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Wednesday, April 8, 2009

लड़कियां नहीं डरतीं


मैं हमेशा से किसी ख़ास दिन ही किसी ख़ास मसले पर विचार करने का विरोधी रहा हूं। जैसे हिंदी दिवस, महिला दिवस या ऐसे ही और भी दिवस। कोई मनाए तो मेरा विरोध भी नहीं है। बड़े उद्देश्यों वाले इन मुद्दों पर जीवन भर विचार करने करने की जरूरत है। ख़ैर, जाने दीजिये। एक कविता याद आ रही है... महिला दिवस पर तो नहीं लिख पाया था। अब पढ़िये। चाहे जिसकी कविता हो, बेहद अच्छी हैः संजीव

पैदा होने से पहले भ्रूण हत्या का डर/ पैदा होते ही मार दिये जाने का डर/ जवान होते ही बाजार में बेच दिए जाने का डर/ शादी होते ही दहेज में झोंके जाने का डर/ वृद्धा होते ही घर से निकाल दिए जाने का डर/उफ, ये लड़कियां/ लड़कियां होने से डरती क्यों नहीं हैं?

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

लड़कियों की ये ही विडम्बना है साहब।
नर की खान जो ठहरी।
इसीलिए,
ये लड़कियां होने से डरती नहीं हैं।

संगीता पुरी said...

सही सवाल ... लड़कियां होने से डरती क्यों नहीं हैं?

Dipti said...

एक बहुत ही बेहतरीन सोच...
लेकिन, एक सोच ये भी है कि उसे डरानेवाले कब बाज आएंगे?