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Monday, March 2, 2009

हाथी नहीं संवाददाता पगलाया था..

मित्रों, आपसे वादा किया था पत्रकारिता के कुछ कुस्सों का... यही बात जब पत्नी को बताया तो लगी बच्चों की दुहाई देने। ताना मिला मंदी के इस दौर में शायद नौकरी का मोह नहीं है इसलिए ऐसे बुरे- बुरे ख्यालात आ रहे हैं। सोचा, सही कह रही है। पत्नी और दो छोटे-छोटे बच्चे... पता नहीं कौन नाराज हो जाए। यही सब सोचकर अपने ब्लॉग पर आया तो पंच लाइन पर नजर पड़ी- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे। तय किया कि कोई ऐसा रास्ता निकाला जाए जिससे आपसे किया वादा भी पूरा हो जाए और कोई आहत भी न हो। निश्चय ही ये एक डरपोक रवैया है... जो शायद मेरे पूरे व्यक्तित्व में समाया हुआ है... नौकरी करते- करते कब मेरे भीतर ये मजबूत शक्ल में आ गया... पता नहीं चला। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि मेरा या फिर मेरे जैसे औरों के भीतर बैठा आदमी कभी बगावत नहीं करता होगा... जरूर करता है.. कभी रात के दो बजे तो कभी जिंदगी में सिर्फ एकबार। वो गुबार निकलता जरूर है। और जब कभी ये निकलता है तो पूरी तरन्नुम में... पूरे उफान के साथ। ख़ैर, आप पढ़ें ऐसे ही कुछ किस्से जो सनसनी कतई नहीं हैं... जिसे खुलासा भी नहीं समझा जाना चाहिए। बेहद संयत और कुछ निजी तो कुछ औरों के अनुभव पर आधारित।
(भाग- एक) सबसे पहले बात शुरू करना चाहूंगा अखबारों की दुनिया से... जहां सबसे ज्यादा वक्त गुजारा। घटना पटना की है। हिंदी अखबारी दुनिया का एक जाना- माना नाम पटना संस्करण के रूप में आया और छा गया। इस अखबार के पटना संस्करण में कई समर्थ संपादक आए और आगे चलकर टीवी और अखबारी दुनिया में मक़बूलियत को प्राप्त हुए। अखबार ने अपने यहां संवाददाताओं की बाकायदा लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बाद चयन किया था। उन्हें नौकरी का ऑफर लेटर तक दिया गया था... बिहार की हिंदी पत्रकारिता में शायद ऐसा पहली बार हो रहा था। शहर के पॉश इलाके में अपने अंग्रेजी संस्करण के साथ दूसरे माले पर अखबार का दफ्तर खुला। इस अखबार में ऐसे युवा पत्रकारों की फौज थी जो जेपी आंदोलन के समय सक्रिय थे... समाज को लेकर उनकी अपनी दृष्टि थी... अपना नजरिया था। यानी, ये एक नई पत्रकारिता की शुरुआत थी। अखबार के रिपोर्टर अपनी- अपनी बीट के नवोदित लेकिन जानकार लोग थे। उनकी बाईलाइन खबरें जैसे एक नए स्टारडम को जन्म देती थी। लोग चेहरे से भले रिपोर्टरों को न जाने मगर उनके नाम का जादू चलता था पाठकों पर। सत्ता तंत्र को लेकर अखबार आक्रमक था और समाज से जुड़े खबरों को प्राथमिकता दी जाती थी। लेकिन अखबार में निचले स्तर पर आधारभूत ढांचा वही पुराना था। स्ट्रिंगर्स थे और जिला स्तर पर एक- एक स्ट्रिंगर कई –कई अखबारों और एजेंसियों के प्रतिनिधि थे। इस तरह की व्यवस्था के अपने खतरे भी हैं जिसके बारे में आगे भी एक किस्सा बताऊंगा। इसके साथ ही ये भी पता चलता है कि उस दौर की पत्रकारिता कितनी चैलेंजिंग थी, जब आपके पास न तो फोन था न इंटरनेट....या फैक्स। डाक या टेलिप्रिंटर ही खबरें भेजने का सहारा होता था। ...तो हुआ कि बिहार के एक जिले में भी इस अखबार का अपना एक स्ट्रिंगर था जो अलग- अलग संवाद एजेंरियों का नुमाइंदा भी था। इस स्ट्रिंगर ने एक ख़बर अखबार को भेजी जो दूसरे दिन उस अखबार के पहले पेज पर बॉक्स में प्रमुखता से छपी। दूसरे अखबारों में भी ये खबर थी। खबर थी कि उस शहर में कोई सर्कस आया था जिसका हाथी अचानक मदमस्त होकर लोगों की भीड़ में आ गया और हाथी ने दो लोगों को कुचल दिया... बाद में जैस-तैसे हाथी पर काबू पा लिया गया। इस खबर के छपते ही दूसरे दिन सर्कस के मैनेजर या फिर मालिक पटना स्थित अखबार के दफ्तर में पहुंच गया... उसका कहना था कि हाथी मदमस्त हुआ था जरूर लेकिन कर्मचारियों ने उसे बाड़े से बाहर नहीं आने दिया। वहां किसी तरह की अफरातफरी तक नहीं मची और न ही कोई आदमी कुचला गया। अगर कोई मरा है तो कृपया अपने संवाददाता से पूछें कि लाश कहां है... या पुलिस के अधिकारी ने घटना की पुष्टि की है। संपादक बेहद संजीदा थे... उन्होंने तीन सदस्यीय कमेटी बनाकर मामले की जांच का आश्वासन देकर सर्कस वालों को विदा कर दिया। जांच हुई तो संवाददाता ने साफ- साफ बता दिया- दरअसल, समाचार भेजने की जल्दी की वजह से ऐसा हुआ। बारह बजे के बाद खबर भेजने की कोई व्यवस्था नहीं थी... और पौने बारह बजे उसके घर में कोई आदमी भागता हुआ आया जिसने बताया कि रेलवे मैदान में लगी सर्कस में एक हाथी ने दो लोगों को कुचल दिया... पूछने पर बताया कि वह खुद भागता हुआ आया है। खबर की पुष्टि करने का वक्त नहीं था... इसलिए उसके कहे के मुताबिक खबर जारी कर दी। लेकिन शाम होते- होते उसे भी पता चल गया था लेकिन तबतक खबर को रुकवाने के लिए ट्रंक काल बुक कराया तो वह भी नहीं लगा। उसने स्वीकार किया कि उससे गलती हुई है। ... जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट संवाददाता की स्वीकरोक्ति के साथ संपादक को सौंप दी। संपादक ने संवाददाता को न तो बुलाकर हड़काया न ही नौकरी ली। लेकिन दूसरे दिन अपने यहां संपादकीय में इसके बारे में लिखा... उसका शीर्षक था- हाथी नहीं संवाददाता पगलाया था। अंदर ये तफ्सील के साथ कि जिला स्तर के संवाददाताओं के पास न तो अपनी खबरों को पुष्ट करने का वक्त होता है न संसाधन... ये गलती उसी वजह से हुई थी। पाठकों और खास तौर पर सर्कस वालों से क्षमा याचनाओं सहित।... इससे ईमानदार संपादकीय आजतक मेरी नजरों से कभी नहीं गुजरा।
उस समय के स्ट्रिंगर्स पर आधारित एक और घटना मुझे याद आती है। मुंगेर में भूकंप आया था। ... राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और बफोर्स मामलों को लेकर वीपी सिंह ने देश भर में राजीव गांधी के ख़िलाफ एक सियासी मुहिम शुरू कर दी थी। तो इस भूकंप के बाद वहां एक स्ट्रिंगर जो कई संवाद एजेंसियों के प्रतिनिधि थे, उन्होंने खबर दे मारी। जिसमें ब्यौरा दिया गया था कि पूरा मुंगेर तबाह हो गया... हर ओर तबाही का मंजर है- जैसा सीन उन्होंने बांधा और तमाम अखबारों को एजेंसियों को खबर भेज दी। इस खबर के जारी होते ही हुकूमत में हड़कंप मच गया। राजीव गांधी दूसरे ही दिन दौरे पर आ गए... मगर मकानों में दरारों और भूकंप की वजह से लोगों में दहशत के सिवा कोई बड़ी तबाही के निशान नहीं देख पाए। राजीव गांधी के मुंगेर से वापस जाते ही एकाध घंटे के भीतर वीपी सिंह भी वहां पहुंच गए... उन्होंने एक जोशीला भाषण दिया।... राजीव गांधी और वीपी सिंह के मुंगेर आने का श्रेय उस स्ट्रिंगर महोदय को दिया या फिर उन्होंने ये श्रेय खुद ही उन्होंने ओढ़ लिया। मगर उस वक्त उनसे किसी ने नहीं पूछा कि भैय्या ... जरा हमें भी तो तबाही दिखाओ। ये खबर के नाम पर भ्रम फैलाने का एक उदाहरण था मेरे लिए। हालांकि न तो उस वक्त मैं पत्रकार था न ही मेरी कोई समझ थी... लेकिन ये खयाल उस वक्त भी मेरे दिमाग में आया। (जारी)

5 comments:

शोभा said...

इतनी निर्भीकता से सत्य लिखने के लिए बधाई।

Udan Tashtari said...

सही है..जारी रहिये.

kundan shashiraj said...

सर, बढ़िया... आपके हर पोस्ट के साथ मैं आपकी लेखनी का और भी कायल होता जा रहा हू... उम्मीद है कि आपके अगले पोस्ट में मीडिया जगत के कुछ और रोचक किस्से पढ़ने को मिलेंगे... बेसब्री से इंतज़ार है ..आपके अगले पोस्ट का... लेकिन ऐसा लगता है कि नए ऑफिस का नया कार्यभार आपकी ब्लोगिंग कि रफ्तार पर थोडा बहुत असर डाल रहा है.....


वैसे मैंने भी अपना नया ब्लॉग शुरू किया है.... आपकी प्रतिक्रिया और आपके सुझावों के इंतज़ार में हू... मेरे ब्लॉग का पता है.... www.inkalab.blogspot.com

Eihud Auilmar said...
This comment has been removed by the author.
Anonymous said...

इलेक्ट्रानिक मीडिया तो क्या जहन्नुम में भी चला जाऊं तो छपे हुए शब्दों का मोह कम न होगा

तो क्या इलेक्ट्रानिक मीडिया जहन्नुम नहीं है?