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Wednesday, April 1, 2009

सुन रही हैं संगीता पुरी जी... कहां हैं समीर साहब...और आप भी

चुनावी बयार में चुनावों से ही भूमिका बांधना ठीक होगा। सीधे- सीधे कह दूंगा तो लगेगा कि रिरिया रहा है। ...घिघिया रहा है। लोग कहेंगे, देखो तो ...नामुराद बात कहने और मतलब निकालने का सलीक़ा भी नहीं जानता। शायर कह उठेगा- न पीने का सलीक़ा न बहकने का शऊर, जाने कैसे- कैसे लोग चले आए हैं मयखाने में। सो, और तोहमत तो बर्दाश्त कर भी सकता हूं... सलीका नहीं जानने का इल्ज़ाम मैं झेल नहीं पाऊंगा। बचपन से आज तक ( कृपया इसे अमिताभ बच्चन की आवाज़ को याद करते हुए पढ़ें) यही एक सलीका तो नहीं आया। कमजोर नस है... और भी है मगर इस नस को दबाना तो जैसे मेरा टेंटुआ दबाना ही होगा। मित्रो, आप मेरा टेटुआ भी दबाना तो जरा सलीके से...उफ् तक न कहूंगा। लेकिन अगर बेतरतीब तरीके से ऐसा प्रयास किया तो मैं चिल्लाऊंगा...शोर मचाऊंगा। इसलिए नहीं कि मुझे मारा जा रहा है, इसलिए शोर मचाऊंगा कि बेतरतीबी से भरी एक मौत मुझे घेर रही है। एक कविता भी याद आ रही है, (निश्चय ही ये न तो मेरी है, न मैं इतनी अच्छी कविता लिख सकता हूं) ठीक इसी वक़्त- आदमी और कुत्ते की मौत में बड़ा अंतर है/ आदमी मरने से पहले चीखता है- चिल्लाता है, शोर मचाता है खूब/ कुत्ता मर जाता है चुपचाप/ बिना शोर मचाए/ मगर मुझे नहीं पता/ वाक़ई मुझे नहीं पता, इस शहर में हर रोज़/ तक़रीबन हर रोज, एक आदमी कुत्ते की मौत मारा जाता है।– भाई, इस कविता को सीरियसली मत लेना। बुक्के फाड़कर मत रोना... नहीं तो उस आदमी की आत्मा भी रो पड़ेगी जिसे कवि (मैं नहीं) कहता है कि बेचारे को कुत्ते की मौत मिली- मुर्दा शांति से भरी खामोशी भरी मौत। ...सेंटी होने की जरूरत नहीं है, होता है... चलता है। जैसे अबतक चलती रही है दुनिया और चलते रहे हैं दुनिया वाले।
अरे यार। कहां –कहां आपको भटकाने लगा। ...कुछ ज्यादा ही हो गया ये तो। मैं तो बस आपसे अपने ख़्वाबों की बातें करने आया था...और लंतरानियां करने लगा। वैसे, इसका भी अपना मजा है। रात सपने में अपना ब्लॉग देखा ...पोस्ट पर आई टिप्पणियां देखी... मन गदगद हो गया क्योंकि 38 टिप्पणियां आई थी... उसमें समीर लाल साहब, संगीता पुरी जी से लेकर मेरे ब्लॉग पर आने वाले और आने वालियां तमाम ब्लॉगर्स थे। ...खुद को चिऊंटी काटकर देखा। बेवजह जोश में आकर बीबी को जगा दिया। सुबह- सुबह यूं उठाए जाने पर हैरान थी...। मैने कहा कि क्या तुम्हारे ख्वाब में भी टिप्पणियां आती हैं। वो समझी नहीं... मैं भी कुछ समझा नहीं। लैपटॉप लेकर बैठ गया... ब्लॉग पर आया तो सबसे पहले टिप्पणियां देखी- वहां कुछ तो लिखिये जनाब के बगल में आई टिप्पणियों की संख्या थी –शून्य।

10 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

भैया जी।
समीर लाल जी संगीता पुरी जी के साथ
उड़न तश्तरी पर बैठ कर कोलकाता के
चक्कर लगा रहे हैं।
बहिन संगीता पुरी जी उनका भविष्य
बाँच रही हैं और आने वाले खतरों के
बारे में उन्हें सावधान कर रही हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय मूर्ख दिवस की
शुभकामनाओं के साथ-
आपका।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

भैया जी।
समीर लाल जी संगीता पुरी जी के साथ
उड़न तश्तरी पर बैठ कर कोलकाता के
चक्कर लगा रहे हैं।
बहिन संगीता पुरी जी उनका भविष्य
बाँच रही हैं और आने वाले खतरों के
बारे में उन्हें सावधान कर रही हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय मूर्ख दिवस की
शुभकामनाओं के साथ-
आपका।

मोहन वशिष्‍ठ said...

बहुत खूब जनाब

शोभित जैन said...

Bura na mane aapke sapne aapko April fool bana rahe they

Udan Tashtari said...

लो भई, अब जाग जाओ, आ गई टिप्पणी. लिखते चलो, हम तो हईये हैं टिपियाने के लिए. काहे सपने में परेशान हो रहे हैं.

संगीता पुरी said...

बहुत गडबड हुआ भई आपके साथ ... हमलोगों के होते हुए ख्‍वाब में टिप्‍पणी देखनी पडी ... हकीकत में न मिली ... आगे लिखते चलें ... जरूर टिप्‍पणी मिलेगी।

Anil said...

हे टिप्पणीदेवता! अपनी कृपादृष्टि इस बालक की ओर भी डाल दे!

रंजन said...

आठवीं आहू्ती मेरी और से..

Dr.Bhawna said...

आपका ख्वाब जरूर पूरा होगा...

prabhat said...

9 से बड़ी कोई संख्या हो तो बताओ प्यारे भाई. अब मेरी टिपण्णी के बाद इसमें शून्य ज़रूर आ जायेगा. जिनके लिखे पर ढेर ढेर कमेन्ट आते हैं, तुम तो उसमे शुमार नहीं हो पाओगे. क्वालिटी मांगता है तो ढेर सारा नहीं मिलेगा. ढेर कमेन्ट पाने के लिए तुलसी-निराला कहने की तरह का उपक्रम करना पद सकता है. मैं जानता हूँ कि तुम्हे निराला कहने में एक बार गुरेज़ नहीं भी हो सकता है मगर खुद को तुलसी कहे जाने की शर्म बर्दाश्त न कर पाओगे. अपना काम करते रहो, कमेन्ट के चक्कर में घर वालों को दुखी मत करो.