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Sunday, March 22, 2009

..एटीएम मशीन की क़ीमत क्या है भाई


पत्रकारिता के अनुभव के साथ इसबार उस वक़्त हुए अहम बदलावों के बारे में भी बताना चाहूंगा। हालांकि इसका पत्रकारिता से कोई लेना- देना नहीं है... लेकिन बदलाव का वह दौर हम सबके जीवन में काफी अहम था। इसलिए इसकी चर्चा कर रहा हूं। पढ़कर देखिये... शायद आप पसंद करेंगे।

(भाग- चार)- जिस अख़बार में मैं नौकरी करता था, वहां शुरु में तो कैश सैलरी दिए जाने की व्यवस्था थी। अकाउंटेंट.. एक-एक कर्मचारी को बुलता जाता और हस्ताक्षर लेकर उसकी पग़ार हाथ में थमा देता। लेकिन ये सिलसिला कुछेक वर्षों में ही ख़त्म हो गया। बैंकों के जरिये तनख्वाह दिए जाने की व्यवस्था की गई। लेकिन बैंकों से तनख्वाह लेना कम ज़िहादी काम नहीं था। होता ये था कि जिस दिन बैंक में सैलरी जाती थी, उस दिन दफ़्तर में बता दिया जाता था। सैलरी आने की ख़बर सरेबाजार होते ही दूसरे दिन सुबह- सुबह बैंक की उस शाखा में भीड़ लग जाती। बैंक अपने निर्धारित समय पर खुलता और कैश काउंटर का नजारा ऐसा होता जैसे सिनेमा की टिकट खिड़कियों में पहले अक्सर ऐसे दृश्य देखने को मिलते। सुबह में जाकर हम पहले वाउचर लेते और उसपर रक़म भरकर जमा कराते। एक टोकन मिलता जिसपर एक नंबर होता। बैठने की कोई जगह नहीं थी... न ही जिसकी बारी आती, उसका नंबर डिस्प्ले होता... बस उसका नंबर पुकारा जाता। अपना नंबर आते- आते दोपहर हो जाती और दफ़्तर जाने का वक़्त भी होने को जाता। दोपहर बाद काफी मशक्कत करते हुए भुगतान लेता... इस दौरान कई बार शर्ट के एकाध बटन तक टूट गए... औरों से जोर- आजमाईश में। कई बार झगड़ा- झंझट की स्थिति भी पैदा हो गई। खैर, वहां से निकलकर सबसे पहले हम कुछ दोस्तों के साथ रास्ते में पड़ने वाले घंटाघर पर जमा होते और वहां बनाना शेक का दौर चलता...। एक.. दो... तीसरा गिलास आते –आते बम बोल जाता। तीस- तीस रुपये देकर घर की तरफ भागते... और वहां से दफ़्तर तक हांफते- हूंफते पहुंचते।
ये सिलसिला भी ज्यादा नहीं चला। अख़बार में सबके पास सूचना भिजवाई गई कि एक विदेशी बैंक का खाता खोला जाना है और उसमें सैलरी जाएगी। हमने भी अकाउंट में अपना नाम- पता और फोटो दे दिया। हफ्ते भर बाद एक लिफाफ मिला जिसमें एक चेकबुक जो मेरे नाम से छपा था और साथ में एक कार्ड भी था। कार्ड बहुत समझ में नहीं आया तो घर पर रख दिया। ... इसबार सैलरी लेने पहुंचा दो इस बैंक को पहली बार देखा... खूबसूरत लड़कियां अलग- अलग काउंटर की जानकारी दे रही थीं... ग्राहकों के बैठने के लिए चकाचक सोफे। चेक जमा कराया और सोफे पर तनकर बैठ गए। वातावरण में खुशबू थी और बैंक के सुंदर- सुंदर चेहरे को तकते हुए कब वक्त बीत गया पता ही नहीं चला। बामुश्किल पंद्रह मिनट के भीतर कैश मिल गया और हम फिर घंटाघर पहुंच गये।
कुछ महीने बाद मेरे एक मित्र थे गंगेश जी। एकदिन रास्ते में मिले तो मैने बताया कि सैलरी लेने बैंक जा रहा हूं... उन्होंने कहा कि आपका एटीएम नहीं मिला क्या। मैने कहा मिल गया लेकिन मै इस्तेमाल नहीं करता हूं। (दरअसल मुझे एटीएम के इस्तेमाल का पता ही नहीं था...। एटीएम का दरवाजा उस समय कार्ड डालने पर खुलता और फिर भीतर से बंद हो जाता। निकलने के लिए दोबारा कार्ड डालना पड़ता।... सो अंदर जाते हुए डर लगता और कभी गया ही नहीं। लेकिन गंगेश जी पर जाहिर भी नहीं होने देना चाहता था कि मैं कितना जाहिल हूं।) उन्होंने हैरानी जताई कि क्यों आप धक्के खाने जाते हैं... मैने कहा कि मजा आता है। हंसने लगे... कहा कि आपने कभी एटीएम कार्ड का इस्तेमाल किया भी है कि नहीं... अब मैं कहूं तो क्या... मुझे चुप देखकर अपनी मोटरसाइकिल पर पहले मेरे घर ले गए जहां से लिफाफाबंद एटीएम कार्ड लिया और फिर वहां से पास के ही एटीएम में अपने साथ ले गए। ... सबकुछ बताया... पैसे जब निकल गए तो भी शुरु में तीन- चार बार गंगेश जी को ही जबरन अपने साथ एटीएम ले जाता।
ख़ैर। अजीब दौर था वो। तक़रीबन उसी समय सभी रिपोर्टरों को मोबाइल अनिवार्य कर दिया गया तो मुझे भी ख़रीदना पड़ा। ...एक फोटो देखकर अब भी हंसी फूट पड़ती है अपने जाहिलपने पर... जब देखता हूं कि मोबाइल खरीदने पर खुशी से फूला समाया मैं.. अपने दोस्तों के साथ खड़ा हूं और हाथ में मोबाइल इस स्टाइल में पकड़ रखा है जैसे कोहिनूर हीरा हाथ लग गया हो।
...तो जिंदगी में रोज नई –नई चीजें आ रही थीं। उसी समय उसी विदेशी बैंक का एक एजेंट मेरे दफ्तर में आया और कहने लगा खाता खुलवा लो। मैं और मेरे कुछ सहयोगी तफ़रीह के मूड में थे सो कहा कि क्या- क्या सुविधा दोगे। उसने कहा कि लोन ले सकते हैं ...एटीएम की सुविधा है और फलां- फलां। हमने कहा कि लोन दे सकते हो तो ये बताओ कि एटीएम मशीन की क्या कीमत है। उसने कहा कि आप समझे नहीं ...एटीएम मशीन बिकती नहीं है... उससे तो नोट निकलते हैं। हमने कहा कि बैंक में पता करो... चाहे कितने लाख हो... हमे मशीन दे दो और हम उस मशीन से रुपये निकालकर तुम्हारा लोन चुका देंगे। ... कम-से-कम दस बार समझाने के बावजूद जब हम समझने को राजी नहीं हुए तो उसने कहा कि भाई साहब ..आपलोग पढ़े- लिखे भी हो या फिर ऐसे ही चले आए। बहुत लाल- पीला होता देख मेरे एक सहयोगी ने बताया कि हम तो तुम्हारी परीक्षा ले रहे थे कि तुम अपने कस्टमर को कैसे एटीएम के बारे में बताते हो... हम सब तो तुम्हारे बैंक में खाता भी खुलवा चुके हैं। ...एजेंट सिर धुनता हुआ निकल लिया। (जारी)

5 comments:

MANVINDER BHIMBER said...

gagesh ka jike achcha laga...post to or bhi achchi lagi.....keep it up

kundan shashiraj said...

आपकी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद आपका उत्कृष्ट और मनोरंजक पोस्ट पढ़कर मन प्रसन्न हो जाता है. सर, जरा मेरे ब्लॉग पे भी नजर डाल लीजिये कभी. . मेरे वीडियो और कुछ पोस्ट है... ब्लॉग का पता है...www.inkalab.blogspot.com

Jayant said...

रोचक विवरण.... लिखते रहिए....!!!!

Bhuwan said...

बेहतरीन संस्मरण..
अब क्या कहूँ... जब हमारे सामने नई तकनीकें आती है तो हम उनसे यूँ ही बचने की कोशिश में लगे रहते है. मेरे पिताजी तो अब तक एटीएम का इस्तेमाल नहीं करते. शुरुआत में जब उन्हें कार्ड दिया गया तो घर में अपनी फाइल जिसमे वो अपने दस्तावेज बहुत करीने से, सहेज कर रखते है उसमे रख दिया.. पिन बैंक से लाना था.. वो लेकर नहीं आये..सो कुछ दिनों बाद उसकी समय सीमा ख़त्म हो गई. बाद में जब मैंने जोर दिया तो दुबारा कार्ड बनवाया लेकिन खुद आज तक इस्तेमाल नहीं किया. मोबाइल के साथ भी उनकी ये परेशानी बरक़रार है. पहले जब मेरे मोबाइल पर उनका ब्लैंक मेसेज आता था तो मुझे लगता था की कुछ बात हो गई..तुंरत फ़ोन करता था.. जवाब मिलता था मैंने नहीं किया मैसेज. उनका ब्लैंक मैसेज अब भी आता है...

menka said...

wah kya baat hai....? mere papa to aaj tak mobile phone nahi rakhte... kah nahi sakti ki unhe mobile phone oprate karna nahi aata, ho sakta hai ki wo bhi aapki tarah nayee cheez se bach rahein ho.....