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Saturday, April 25, 2009

बिहार की साख़ का सवाल


मुंबई में जब उत्तर भारतीयों के ख़िलाफ़ महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का गुस्सा भड़का तो उसकी व्यापक प्रतिक्रिया हुई। स्वभाविक तौर पर बिहार के लोगों में इसे लेकर कुछ ज्यादा ही नाराज़गी दिखी। लेकिन गुस्से और नफ़रत के माहौल में कुछ बुद्धिजीवी बिहार के हक़ में तर्कसम्मत ढंग से बोल रहे थे। उनका कहना था कि महाराष्ट्र में भले ही उत्तर भारतीयों के साथ मारपीट हो रही हो लेकिन बिहार ने कभी भी महाराष्ट्र या फिर दूसरे अन्य सूबे के लोगों के साथ ये व्यवहार नहीं किया। दूसरा उदाहरण दिया गया था कि बिहार की सियासी भूमि ने ऐसे –ऐसे नेताओं को बार- बार जिताया है जो दूसरे सूबों के थे। मधु लिमये और जॉर्ज फर्नांडिज़ जैसे उदाहरण सामने थे। बिहार के लोगों ने दूसरे प्रदेश के नेता होने के बाद भी इन नेताओं को अपनी नुमाइंदगी का मौक़ा दिया। जनता दल युनाइटेड के शरद यादव तो इसके बड़े उदाहरण हैं जो न केवल दूसरे सूबे से आते हैं बल्कि उन्हें जिताने के लिए मधेपुरा संसदीय सीट के लोगों ने बिहार के सबसे बड़े नेता लालू यादव तक को हरा दिया। बिहार में यादव बहुल संसदीय क्षेत्र में लालू यादव की हार और एक दूसरे प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले शरद यादव की जीत एक इतिहास है।
ये सुन- सुनकर महाराष्ट्र के प्रति क्रोध कतई नहीं आया लेकिन बिहार को लेकर थोड़ा गौरव जरूर हुआ। बिहार जो वर्षों से हिकारत का मुहावरा बन गया हो। पिछड़ापन जिसकी अपनी पहचान हो। जहां भूख और ग़रीबी से छटपटाते लोगों के लिए अपना घर-बार छोड़ने की मजबूरी हो। जिसके लिए दिल्ली में मेट्रो निर्माण के दौरान जान जोखिम में डालकर फुनंगी पर तपतपाती दुपहरिया में मजदूरी करने की विवशता हो। मधुबनी और कटिहार के रहने वाले दिल्ली में रिक्शा चलाते लोग। लेकिन इन गरीब- गुरबों ने ही बिहार की एक तटस्थ छवि को बनाए रखा। वोटों की ताक़त पर अपनी जाति- धर्म और सूबे के उम्मीदवारों को भी हराने का साहस दिखाया।...बिहार के पक्ष में ऐसी बातें सुनकर लगता था पहली बार किसी कर्ण की भी तारीफ़ हो रही है।... हिंदुस्तान का अर्जुन या उसके खेमे के सूबे तो बहुत हैं जो स्वभाविक रूप से वाहवाही की दावेदारी प्रस्तुत करते रहे हैं।
लेकिन एकबार फिर देश के इस कर्ण की परीक्षा होनी है। बिहार का असली चेहरा सामने आने वाला है। इसबार उसी जॉर्ज फर्नांडिज़ के बारे में मुजफ्फरपुर संसदीय सीट से बाहरी उम्मीदवार होने की तोहमत लग रही है... जो सियासत में मुजफ्फरपुर के पर्याय बन गए... या फिर मुजफ्फरपुर जॉर्ज का पर्याय बन गया। जिस तरह मुजफ्फरपुर लीची की वजह से जाना जाता है... सियासी मंडी में इसकी पहचान जॉर्ज के कारण भी है। एक तरह से अपने ही घर में जॉर्ज का सम्मान दांव पर लगा हुआ है- बचे या जाय। लेकिन मुजफ्फरपुर के मतदाताओं की साख भी दांव पर है। क्या वाकई आगे भी बिहार के लोग कह सकेंगे कि वहां के मतदाता जाति- धर्म और क्षेत्र से बहुत ऊपर हैं। - हमें और आपको तो इंतजार है ही... शायद नीतीश कुमार एंड कंपनी को इसका इंतजार ख़ास तौर पर होगा। जिन्होंने पहले तो कहा कि जॉर्ज साहब की उम्र इतनी हो गई कि उन्हें चुनाव लड़वाना उनकी सेहत से खिलवाड़ होगा। लेकिन जब वयोवृद्ध निषाद को पार्टी ने टिकट दिया तो नीतीश कहने लगे कि उम्र के कारण नहीं बल्कि ख़राब स्वास्थ्य के कारण टिकट नहीं दिया गया। ...लेकिन अब जॉर्ज साहब चूंकि बगावत कर निर्दलीय खड़े हैं तो पार्टी से उनका कोई संबंध नहीं रह गया है। बेवफ़ाई और बेशर्मी का ये अंदाज भी बुरा नहीं है।

2 comments:

Sanjay Sharma said...

जॉर्ज की तबियत किस हद तक ख़राब थी ,ये टी.वी.पर उनकी आवाज़ सुनकर जाना .तब तकलीफ या शिकायत नहीं रही नीतिश से . नीतिश काफी पहले जॉर्ज साहब को नक्कार गए थे .ये खबर मिडिया में तब क्यों नहीं आई
बीमारी ,बुढापे में जिद्द की मात्रा काफी बढ़ने से जॉर्ज निर्दलिये बन गए .नीतिश टिकेट कटवा बने तो जॉर्ज वोट कटवा साबित हो रहे हैं .

Sachi said...

आप यह नहीं कह सकते कि जोर्ज बाहरी नेता हैं. जितनी भी खबरें मैं पढता हूँ, उससे एक बात साफ़ नज़र आती है कि वह बुजुर्ग हो गए.
रही बात अंधभक्ति और निष्ठा की, तो वह आपमें कूट कूट कर भरी है. अनर्गल तथ्यों का सहारा लेना आपको खूब आता है.