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Thursday, March 19, 2009

हम समझते कि वायरस कोई पिल्लू है


दोस्तों, पत्रकारिता के इतिहास में चुग़ली कला और कंप्यूटर के तकनीकी ज्ञान का अलग- अलग महात्म है। चुगली कला का ज़िक्र तो फिर कभी करेंगे लेकिन इस वक्त कंप्यूटर की बात करते हैं... जिसने पत्रकारिता की दिशा बदल दी। सूचनाओं और सुविधाओं के नए द्वार खोल दिए। ...उससे जुड़े कुछ रोचक किस्से। कैसा था अख़बारों की दुनिया में कंप्यूटर का प्रवेश।- संजीव

( भाग- तीन) बात शायद 1995 की है। जिस अख़बार में ट्रेनी की हैसियत से लगा था वहां तीन कंप्यूटर लगाए गए। ये पहला मौका था जब हिंदी पट्टी के अख़बार में कंप्यूटर के इस्तेमाल का प्रयोग शुरू हुआ। कंप्यूटर का स्क्रीन ब्लैक एंड व्हाइट था और उसमें तब माउस का प्रावधान नहीं था। की बोर्ड ही एकमात्र सहारा था। ख़ैर साहब, ये तीनों कंप्यूटर एक छोटे से कमरे में लगा जिसमें एसी लगा था। उस कमरे में जूते या स्लीपर पहनकर जाने पर पाबंदी थी। ऑपरेटर जो था उसका कहना था कि धूल से कंप्यूटर के ख़राब होने का ख़तरा है। हम उस ऑपरेटर साहब की बातें बड़े ग़ौर से सुनते... तो अजीब- अजीब बातें सुनने को मिलती। उसका कहना था कि कोई पान- तंबाकू खाकर कंप्यूटर रूम में न जाए। ...वो बताता था कि इससे कंप्यूटर में वायरस आने का ख़तरा था। गांव में पला- बढ़ा मैं और मेरे सहयोगी भला क्या जाने वायरस क्या होता है... सो उसके सामने मुंडी हिलाकर मान लेते। इसके बारे में पूछता भी तो भला किससे। धीरे- धीरे कंप्यूटर में घुसने वाले वायरस को लेकर मेरी समझदारी बन गई कि ये जरूर कोई पिल्लू है जो चुपके से जाकर कंप्यूटर स्क्रीन पर चिपक जाता है... और छुटाए नहीं छूटता। तो भाई हम इस कंप्यूटर में लगने वाले पिल्लू का खास ख्याल रखते... मगर पिल्लू जो है सो अबतक नहीं दिखा।
चूंकि कंप्यूटर हम सबके लिए अचंभे का सबब था... इसलिए उससे जुड़ा ऑपरेटर भी हम सबकी निग़ाह में खास सम्मान का हक़दार था। पूरे दफ़्तर में अकेला ऐसा आदमी था जो कंप्यूटर का मास्टर कहा जाता था...और सब कर्मचारी मौका लगते ही उसकी चिरौरी करते हुए कंप्यूटर सिखलाने का इसरार करते। हम भी सीखना तो चाहते थे लेकिन कंप्यूटर से डर लगता था। होता ये था कि जैसे ही हम की बोर्ड पर उंगली रखते तो कर्सर अपने आप भागने लगता... हम डरकर उछलने लगते और असहाय भाव से कंप्यूटर ऑपरेटर को देखने लगते। ऑपरेटर अगर वहां मौजूद न हो तो कंप्यूटर रूम में बाकायदा भगदड़ मच जाती... शिफ्ट पर उंगलियां मारकर कर्सर को रोकने की हिम्मत इसलिए नहीं पड़ती कि पता नहीं कोई नया बखेड़ा न खड़ा हो जाए।... तुर्रा ये कि इस बारे में जब ऑपरेटर को बताते कि कंप्यूटर में कुछ गड़बड़ी हो गई तो कर्सर को भागता देख... वो हमें और भी डरा देता कि ये आपने क्या कर दिया। हमारी धड़कने लगभग थम जाती और डर सताने लगता कि अब तो कंप्यूटर के ख़राब होने के कारण डेढ़ लाख रुपये हमसे वसूले जाएंगे। ऑपरेटर ने हम सबको बताया था कि साढ़े चार लाख रुपये में तीन कंप्यूटर कंपनी ने मंगवाए हैं। सो, हम कंप्यूटर से थोड़ा परहेज ही करते। वैसे, एक इंस्टीट्यूट में पता किया कि कंप्यूटर सीखने का कितना पैसा लगेगा... उसने ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा कि नौ महीने के कोर्स का खर्च लगभग दो लाख रुपये... मैने तौबा कर ली। हालांकि मोहल्ले के एक सज्जन थे जो अपने दफ़्तर में ले जाकर टाइपिंग सिखाने को राजी हुए मगर चुपके से चार हजार रुपये की मांग कर दी। हमने भी चार हजार रुपये देकर चाणक्य फॉंट में टाइप करना सीख लिया।
कंप्यूटर का ऐसा ही आधा- अधूरा ज्ञान लेकर एक नए शहर और एक नये अखबार में जब गए तो वहां भी कुछ महीनों बाद कंप्यूटर लगवाए जाने का सिलसिला शुरू हो गया। शुरू में अख़बार के मठाधीशों ने कंप्यूटर का ये कहते हुए विरोध किया कि साहब ये तो पत्रकारों को ऑपरेटर बनाने की साजिश है ...जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यानी, हम ज़ाहिल बने रहने के लिए आंदोलनकारी रुख अपनाने की तैयारी कर रहे थे। दरअसल, मठाधीशों को इसका भी डर नहीं था कि उन्हें ऑपरेटर बना दिया जाएगा... वे तो कंप्यूटर नाम के भूत से डर रहे थे जो उन्हें आता ही नहीं था।... एकदिन मेरे बॉस ने कड़ी फटकार लगाई कि एक सप्ताह के भीतर सभी रिपोर्ट कंप्यूटर पर ही फाइल करोगे... हालांकि खुद उन्होंने तीन- चार साल बाद कंप्यूटर का ज्ञान लिया। हम तो जूनियर सब एडिटर थे ...सो बॉस के आदेश पर तुरंत मान गए और कंप्यूटर सीखना शुरू किया। मुझे तो ताब थी कि मैने पहले ही कंप्यूटर पर टाइपिंग सीख ली... तो मैं शेखी बघारने लगा। लेकिन जब की बोर्ड पर उंगलियां चलाई तो पता चला कि आंय- बांय शब्द आ रहे हैं... मुझे तुरंत लगा कि मेरे साथ उस सज्जन ने धोखा किया और चार हजार रुपये झटक लिए। तब फोन- फान भी इतना सुलभ नहीं था कि उस सज्जन को गलियाऊं... अगर ऐसा होता तो वो सज्जन बच नहीं पाते। मगर बाद में जाकर पता चला कि वो सज्जन बेवजह ही मेरी गालियां खाते... वो तो फॉंट की बाजीगरी थी। उन्होंने अलग फांट में चाणक्या में सिखलाया था... लेकिन अखबार में अलग फांट था।
कंप्यूटर में सिर्फ टाइपिंग सीखी थी... उससे आगे की कोई चीज नहीं सीख पाया। पेज वगैरह बनाना तो वर्षों तक नहीं सीख पाया था। लेकिन कंप्यूटर की देखरेख करने वाले आईटी विभाग के कर्मचारियों से अजीब –अजीब चीजें सुनने को मिलतीं और हम उसके बारे में अपने हिसाब से अंदाजा लगा लेते। जैसे एकबार मेरे एक साथी के कंप्यूटर पर लिखते- लिखते हैंग हो गया तो आईटी में जाकर उसने कहा कि कंप्यूटर –चोक- हो गया है जी ...जरा चलकर देख लीजिए। ये कंप्यूटर न होकर शहर का नाला हो गया था जो चोक हो जाता था। ...उसी तरह मेरी फाइल करप्ट हो गई... तो आईटी वाले ने कहा कि ये तो करप्ट हो गया... मै सोचने लगा कि मैंने ऐसी कोई भ्रष्ट या आपत्तिजनक चीज तो टाइप की नहीं और ये आईटी महाराज इसे करप्ट मैटर बता रहे हैं।...आईटी वाला बताता कि फलां मैटर को अलग फोल्डर में ले जाकर सेव कर दो तो हम उस मैटर का प्रिंट निकालकर उसे अपने दराज में लेकर जाकर सुरक्षित कर लेते।.....उस दौर में कंप्यूटर कम थे और कर्मचारी ज्यादा। सो जिस किसी को अकेले एक कंप्यूटर मिल जाता उसे पूरे दफ़्तर में बड़े सम्मान के साथ देखा जाता। रंगीन स्क्रीन वाला कंप्यूटर तो काफी बाद में आया। हम सब उसी छोटे- छोटे स्क्रीन वाले ब्लैक एंड व्हाइट कंप्यूटरों पर टपाटप लगे रहते। अखबार चलता रहा।( जारी)

9 comments:

रंजना said...

बाप रे बाप...हंसते हंसते बुरा हाल हो गया हमारा.......इतना मज़ा आया पढ़कर कि पूछिए मत.......

आपकी विवेचना इतनी रोचक और मजेदार है कि क्या कहूँ....दिन बना दिया आपने तो...

बहुत बहुत बहुत आभार आपका,इतना आनंदित करने के लिए...

डॉ .अनुराग said...

झकास लिखे हो भाई....ऐसा की दो मिनट कोम्पुटर को तकते रहे की मुआ ये ही कोई रिएक्शन न दे दे....

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

मुझे हंसता देख कर घरवाले घुर रहें हैं ..वाह क्या रोचक संस्मरण हैं ..बहुत हंसी आई पढ़कर

MANVINDER BHIMBER said...

sanjev ...wo bahut achche don the ....kale the par saaf the

uday said...

thank you... raur e lekh padh ke adami ban gailee..raur pillu shabd hase par mazboor kar dihalas...kida-makoda na raura pillu shabd ke istemal kar ke e lekh ke behad wyangatmak aur rochak bana dihali...hum raura e comment pure news room ke hanshi ke mahaul me likhat bani...
dhanyabad...koi raur e pillu shabd se chayan ke jitana bhi tarif kari kum ba...

Dipti said...

बहुत ही बेहतरीन लिखा है। जब मेरे घर में कम्प्यूटर खरीदा गया था तब मेरे भैया के भी इसी तरह के दिशा-निर्देश होते थे। कई दिनों तक तो घर में हवन नहीं हुआ कि धुंए से कम्प्यूटर खराब हो जाएगा।

दीप्ति

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

भई वाह्! बहुत ही रोचक संस्मरण........लिखने की शैली जितनी बढिया है....शब्द चयन उतना ही बेहतरीन.......

vivek said...

मैं भी सन पंचानवे में कम्प्युटर सीखा करता था, इंस्टीट्यूट में अनुभवी टाइपिस्ट भी कम्प्युटर सीखने आया करते थे. हर लाइन टाइप करने के बाद उन्हें कैरिज रिटर्न लीवर धकेलने की आदत थी, अब कम्प्युटर में यह नहीं था तो मोनिटर को ही धकेलते रहते थे :)

menka said...

Sanjeev ji, aapke lekh per comment aur compliment dene ki haisiyat to main nahi rakhti.... lekin is waqt bina kuch kahe bhi nahi rah sakti.... mere saath kabhi aisa nahi hua jaisa aapne likha hai... lekin aapke lekh ko padhne ke bad lag raha hai ki computer ab bhi utna hi ajnabi hai hamare liye. Jis computer ke bare mein aapne likha hai, usi ke badle huye swaroop ke madhyam se main kahna chahoongi ki iske bare mein aisi vyakhya maine pahle kabhi nahi padhi.