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Thursday, April 16, 2009

भूख के ख़िलाफ बंदूक का रास्ता


मेरे एक साथी चुनावों के दौरान नक्सली हिंसा की वजह से क्षत- विक्षत लाशों को देख विचलित थे। नक्सलवाद के ख़िलाफ़ उनका गुस्सा फूट पड़ा। नक्सलवाद की असली अवधारणा बताने की कोशिश की तो उन्होंने इसे नक्सलियों की हिंसा को जायज ठहराने की कोशिशों के रूप में देखा। नक्सलवाद उनके लिए हिंसा का वाद है और नक्सलवाद के इस विद्रूप चेहरे को ही उन्होंने अबतक देखा- जाना है। यानी ऊपरी तौर पर नक्सलवाद से उनका सामना हुआ। जिसके बाद उनके अवचेतन में नक्सलवाद का यही घिनौना रूप रच- बस गया है। ...हम जैसे तमाम मध्यवर्गीय लोग नक्सलवाद के बारे में यही सोचते- समझते हैं। हालांकि निजी तौर पर मैं इससे सहमत नहीं हूं। मुझे लगता है कि नक्सलवाद एक भटका हुआ आंदोलन है जो सशस्त्र क्रांति के जरिये भूमिहीनों और किसानों को उसका हक़ दिलाने के बड़े उद्देश्यों के साथ शुरू हुआ था।
नक्सलवादी विचारधारा ....मार्क्सवाद- लेलिनवाद और माओत्सेतुंगवाद के क्रांतिकारी पर्याय के रूप में उभरा। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में नेपाल की सीमा से सटे कस्बे नक्सलबाड़ी ने इस क्रांतिकारी अवधारणा को जन्म दिया। साठ के दशक के आखिरी वर्षों में भूमिहीन किसानों को उनका हक़ दिलाने के उद्देश्यों के साथ नक्सलवाद की शुरुआत हुई। जनताना सरकार यानी जनता की सरकार के नारे के साथ नक्सलवाद पश्चिम बंगाल से शुरू होकर नेपाल के साथ- साथ बिहार, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश तक फैल गया है। इसे रेड करिडोर या फिर लाल गलियारे के रूप में देखा जाता है। इन राज्यों के कई जिलों में नक्सली संगठनों का ख़ासा प्रभाव है। नक्सली संगठन पीपुल्स वार ग्रुप और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी के रूप में सक्रिय हैं। दोनों ही संगठन मुख्य रूप से बिहार, झाड़खंड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में सक्रिय हैं। ग़ौर करें तो ये वही सूबे हैं जहां ग़रीबी और मुफलिसी है। इन राज्यों के नक्सल प्रभावित इलाकों में हिंदुस्तान की एक अलग तस्वीर दिखती है। यहां से अगर हिंदुस्तान को देखा और समझा जाय तो यहां नक्सलवाद के जन्म को आसानी से समझा जा सकता है। नक्सलवाद उन सूबों में अपनी जड़ें मजबूत नहीं कर सका है जहां देश के अन्य हिस्सों की तरह मजबूत मध्यमवर्ग है। जहां का मध्यमवर्ग रोटी और भूख के सवालों को काफी पीछे छोड़ चुके हैं।
एक बड़े उद्देश्यों के साथ जिस नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआत हुई थी... आज उसका अलग रूप सामने है। अब जबकि नक्सवादी संगठन बेहद ताक़तवर बनकर उभरे हैं... वे अपने असली मकसद को काफी पीछे छोड़ चुके हैं। आईए देखते हैं नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआती तस्वीर कैसी थी। साठ के दशक में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में नेपाल की सीमा से लगा कस्बा नक्सलबाड़ी सशस्त्र क्रांति की वजह से जाना जाता है। 25 मई 1967 को इसी छोटे से कस्बे से चारू मजुमदार के साथ नक्सलवादी नेता कानू सान्याल ने वर्ग भेद के ख़िलाफ़ सशस्त्र क्रांति का बिगूल फूंक दिया। शुरुआती वर्षों में इस आंदोलन के जरिये भूमि आंदोलन और कृषि क्रांति की कोशिशें तेज हुई। लेकिन नक्सलवाद का मौजूदा रूप उसके सैद्धांतिक उद्देश्यों के ख़िलाफ़ दीख रहा है। चुनाव बहिष्कार और नक्सली हमले इसके प्रमाण हैं...। नक्सली हमलों में बड़ी संख्या में सुरक्षाबल के जवानों की मौत हो गई है... और बेकसूर लोग भी इन हमलों की भेंट चढ़ते रहे हैं। नक्सलवादी संगठनों का अलग- अलग इलाकों में अतिवादी संगठनों के साथ सांठगांठ भी इस आंदोलन के चेहरे को बदनुमा रूप देते रहे हैं। बंदूक का भय दिखाकर जबरन वसूली से भी नक्सलवाद को जोड़कर देखा जा रहा है। आंदोलन की शुरुआत में आम मजदूर- किसानों के हाथों में उसके हक़ के लिए बंदूक की बात कही गई थी मगर आज चंद समूहों के हाथों में बंदूक है जो नक्सलवाद के नाम पर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। इस आंदोलन को जन्म देने वालों में शामिल नक्सलवाद के अगुवा नेता कानू सान्याल नक्सलवाद के मौजूदा रूप से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि जनता को छोड़कर कोई क्रांति संभव नहीं है। भय और आतंक पर टिका संगठन ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता। सान्याल मानते हैं कि आतंकवाद के रास्ते में भटक जाना हमारे लिए घातक सिद्ध हुआ। नक्सलवादी आंदोलन एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां से उसके लिए अपने उद्देश्यों तक पहुंचने का रास्ता तक़रीबन असंभव है। इतिहास इस आंदोलन का निष्पक्ष आकलन करेगा, जिसमें नक्सल समर्थकों को उनकी सूरत बेहतर नहीं लगेगी।
अब सवाल है कि नक्सलवाद की समस्या का समाधान क्या है। ...हालांकि नक्सलवाद पर सरकार के रुख़ ने इसके समाधान को और भी पेचीदा बना दिया है। जैसे ग़रीबी हटाने के नाम पर गरीबों को हटाने की नीति अपनाई जाती है... शायद उसी तरह से नक्सलवाद की समस्या को नक्सलियों के सफाये से क्या वाक़ई इसका निदान संभव है? -निश्चय ही समाधान ये नहीं है। इससे नक्सली समस्या से निजात नहीं पाई जा सकती। कोई भी स्पेशल टास्क फोर्स नक्सलियों का तो सफाया कर सकती है, लेकिन भूख और वर्ग भेद के सवालों पर खड़ी नक्सलवादी विचारधारा का सफाया कैसे हो सकता है। इसके लिए नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर विकास कार्यों को जमीन पर उतारना होगा। नक्सलियों के मददगार स्थानीय लोगों को विकास की मुख्यधारा में जोड़ने पर ही नक्सलवादियों से लोगों को अलग कर एक नयी शक्ल बनाई जा सकती है। इसमें स्वयंसेवी संगठनों का सहयोग लेकर उन इलाकों में एक वातावरण भी बनाया जाना चाहिए। निश्चय ही शुरु में इसमें कठिनाइयां भी होंगी लेकिन अंधेरी सुरंग में कहीं तो रोशनी होगी ही।

7 comments:

विनय said...

itni samasya'ein jaane kab nidaan hogaa...

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दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

नक्सलवाद एक अतिवाद है इस लिए वह भ्रष्ट हुआ और सरकार ने जनता की समस्याओं को सुलझाना नहीं चाहा। इस लिए इस समस्या का अंत नहीं हुआ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सरकार की लापरवाही के कारण ही
यह दिन देखने पड़ रहे हैं।

Jayant said...

किसी कवि ने लिखा है,

गोली खा के एक के मुँह से निकला..... राम,
दूसरे के मुँह से..... अल्लाह,
लेकिन तीसरे के मुँह से निकला..... आलू
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
की पहले दो के पेट भरे हुए थे...!!!

जाहिर है की जब पेट को भूख लगी हो तो फिर कोई भी रास्ता ग़लत या सही नही रह जाता.... भले ही वो बंदूक का ही क्यों ना हो...!!!!!

Bhuwan said...
This comment has been removed by the author.
Bhuwan said...

अच्छी जानकारी... आपका कहना बिलकुल सही है की नक्सलवाद एक भटका हुआ आन्दोलन है.. मुझे लगता है की हर देश की परिस्थितियां और हालात एक जैसे नहीं होते.. इसलिए वैश्विक विचारधाराओं में भी देश के हालात के मुताबिक बदलाव लाना चाहिए. चीन रशिया और दूसरे वाम समर्थक मुल्कों की तुलना में भारत की परिस्थितियां काफी जुदा थी... दूसरी ये की अन्य देशों में मुल्क के लिए विचारधारा का समर्थन किया गया.. लेकिन हमारे देश में इसका उल्टा हुआ. तीसरी ये की इस आन्दोलन के दिशाहीन होने की वज़ह अग्रणी नेताओं की कमी भी रही.

Brijesh Dwivedi said...

bahut khoob...