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Monday, March 30, 2009

फुटेज लिये हो या नहीं

पत्रकार भुवन ने अपने ब्लॉग लूज शंटिंग पर अपना एक हाहाकारी तजुर्बा लिखा है। इस अनुभव में किसी तरह का झोल या मिलावट नहीं है। पूरी तरह मौलिक भुवन का अनुभव आप भी पढ़ें... और इस आईने में खुद को भी देखें।- संजीव

कल सुबह दफ्तर से जहांगीरपुरी मेट्रो स्टेशन की तरफ जाते वक़्त हुए एक हादसे ने अभी तक मुझे सामान्य नहीं होने दिया है. सड़क पर आने जाने वालों की कमी नहीं थी. मेट्रो स्टेशन से करीब सौ मीटर की दूरी पर मेन रोड पर एक आदमी पूरी तरह आग की लपटों से घिरा हुआ बदहवास भाग रहा था. अचानक सामने आये उस आदमी को देख कर कुछ सेकंड तक तो मैं सन्न रह गया. लेकिन फिर उसे बचने की कोशिश में लग गया. पहले ही बता दिया की सड़क पर लोगों की कमी नहीं थी... लेकिन कोई भी सामने नहीं आया. मुझे समझ में नहीं आ रहा था की करू क्या..आग कैसे बुझाऊ. मैंने उस पर मिटटी डालनी शुरू की. आग इतनी तेज थी की उसके पास जाना संभव नहीं था. इस मिटटी से आग हलकी हो रही थी लेकिन बुझ नहीं रही थी. उस आदमी को जलते देख मेरी भी हालत ख़राब हो रही थी. सड़क के किनारे लोगों का जमावडा लगा हुआ था. बसे कारें रुक गई थी. लेकिन मदद के लिए कोई नहीं आया. संयोग से एक रिक्शे वाले ने अपनी सीट के नीचे से कम्बल निकाल कर दिया. तब जाकर किसी तरह आग को बुझा सका. इस बीच मैंने कई बार लोगो से आवाज लगाई, पुलिस बुलाने को कहा लेकिन सब तमाशाई बने रहे. आग बुझने के बाद मैंने पुलिस को फ़ोन किया. उस आदमी की किस्मत अच्छी थी की पुलिस और एम्बुलेंस तुंरत आ गई और उसे अस्पताल ले गई. इधर मैंने ऑफिस में भी खबर कर दी थी. उधर से पहला सवाल था जलते हुए फुटेज लिया या नहीं... इतनी देर से मैं मन ही मन वहां खड़े लोगों की ही कोस रहा था.. लेकिन उस सवाल के बाद मेरा दिमाग सन्न रह गया. कई पुरानी बाते याद आ गई. भोपाल में कॉलेज के ठीक बगल में बन रहे मेनहाल में गिर कर मर गए बच्चे के पिता से मेरे सहयोगी ने पूछा था..कैसा लग रहा है आपको... मुझे लगा अभी ये शख्स मेरे साथी की पिटाई कर दे तो क्या बुरा हो. दूसरी घटना तब की है जब मैं एक नामी प्रोडक्शन हॉउस में इंटर्नशिप कर रहा था. वो कई न्यूज़ चैनल्स को खबरे और प्रोग्राम बना कर देता था. काम के दौरान एक बार मैंने एक फ़ोन रिसिव किया. सामने वाला रो रो के कह रहा था की उसकी बेटी से किसी ने बलात्कार कर हत्या कर दी है. आप जल्दी से आइये... मैंने उस का पता ठिकाना नोट किया और अपने बॉस को बताया. उन्होंने पूछा प्रोफाइल क्या है. मैं उनकी बात समझ नहीं पाया. उन्होंने कहा वो आदमी करता क्या है ? मैंने कहा मजदूर है... सर की तरफ से मिले जवाब ने मुझे शून्य कर दिया. उनका कहना था की मामला बहुत लो प्रोफाइल है..खबर में जान नहीं आएगी. इन दोनों बातों ने मुझे झकझोर दिया था. फिर इतने दिनों बाद हुई इस घटना से वो बाते फिर आँखों के सामने आ गई. खैर तब तक वहा भीड़ जमा हो चुकी थी... तरह तरह की बातें..कयास.. उस आदमी के अस्पताल जाते ही मैं भी वहा से निकल गया. दिमाग में कई बातें कई सवाल घूम रहे है. कभी लगता है की मेरे सहयोगियों के सवाल भी अपनी जगह ठीक थे.. आखिर प्रोफेशंलिस्म तो इसे ही कहते है..कभी लगता है की थोडी इंसानियत भी जरूरी है. दूसरी तरफ इस वाकये के बाद इस बात का यकीन हो चला है की कल को मुझे राह चलते कुछ हो जाये तो मदद करने वाला कोई नहीं होगा. शायद यही दुनिया का दस्तूर हो गया है.

3 comments:

Anonymous said...

sabse pahle to mai bhuwan ki himmat aur jajbe ko salam karta hu ki unhone aaj ke samay me jab log apno ki hi madad karne se katrate hai..unhone ek anjane shaksha ki jaan bachai. sath hi apne lekh ke jariye patrakarita ki maujuda halat ko bhi samne la diya.

Deepak Awasthi

rajeev sinha said...

उस आदमी को जलते देख मेरी भी हालत ख़राब हो रही थी. सड़क के किनारे लोगों का जमावडा लगा हुआ था. बसे कारें रुक गई थी. लेकिन मदद के लिए कोई नहीं आया.

yahi aaj ki sachchai hai bhuwan

menka said...

Bhuvan tumne mahsoos kiya, kayee to mahsoos bhi nahi karte... Waise media ke baare mein kaha jata hai ki, jismein samvedna hai vo patrakar nahi ban sakta....