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Tuesday, April 7, 2009

...ये जूता बोलता है

शायद नरसिम्हाराव की सरकार को लेकर आडवाणी अपनी सभाओं में एक किस्सा कहते थे। उसकी तफ्सील थी कि एक चोर को राजा के दरबार में पेश किया गया। चोर ने अपना गुनाह कुबूल कर राजा का दिल जीत लिया। राजा ने खुश होकर चोर से कहा कि तुम्हे गुनाह किया है इसलिए सजा भी मिलेगी। लेकिन तुमने गुनाह कुबूल कर लिया है इसलिए तुम्हें सजा के दो विकल्प दिये जाएंगे, जो भी तुम्हें अच्छा लगे, उसपर अपनी रज़ामंदी दे सकते हो। चोर से कहा गया कि तुम सौ जूते खाओ या फिर सौ प्याज़। चोर ने मन ही मन में कहा कि कितना कमअक़्ल है, कौन सौ जूते खाए... सौ प्याज खाकर छुट्टी। सो, उसने सौ प्याज की सजा पर हामी भरी। उसने प्याज खाना शुरू किया तो उसके मुंह-कान से धुआं निकलने लगा। उसने सोचा सौ जूते ही लगवा लो...हाथ –पैर झाड़कर निकल लो। उसने गुजारिश की महाराज सौ जूते ही ठीक रहेंगे। जब जूता पड़ना शुरू हुआ दस जूते के बाद हालत ख़राब हो गई। उसने फिर से प्याज का विकल्प चुना। इस तरह से उसने सौ जूते भी खाए और सौ प्याज भी।– शायद स्थिति अबतक नहीं बदली। चौरासी के दंगों के मामले में प्याज और जूते ...दोनों की बराबर सजा भुगत रही है। ख़ैर। पत्रकार जरनैल सिंह की जूतामयी प्रस्तुति ने जूते को नये ढंग से परिभाषित किया है। जूता एक मुहावरा है... जूता एक नारा है। जूता नेताओं के लिए समस्या है तो जनता के लिए समाधान है। जूता मर्ज है तो जूता ही दवा है। जूता मायूसी भरा अंधेरा है तो जूता उम्मीदों का उजाला भी। जूता वाद है तो जूता निर्विवाद भी है। जूता छायावादी है तो जूते का अपना ठोस अस्तित्व भी है। जूता विरोध का प्रतीकात्मक स्वर है तो जूता एक जज्बा भी है। जूता अस्त्र है... जूता शस्त्र भी है। जूता नाराजगी का प्रतीक है तो जूता हास्य भी पैदा करता है। जूता अमीरी दिखाता है तो फटे जूतों से गरीबी भी झांकती है। रामचंद्र जी वनबास को गए तो भरत ने उनका खड़ाऊं संभाला।... लालूजी जेल गए तो राबड़ी देवी ने खड़ाऊं संभाला। हर नेता अपने से बड़े नेता की खड़ाऊं संभालने की ताक में रहता है। वैसे, नेता लोग खैर मनाएं कि खड़ाऊं अब जूते में तब्दील हो गया। खड़ाऊं का चलन नहीं रहा। क्या ऐसा नहीं लगता ? ऐसे जूतावादी दौर में अगर खडा़ऊं का अस्तित्व रहा होता तो कम-से-कम सिर तो फोड़ ही डालता। ...मैं ऐसा लिख रहा था तो मेरे एक साथी ने कहा कि जूते से किया गया हमला शरीर से ज्यादा आत्मा पर चोट ज्यादा करता है। जैसे गांधीजी शराब के बारे में कहा करते थे।
मित्रों, जूता खाना और जूता चलाना बिल्कुल अलग- अलग अनुभव है। जूता खाने के अनुभव के बारे में तजुर्बेदार लोग आपको बताएंगे लेकिन जूता चलाकर आप खुद को वीर रस में पाते हैं। ये भी कम दिलचस्प नहीं कि चलने के नाम पर सिर्फ जूता ही नहीं है। चलती तो कलम भी है।... लेकिन दोनों के चलने की स्थितियां अलग- अलग हैं। कलम चलती रहे तो इसी में उसकी सार्थकता है ...जूता पांव से बाहर न निकले, नेता यही दुआ करते रहे हैं। कलम चूंकि स्त्रीलिंग है इसलिए कमजोर है। जूता पुल्लिंग है इसलिए दमदार है। दमदार लोगों की दमदार पसंद। दोस्तो, जूते भी कई नाना प्रकार के होते हैं। राजकपूर साहब जापानी जूते का अफसाना कहते- कहते चले गए। सलमान खान- माधुरी दीक्षित में जूते चुराने और लुकाने को लेकर लटरपटर अब पुरानी बात हो गई। हम तो बात कर रहे थे विशुद्ध देसी किस्म के जूतों की जो पहनने पर काटते भी हैं... आपके जूते तो नहीं काटते जनाब ? जूता भी अलग- अलग मिजाज का होता है। पब्लिक का जूता अलग होता है... जर्नलिस्ट का जूता अलग होता है। ...पूरी दुनिया में। मौक़ा अलग- अलग हो, मगर इन दोनों ही जूतों का निशाना बनते आखिरकार नेता ही हैं। नेता इनके जूतों में भी भेद करते हैं। पब्लिक मंच पर पब्लिक जब जूते उछालती है तो नेताओं को खास बुरा नहीं लगता। लेकिन पत्रकारों का जूता ...तौबा- तौबा। (सॉरी, चिदम्बरम साहब)

5 comments:

ajay kumar jha said...

waah saahab joote par aapka shodhgranth yadi chidambaram saahab ko padhwaa diyaa jaaye to shyaad unkaa dukh kuchh kam ho sake. andaaj pasand aaya.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

जूता खाकर बुश को अपनी कुर्सी गवाँनी पडी,
क्या चिदम्बर साहब का भी यही हाल होगा.

परमजीत बाली said...

अच्छी पोस्ट लिखी है।बधाई।

nitu pandey said...

सर,मस्त लिखा है आप ने जूते के मार पर। आप का जवाब नहीं । आप ने जूते पर इस ऑटिकल को लिख कर सबको यानी नेता और जर्नलिस्ट को बहुत मस्त लपेटा है।

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया पोस्‍ट लिखा है ... बधाई।