप्यूटर एक छोटे से कमरे में लगा जिसमें एसी लगा था। उस कमरे में जूते या स्लीपर पहनकर जाने पर पाबंदी थी। ऑपरेटर जो था उसका कहना था कि धूल से कंप्यूटर के ख़राब होने का ख़तरा है। हम उस ऑपरेटर साहब की बातें बड़े ग़ौर से सुनते... तो अजीब- अजीब बातें सुनने को मिलती। उसका कहना था कि कोई पान- तंबाकू खाकर कंप्यूटर रूम में न जाए। ...वो बताता था कि इससे कंप्यूटर में वायरस आने का ख़तरा था। गांव में पला- बढ़ा मैं और मेरे सहयोगी भला क्या जाने वायरस क्या होता है... सो उसके सामने मुंडी हिलाकर मान लेते। इसके बारे में पूछता भी तो भला किससे। धीरे- धीरे कंप्यूटर में घुसने वाले वायरस को लेकर मेरी समझदारी बन गई कि ये जरूर कोई पिल्लू है जो चुपके से जाकर कंप्यूटर स्क्रीन पर चिपक जाता है... और छुटाए नहीं छूटता। तो भाई हम इस कंप्यूटर में लगने वाले पिल्लू का खास ख्याल रखते... मगर पिल्लू जो है सो अबतक नहीं दिखा।
चूंकि कंप्यूटर हम सबके लिए अचंभे का सबब था... इसलिए उससे जुड़ा ऑपरेटर भी हम सबकी निग़ाह में खास सम्मान का हक़दार था। पूरे दफ़्तर में अकेला ऐसा आदमी था जो कंप्यूटर का मास्टर कहा जाता था...और सब कर्मचारी मौका लगते ही उसकी चिरौरी करते हुए कंप्यूटर सिखलाने का इसरार करते। हम भी सीखना तो चाहते थे लेकिन कंप्यूटर से डर लगता था। होता ये था कि जैसे ही हम की बोर्ड पर उंगली रखते तो कर्सर अपने आप भागने लगता... हम डरकर उछलने लगते और असहाय भाव से कंप्यूटर ऑपरेटर को देखने लगते। ऑपरेटर अगर वहां मौजूद न हो तो कंप्यूटर रूम में बाकायदा भगदड़ मच जाती... शिफ्ट पर उंगलियां मारकर कर्सर को रोकने की हिम्मत इसलिए नहीं पड़ती कि पता नहीं कोई नया बखेड़ा न खड़ा हो जाए।... तुर्रा ये कि इस बारे में जब ऑपरेटर को बताते कि कंप्यूटर में कुछ गड़बड़ी हो गई तो कर्सर को भागता देख... वो हमें और भी डरा देता कि ये आपने क्या कर दिया। हमारी धड़कने लगभग थम जाती और डर सताने लगता कि अब तो कंप्यूटर के ख़राब होने के कारण डेढ़ लाख रुपये हमसे वसूले जाएंगे। ऑपरेटर ने हम सबको बताया था कि साढ़े चार लाख रुपये में तीन कंप्यूटर कंपनी ने मंगवाए हैं। सो, हम कंप्यूटर से थोड़ा परहेज ही करते। वैसे, एक इंस्टीट्यूट में पता किया कि कंप्यूटर सीखने का कितना पैसा लगेगा... उसने ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा कि नौ महीने के कोर्स का खर्च लगभग दो लाख रुपये... मैने तौबा कर ली। हालांकि मोहल्ले के एक सज्जन थे जो अपने दफ़्तर में ले जाकर टाइपिंग सिखाने को राजी हुए मगर चुपके से चार हजार रुपये की मांग कर दी। हमने भी चार हजार रुपये देकर चाणक्य फॉंट में टाइप करना सीख लिया।
कंप्यूटर का ऐसा ही आधा- अधूरा ज्ञान लेकर एक नए शहर और एक नये अखबार में जब गए तो वहां भी कुछ महीनों बाद कंप्यूटर लगवाए जाने का सिलसिला शुरू हो गया। शुरू में अख़बार के मठाधीशों ने कंप्यूटर का ये कहते हुए विरोध किया कि साहब ये तो पत्रकारों को ऑपरेटर बनाने की साजिश है ...जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यानी, हम ज़ाहिल बने रहने के लिए आंदोलनकारी रुख अपनाने की तैयारी कर रहे थे। दरअसल, मठाधीशों को इसका भी डर नहीं था कि उन्हें ऑपरेटर बना दिया जाएगा... वे तो कंप्यूटर नाम के भूत से डर रहे थे जो उन्हें आता ही नहीं था।... एकदिन मेरे बॉस ने कड़ी फटकार लगाई कि एक सप्ताह के भीतर सभी रिपोर्ट कंप्यूटर पर ही फाइल करोगे... हालांकि खुद उन्होंने तीन- चार साल बाद कंप्यूटर का ज्ञान लिया। हम तो जूनियर सब एडिटर थे ...सो बॉस के आदेश पर तुरंत मान गए और कंप्यूटर सीखना शुरू किया। मुझे तो ताब थी कि मैने पहले ही कंप्यूटर पर टाइपिंग सीख ली... तो मैं शेखी बघारने लगा। लेकिन जब की बोर्ड पर उंगलियां चलाई तो पता चला कि आंय- बांय शब्द आ रहे हैं... मुझे तुरंत लगा कि मेरे साथ उस सज्जन ने धोखा किया और चार हजार रुपये झटक लिए। तब फोन- फान भी इतना सुलभ नहीं था कि उस सज्जन को गलियाऊं... अगर ऐसा होता तो वो सज्जन बच नहीं पाते। मगर बाद में जाकर पता चला कि वो सज्जन बेवजह ही मेरी गालियां खाते... वो तो फॉंट की बाजीगरी थी। उन्होंने अलग फांट में चाणक्या में सिखलाया था... लेकिन अखबार में अलग फांट था।
कंप्यूटर में सिर्फ टाइपिंग सीखी थी... उससे आगे की कोई चीज नहीं सीख पाया। पेज वगैरह बनाना तो वर्षों तक नहीं सीख पाया था। लेकिन कंप्यूटर की देखरेख करने वाले आईटी विभाग के कर्मचारियों से अजीब –अजीब चीजें सुनने को मिलतीं और हम उसके बारे में अपने हिसाब से अंदाजा लगा लेते। जैसे एकबार मेरे एक साथी के कंप्यूटर पर लिखते- लिखते हैंग हो गया तो आईटी में जाकर उसने कहा कि कंप्यूटर –चोक- हो गया है जी ...जरा चलकर देख लीजिए। ये कंप्यूटर न होकर शहर का नाला हो गया था जो चोक हो जाता था। ...उसी तरह मेरी फाइल करप्ट हो गई... तो आईटी वाले ने कहा कि ये तो करप्ट हो गया... मै सोचने लगा कि मैंने ऐसी कोई भ्रष्ट या आपत्तिजनक चीज तो टाइप की नहीं और ये आईटी महाराज इसे करप्ट मैटर बता रहे हैं।...आईटी वाला बताता कि फलां मैटर को अलग फोल्डर में ले जाकर सेव कर दो तो हम उस मैटर का प्रिंट निकालकर उसे अपने दराज में लेकर जाकर सुरक्षित कर लेते।.....उस दौर में कंप्यूटर कम थे और कर्मचारी ज्यादा। सो जिस किसी को अकेले एक कंप्यूटर मिल जाता उसे पूरे दफ़्तर में बड़े सम्मान के साथ देखा जाता। रंगीन स्क्रीन वाला कंप्यूटर तो काफी बाद में आया। हम सब उसी छोटे- छोटे स्क्रीन वाले ब्लैक एंड व्हाइट कंप्यूटरों पर टपाटप लगे रहते। अखबार चलता रहा।( जारी)

Saturday, March 14, 2009

गुडबाय गुडी... जीती रहो


जर्नलिस्ट नीरज जेड गुडी के बारे में बता रहे हैं, जो मौत के करीब आ गई हैं। -
जेड गुडी आहिस्ता- आहिस्ता मौत के क़रीब जा रही है.. और करीब... और करीब। एक बिंदास महिला, जिसने ज़िंदगी को खिलंदड़पन के साथ जीया... और जो मौत को भी अपने खिलंदड़पन का अहसास करा देना चाहती थी... लेकिन अब टूट रही है। मौत को क़रीब देख विचलित हो गई है.. क्योंकि गुडी अब किसी को देख नहीं सकती। ..अब कभी भी वो अपने दो बच्चों और पति का चेहरा नहीं देख सकती। दुनिया अब उसके लिए फ़कत स्याह सुरंग बन गई। ...अस्पताल से गुडी को उसके घर भेज दिया गया है.. इंतजार के लिए। गुडी मौत का इंतजार कर रही है।
ब्रिटिश सेलिब्रिटी जेड गुडी के बारे में मेरी जानकारी उतनी ही है, जितनी किसी भी आम हिंदुस्तानी को होगी। ब्रिटेन के चैनल फोर के एक रियलिटी शो बिग ब्रदर के जरिये शायद पहली बार गुडी का नाम सुना था.. उस शो में गुडी बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के साथ हाउसमैट थी। शो के दौरान गुडी ने नस्लीय टिप्पणी कर दी थी...इसने गुडी को रातोंरात खलनायिका बना दिया। ..जबकि शिल्पा दुनिया भर में मशहूर हो गई। उम्रदराज हो चलीं शिल्पा को ग्लैमर जगत में नई जिंदगी मिल गई।..बाद में गुडी ने भी माफी मांगकर अपनी नेकदिली दुनिया को दिखा दी। हिसाब बराबर हो गया। पिछले साल शिल्पा शेट्टी के बिग ब्रदर के इंडियन वर्जन में गुडी प्रतिभागी के तौर पर शामिल हुईं। गुडी को हिंदुस्तान बुलाया गया... मुझे अच्छी तरह याद है वो शाम.. जब मैं घर में बैठा सुकून से टीवी देख रहा था... तभी एक ख़बर आई कि सरवाइकल कैंसर की वजह से गुडी बिग बॉस छोड़कर ब्रिटेन जा रही हैं। तब जेहन में सिर्फ यही चल रहा था कि रियलिटी शो को हिट कराने के लिए जाने कौन- कौन सा हथकंडा आजमाया जाता है। लेकिन पांच- छह महीने भी नहीं गुजरे कि पता चला कि गुडी का अपने देश वापस जाना किसी हथकंडे का हिस्सा नहीं था। ..ये एक ऐसा सच था, जो किसी को भी डरा सकता था। सरवाइकल कैंसर गुडी के शरीर में इस कदर फैल चुका था कि मेडिकल साइंस जवाब दे गया।... लेकिन जिंदगी को अलग अंदाज में लेने वाली गुडी ने उस स्थिति में भी ये कहकर सबको चौंका दिया कि वो एक ऐसा रियलिटी शो करना चाहती हैं, जिसमें उनकी सच्ची मौत होगी। यानी रीयल लाइफ में मौत का सच। इसके पीछे गुडी का तर्क था कि उसने जिंदगी कैमरे के सामने बिताई। सो, मौत की आगोश में भी कैमरे के सामने ही जाना चाहती है। गुडी की एक और ख्वाहिश थी... शादी करने की। 22 फरवरी को उसने जैक ट्वीड के साथ ब्याह रचा लिया।
गुडी की जिंदगी मायूसियों का फ़साना था, जिसे बदलने की गुडी ने हरचंद कोशिशें कीं। उसका पिता बेहद कुख्यात किस्म का व्यक्ति था। ..ड्रग्स का आदी उसका पिता एंड्रयू गुडी डकैती के मामले में जेल भुगत चुका था.. और ड्रग्स के ओवरडोज़ से ही उसकी जान गई। उपेक्षित बचपन जी चुकी गुडी जिंदगी को शिद्दत के साथ जीना चाहती थी... उसने दो बच्चों के पिता जैफ ब्रैजियर और फुटबॉलर रयान के साथ भी जिंदगी के कुछ लम्हे गुजारे। मगर गुडी की कहानी महज सत्ताईस साल में आकर ठहर गई।... किसी भी समय गुडी दुनिया को अलविदा कह सकती है। उसका आख़िरी शो किस लम्हा थम जाए.. भला कौन जानता है। सो, गुडबॉय गुडी... जीती रहो।

Friday, March 13, 2009

...बस यादें रह जाती हैं

भुवन टीवी जर्नलिस्ट हैं। एक अच्छे नवोदित पत्रकार। उन्होंने अपने ब्लॉग लूज़ शंटिंग पर अपनी भोपाल यात्रा के बारे में लिखा है, जहां से उन्होंने पत्रकारिता का कोर्स किया। आप भी उसका आनंद उठाइए- संजीव
.. और भुवन कैसे हो... वो लपक कर आगे आए और मेरी ओर अपना हाथ बढ़ा दिया। उनके मुंह से अपना नाम सुन कर मैं हतप्रभ था। मैं आगे बढ़ा और उन्हें गले से लगा लिया। ये वो चाय वाले भैया थे जिनकी दुकान भोपाल के सात नंबर स्टॉप मंदिर के बगल में है। माखनलाल में पढ़ाई के दौरान मैं और मेरे दोस्त क्लास के बाद अक्सर वह बैठे रहते थे। सूखे नाले पर बनी पुलिया.... और वो चाय पर चाय के दौर। कभी-कभी सिगरेट भी चला करती थी। भैया हमेशा सिगरेट देने से पहले मुझसे कहते मत पिया करो.. सिगरेट के साथ तुम अच्छे नहीं लगते.... मैं बस मुस्कुरा देता।...
पुराने दिन मेरी आंखों के सामने घूम गया। लगा कि मैं चार साल पीछे चला गया हूँ। सब कुछ वैसा कि वैसा ही है। वही भोपाल, वही सात नंबर, वही चाय की दुकान। करीब दो साल से ज्यादा हो गए थे भोपाल गए... जब से ख़बर मिली थी की दीक्षांत समारोह की तारीख तय हो गई तब से ही ठान लिया था की भोपाल जाना है। ऑफिस से छुट्टी ली और भोपाल के लिए ट्रेन पकड़ ली। साथ में तीन दोस्तों का भी रिज़र्वेशन था। लेकिन ट्रेन में तो जैसे पूरा माखनलाल ही उमड़ पड़ा हो। हर बोगी में अपने कॉलेज के साथी मौजूद थे। हँसते-गाते मस्ती करते कब पहुंच गए पता ही नहीं लगा। हबीबगंज पर उतरते ही सब के सब हकीम भाई की चाय की दुकान पहुँच गए। थोड़ी मस्ती और हँसी मजाक के बाद अपने अपने ठिकानों पर गए और घंटे दो घंटे के बाद फिर कॉलेज में... पुराने टीचर्स और कॉलेज स्टाफ़ से मिल कर काफी ख़ुशी हो रही थी। शाम में सब समन्वय भवन में जमा हुए. डिग्री लेने के लिए गाउन पहने हम सब काफी खुश थे. कैमरे के फ्लैश लगातार चमक रहे थे. दूसरे दिन मैंने भारत भवन जाने का सोच रखा था। मै और कुछ दोस्त निकल पड़े, पहले बड़ी झील गए। देखकर बहुत अफ़सोस हुआ. झील सिमटती जा रही है.. हालत ये है की लोग पैदल ही झील के बीचो बीच मौजूद दरगाह तक चले जा रहे है। फिर पुराने दिनों की तरह सभी दोस्त फक्कड़ों की तरह पैदल ही भारत भवन के रास्ते चल दिए। अंतरंग में तो नहीं जा सके.. लेकिन बहिरंग की सीढि़यों पर बैठ कर काफी समय बिताया। कुछ तस्वीरें खिचवाई, कैंटीन में चाय पी और फिर श्यामला हिल्स की पहाड़ियों से पैदल-पैदल पोलेटेक्निक तक आ गए। शाम में एक बार फिर सभी इक्कठा हुए। हबीबगंज रेल्वे स्टेशन पर। लेकिन, इस बार एक मायूसी साथ थी। वापसी की ट्रेन जो पकड़नी थी। याद आ रहे थे वो दिन तब एक होली या दिवाली के घर जाते थे। मन में घर जाने की खुशी के साथ-साथ कुछ दिनों बाद वापस इसी स्टेशन पर मिलने की खुशी भी रहती थी। लेकिन, इस बार ऐसा नहीं था। नौ पाँच हुए और ट्रेन खुल गई। मैं भोपाल को विदा बोल दिल्ली के लिए चल पड़ा। भोपाल के दुबारा छूटने की कसक लिए मैं वापस चला आया इस दिल्ली को......

Tuesday, March 10, 2009

....रंग बरसे (चुनरवाली के साथ सब भीगे)


वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रभात जी के ब्लॉग viewfinder पर रंगों का ये मेला लगा है। एकबार वहां जाकर जरूर देखें... अपनी आंखों के सुकून के लिए। वैसे, जब कभी आपको ज़िंदगी में रंगों की जरूरत पड़े तो प्रभात जी के ब्लॉग पर उपलब्ध तस्वीरों को देख सकते हैं। रंग ही उनकी तस्वीरों की ख़ासियत है। तमाम साथियों और (अ) साथियों को होली की बहुत- बहुत शुभकामनाएं। फिर मिलेंगे... बल्कि मिलते रहेंगे। - संजीव

लगाई- बुझाई की नौकरी

(भाग- दो) लगाई –बुझाई आप समझते होंगे। कभी आप इस कला के शिकार हुए होंगे या फिर आपने किसी के ख़िलाफ़ आजमाया होगा। इस लगाई- बुझाई का अपना एक रस है। इसे ख्वामख़ाह चुगली जैसा नाम नहीं दिया जाना चाहिए। इसे फ़ितना भी कहना उचित नहीं होगा... क्योंकि ये शैतानी या कपट जैसा सख़्त नहीं है। पत्रकारिता हो या फिर आप जहां कहीं काम करते हों... आपके आसपास ऐसा किरदार जरूर मिलेगा जो काम में दक्ष हो या न हो लेकिन इस कला में उसकी अतिरिक्त दक्षता होती है। आज हम एक ऐसे ही साथी मुकेश जी (बदला हुआ नाम) का ज़िक्र करने जा रहे हैं...जो अद्भुत हैं। उनके साथ खूबी ये है कि वे अपने काम में भी दक्ष हैं और लगाई- बुझाई की उनकी अतिरिक्त योग्यता आपको चमत्कृत कर सकती है। अगर आप उनके ख़ास मित्र हैं तो आप उनकी इस कला के शिकार अक्सर हो सकते हैं। आप जब इस बारे में खुद उनसे पूछेंगे तो वे हंसते हुए न केवल स्वीकार कर लेंगे बल्कि कहेंगे कि बॉस... क्या करें, बोलते-बोलते बोल गए।... ये है मुकेश जी। हां, उनसे जुड़ी घटनाओं के आधार पर उनके बारे में कयास लगाने की गलत न करें। ( उनसे क्षमा याचना सहित)।

मुकेश जी से पुराना परिचय था लेकिन उनके नस- नस से वाक़िफ हुआ जब उनके साथ एक ही अख़बार में काम किया। वर्षों का साथ रहा। लेकिन तब उस अख़बार में चार –पांच प्रशिक्षु पत्रकारों का एक गैंग सक्रिय था। इस गैंग के थिंक टैंक मुकेश जी थे और मैं भी उसका एक मामूली सदस्य। धीरे- धीरे पता चला कि किसी के ख़िलाफ किसी दूसरे को भड़काना हो या फिर किसी की हवा बांधनी हो तो मुकेश जी पर हमारा गैंग आंख मूंदकर भरोसा कर सकता है। हमारे गैंग की एक ख़ास आदत ये थी कि उस अख़बार में जो कोई नया आए ...और हम लोगों की शरण में न आए तो वो हमारा दुश्मन हो जाता था। मुकेश जी हमारे चढ़ाने पर उस पिल पड़ते... उसकी छवि ध्वस्त करने का कोई अवसर नहीं जाने देते। मेरे रहते मुकेश जी के तीन शिकार हुए। उसमें से पहला था कमलेश। कमलेश वामपंथी मिजाज का था...निजी जिंदगी में बेहद संघर्षों से निकलकर मुंबई सहित तमाम महानगरों की पत्रकारिता का तजुर्बा रखते हुए हमारे अख़बार में आया। उससे मुकेश जी की काफी छनती... मुकेश जी अकेले रहने वाले और कमलेश परिवार वाला आदमी। मुकेश जी अक्सर उसके घर पर सुबह ही चाय पीते और देर रात तक उनका साथ बना रहता। दोनों थे बातों के बहादुर। दुनिया जहान की मार्क्सवादी- लेलिनवादी बातों से वातावरण को पका देते दोनों। कमलेश दुनिया बदलने की बात करता... क्रांति को जरूरी बताता तो मुकेश जी कहते कि अगर क्रांति करनी हो तो
अख़बार की ये बुर्जुआ व्यवस्था तो छोड़ने का साहस दिखाना पड़ेगा। ये संपादक नाम को जो चीज है... ये तो अपने को पोप समझता है और तुम जैसे लोग दुम हिलाकर उसके आगे- पीछे करने लगते हो...खाक करोगे क्रांति... कमलेश वामपंथ का लाल गलियारा तुम्हें आवाज दे रहा है.. उठो और दुनिया बदल दो।.... मित्रों, इस चढ़ावे का असर हुआ कि सुबह होते ही कमलेश पहुंच गया अख़बार के दफ़्तर... कुछ देर इंतजार किया और संपादक जी के पहुंचने पर सीधे उनके चैंबर में घुस गया। पता नहीं और क्या- क्या बातें हुई लेकिन कमलेश की आखिरी लाइन जो उसने बड़े जोर से कही थी....वो याद है। उसने संपादक से कहा कि क्या आप पोप हैं जो फ़तवे देंगे और हम उसे मान लेंगे। संपादकजी ने कमलेश को थोड़ी देर बाहर में बैठने का आदेश दिया ...कुछेक मिनट के बाद अखबार के एचआर डिपार्टमेंट का कर्मचारी संपादक जी के चैंबर में घुसा ...बाहर निकला तो उसने कमलेश को अपने साथ चलने को कहा। कमलेश आधे घंटे की कागजी कार्यवाही के बाद फाइनल हिसाब करके अखबार के दफ़्तर से बाहर जा रहा था।...हालांकि मुकेश जी को आज भी इसका अफसोस है।
एक किस्सा और याद आता है। एक और ट्रेनी आया जो संपादकजी का नजदीकी था... कोई खोसला। लिहाजा, उसने हमारे गिरोह को नजरअंदाज कर दिया। हम सब फुंके बैठे थे... मुकेश जी को कहा कि इसका बॉडी लैंग्वेज कुछ ठीक नहीं लगता। उन्होंने भरोसा दिया कि जल्द ही इसका भी हिसाब हो जाएगा।...और उसी शाम लाइब्रेरी में बैठे खोसला को मुकेश जी ने पकड़ लिया। पूछा तो पता चला ट्रेनी लगा है और अंग्रेजी मीडियम से पढ़ा-लिखा है। मुकेश जी ने उसे कहा कि यहां कहां ऐसी- तैसी कराने आ गए...और जब आ ही गए हो तो लाला एक काम करो। अंदर की बात ये है कि तुम्हारे जैसे होनहार का ट्रेनी होना शर्म की बात है... यहां संपादक का पद जल्द ही खाली हो रहा है... अभी जो संपादक हैं उनका तबादला होना है। तो आप उसी पद के लिए तत्काल आवेदन कर दो। उसने कहा कि...ठीक है... लेकिन संपादक जी से रात में बात करके कल दे दूंगा। मुकेश जी ने दन से कहा कि कल तक तो देर हो जाएगी... आज इसी वक्त लिखो आवेदन... लाओ कागज-कलम.. मैं उसका मजमून समझा देता हूं। मुकेश जी ने उससे लिखवाया- सेवा में निदेशक। विश्वस्त सूत्रों से खबर मिली है कि आपके यहां संपादक का पद शीघ्र खाली होने जा रहा है... मैं इस पद के लिए अपना दावा पेश करता हूं। -केवल आपका ही, खोसला। मुकेश जी ने कहा कि ये आवेदन पत्र आप संपादक जी को ही दे दो, उनके जरिये निदेशक तक पहुंच जाएगा। खोसला ने ऐसा ही किया। आवेदन पत्र देखकर संपादक जी ने क्या- कुछ कहा होगा ये समझा जा सकता है। दस दिनों बाद अचानक शहर में खोसला दिखा... मुझे नहीं पता था कि उसका क्या हुआ। मैने उसे आवाज देकर बुलाया- तो उसने बताया कि वो स्कूल से लौट रहा है...वहीं टीचर लग गया है। अखबार से तो उसका उसी दिन हिसाब हो गया।
मुकेश जी का एक और शिकार।... आपने गौर किया होगा कि आप ख्वामखाह किसी पर चिढ़ जाते हैं। वैसा ही एक जायसवाल नाम का युवक अख़बार में आया... तो हमारा गैंग उसपर बेवजह नाराज होने लगा। उसी अखबार में एक लड़की थी जो उसवक्त जींस –शर्ट में दफ्तर आती जब अखबारों में लड़कियों के काम करने का चलन बहुत नहीं था। लेकिन लड़की जो थी आजाद ख्याल थी और दफ्तर से घर जाने वक्त सभी डेस्क पर सभी से हाथ मिलाने के बाद स्कूटी से घर वापस जाती। जायसवाल नया- नया था इसलिए सबसे संकोच करता... लड़की का तो क्या कहना...वो हाथ मिलाने में भी सकुचाता। खैर, मुकेश जी ने एकदिन जायसवाल से कहा कि वो जो लड़की आती है शाम में वो कह रही थी कि वो कौन सा सुंदर लड़का है जो मुझसे कोई बात ही नहीं करना चाहता। इतना कहकर मुकेश जी हमारे पास अपने डेस्क पर आकर बैठ गए... हमसे फुसफुसाकर कहा कि देखिये जल्द ही जायसवाल आने वाला है। हुआ भी ऐसा ही... जायसवाल मुकेश जी को इशारे से बुलाकर कैंटीन की तरफ ले गया और जमकर समोसे तुड़वाए। चाय पिलाई। तो मुकेश जी ने कहा कि उससे बातचीत करो... माइंड नहीं करेगी। दूसरे दिन जायसवाल बिल्कुल बदले हुए लुक में दफ़्तर आया... टाइट जींस में बेहद फंकी लग रहा था। हम सब खूब हंसे लेकिन लड़की जब उसके पास हाथ मिलाने पहुंची तो उससे कुछ कहने की हिम्मत फिर भी नहीं हुई।...शायद चौथे दिन जायसवाल उस लड़की को दफ्तर के बाहर एकांत में ले जाकर जाने क्या कह दिया कि वो फट पड़ी। नाराज होकर चिल्लाने लगी कि डायरेक्टर साहब से तुम्हारी शिकायत करूंगी... तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई। और भी जाने क्या- क्या। पूरा तमाशा बना। ...आखिरकार मुकेश जी ने ही वहां पहुंचकर लड़की और जायसवाल को समझाया। लड़की को भी ताकीद की कि किसी से शिकायत मत करना। खैर, जायसवाल की नौकरी नहीं गई।

Monday, March 9, 2009

इन मुशर्रफ जैसों...इमरान जैसों का क्या करें


पाक़िस्तान के क्रिकेटर इमरान ख़ान को मैदान पर एक जुझारू... जीत के लिए एक जिद्दी ख़िलाड़ी के रूप में देखा था... जो जीत के लिए मैदान में जमकर पसीना बहाता था। ख़िलाड़ी के तौर पर इमरान कभी विचलित नहीं दिखे... भ्रमित नहीं लगे... भटके हुए दिशाहीन इमरान कभी नहीं दिखे। लेकिन पाक़िस्तान की सियासत में जाकर दुनिया के सामने इमरान का एक नया चेहरा उभरा है। सियासत में जाने के बाद इमरान का जुझारूपन कहीं खो गया। इमरान विचलित और विक्षिप्त दिखने लगे... पाक़िस्तान की सियासत में एक दोयम दर्जे का खिलाड़ी... जिसकी कोई राजनीतिक हैसियत नहीं। इसे इमरान ख़ान के हालिया बयानों से समझा जा सकता है। स्वात घाटी में तालिबान के सामने पाक़िस्तानी सरकार के घुटना टेक देने के बाद इमरान का बयान आया कि तालिबान को लेकर भ्रामक प्रचार किया जा रहा है।... इससे ऐसा नहीं होगा कि स्वात घाटी की स्थिति बेहद ख़राब हो जाएगी और वहां अराजकता आ जाएगी। (इमरान उसी स्वात घाटी के बारे में कह रहे थे जहां हाल में पाक़िस्तान सरकार ने संघर्ष विराम का फैसला किया। स्वात घाटी हाल के दिनों में उस वक्त चर्चा में आया जब तालिबान ने उसका हुक्म नहीं मानने वालों को सरेआम सिर काटकर उनकी लाशों को ख़ूनी चौक पर लटका दिया। ...तालिबान पर कई पुस्तकें लिखने वाले पाकिस्तानी लेखक अहमद राशिद मानते हैं कि तालिबान के साथ युद्ध विराम पाक़िस्तान के लिए ख़तरनाक है... ऐसे संगठन संघर्ष विराम के दौरान अपना विस्तार करते हैं और उन्हें एकजुट होने का मौका मिलता है।) इमरान ख़ान उसी तालिबानी प्रभाव को कोई बड़ा ख़तरा मानने से इनकार करते हैं। इमरान यहीं नहीं रुकते... उनका कहना है कि पाक़िस्तान में श्रीलंकाई क्रिकेटर्स पर हमले में विदेशी ताकते हैं... इन विदेशी ताक़तों में भारत, श्रीलंका या अफ़गानिस्तान भी हो सकता है। अपने आरोपों को पुष्ट करने के लिए इमरान का दावा भी कम दिलचस्प नहीं है... उनका कहना है कि पाकिस्तानी फौज 2004 में जब से पाकिस्तान के कबिलाई इलाकों में गई... तभी से आतंकी हमले शुरू हुए। उसके बाद आतंकी हमलों की पाकिस्तान में कई घटनाएं हुई... जो एक जैसे थे। लेकिन श्रीलंकाई खिलाड़ियों पर जिस तरह से हमला हुआ... उसका अंदाज जुदा था। यही बताता है कि हमले में विदेशी ताकतों का हाथ है। इमरान ने एक ही झटके में गूढ़ प्रश्नों का नायाब हल निकाल लिया।
यह कितना अजीब है कि एक पड़ोसी होने के नाते हम पाक़िस्तान में लगातार बिगड़ती स्थिति पर न केवल अफसोस जाहिर कर रहे हैं बल्कि पाक़िस्तान के कमजोर होने से भारत की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं रह जाएगी। इसके बावजूद पाकिस्तान के हुक्मरान और वहां की कुछ बड़ी शख़्सियतों को या तो अपने देश की स्थिति का अंदाजा नहीं या फिर इसे जानना नहीं चाहते।... अपनी हालत को नजरअंदाज करते हुए वे लगातार भारत की स्थिति ख़राब बता रहे हैं। ताज़ हमले के बाद पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने भारत पर युद्धोन्मादी वातावरण बनाने का आरोप लगाया था। ...अब इंडिया टुडे के समारोह में हिंदुस्तान आए यही परवेज मुशर्रफ ने हिंदुस्तान में मुस्लिमों की हालत ख़राब बताकर एक नया शिगूफ़ा छोड़ने की कोशिश की। वे आगरा समझौते की तरह ही भारतीय मीडिया के इस्तेमाल का मंसूबा बांधे आए थे।....उन्हें लगा कि मुसलमानों की बात उठाकर हिंदुस्तान में भी तालियां बटोर लेंगे और विश्व के नक्शे पर एक सर्वमान्य नेता बनकर उभरेंगे। ...शायद ऐसा ही उनका इरादा रहा होगा। वो तो भला हो राज्यसभा सदस्य महमूद मदनी का, जिन्होंने मुशर्रफ को दो- टूक जवाब दिया। मदनी ने मुशर्रफ से कहा कि आप अपनी और अपने देश की चिंता कीजिए... हिंदुस्तान में मुस्लिमों का हक़ सुरक्षित है...अपनी सियासत चमकाने के लिए इस तरह के बयान देकर हिंदुस्तान के मुस्लिमों को बांटने की साजिश मत कीजिए। ... जवाब सुनकर परवेज़ मुशर्रफ का चेहरा उतर गया।... मुशर्रफ को सही वक्त पर जवाब मिला था। लेकिन इसके बाद भी हम मुशर्रफ जैसों... इमरान जैसों से उम्मीद करें कि भविष्य में वे बेहतर तरीके से पेश आएंगे... बेकार है।

Friday, March 6, 2009

बापू हम शर्मिंदा हैं


बापू हम शर्मिंदा हैं। दुनिया ने गांधी की इस्तेमाल की हुई कुछ चीजों पर बोली लगाई। ...जो बेशक़ीमती थी। बेमोल थी। मगर दुनिया ने उसकी क़ीमत लगाई। ये जज्बातों पर लगाई गई बोली थी। बाक़ायदा नीलामी हुई... और ये विरासत या धरोहर लिकर किंग विजय माल्या की हो गई। उससे पहले गांधी की सियासी विरासत संभालने का दावा करने वाली कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार इस नीलामी को रोकने में विफल रही।... लेकिन इन सबके बीच क्या इसकी पहचान जरूरी नहीं की गांधी किसके थे... सिर्फ हिंदुस्तान के या फिर पूरे विश्व के एक महामानव। क्या ये जरूरी नहीं कि गांधी की असली विरासत की भी पहचान हो। क्या ऐनक, घड़ी जैसी चीजें गांधी की विरासत का प्रतिनिधित्व करती हैं...। गांधी की असली विरासत गांधी दर्शन और अहिंसा का उनका संदेश है। जिसपर हिंदुस्तान सहित पूरी दुनिया का हक है। इसकी चिंता बेवजह है कि कोई सिरफिरा गांधी के सामान की बोली लगाता है और कोई उसे ख़रीदने के लिए राजी हो जाता है...। गांधी के सामान की नीलामी का विरोध इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता कि कोई भी हिंदुस्तानी इस बोली में शामिल नहीं होता ... इसे ख़रीदने से मना कर देता। क्योंकि जिस वक्त हम इसे ख़रीदने को राजी हो गए... उसी वक्त हमने भी गांधी की विरासत की क़ीमत भी लगा दी।

Monday, March 2, 2009

हाथी नहीं संवाददाता पगलाया था..

मित्रों, आपसे वादा किया था पत्रकारिता के कुछ कुस्सों का... यही बात जब पत्नी को बताया तो लगी बच्चों की दुहाई देने। ताना मिला मंदी के इस दौर में शायद नौकरी का मोह नहीं है इसलिए ऐसे बुरे- बुरे ख्यालात आ रहे हैं। सोचा, सही कह रही है। पत्नी और दो छोटे-छोटे बच्चे... पता नहीं कौन नाराज हो जाए। यही सब सोचकर अपने ब्लॉग पर आया तो पंच लाइन पर नजर पड़ी- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे। तय किया कि कोई ऐसा रास्ता निकाला जाए जिससे आपसे किया वादा भी पूरा हो जाए और कोई आहत भी न हो। निश्चय ही ये एक डरपोक रवैया है... जो शायद मेरे पूरे व्यक्तित्व में समाया हुआ है... नौकरी करते- करते कब मेरे भीतर ये मजबूत शक्ल में आ गया... पता नहीं चला। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि मेरा या फिर मेरे जैसे औरों के भीतर बैठा आदमी कभी बगावत नहीं करता होगा... जरूर करता है.. कभी रात के दो बजे तो कभी जिंदगी में सिर्फ एकबार। वो गुबार निकलता जरूर है। और जब कभी ये निकलता है तो पूरी तरन्नुम में... पूरे उफान के साथ। ख़ैर, आप पढ़ें ऐसे ही कुछ किस्से जो सनसनी कतई नहीं हैं... जिसे खुलासा भी नहीं समझा जाना चाहिए। बेहद संयत और कुछ निजी तो कुछ औरों के अनुभव पर आधारित।
(भाग- एक) सबसे पहले बात शुरू करना चाहूंगा अखबारों की दुनिया से... जहां सबसे ज्यादा वक्त गुजारा। घटना पटना की है। हिंदी अखबारी दुनिया का एक जाना- माना नाम पटना संस्करण के रूप में आया और छा गया। इस अखबार के पटना संस्करण में कई समर्थ संपादक आए और आगे चलकर टीवी और अखबारी दुनिया में मक़बूलियत को प्राप्त हुए। अखबार ने अपने यहां संवाददाताओं की बाकायदा लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बाद चयन किया था। उन्हें नौकरी का ऑफर लेटर तक दिया गया था... बिहार की हिंदी पत्रकारिता में शायद ऐसा पहली बार हो रहा था। शहर के पॉश इलाके में अपने अंग्रेजी संस्करण के साथ दूसरे माले पर अखबार का दफ्तर खुला। इस अखबार में ऐसे युवा पत्रकारों की फौज थी जो जेपी आंदोलन के समय सक्रिय थे... समाज को लेकर उनकी अपनी दृष्टि थी... अपना नजरिया था। यानी, ये एक नई पत्रकारिता की शुरुआत थी। अखबार के रिपोर्टर अपनी- अपनी बीट के नवोदित लेकिन जानकार लोग थे। उनकी बाईलाइन खबरें जैसे एक नए स्टारडम को जन्म देती थी। लोग चेहरे से भले रिपोर्टरों को न जाने मगर उनके नाम का जादू चलता था पाठकों पर। सत्ता तंत्र को लेकर अखबार आक्रमक था और समाज से जुड़े खबरों को प्राथमिकता दी जाती थी। लेकिन अखबार में निचले स्तर पर आधारभूत ढांचा वही पुराना था। स्ट्रिंगर्स थे और जिला स्तर पर एक- एक स्ट्रिंगर कई –कई अखबारों और एजेंसियों के प्रतिनिधि थे। इस तरह की व्यवस्था के अपने खतरे भी हैं जिसके बारे में आगे भी एक किस्सा बताऊंगा। इसके साथ ही ये भी पता चलता है कि उस दौर की पत्रकारिता कितनी चैलेंजिंग थी, जब आपके पास न तो फोन था न इंटरनेट....या फैक्स। डाक या टेलिप्रिंटर ही खबरें भेजने का सहारा होता था। ...तो हुआ कि बिहार के एक जिले में भी इस अखबार का अपना एक स्ट्रिंगर था जो अलग- अलग संवाद एजेंरियों का नुमाइंदा भी था। इस स्ट्रिंगर ने एक ख़बर अखबार को भेजी जो दूसरे दिन उस अखबार के पहले पेज पर बॉक्स में प्रमुखता से छपी। दूसरे अखबारों में भी ये खबर थी। खबर थी कि उस शहर में कोई सर्कस आया था जिसका हाथी अचानक मदमस्त होकर लोगों की भीड़ में आ गया और हाथी ने दो लोगों को कुचल दिया... बाद में जैस-तैसे हाथी पर काबू पा लिया गया। इस खबर के छपते ही दूसरे दिन सर्कस के मैनेजर या फिर मालिक पटना स्थित अखबार के दफ्तर में पहुंच गया... उसका कहना था कि हाथी मदमस्त हुआ था जरूर लेकिन कर्मचारियों ने उसे बाड़े से बाहर नहीं आने दिया। वहां किसी तरह की अफरातफरी तक नहीं मची और न ही कोई आदमी कुचला गया। अगर कोई मरा है तो कृपया अपने संवाददाता से पूछें कि लाश कहां है... या पुलिस के अधिकारी ने घटना की पुष्टि की है। संपादक बेहद संजीदा थे... उन्होंने तीन सदस्यीय कमेटी बनाकर मामले की जांच का आश्वासन देकर सर्कस वालों को विदा कर दिया। जांच हुई तो संवाददाता ने साफ- साफ बता दिया- दरअसल, समाचार भेजने की जल्दी की वजह से ऐसा हुआ। बारह बजे के बाद खबर भेजने की कोई व्यवस्था नहीं थी... और पौने बारह बजे उसके घर में कोई आदमी भागता हुआ आया जिसने बताया कि रेलवे मैदान में लगी सर्कस में एक हाथी ने दो लोगों को कुचल दिया... पूछने पर बताया कि वह खुद भागता हुआ आया है। खबर की पुष्टि करने का वक्त नहीं था... इसलिए उसके कहे के मुताबिक खबर जारी कर दी। लेकिन शाम होते- होते उसे भी पता चल गया था लेकिन तबतक खबर को रुकवाने के लिए ट्रंक काल बुक कराया तो वह भी नहीं लगा। उसने स्वीकार किया कि उससे गलती हुई है। ... जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट संवाददाता की स्वीकरोक्ति के साथ संपादक को सौंप दी। संपादक ने संवाददाता को न तो बुलाकर हड़काया न ही नौकरी ली। लेकिन दूसरे दिन अपने यहां संपादकीय में इसके बारे में लिखा... उसका शीर्षक था- हाथी नहीं संवाददाता पगलाया था। अंदर ये तफ्सील के साथ कि जिला स्तर के संवाददाताओं के पास न तो अपनी खबरों को पुष्ट करने का वक्त होता है न संसाधन... ये गलती उसी वजह से हुई थी। पाठकों और खास तौर पर सर्कस वालों से क्षमा याचनाओं सहित।... इससे ईमानदार संपादकीय आजतक मेरी नजरों से कभी नहीं गुजरा।
उस समय के स्ट्रिंगर्स पर आधारित एक और घटना मुझे याद आती है। मुंगेर में भूकंप आया था। ... राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और बफोर्स मामलों को लेकर वीपी सिंह ने देश भर में राजीव गांधी के ख़िलाफ एक सियासी मुहिम शुरू कर दी थी। तो इस भूकंप के बाद वहां एक स्ट्रिंगर जो कई संवाद एजेंसियों के प्रतिनिधि थे, उन्होंने खबर दे मारी। जिसमें ब्यौरा दिया गया था कि पूरा मुंगेर तबाह हो गया... हर ओर तबाही का मंजर है- जैसा सीन उन्होंने बांधा और तमाम अखबारों को एजेंसियों को खबर भेज दी। इस खबर के जारी होते ही हुकूमत में हड़कंप मच गया। राजीव गांधी दूसरे ही दिन दौरे पर आ गए... मगर मकानों में दरारों और भूकंप की वजह से लोगों में दहशत के सिवा कोई बड़ी तबाही के निशान नहीं देख पाए। राजीव गांधी के मुंगेर से वापस जाते ही एकाध घंटे के भीतर वीपी सिंह भी वहां पहुंच गए... उन्होंने एक जोशीला भाषण दिया।... राजीव गांधी और वीपी सिंह के मुंगेर आने का श्रेय उस स्ट्रिंगर महोदय को दिया या फिर उन्होंने ये श्रेय खुद ही उन्होंने ओढ़ लिया। मगर उस वक्त उनसे किसी ने नहीं पूछा कि भैय्या ... जरा हमें भी तो तबाही दिखाओ। ये खबर के नाम पर भ्रम फैलाने का एक उदाहरण था मेरे लिए। हालांकि न तो उस वक्त मैं पत्रकार था न ही मेरी कोई समझ थी... लेकिन ये खयाल उस वक्त भी मेरे दिमाग में आया। (जारी)