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Tuesday, March 10, 2009

लगाई- बुझाई की नौकरी

(भाग- दो) लगाई –बुझाई आप समझते होंगे। कभी आप इस कला के शिकार हुए होंगे या फिर आपने किसी के ख़िलाफ़ आजमाया होगा। इस लगाई- बुझाई का अपना एक रस है। इसे ख्वामख़ाह चुगली जैसा नाम नहीं दिया जाना चाहिए। इसे फ़ितना भी कहना उचित नहीं होगा... क्योंकि ये शैतानी या कपट जैसा सख़्त नहीं है। पत्रकारिता हो या फिर आप जहां कहीं काम करते हों... आपके आसपास ऐसा किरदार जरूर मिलेगा जो काम में दक्ष हो या न हो लेकिन इस कला में उसकी अतिरिक्त दक्षता होती है। आज हम एक ऐसे ही साथी मुकेश जी (बदला हुआ नाम) का ज़िक्र करने जा रहे हैं...जो अद्भुत हैं। उनके साथ खूबी ये है कि वे अपने काम में भी दक्ष हैं और लगाई- बुझाई की उनकी अतिरिक्त योग्यता आपको चमत्कृत कर सकती है। अगर आप उनके ख़ास मित्र हैं तो आप उनकी इस कला के शिकार अक्सर हो सकते हैं। आप जब इस बारे में खुद उनसे पूछेंगे तो वे हंसते हुए न केवल स्वीकार कर लेंगे बल्कि कहेंगे कि बॉस... क्या करें, बोलते-बोलते बोल गए।... ये है मुकेश जी। हां, उनसे जुड़ी घटनाओं के आधार पर उनके बारे में कयास लगाने की गलत न करें। ( उनसे क्षमा याचना सहित)।

मुकेश जी से पुराना परिचय था लेकिन उनके नस- नस से वाक़िफ हुआ जब उनके साथ एक ही अख़बार में काम किया। वर्षों का साथ रहा। लेकिन तब उस अख़बार में चार –पांच प्रशिक्षु पत्रकारों का एक गैंग सक्रिय था। इस गैंग के थिंक टैंक मुकेश जी थे और मैं भी उसका एक मामूली सदस्य। धीरे- धीरे पता चला कि किसी के ख़िलाफ किसी दूसरे को भड़काना हो या फिर किसी की हवा बांधनी हो तो मुकेश जी पर हमारा गैंग आंख मूंदकर भरोसा कर सकता है। हमारे गैंग की एक ख़ास आदत ये थी कि उस अख़बार में जो कोई नया आए ...और हम लोगों की शरण में न आए तो वो हमारा दुश्मन हो जाता था। मुकेश जी हमारे चढ़ाने पर उस पिल पड़ते... उसकी छवि ध्वस्त करने का कोई अवसर नहीं जाने देते। मेरे रहते मुकेश जी के तीन शिकार हुए। उसमें से पहला था कमलेश। कमलेश वामपंथी मिजाज का था...निजी जिंदगी में बेहद संघर्षों से निकलकर मुंबई सहित तमाम महानगरों की पत्रकारिता का तजुर्बा रखते हुए हमारे अख़बार में आया। उससे मुकेश जी की काफी छनती... मुकेश जी अकेले रहने वाले और कमलेश परिवार वाला आदमी। मुकेश जी अक्सर उसके घर पर सुबह ही चाय पीते और देर रात तक उनका साथ बना रहता। दोनों थे बातों के बहादुर। दुनिया जहान की मार्क्सवादी- लेलिनवादी बातों से वातावरण को पका देते दोनों। कमलेश दुनिया बदलने की बात करता... क्रांति को जरूरी बताता तो मुकेश जी कहते कि अगर क्रांति करनी हो तो
अख़बार की ये बुर्जुआ व्यवस्था तो छोड़ने का साहस दिखाना पड़ेगा। ये संपादक नाम को जो चीज है... ये तो अपने को पोप समझता है और तुम जैसे लोग दुम हिलाकर उसके आगे- पीछे करने लगते हो...खाक करोगे क्रांति... कमलेश वामपंथ का लाल गलियारा तुम्हें आवाज दे रहा है.. उठो और दुनिया बदल दो।.... मित्रों, इस चढ़ावे का असर हुआ कि सुबह होते ही कमलेश पहुंच गया अख़बार के दफ़्तर... कुछ देर इंतजार किया और संपादक जी के पहुंचने पर सीधे उनके चैंबर में घुस गया। पता नहीं और क्या- क्या बातें हुई लेकिन कमलेश की आखिरी लाइन जो उसने बड़े जोर से कही थी....वो याद है। उसने संपादक से कहा कि क्या आप पोप हैं जो फ़तवे देंगे और हम उसे मान लेंगे। संपादकजी ने कमलेश को थोड़ी देर बाहर में बैठने का आदेश दिया ...कुछेक मिनट के बाद अखबार के एचआर डिपार्टमेंट का कर्मचारी संपादक जी के चैंबर में घुसा ...बाहर निकला तो उसने कमलेश को अपने साथ चलने को कहा। कमलेश आधे घंटे की कागजी कार्यवाही के बाद फाइनल हिसाब करके अखबार के दफ़्तर से बाहर जा रहा था।...हालांकि मुकेश जी को आज भी इसका अफसोस है।
एक किस्सा और याद आता है। एक और ट्रेनी आया जो संपादकजी का नजदीकी था... कोई खोसला। लिहाजा, उसने हमारे गिरोह को नजरअंदाज कर दिया। हम सब फुंके बैठे थे... मुकेश जी को कहा कि इसका बॉडी लैंग्वेज कुछ ठीक नहीं लगता। उन्होंने भरोसा दिया कि जल्द ही इसका भी हिसाब हो जाएगा।...और उसी शाम लाइब्रेरी में बैठे खोसला को मुकेश जी ने पकड़ लिया। पूछा तो पता चला ट्रेनी लगा है और अंग्रेजी मीडियम से पढ़ा-लिखा है। मुकेश जी ने उसे कहा कि यहां कहां ऐसी- तैसी कराने आ गए...और जब आ ही गए हो तो लाला एक काम करो। अंदर की बात ये है कि तुम्हारे जैसे होनहार का ट्रेनी होना शर्म की बात है... यहां संपादक का पद जल्द ही खाली हो रहा है... अभी जो संपादक हैं उनका तबादला होना है। तो आप उसी पद के लिए तत्काल आवेदन कर दो। उसने कहा कि...ठीक है... लेकिन संपादक जी से रात में बात करके कल दे दूंगा। मुकेश जी ने दन से कहा कि कल तक तो देर हो जाएगी... आज इसी वक्त लिखो आवेदन... लाओ कागज-कलम.. मैं उसका मजमून समझा देता हूं। मुकेश जी ने उससे लिखवाया- सेवा में निदेशक। विश्वस्त सूत्रों से खबर मिली है कि आपके यहां संपादक का पद शीघ्र खाली होने जा रहा है... मैं इस पद के लिए अपना दावा पेश करता हूं। -केवल आपका ही, खोसला। मुकेश जी ने कहा कि ये आवेदन पत्र आप संपादक जी को ही दे दो, उनके जरिये निदेशक तक पहुंच जाएगा। खोसला ने ऐसा ही किया। आवेदन पत्र देखकर संपादक जी ने क्या- कुछ कहा होगा ये समझा जा सकता है। दस दिनों बाद अचानक शहर में खोसला दिखा... मुझे नहीं पता था कि उसका क्या हुआ। मैने उसे आवाज देकर बुलाया- तो उसने बताया कि वो स्कूल से लौट रहा है...वहीं टीचर लग गया है। अखबार से तो उसका उसी दिन हिसाब हो गया।
मुकेश जी का एक और शिकार।... आपने गौर किया होगा कि आप ख्वामखाह किसी पर चिढ़ जाते हैं। वैसा ही एक जायसवाल नाम का युवक अख़बार में आया... तो हमारा गैंग उसपर बेवजह नाराज होने लगा। उसी अखबार में एक लड़की थी जो उसवक्त जींस –शर्ट में दफ्तर आती जब अखबारों में लड़कियों के काम करने का चलन बहुत नहीं था। लेकिन लड़की जो थी आजाद ख्याल थी और दफ्तर से घर जाने वक्त सभी डेस्क पर सभी से हाथ मिलाने के बाद स्कूटी से घर वापस जाती। जायसवाल नया- नया था इसलिए सबसे संकोच करता... लड़की का तो क्या कहना...वो हाथ मिलाने में भी सकुचाता। खैर, मुकेश जी ने एकदिन जायसवाल से कहा कि वो जो लड़की आती है शाम में वो कह रही थी कि वो कौन सा सुंदर लड़का है जो मुझसे कोई बात ही नहीं करना चाहता। इतना कहकर मुकेश जी हमारे पास अपने डेस्क पर आकर बैठ गए... हमसे फुसफुसाकर कहा कि देखिये जल्द ही जायसवाल आने वाला है। हुआ भी ऐसा ही... जायसवाल मुकेश जी को इशारे से बुलाकर कैंटीन की तरफ ले गया और जमकर समोसे तुड़वाए। चाय पिलाई। तो मुकेश जी ने कहा कि उससे बातचीत करो... माइंड नहीं करेगी। दूसरे दिन जायसवाल बिल्कुल बदले हुए लुक में दफ़्तर आया... टाइट जींस में बेहद फंकी लग रहा था। हम सब खूब हंसे लेकिन लड़की जब उसके पास हाथ मिलाने पहुंची तो उससे कुछ कहने की हिम्मत फिर भी नहीं हुई।...शायद चौथे दिन जायसवाल उस लड़की को दफ्तर के बाहर एकांत में ले जाकर जाने क्या कह दिया कि वो फट पड़ी। नाराज होकर चिल्लाने लगी कि डायरेक्टर साहब से तुम्हारी शिकायत करूंगी... तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई। और भी जाने क्या- क्या। पूरा तमाशा बना। ...आखिरकार मुकेश जी ने ही वहां पहुंचकर लड़की और जायसवाल को समझाया। लड़की को भी ताकीद की कि किसी से शिकायत मत करना। खैर, जायसवाल की नौकरी नहीं गई।

2 comments:

prabhat said...

jaiswal ko shukra manana chahiye ki mukesh wahin the.

uday said...

bahut achhe bada kam ke chij badan raura mukesh ji..aur unakar kunada..jauna kunaba ke ego sadashya rauro rahin..khair hum itana janatani ki mukesh ji bhi kuchh kare aur kahe se pahile raura se salaha mashwira jaroor karat hoihen..aur bat jahan tak mukesh ji ke khurafati dimad ke karin..to unakar shaitani dimad ke raura tonnik jaroor milat hoi... kahe ki koi bhi ghatana ke bad, jaishwal ji ke tait jins pahanla ke bad shanti banala par raura maza ke aawat hoi..dhanyabad..raura aishahin mukesh hi aur shanti jaishwan ji ke bare me likhat rahin..dhanyabad