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Tuesday, March 31, 2009

...एक एड्स रोगी की मौत

पत्रकारिता में कई ऐसे अवसर आते हैं जब एक आदमी के तौर पर भी आपकी पहचान होती है। मेरे साथ भी कुछेक बार ऐसा ही हुआ। मैं ऐसे समय में पत्रकारिता में आया जब बहुत सारे चेंजेज आ रहे थे। बीमारी के रूप में एड्स जैसी भयावह बीमारी भी उसी वक़्त आम होने जा रही थी... वैसे, हम सब शुरू में यही मानकर चल रहे थे कि ये कोई नाइजीरियन बीमारी है जिसका हिंदुस्तान में कोई असर नहीं होने वाला...दरअसल, हम बेहद छोटी बुद्धि और छोटे नजरिये वाले लोग थे।
(भागः पांच) – मैं जिस अख़बार में काम करता था, उसके मुख्य पृष्ठ पर एक सिंगल कॉलम की ख़बर छपी। हेडिंग थी कि एड्स रोगी मरा, इलाके में सनसनी। ख़बर की तफ्सील ये थी कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के खेकड़ा तहसील में एक युवक की मौत हो गई, जिसे एड्स था। एम्स ने इस युवक के एड्स पीड़ित होने की पुष्टि कर दी थी। ख़बर के मुताबिक युवक ट्रक ड्राईवर था और कभी बिहार गया था जहां एक्सीडेंट होने पर वहां के स्थानीय अस्पताल में उसे जब भर्ती कराया गया तो एड्स संक्रमित खून चढ़ने से युवक को एड्स हो गया और युवक की मौत हो गई।– उस वक़्त ये बहुत बड़ी ख़बर थी जिसे सिंगल कॉलम में निबटाकर तक़रीबन अपराध किया गया था। ये वह दौर था जब किसी अस्पताल में एड्स रोगी को देखकर अन्य रोगी तो क्या डॉक्टर भी दौड़कर भाग खड़े होते थे। कुछेक जगहों पर तो एड्स रोगियों को पथराव करके अस्पताल से भगा दिए जाने की भी घटनाएं सुनने को मिली थी। ...तो मैं इस खबर को पढ़कर हिल गया। मैंने रोजाना होने वाली सुबह की मीटिंग में अपने बॉस से कहा कि ये ख़बर बेहतर जगह की मांग करती थी। बॉस ने कहा कि तो अब तुम कर लो। खेकड़ा जाने के लिए एक साथी फोटोग्राफर अपनी गाड़ी लेकर आए...और हम चल पड़े बागपत की तरफ़। खेकड़ा में हमारा वही संवाददाता था जिसने ये ख़बर लिखी थी। सबसे पहले हम उसके पास गए और कहा कि उस गांव ले चलो जहां एड्स रोगी की मौत हुई... पहले तो उस संवाददाता ने काफी टालमटोल की। बहुत ज़िद करने पर कहा कि गांव के मुहाने पर वो हमें छोड़ देगा। मैने उससे कहा कि तुम उस गांव में कल गए तो आज जाने में क्या हर्ज है ? उसने नाराज होते हुए कहा कि न तो मैं कल गया ..न ही आज जाऊं... हमें एड्स न लेणा... भाईसाब, तुम्हें जाणा हो तो शौक़ से जाव। हमने तो जैसा पता लगा जी तो लिख के भेज दी।... ख़ैर हमें गांव के बाहर एक चौधरी साहब के दालान पर बिठाकर हुक्का पिलाया.... और बुजुर्गों ने बड़ी ज़िद करके भरी गर्मी में एक गिलास पानी मिला हुआ दूध पीने को दिया (ऐसा करने से बताते हैं कि लू नहीं लगती)। पूरे गांव में उसी एड्स पीड़ित युवक की चर्चा थी।
वहां से हम फोटोग्राफर को लेकर उस घर गए। उसके बड़े भाई ने जो बताया वो हैरान करने वाला था। उसके बड़े भाई ने बताया कि एड्स मरीज होने की वजह से पूरे गांव ने उनका बहिष्कार कर दिया है... अंतिम संस्कार के लिए भी कोई नहीं आया। अकेले ही उन्होंने सबकुछ जैसे भी हुआ...कर दिया। यानी अकेले आदमी ने अंतिम संस्कार किया। उसके बाद उन्होंने बताया कि उनका भाई ट्रक ड्राईवर नहीं था और न ही कभी बिहार गया... अख़बार में लिखा गलत है। ख़ैर इसी बीच उन्होंने अंदर जाकर कुछ कहा और थोड़ी देर बाद लंबा घूंघट काढ़े एक महिला थाली में मट्ठा लेकर आई..। उन्होंने बताया कि मरने वाली युवक की पत्नी हैं। मैने तो गिलास उठा लिया लेकिन मेरे फोटोग्राफर ने गिलास उठाने के बाद आहिस्ते से जमीन पर रखकर उलट दिया... और मुझे कहुनी मारते हुए आंखें दिखाई कि ...साले, पी मत लियो बस... एड्स हो जावेगा।... ईमानदारी से, मैं डरा तो जरूर लेकिन एक सांस में ही गिलास उठाकर पी गया गटागट। (जारी)

1 comment:

menka said...

Aids pidito ki aisi kahaniya pahle bhi padi aur likhi hai..... lekin aapne jo likha hai, vo padhte-padhte pata hi nahi chala ki kahani khatm ho gayee hai... Main janna chahti hun ki aapke maththa pine ke baad kya hua?