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Saturday, April 4, 2009

...धुत्त इनको तो ट्रेन में चलने का सेन्से नहीं है

चुनाव के समय देश की जनता ऐसी लगती है जैसे घंटों लेट चल रही भारतीय रेल में सवार हो... ट्रेन के भीतर चिल्ल-पों मची हो। जिस रेल में अधिकतर यात्री खड़े हों, पांव रखने की जगह न हो... इसमें भीख मांगने वाले, चाय-पानी और गुटखे- तंबाकू बेचने वालों की आवाजाही। यहां कभी बीजेपी वाले दुकानदार आते हैं तो कभी कांग्रेसी टीटी। आप भी कुछ ऐसा ही अनुभव करके देखिये... शायद मजा आए।- संजीव

चुनावी घोषणा पत्र क्या होता है... आवाम के हाथों थमाया गया झुनझुना। एक ऐसी बीन जिसे बजाकर लोगों का मजमा जुटाया जाता है। पहले कांग्रेस का झुनझुना बजा तो अब बीजेपी का। वैसे, बीजेपी का साज़ औरों से अलग है।... बीजेपी के चुनावी साज पर रामधुन के सिवा कुछ और नहीं बजता। गाहे-बगाहे कुछ बज भी जाए तो सम में राम पर ही आकर ठहर जाता है। चुनाव नजदीक था...मगर बीजेपी पसोपेश में थी। अटलजी बेजार थे॥ मगर आडवाणी ताक में थे। ...साथी कुनमुनाए... लालू की भविष्यवाणी भी उन्हें डरा नहीं पाई...। मगर एक सवाल था...चुनावी बीन पर सवालों के किस नाग को नचाएं ? बहुत कोशिश की। आतंकवाद का नाग तरन्नुम में नाच नहीं रहा था।... खाना ख़राब हो कांग्रेस का...रहमान के ऑस्कर जिताऊ गीत पहले ही ले उड़ी। कह दिया...ये हमारे हिस्से के रहमान हैं। क्या करे बीजेपी...बीजेपी का साज बजाने के लिए कोई रहमान राजी नहीं। सो, बीजेपी ने अपना रहमान गढ़ लिया। बीजेपी के फ़नकार ने रच दिया- भय हो। लटपटाती... घरघराती आवाज में चलती रेल। मुफलिसी और मायूसी के गीत गा रहा बालक। गर्मी के मारे पसीने से नहाए... अनमनाए लोग। आवाज़ आती है –नींद तोड़िए ज़नाब। लोग सोचते हैं चाय वाला है... मगर ये तो बीजेपी वाला है। इसके पास नींद खोलने के लिए चाय नहीं है। मायूसी के गीत गाने वाले बालक के लिए रोटी भी नहीं है। उसके सीने में ऐसी हूक कभी नहीं उठी कि नंगधड़ंग लोट रहे बच्चे को अपनी रामनामी चादर ओढ़ा दे। तो क्या है इसके पास... इसके पास राम है। राम के नाम पर इनकी दुकान है। कहते हैं कि राम नाम का रतन उनके पास ही है। ख़्याल आया, आडवाणी जी कहते हैं -पायो जी मैने राम रतन धन पायो। आडवाणी ने वो गाना नहीं सुना- देखो ऐ दीवानों ये काम न करो, राम का नाम बदनाम न करो। अपना मेनका का लाडला जिसे विरोधी कहते हैं कि ग़लत सोहबत में बिगड़ गया है, उसका भी कुसूर नहीं। जब राम का नाम बदनाम न करने की सीख वाले गाने आए थे... उस समय तो बेचारा पैदा ही नहीं हुआ था। वो ताज़महल बनने के बाद में पैदा हुआ तो वो क्या जाने ताज़महल कब और कैसे बना था। तो उसने भी रेल में आकर जोर से कहा आवाज लगाई... लोगों ने देखा और मुसाफिरों ने मुंह फेर ली...। खैर साहब, लालू जी की रेल जैसे चलती है, वैसी ही खटरपटर आवाज में चलती रही... मुसाफिर फिर से ऊंघने लगे। बीच- बीच में पसीना भी पोछते रहे। सफर में कुछ और मदारी आए मगर मुसाफिर नहीं जगे।... बेकारी की छटपटाहट में मुसाफिरों को गीत सुनाकर भीख मांगने वाले बालक का शोर बढ़ता गया... कांग्रेसी टीटी ने सुना तो उखड़ गया। हमारी ट्रेन में भय हो बोलने वाले कमअक़्ल... आगे भी रेल में भीख मांगनी हो तो बोल- जय हो। आतंकवाद में अपनी भी गर्दन गंवा चुके... महंगाई में अपनी रीढ़ खो चुके ...तमाम मुसाफिर बोल उठे- जय हो। रेल चलती रही... गीत गाने वाले बालक का सुर बदलता रहा... अलसाए- अनमनाए मुसाफिर मजमा दिखाने वालों... दुकान सजाए लोगों से बेजार ऊंघते रहे।... हांफती हुई रेल चलती रही।

2 comments:

संगीता पुरी said...

बिल्‍कुल सही लिखा ... चाहे कोई झुनझुना बज जाए ... कोई उत्‍साह नहीं है मुसाफिरों में ... यात्रा नीरस जो हो गयी है।

menka said...

Jhunjhuna dekh kar khush hone ki to hame aadat ho gayee hai.... hame bhi pata hai ki, jitna dene ka vayda hota hai... uske aadha bhi nahi milne wala... aise mein nirash kyon hona.. so hum khush hi rahte hain. Waise ummid lagay baithe hain ki rail chalane wale haath zaroor imandaar honge.