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Sunday, May 31, 2009

एक मरीज़...दस घंटे और हलकान भीड़

शनिवार को अपने रिश्तेदार को फिर दिल्ली के एम्स में लेकर गया था। सुबह चार बजे जागे और पौने पांच बजे घर से निकलकर साढ़े छह बजे एम्स पहुंच गए। लाइन इसबार भी लंबी थी। लाइन की शुरुआत में मेरठ के एक सज्जन खड़े थे जिनके हाथ में एक्सरे रिपोर्ट वाला बैग था। बैग पर लिखा था- मेरठ स्कैन सेंटर, इव्ज चौराहा, पूर्वी कचहरी रोड, मेरठ। उनके पीछे पीठ खुजा रहा बिहार से था। उसकी बोली से लगा। एक उत्तरांचल साइड की महिला थी। एक पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक बुजुर्ग। हरियाणा के लोग भी लाइन में थे तो पंजाब के भी इक्का- दुक्का लोग शामिल थे। मतलब, हर सूबे से कोई न कोई यहां था... एम्स का मारा। तो साहब साढ़े आठ बजे खिड़की खुली तो मैने अपने रिश्तेदार का नंबर जानने के लिए मुंडी गिनना शुरू कर दिया...एक..दो...तीस..चालीस...लगभग पैंसठवां नंबर था। लाइन में लगभग ढाई सौ लोग खड़े थे। थोड़ी देर बाद एक पर्ची लगी.. जिसपर लिखा था कि रूम नंबर 34 के डॉक्टर छुट्टी पर हैं। छुट्टी मारने वाले उस डॉक्टर के मरीजों में गुस्सा... नाराजगी और मायूसी साफ थी। सुबह से लाइन लगे थे। लाइन से हट गए। मजबूर और बेबसी में वापस घर की तरफ जाने लगे। लगभग डेढ़ घंटे बाद हमारा भी नंबर आया। पर्ची कटी तो डॉक्टर वाले चैंबर की तरफ गए। बड़े से हॉल में चार- पांच सौ लोग बैठे थे। कुछ घंटे इंतजार के बाद डॉक्टर के चैंबर में मरीजों को भेजे जाने का सिलसिला शुरू हुआ तो कंपाउंडर ज्यादा सक्रिय हो गए। एम्स के कर्मचारी,,, और उनके नाते-रिश्तेदार कानाफूसी कर अपना नंबर पहले लगवाने में सफल रहे। सबसे पहले जिस महिला ने सुबह साढ़े चार बजे एम्स आकर नंबर लगाकर पर्ची कटवाई थी... लगभग ढाई घंटे बाद उसका नंबर आया। इस ढाई घंटे में विशुद्ध रूप से एम्स के कर्मचारियों के रिश्तेदारों को ही डॉ.रणदीप गुलेरिया के पास भेजा गया। बेहद सुनियोजित तरीके और संगठित तरीके से एम्स के कर्मचारी इसे अंजाम देते हैं। आपने जरा भी चूं-चपड़ की तो उन्हें गिरेबां पकड़ते देर नहीं लगती। मेरे सामने भी ऐसा नजारा कई दफे आया। एक ने कहा कि सारे रिश्तेदारों कू आज ही दिखवा लेगा क्या... अपने रिश्तेदारों के लिए अलग से एम्स क्यों न खुलवा लेता... किसी ने कहा कि तेरे रिश्तेदारों को तो एम्स की दवा भी असर नहीं करेगी। इतना सुनना था कि एक कर्मचारी ने टिप्पणी करने वाले पर ठुकाई शुरू कर वहां से भगा दिया।...एक मरीज जान –बूझकर मारने वाले उस कर्मचारी की चिरौरी करने लगा। सो, ये सब देखते –सुनते साढ़े तीन बजे गए। तब हमारा नंबर आया। मैं तो सोच रहा था कि आज यहां ताला लगाने की जिम्मेदारी भी हमारी ही होगी। ...चलिये छोड़िये भाई.. एक गुड न्यूज़। हमारे रिश्तेदार को डॉ. गुलेरिया ने अब स्वस्थ बताया। दवा भी कम कर दी। यानी, घंटो की मेहनत सफल रही ...और हम भूखे- प्यासे शाम लगभग साढ़े चार बजे घर पहुंच गए।

Wednesday, May 27, 2009

एम्स में आप आदमी नहीं फ़क़त मरीज़ हैं

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में स्वास्थ्य की नियमित जांच के लिए गए थे। एम्स के डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने उनकी जांच की। सुबह ख़बरों में इसका ज़िक्र था। डॉ।गुलेरिया का नाम सुनकर थोड़ा हैरान हुआ। ये वही डॉ।गुलेरिया हैं जो मेरे एक रिश्तेदार का भी इलाज़ कर रहे हैं। बिहार से तक़रीबन हर चार- पांच महीने बाद मेरे रिश्तेदार आते हैं और डॉ।गुलेरिया को अपनी रिपोर्ट दिखाने तड़के चार बजे जागकर एम्स के लिये रवाना हो जाते हैं। मौसम से कोई फर्क नहीं पड़ता... जाड़ा, गर्मी...बरसात। हर मौसम में वे एम्स जा चुके हैं। हाड़ कंपाती सर्दी हो या चमड़ी झुलसाने वाली गर्मी... बेचारे अपने भाई को लेकर आते हैं और दो- तीन सप्ताह की जद्दोजहद के बाद बिहार के लिए रवाना हो जाते हैं। इलाज का फायदा साफ दिखता है। हालांकि उनके दिल्ली आने से मेरे घर में बड़ी मौज आ जाती है। बढ़िया- बढ़िया चीजें खाने को मिलती हैं...और हंसी- ठठा भी खूब होता है। ससुराल के रिश्तेदार हैं। लेकिन उनकी एम्स जाने की तक़लीफ़ देखी नहीं जाती। और बार आते थे तो उनके बड़े भाई साथ होते थे और दोनों भाई एम्स जाते थे... अपने राम को ख़बर नहीं रहती थी। इसबार अकेले आए तो मै ही उनके साथ एम्स चला गया। पहली बार लगा कि बेचारे ने बीमारी के साथ- साथ कितना कष्ट अबतक उठाया है। कितनी जलालत झेली है। कितना अपमान सहा है। हम सुबह पांच बजे मोहननगर से ऑटो से एम्स के लिए चले। हमारे रिश्तेदार...उनकी पत्नी और मैं। एम्स पहुंचे तो बाहर से ही लंबी लाइन दिखी... हमारे रिश्तेदार की पत्नी ने कहा कि लेट हो गए। ख़ैर। अंदर गए तो लगभग सौ लोगों की लाइन लगी थी...सुबह पौने छह बजे। हम दोनों मर्द खड़े- खड़े आपस में बात करने लगे और मेरे रिश्तेदार की पत्नी लाइन में लग गईं.... । बैठने की कोई जगह नहीं थी सो मरीजों को भी खड़े रहने की अनिवार्यता थी। मेरे रिश्तेदार ...औरों के भी मरीज रिश्तेदार ऐसे ही खड़े थे... कुछ तो मरीज ही लाइन में लगे हुए थे। अजब नजारा था। सुबह साढ़े सात बजने तक लाइन में खड़े रहने के बाद पैरों पर खड़े रह पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा था। लेकिन अचानक एक महिला लाइन में खड़े होने को लेकर पड़ोस की एक महिला से झगड़ पड़ी। झगड़ने और ताने मारने की उसकी अदा से भीड़ का खूब मनोरंजन हुआ। भीड़ बढ़ चुकी थी। लाइन में अब डेढ़ से पौने दो सौ लोग लगे थे। हालांकि रोजाना सौ पर्चियां ही काटे जा ने की व्यवस्था है लेकिन लेकिन सिर्फ भरोसे की पूंजी के साथ लोग लाइनों में खड़े थे। साढ़े आठ बजा तो पर्ची वाली खिड़की खुल गई। यहां से पर्ची लेकर डॉक्टरों के चैंबर के आगे नंबर लगाने की व्यवस्था है। खिड़की पर केवल सौ टिकट ही जारी किये जाते हैं रोजाना... लेकिन भीड़ दो सौ को भी पार कर चुकी थी। एकाध पर्ची कटने के बाद खिड़की के ऊपर एक कागज चस्पा था जिसपर लिखा था रूम नंबर ३२ के डॉक्टर साहब आज नहीं आएंगे... यही तो डॉक्टर गुलेरिया का चैंबर है। उन्हीं से तो मेरे रिश्तेदार को दिखलाना था जिसके लिए तीन घंटे से लाइन में खड़े थे। तीन घंटे बाद पता चला कि डॉक्टर साहब शनिवार को आएंगे। मेरे रिश्तेदार परेशान तो थे लेकिन हैरान नहीं... क्योंकि डेढ़ साल में उनके साथ दसियों दफ़े ऐसा हो चुका है। आखिरी कोशिश के रूप में उन्होंने वहां बने एक काउंटर पर जाकर कुछ पूछना चाहा तो वार्ड ब्वॉय जैसी वर्दी में खड़े व्यक्ति ने उन्हें झिड़क दिया। मेरे रिश्तेदार बिहार के एक बड़े कॉलेज में अच्छे पद पर हैं। लेकिन ये कॉलेज नहीं था... अस्पताल में वे फ़क़त एक मरीज थे... जिन्हें कुछ पूछने की इजाजत नहीं थी। आपने अगर ऐसी कोशिश की तो डॉक्टर भले आपको बख़्श दें... वार्ड ब्वॉय जैसा ओहदेदार आपको नहीं बख्शेगा... मैं थोड़ा नाराज होने लगा तो मेरे रिश्तेदार ने अपने चेहरे की बेचारगी को थोड़ा दबाते हुए मुझे बाहर की ओर ले जाने लगे कि शनिवार को फिर आ जाएंगे।

Thursday, May 21, 2009

सर्दभरी रात, लालू और लोगों का हुजूम


लालू यादव का बदला हुआ अंदाज आजकल आप भी देख रहे होंगे। ..बुझे- बुझे से। अनमनाए। कुछ- कुछ बौखलाए। कभी आवेग में तो कभी अफसोस जताने की मुद्रा में। लालू यादव इन दिनों खुद भी नहीं हंसते हैं। उनकी बातचीत में कोई शिगूफ़ा भी नहीं होता है जो लोगों हंसाए। एक तो...मीडिया से मिलते ही बहुत कम हैं। भले ही बोल रहे हों कि मंत्रीपद की कोई चाहत नहीं है। लेकिन ये भी कहते हुए दिल्ली दरबार में घूम रहे हैं कि बहुतों को बनते- बिगड़ते देखा है। ये भी कहते हैं कि मेरा अपमान हो रहा है... फिर कहते हैं कि गांधी परिवार के बारे में मुंह नहीं खोलेंगे। साथ में ये भी जोड़ते हैं कि खुद पीएम ने उन्हें फोन कर छुटभैये कांग्रेसी नेताओं के बयानों के लिए अफसोस जताया। लालू अब समझ गए हैं। नेता बड़ा नहीं होता... उसके पीछे खड़े लोगों की संख्या उसे ताक़तवर बनाती है। लालू जी अबतक खुद को ताकतवर माने बैठे थे। तभी तो अपने एक रसोइये के खाने पर रीझ गए तो उसे भी टिकट देकर जितवा दिया। लालूजी को पता नहीं याद भी हो या न हो... कभी बिहार में उनका ऐसा जलवा था कि जिधर निकल जाते दस-बीस हजार लोग ऐसे ही इकट्ठा हो जाते। पटना के पीरमुहानी इलाके में सर्द भरी रात में लालूजी एकबार निकल गए तो गरीब- गुरबों का मानो सैलाब सड़कों पर निकल आया। उतनी भीड़ ...कि रैली में जिस तरह से बसों का इंतजाम करके राजनीतिक दल भीड़ जुटाते हैं। यहां लालू को देखने के लिए सैलाब उमड़ा पड़ा था। मुख्यमंत्री रहते हुए लालूजी ने एक अभियान चलाया था- साफ-सफाई और नहाने –धोने का। खुद कुर्सी लगाकर बैठ जाते और नाई से बच्चों के बाल बनवाते। कई बस्तियों में साड़ी बंटवाते...और अपने खास अंदाज में साड़ी के लिए मारा-मारी करती महिलाओं को जोर से कहते कि शंतिया तू फिर आ गईली रे... भीड़ में कोई न कोई शांति होती ही या लालूजी जो भी नाम लेते उस नाम की महिला चौंककर दांत निपोर देती। खुश हो जाती कि लालूजी उन्हें जानते हैं। अपने उड़नखटोला पर जाते-जाते अचानक कहीं भी उसे उतारकर किसानों से बतियाने लगते। छठ पूजा में जब गंगाघाट पर जाते तो जैसे मजमा लग जाता। फिर अपनी कोठी में ही छठ का इंतजाम हुआ। लाइट- कैमरा और दुनिया भर की मीडिया के सामने लाइव पूजा- पाठ की नफासत लालूजी में आ गई। लालूजी और आगे गए। चारा घोटाले के बाद भी लालू का करिश्मा जैसे लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा था। केंद्र की राजनीति में ऐसे लटपटाए कि बिहार भूल गए। यहां शाहरुख ख़ान के शो में आए... या फिर किसी और मीडिया हाउस के शो में...जबर्दस्त टीआरपी मिली। पाकिस्तान तक में उनकी शोहरत का डंका बजा। उनके साथ पाक़िस्तान यात्रा पर गए रामविलास पासवान पूरी यात्रा में कुनमुनाए ही रहे। फिर सत्ता में आए तो क्या कहने। बेतरतीब खिचड़ी बाल शेप में आ गए। मीडिया ने उन्हें प्रबंधन गुरू का नाम दे दिया। मंतर मारकर रेल को घाटे से उबारकर फायदे में बदल दिया।...सब तरफ लालू का ही जलवा रहा। सो, उनकी जुबान बदल गई। पटना में कैमरे के सामने मटर की पत्तियां चबाने वाले लालूजी मीडिया वालों को दुत्त- दुत्त कर भगाने लगे। पब्लिक को बुड़बक कहकर भगाने लगे।...उन्हें भ्रम था कि जीत का समीकरण उनके पास है तो पब्लिक की जरूरत नहीं। तभी तो चुनाव के समय भी कहते फिरे कि विकास- उकास कुछ नहीं होता है... जातीय समीकरण से फायदा होता है तो क्यों न फायदा उठाएं। नतीजा देख लिया। लालू की लोकप्रियता वाले गुब्बारे से पब्लिक नाम की हवा निकल चुकी है। सो, लालूजी की शोहरत का गुब्बारा भी फ़क़त कहने का गुब्बारा रह गया है। लेकिन लालूजी ने कोई सबक नहीं सीखी। एकदिन पहले ही एक चैनल से बातचीत करते हुए एंकर ने जब पूछा कि बिहार से तो इसबार किसी के मंत्री बनने की उम्मीद नहीं है तो उनका लहजा कुछ ऐसा था जैसे बिहार की जनता ने उन्हें हराकर कोई बड़ी भारी ग़लती की है। उन्हें अबतक अपने चुनावी जीत के फार्मूले के पिट जाने का विश्वास नहीं हुआ है। लालूजी इसी इंटरव्यू में कहते मिले कि विकास- उकास कोई मुद्दा नहीं रहा ...सब जाति का समीकरण है। पता नहीं लालूजी जिस जनादेश के बल पर फूले नहीं समाते थे... आज उसी जनादेश का सम्मान करना क्या वाक़ई भूल चुके हैं?

Wednesday, May 20, 2009

...मुझे मेरी बीवी से बचाओ


शादीशुदा मर्दों के लिये सुप्रीम कोर्ट ने दिलचस्प मशविरा दिया है। कोर्ट ने एक पारिवारिक विवाद के मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि शादीशुदा मर्द अपनी पत्नियों की हर सलाह मान लें... अन्यथा आप परेशानी में फंस सकते हैं। पत्नी जो भी कहे उसपर तर्क-वितर्क किये बिना उसे मंजूर कर लें तो सुखी रहेंगे। यानी सुखी जीवन का मंत्र यही है कि पत्नी खुश तो पूरा जमाना आपके लिये खुशगवार हो जाएगा। कोर्ट की इस सलाह की रौशनी में ख़ुद को भी देखने की कोशिश कर रहा हूं। कहते हैं न कि शादी का लड्डू जो खाए वो पछताए और जो न खाए वो भी पछताए। अजीब संयोग है कि ज्यादातर लोग लड्डू खाकर ही पछताना बेहतर समझते हैं।..तो जनाब, मैं भी शादी का लड्डू खाकर पछताने वालों में शामिल हूं। जाने दीजिये... सुप्रीम कोर्ट की इस सलाह पर टीवी में आधे घंटे का प्रोग्राम तैयार करते हुए कुछ दिलचस्प बाते हुई। दिमाग में कुछ ऐसे फिल्मी गाने घूमने लगे जिसमें पति गाता है कि जबसे हुई है शादी, आंसू बहा रहा हूं। या फिर जमाना तो है नौकर बीबी का। या मुझे मेरी बीबी से बचाओ...और भी ऐसे ही हंसी- ठिठोली वाले गाने। तब साथियों से बातचीत के दौरान ये हुआ कि इसके लिए शॉट्स क्या लिये जाएं। तय पाया गया कि नाट्य रूपांतरण से भी काम चलाया जा सकता है। उसके लिये एक महिला की जरूरत थी और एक ऐसे चेहरे की जो पत्नी पीड़ित हो। महिला किरदार के लिये कई सहयोगी तैयार हो गई लेकिन पति बनने के लिये कोई तैयार नहीं। खोज शुरू हुई तो सबपर बारी- बारी से निगाह दौड़ाई गई। इसके लिये बेहद दुबला- पतला हलकान दिखने वाले व्यक्ति की जरूरत थी।...किरदार की मांग थी कि उजड़े चमन सरीखा कोई व्यक्ति ही हो। जो ऐसे थे भी... वे पत्नी पीड़ित पति का किरदार निभाने को तैयार नहीं थे। वे लोग भी नकार गए जो अक्सर अपनी पत्नी के जुर्मों के किस्से सुनाते फिरते हैं। मुश्किल ये कि प्रोग्राम का समय होता जा रहा था...और नाट्य रुपांतरण का काम अधर में लटका हुआ था। आख़िरकार फिल्मी शॉट्स के जरिये प्रोग्राम पूरा करना पड़ा। लेकिन कोई ऐसा मर्द नहीं मिला जो पत्नी पीड़ित बनने को राजी हो। यहां तक कि कुंवारे भी इसके लिये तैयार नहीं हुए...इस अंदेशे में कि उनकी गर्लफ्रैंड की नज़र न पड़ जाए। मेरे लिये ये किसी हैरानी से कम नहीं था। ये अपनी मूछों को हमेशा ऊंची रखने की आदत थी या हिंदुस्तानी मर्दों का बीवी प्रेम का ही रूप था? जो घर में लाख फ़साद करे... या पत्नी उसपर चाहे जितना जुल्म करे.. लेकिन ये फ़साना जमाने के सामने लाने में हिचकिचाता है। भले ही पत्नी पीड़ित हो लेकिन दिखना कोई नहीं चाहता। यहां तो कई ऐसे लोग आपको मिल जाएंगे जिन्हें जोरू का गुलाम कहा जाए तो इस गुलामी को भी ज़िंदगी का हिस्सा मानते हैं।

Tuesday, May 19, 2009

सनक भरी एक ख़बर


सनक से भरी कई ख़बरें पढ़ी होंगी या फिर अपने आसपास देखी होंगी। इस तरह की सनक भरी एक और ख़बर पर मेरी निगाह पड़ीः संजीव


नयी दिल्ली : ऐसा कहा जाता है कि शाहरुख का घर बाकी सारे बॉलीवुड सितारों के घरों से सबसे खूबसूरत है और वह आये दिन उसमें कुछ न कुछ कराते ही रहते हैं. लेकिन इस बार तो उन्होंने हद ही कर दी. आपको शायद पता होगा कि पढ़ने के लिए शाहरुख चश्मे का इस्तेमाल करते हैं. शायद न भी पता हो क्योंकि न तो उन्हें आमतौर पर चश्मा पहने देखा गया है और न ही उनकी जेब में रखा या फ़िर गले में टंगा चश्मा दिखता है, तो फ़िर शाहरूख का चश्मा रहता कहां है. दरअसल शाहरुख के पास एक नहीं, दो नहीं, बल्कि इतने चश्मे हैं जितने उनके घर में कमरे. आप सोच रहे होंगे कि ये कैसी व्यवस्था है. दरअसल शाहरुख अपने हर एक कमरे में एक चश्मा रखते हैं जिससे वो जिस भी कमरे में जायें या जिस टेबल पर बैठ कर पढ़ने-लिखने का काम करें वहां उनके लिए तैयार रहे एक डिजाइनर चश्मा.

Monday, May 18, 2009

मजबूत सरकार, बिखरा विपक्ष

लोकसभा चुनाव नतीजे निश्चित तौर पर अप्रत्याशित रहे। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जो दुर्गति हुई है वो सबके सामने है। चुनावी जीत के लिए बीजेपी ने तमाम आजमाए हुए हथकंडे अपनाए लेकिन विफल रहे। इस फेहरिस्त में वरुण गांधी प्रकरण से लेकर मोदी और खुद आडवाणी के उन बयानों को लिया जा सकता है जिसमें उन्होंने डॉ.मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री बताया। जाहिर है कि बीजेपी कमजोर हुई है। लालू, मुलायम सिंह, डीएमके, चंद्रबाबू नायडू जैसे क्षेत्रीय दिग्गज भी कमजोर हुए हैं। वाम दलों की हालत और भी खास्ता हो गई। हालांकि ममता बनर्जी, नवीन पटनायक जैसे क्षेत्रीय सूरमा भी हैं जिन्होंने असाधारण प्रदर्शन कर सबको चौंकाया।... एक ज़माने तक बेलग़ाम राजनीति की सूत्रधार रही कांग्रेस मजबूत हुई है। अकेले भी और यूपीए गठबंधन के रूप में भी। कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ी है। मध्यम वर्ग को कांग्रेस का ये चेहरा भा गया है। नतीजे उसके सुबूत हैं। ये तब है जबकि डॉ.मनमोहन सिंह की सरकार भी आम मतदाताओं को खास राहत देने में विफल रही थी। वैश्विक आर्थिक मंदी और आतंकवाद की बढ़ती घटनाओं के लिये मनमोहन सिंह की पिछली सरकार को जिम्मेदार ठहराना बहुत ठीक नहीं होगा... क्योंकि ये किसी भी सरकार के कार्यकाल में हो सकता था। महंगाई के सवाल पर मनमोहन सिंह कितना कर पाए, ये आम घरों की महिलाएं बेहतर बता सकती हैं। लेकिन आसमान छूती महंगाई इस चुनाव में मुद्दा नहीं बनी। क्या इसके गहरे निहितार्थ है? आप अगर पूरे चुनाव प्रचार पर ग़ौर करें तो फूहड़ संवादों के बीच लोगों के मुद्दे ग़ायब रहे। मसलन, लालू अपने विरोधियों को उसका साला और उसका साढ़ू कहते- कहते अपनी मिट्टी ख़राब करवा ली। मोदी कांग्रेस को पहले बुढ़िया कहा और बाद में उसे गुड़िया कहने लगे। वरुण गांधी के मसले पर मेनका गांधी और मायावती आपस में मां के सवाल पर भिड़ गईं। वामदलों की आवाज इतनी धीमी रही कि शायद ही किसी ने उनकी आवाज सुनी हो। ...ये लोगों को भटकाने की एक साजिश थी। मतदाताओं का ध्यान बांटने की सियासी साजिश। लेकिन जनता ने नेताओं को माक़ूल जवाब दिया। लालू –पासवान सहित तमाम ऐसे नेताओं को सबक सिखाया जो अपने कुछ सांसदों के बूते पर केंद्र की सरकार को घुटने पर लाने के लिये जाने जाते हैं। अपने सांसदों को जेब में डालकर दिल्ली के निजाम में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते रहे हैं। उन बाहुबलियों या फिर उनकी पत्नियों का भी चुनावों में सफाया कर दिया... जो अबतक मीडिया से ये कहते हुए संसद पहुंचते थे कि हमें जनता ने जिताया है तो आप कौन हैं पूछने वाले? उसी जनता ने उन्हें आईना दिखा दिया है।
सत्ता पक्ष की तस्वीर तो साफ है। लालू, मुलायम से लेकर तमाम दल सत्ता पर डोरे डाल रहे हैं। जेडीयू जैसे दूसरे क्षेत्रीय दलों का भी कोई भरोसा नहीं है। कांग्रेस के लिये काफी सुविधानजक स्थिति है। लेकिन विपक्ष का क्या होगा? विपक्ष की सूरत कैसी होगी। देखिये कि सत्ता में एक ऐसा गठबंधन है जिसके पास बेशुमार ताकत है। लेकिन विपक्ष में बैठने वाले एनडीए का कोई वजूद बचता नहीं दिखता है। बीजेपी अंदरूनी तौर पर बिखरी हुई दिख रही है। वामदल सदन के अंदर किसी ख़ास हैसियत में नहीं रह गए हैं। क्षेत्रीय सूरमाओं का सत्ता के साथ याराना रहा है या फिर उनसे दोस्ती की चाहत है। विपक्ष की बिखरी हुई ताक़त के सामने क्या एकबार फिर कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के बेलगाम होने का ख़तरा नहीं है?

Thursday, May 14, 2009

मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं है


रजत शर्मा को हम सबने उनके ख़ास कार्यक्रम आपकी अदालत में तीखे सवालों को भी बड़ी शाइस्तगी के साथ पूछते देखा है। तहलका में उनका इंटरव्यू छपा था। उस समय अगर आपकी निगाह न पड़ी हो तो पढ़ियेः संजीव



रजत शर्मा को टेलीविज़न शो ‘आप की अदालत’ से पहले बतौर अखबारी पत्रकार कम ही लोग जानते थे। 16 साल बाद, आज उनका खुद का न्यूज़ चैनल टीआरपी की दौड़ में सबसे आगे है। हरिंदर बवेजा के साथ बातचीत में शर्मा ने सफलता के अपने ही तरीकों से लेकर अपने प्रतिद्वंदियों तक पर बेबाकी से अपने विचार रखे।
आखिरी पायदान से शीर्ष तक का सफर...अपनी यात्रा के बारे में कुछ बताएं?
बहुत मुश्किलों भरी थी ये. आज से चार साल पहले जब मैंने इंडिया टीवी शुरू करने का फैसला किया था तब मेरे दोस्तों ने मुझसे कहा कि मैं एक ऐसे बाज़ार में छलांग लगाने जा रहा हूं जो पहले से ही खचाखच भरा हुआ है। एनडीटीवी, स्टार, आज तक, ज़ी, सहारा और डीडी जैसे न्यूज़ चैनल पहले से ही स्थापित थे। लेकिन मेरा विश्वास उन दर्शकों पर था जिन्होंने मेरे पूरे टेलीविज़न करियर के दौरान मेरा साथ दिया था। मुझे यकीन था कि अगर मैं अपना चैनल शुरू करता हूं तब भी वे मेरा साथ देंगे। इसमें काफी समय और ऊर्जा लगी। इस दौरान कई डरावने पल भी आए, जब मुझे लगा कि शायद मैं इसे कर ही न पाऊं। तीन मौकों पर मुझे तनख्वाहें देने के लिए अपनी संपत्ति तक को बेचना पड़ा। 20 सालों के करियर में मैंने जो भी कमाया था वो सब धीरे-धीरे गायब होने लगा। लेकिन परिस्थितियां बदली। जब पहला विदेशी निवेशक सामने आया तो उसने कंपनी की कीमत 300 करोड़ आंकी, अगले ने 600 करोड़ और अब निवेशक इसे 1000 करोड़ का बताते हैं। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि संकट के जो पल थे उनसे गुज़रना बेकार नहीं गया।
आज तक और स्टार जैसे अपने निकट प्रतिद्वंदियों को पछाड़ने का आपका फार्मूला क्या है?
मैं अपनी संपादकीय टीम से कहता रहता हूं कि टीवी का दर्शक वर्ग किसी क्रिकेट के खेल की तरह होता है। एक समय था जब टेस्ट मैच काफी पसंद किए जाते थे, गावस्कर हीरो थे। इसके बात सीमित ओवरों के क्रिकेट का जमाना आया और कपिल के रूप में नया सितारा चमका। अब ज़माना टी-20 का है। आज मैं ये थोड़े ही कह सकता हूं कि मुझे सुनील गावस्कर बन कर टी-20 खेलना है। ‘काँटेंट’ को समय के साथ बदलना ही होता है फिर भले ही इसमें मीडिया के दूसरे साथियों की आलोचना क्यों न झेलनी पड़े। हमारे प्रतिस्पर्धी इसे लोकप्रियता की होड़ का नाम दे सकते हैं लेकिन हमारा असल सरोकार तो दर्शक से ही होता है। अगर दर्शक टी-20 देखना चाहते हैं तो मैं उन्हें टेस्ट मैच थोड़े ही दिखा सकता हूं।
आलोचनाओं पर आते हैं...हिंदी चैनलों की सबसे ज्यादा आलोचना इस बात के लिए हो रही है कि उनकी काँटेंट का स्तर काफी गिर गया है।
नहीं, ऐसा नहीं है। हमने न्यूज़ की परिभाषा बदल दी है। अगर लोग आज भी सोचते हैं कि फीता काटते नेता और संसद में भाषण देना ही ख़बर हैं तो वो दिन बीत गए। हिंदी के न्यूज़ चैनलों पर आरोप लग रहे हैं लेकिन अगर आप सभी बड़े अख़बारों के मुखपृष्ठ पर नज़र डालें तो आपको आईपीएल नज़र आएगा। सच्चाई ये है कि दो शीर्ष साप्ताहिक पत्रिकाएं भारतीय महिलाओं की यौन अभिरुचियों पर कवर स्टोरी छाप चुकी हैं, लेकिन उन्हें तो कोई कटघरे में खड़ा नहीं करता। तहलका को छोड़कर, जो कि एक अपवाद रहा, लगभग सभी लोकप्रिय पत्रिकाओं में आईपीएल को प्रमुखता दी गई। अगर आप पुरानी परंपरा के हिसाब से चलेंगे तो इस हफ्ते की कवर स्टोरी महंगाई होनी चाहिए थी। इसी तरह से टेलीविज़न न्यूज़ चैनलों की भी विषयवस्तु बदल गई है।
राजनीतिक तबके के विचारों की आप किस हद तक परवाह करते हैं?
बहुत ज्यादा। जिस तरह से राजनेता लोगों के प्रति जवाबदेह हैं उसी तरह हम भी हैं। हमारा काम ही है राजनीतिज्ञों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना। इसी सोच से प्रेरित होकर “आप की अदालत” का जन्म हुआ था। आज 16 साल बाद भी ये प्रोग्राम उतना ही पसंद किया जाता है। इंडिया टीवी इसी फॉर्मूले पर आधारित है। इसकी कोशिश है कि लोग जनता के प्रति जवाबदेह बनें, चाहे वो राजनेता हों, फिल्म स्टार हों या फिर क्रिकेटर।
अगर मैं ये कहूं कि इंडिया टीवी भूत-प्रेत का पर्याय बन गया है तो आप क्या कहेंगे?
ये छह महीने पहले की बात है। उसके बाद से हमने भूत-प्रेत की एक भी कहानी नहीं दिखाई है।
लेकिन आपने टीआरपी की सीढ़ियां चढ़ने के लिए इसका सहारा लिया है।
नहीं, हमने ऐसा नहीं किया। उन दिनों इसी तरह की कहानियां आती थीं। और लोग इन्हें पसंद करते थे। उदाहरण के लिए पिछले हफ्ते हमने पाया कि 51 फीसदी दर्शकों ने इंडिया टीवी देखा क्योंकि हमने विष्णु का इंटरव्यू दिखाया था, जो कि पहले राजेश तलवार के यहां काम करता था। हमारे रिपोर्टर ने उसे नेपाल में कहीं ढूंढ़ निकाला था। पिछले हफ्ते हमें रेटिंग में सबसे ऊपर जगह मिलने की वजह रही आरुषि हत्याकांड पर हमारी विस्तृत कवरेज। इसमें भूत-प्रेत या सांप-नागिन की कोई भूमिका नहीं थी। किस्मत से दूसरे ख़बरिया चैनलों ने वही पुराना फॉर्मूला अपनाया। शाहरुख ख़ान के शो पांचवीं पास... में लालू प्रसाद यादव मेहमान बन कर आए। ये राजनीति और मनोरंजन का शानदार मेल था। हम लोगों की पसंद के मुताबिक चल रहे हैं।
आप ख़बरों के बाज़ार में हैं या मनोरंजन के?
हम सिर्फ और सिर्फ ख़बरों के बाज़ार में हैं। मगर इन दिनों मनोरंजन भी बड़ी ख़बर बन गया है। समय बदल रहा है। आईपीएल क्रिकेट है, मनोरंजन नहीं। लालू एक राजनेता हैं, जनता के प्रतिनिधि, आप उन्हें मनोरंजनकर्ता नहीं कह सकते। इंडिया टीवी एक न्यूज़ चैनल है, आप इसे मनोरंजन चैनल नहीं कह सकते।
सामाजिक जिम्मेदारियों पर क्या कहेंगे? क्या इंडिया टीवी खैरलांजी में हुई हत्याओं पर कोई अभियान चलाएगा?
इंडिया टीवी अकेला चैनल है जिसने अभियानों को सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में चलाया है। मैं आपको तमाम उदाहरण दे सकता हूं। मैं विनम्रता से कुछेक के बारे में आपको बताता हूं। एक जादूगर बच्चे को हर महीने 60,000 रूपए का एक इंजेक्शन लगना था। हमारी स्क्रीन पर एक अपील तीन घंटों तक प्रसारित हुई और इसके बाद चेकों की बरसात होने लगी। मुंबई में अनाथ बच्चों के लिए एक सामाजिक संस्था थी। एक दिन भवन के मालिक ने उन्हें निकाल फेंकने का फैसला कर लिया। इंडिया टीवी वहां पहुंचा और वहां से सीधा प्रसारण शुरू कर दिया। अंतत: मालिक को अपना फैसला बदलना पड़ा। जब पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की घोषणा की गई, हम दिन भर दिखाते रहे कि इस बढ़ोत्तरी का लोगों पर क्या असर पड़ने वाला है। जब भी सामाजिक, राजनीतिक या फिर दर्शकों के हितों के लिए लड़ने की बात आएगी दर्शक हमेशा हमारी जिम्मेदारी को महसूस करेंगे। इसीलिए इंडिया टीवी ने अब अपनी टैग लाइन बनाई है “आपकी आवाज़”। जनता की आवाज़ बनना ही हमारा लक्ष्य है।
लेकिन ये बात तो सच है कि टीआरपी की लड़ाई में अपने प्रतिस्पर्धियों से आगे निकलने के लिए इंडिया टीवी ने भूत प्रेत का सहारा लिया?
इंडिया टीवी ने समय की जरूरतों के हिसाब से खुद को बदला है। एक समय था जब हमने उड़ीसा के एक गांव में चुड़ैल के घूमने की ख़बर दिखाई थी। हमने अपने दर्शकों को खबर के माध्यम से बताया कि ये महज़ अंधविश्वास है।
लेकिन इस बात से तो आप सहमत होंगे कि ये कोई ख़बर नहीं है?
ये खबर ही है। मान लीजिए ठाणे में ये अफवाह है कि वहां कोई भूत घूम रहा है जो लोगों की हत्या कर रहा है। हम लोगों को बताते हैं कि ये कोई भूत नहीं है बल्कि कोई हत्यारा है जो ऐसा कर रहा है। हम इस तरह की ख़बरें लोगों को जागरुक करने के लिए दिखाते हैं।
आप कह रहे हैं कि लोग जो चाहते हैं आप वही दिखाते हैं। पर आप को नहीं लगता कि आपको खुद भी एक मानक स्थापित करने की जरूरत है?
इस देश का एजेंडा क्या है? क्या ये सिर्फ नेताओं को गाली देते रहना है? क्या सिर्फ लंबे-लंबे भाषण और फीते कटते हुए दिखाए जाएं? हमने मानक तय किए हैं। आज मैं आपसे पूरे गर्व के साथ ये कह सकता हूं कि हमारे पीछे सात चैनल हमारे नक्शेक़दम पर चल रहे हैं। वे हमारी काँटेंट ही नहीं बल्कि चैनल को प्रमोट करने का तरीका भी अपना रहे हैं। ये चैनल हमारे ग्राफिक्स, सेट्स, संगीत और विजुअल्स...सब की नकल कर रहे हैं। आज हम ट्रेंडसेटर बन चुके हैं। इसी वजह से हमें इतनी संख्या में लोग पसंद कर रहे है, लोग असल को देखना पसंद करते हैं, नकल नहीं।
क्या आपका कोई फॉर्मूला है?
मैं अपने संपादकीय दल के साथ रोज़ाना होने वाली बैठकों में कहता हूं कि “जाओ और खुद को झोंक दो”। ऐसी स्टोरी मत करो जिससे मुझे, चीफ प्रोड्यूसर को या तुम्हें खुशी मिलती हो। ऐसा करो कि जिससे दर्शकों को खुशी मिले। यही मेरा फॉर्मूला है। दर्शक के लिए करो, उनके लिए बोलो।
आपके पास न्यूज़ और इन्वेस्टिगेशन के लिए लंबा-चौड़ा बजट है।
जब हमने इन्वेस्टिगेशन पर ध्यान देना शुरू किया तो हमारे ऊपर “स्टिंग चैनल” का ठप्पा लग गया। जब हमने इसे रोक दिया तो लोग कहने लगे, रोका क्यों? ये तेज़ी से बढ़ने, नंबर वन होने की दुश्वारियां हैं। पिछले साल हमारी तरक्की की रफ्तार 110 फीसदी रही। हमारे प्रतिद्वंदियों की रही महज़ 2-4 फीसदी। लोग इस फॉर्मूले को जानना चाहते हैं। फार्मूला ये है कि मैं दिन में 18 घंटे अपने न्यूज़रूम में ही बिताता हूं, मैं अभी भी स्टोरी लिखता हूं। मैं गर्व से कह सकता हूं कि इस देश में ऐसा कोई नहीं है जो एक चैनल का मालिक होते हुए भी स्क्रिप्ट लिखता हो और तीन घंटे की प्रोग्रामिंग और प्रोमोज़ भी करता हो।
शक्ति कपूर के स्टिंग ऑपरेशन की ये कह कर आलोचना हुई थी कि ये लोगों के निजी जीवन में ताकाझांकी थी। आपको लगता है कि वो एक ग़लती थी?
नहीं, मुझे इस पर फख्र है। पिछले हफ्ते हमारे एक प्रतिद्वंदी ने कास्टिंग काउच पर एक कार्यक्रम चलाया। छह महीने पहले ही पूर्व में नंबर एक रहे एक चैनल ने भी इसे उठाया था। मुझे फिल्म इंडस्ट्री या फिर मीडिया की तरफ से होने वाली आलोचनाओं की चिंता नहीं थी। मेरे ख्याल से ये फिल्म इंडस्ट्री में आने को लालायित युवा लड़कियों को चेतावनी देने के लिए उठाया गया एक सही क़दम था।
आपको टीआरपी के लिए कुछ भी करने और व्यावसायिक सफलता की अंधी दौड़ में ख़बरों को दरकिनार करने का दोषी ठहराया जा सकता है।
मेरी रुचि कभी भी व्यावसायिक सफलता पाने में नहीं रही। मुझे पैसे ने कभी आकर्षित नहीं किया। लोगों का प्यार और लोकप्रियता ही हमेशा से मेरी कमज़ोरी रही हैं।
आपको नहीं लगता कि आपने “काँटेंट” का स्तर गिरा दिया है?
बिल्कुल नहीं। अगर हमारी सामग्री इतनी घटिया है तो फिर बाकी सात चैनल इसकी नकल क्यों कर रहे हैं? जब भी लोग मुझसे टीआरपी की दौड़ में शामिल होने के बारे पूछते हैं तो मुझे बहुत आश्चर्य होता है। क्या आप सचिन तेंदुलकर से कभी पूछते हैं कि वो इतने सारे रन क्यों बनाते हैं? मेरा काम एक ऐसे चैनल की स्थापना है जो रेटिंग्स में शीर्ष पर हो। इस पर मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं है।
आज तक, स्टार न्यूज़ जैसे प्रतिस्पर्धियों में आपको क्या अच्छा लगता है और वो क्या चीज़ है जो आपको चिंता में डालती है?मुझे उनका जुझारूपन अच्छा लगता है। एकाध मौकों को छोड़ दिया जाए तो हम स्वस्थ प्रतिस्पर्धी रहे हैं। हमारा नंबर एक पर काबिज होना ऐसा था मानो हरभजन ने श्रीसंथ को थप्पड़ मार दिया हो। इससे पहले हमारी लड़ाई में दुर्भावना नहीं थी। मैं अवीक सरकार की तहेदिल से इज़्ज़त करता हूं जो इस समय स्टार न्यूज़ के मुखिया हैं। मैं अरुण पुरी का सम्मान करता हूं जो आज तक के प्रमुख हैं। इन लोगों ने भारतीय पत्रकारिता को नये-नये आयाम दिये हैं। अवीक सरकार ने ‘टेलीग्राफ’ की शुरुआत की और अरुण पुरी ने ‘इंडिया टुडे’ की। ये लोग पुरोधा हैं। जब हम उनके चैनलों को ऐसा करते हुए देखते हैं तो कष्ट होता है। लेकिन हम इस गंदे खेल में शामिल नहीं होंगे। हम न तो कोई जवाब देंगे न मखौल उड़ाएंगे और न ही उन्हें गालियां देंगे।

Wednesday, May 13, 2009

यहां सेक्स टैबू है, स्त्री के लिये


तहलका पर अनुजा रस्तोगी के ब्लॉक से ली गई सामग्री छपी थी। उसे पढ़ने और कमेंट्स भेजने वालों की संख्या ने मुझे चौंकाया तो मैंने भी उसे पढ़ना जरूरी समझा। आप भी पढ़कर देखियेः संजीव


अनुजा रस्तोगी बरेली की रहने वालीं, तहलका की पाठक, अनुजा, एक शिक्षिका हैं। उन्हीं के शब्दों में-"मैंने पत्र-पत्रिकाओं में कभी नहीं लिखा। अभी तक जो भी लिखा अपने ब्लॉग पर ही लिखा। बिंदास लिखना ही मुझे पसंद है। समझौते के बगैर।"

सेक्स को हमारे यहां हमेशा से ही टैबू माना गया है। सेक्स पर बात करना। उसे जग-ज़ाहिर करना या आपस में शेयर करना। हर कहीं सेक्स प्रतिबंधित है। सेक्स का जिक्र आते ही क्षणभर में हमारी सभ्यता-संस्कृति ख़तरे में पड़ जाती है। मुंह पर हाथ रखकर सेक्स की बात पर शर्म और गंदगी व्यक्त की जाती है। सेक्स को इस कदर घृणा की दृष्टि से देखा जाता है, मानो वो दुनिया की सबसे तुच्छ चीज हो।
खुलकर सेक्स का विरोध करते हुए मैंने उन सभ्यता-संस्कृति रक्षकों को भी देखा है जिन्हें सड़क चलती हर लड़की में 'गज़ब का माल' दिखाई देता है। जिन्हें देखकर उनके हाथ और दिमाग न जाने कहां-कहां स्वतः ही विचरण करने लगते हैं। जिन्हें रात के अंधेरे में नीली-फिल्में देखने में कतई शर्म नहीं आती और नीली-फिल्मों के साथ रंगीन-माल भी हर वक्त जिनकी प्राथमिकता में बना रहता है। परंतु रात से सुबह होते-होते उनका सेक्स-मोह 'सेक्स-टैबू' में बदल जाता है। हमारे पुराणों तक में लिखा है कि यौन-सुख स्त्री के लिए वर्जित, पुरुष के लिए हर वक्त खुला है। पुरुष आजाद है हर कहीं 'मुंह मारने' के लिए। यही कारण है स्त्री को अपना सेक्स चुनने की आजादी हमारे यहां नहीं है।
यह सही है कि हम परिवर्तन के दौर से गुज़र रहे हैं। हर दिन, हर पल हमारे आस-पास कुछ न कुछ बदल रहा है। हम आधुनिक हो रहे हैं। यहां तक कि टीवी पर दिखाए जाने वाले कंडोम, केयरफ्री, ब्रा-पेंटी के विज्ञापनों को भी हम खुलकर देख रहे हैं। एक-दूसरे को बता भी रहे हैं। मगर सेक्स को स्वीकारने और इस पर अधिकार जताने को अभी-भी हमने अपनी सभ्यता-संस्कृति के ताबूतों में कैद कर रखा है। हमें हर पल डर सताता रहता है कि सेक्स का प्रेत अगर कहीं बाहर आ गया तो हमारी तमाम पौराणिक मान्यताएं-स्थापनाएं पलभर में ध्वस्त हो जाएंगीं। हम पश्चिमी भोगवाद के शिकार हो जाएंगें। इसलिए जितना हो सके कोशिश करो अपनी मां-बहनों, पत्नियों को सेक्स से दूर रखने और उन्हें अपनी इच्छाओं से अपाहिज बनाने की।
हमारे पुराणों तक में लिखा है कि यौन-सुख स्त्री के लिए वर्जित, पुरुष के लिए हर वक्त खुला है। पुरुष आजाद है हर कहीं 'मुंह मारने' के लिए। यही कारण है स्त्री को अपना सेक्स चुनने की आजादी हमारे यहां नहीं है।
गज़ब की बात यह है स्त्री-सेक्स पर प्रायः वे लोग भी अपना मुंह सींये रहते हैं जो स्त्री-विमर्श के बहाने 'स्त्री-देह' के सबसे बड़े समर्थक बने फिरते हैं। स्त्री जब अपने सुख के लिए सेक्स की मांग करने लगती है तो परंपरावादियों की तरह उनके तन-बदन में भी आग-सी लग जाती है। इन स्त्री-विमर्शवादियों को सेक्स के मामले में वही दबी-सिमटी स्त्री ही चाहिए जो मांग या प्रतिकार न कर सके।
पता नहीं लोग यह कैसे मान बैठे हैं कि हम और हमारा समाज निरंतर बदल या विकसित हो रहा है। आज भी जब मैं किसी स्त्री को दहेज या यौन शोषण के मामलों में मरते हुए देखती हूं तो मुझे लगता है हम अभी भी सदियों पुरानी दुनिया में जी रहे हैं।
मुझे एक बात का जवाब आप सभी से चाहिए आखिर जब पुरुष अपने बल पर अंदरूनी और बाहरी सारे सुख भोगने को स्वतंत्र है तो यह आजादी स्त्रियों को क्यों और किसलिए नहीं दी जाती?
क्या इच्छाएं सिर्फ पुरुषों की ही गुलाम होती हैं, स्त्रियों की नहीं?

Sunday, May 10, 2009

...क्या स्क्रिप्ट है !

( भाग- आठ) मीडिया जिन्हें कंटेंट के नाम पर परोसता रहा है, उससे दर्शक और पाठक बेहद ऊबे हुए हैं। ये कोई नया तथ्य नहीं है। ग़ौर करें तो मीडिया की भाषा से भी दर्शक और पाठक उतने ही ऊबे हुए हैं। भाषा की एक लीक बन गई है जिसकी गोल में सभी घूमते रहते हैं। ऐसा मानने में भी हिचकिचाहट नहीं हो सकती है कि आज की मीडिया दरिद्रता के असुविधाजनक दौर से गुजर रही है। इस दौर की अगुवा मानी जा रही मीडिया के भाषाई लिजलिजेपन पर एक सरसरी नज़रः संजीव

कुछेक महीने पहले मेरी नज़र एक ख़बर पर पड़ी थी कि हिंदी के एक विद्वान को एक चैनल ने अपने यहां बुलाया। उन्होंने भाषा को लेकर इस वर्कशॉप में वहां के पत्रकारों को भाषा के बारे में काफी कुछ बताया। अच्छा लगा...कम-से- कम अपनी कमजोरियों की पहचान कर उसे बेहतर बनाने की पहल तो है। लेकिन मेरा उत्साह दूसरे या तीसरे दिन ही ठंडा पड़ गया। उसी चैनल पर दोपहर से लेकर शाम तक एक टीज़र चलता रहा- पुर्नजन्म। मोटे- मोटे अक्षरों में ये पुर्नजन्म जाने कितनी बार चलता रहा ...और धड़ल्ले से चलता हुआ अपने निर्धारित समय पर सफलतापूर्वक वीरगति को प्राप्त हुआ। ये टीज़र जितनी बार भी मैं देखता, मुझे लगता कि टीवी स्क्रीन पर सुधार की गुंजाईश होती तो काश इसे सुधार पाता- पुनर्जन्म। ..ये किसी एक चैनल की ग़लती नहीं है। तक़रीबन हर चैनल पर इस तरह की गलतियां रोज़-ब-रोज़ हो रही हैं। अब कोसी की तबाही के समय एक हेडलाइन की सीजी थी- पानी का जलस्तर बढ़ा। ...मैं अवाक् रह गया था।
मुझे अख़बार के दिनों के कुछ किस्से अचानक याद आ रहे हैं...पहले उसे बता दूं, फिर आते हैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भाषा पर। एक अख़बार में सिंगल कॉलम की ख़बर छपी थी, जिसमें बताया गया था कि किसी आदमी की हत्या हो गई... हत्या उस वक़्त हुई जब मृतक साइकिल पर चला जा रहा था। कितना दिलचस्प है कि मृतक धड़ाधड़ पैडल मारता हुआ मौत तक जा पहुंचा। ...उसी तरह एक अख़बार की ख़बर थी कि मृतक पेड़ से कूद गया। ...एक ने उससे भी आगे बढ़कर ख़बर दी कि फलां गांव में ट्रांसफार्मर फुंक गया और ये एक चूहे की कारस्तानी थी... दरअसल, तारों पर चढ़कर एक चूहा अपने गंतव्य की ओर जा रहा था कि दो तारों के आपस में टकरा जाने से ये दुर्घटना हुई।...ऐसा कमाल का विश्लेषण आपने कभी देखा था क्या।
अख़बारों में एक दौर ऐसा भी आया था जब कुछेक ख़ास ख़बरों पर विशेषज्ञों की सलाह भी दी जाती थी जिसे बॉक्स आइटम बनाकर प्रकाशित किया जाता था। मसलन, किसी बीमारी के बारे में बताते हुए उससे बचाव का मशविरा। उसी दौर में एक अख़बार ने कहीं आग लगने की घटना के बारे में बताया था और बॉक्स में आग से बचाव का मशविरा दिया था। मशविरे पर जरा ग़ौर कीजिये- आग लगने का पता चलते ही एकदम से भाग खड़े हों। दूसरी सलाह थी- आग –आग चिल्लाएं। तीसरी सलाह फायर ब्रिगेड को फोन करने की थी। ये ख़बर उस अख़बार के प्रमुख पन्ने पर पूरे छह कॉलम के साथ बुलंद थी।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एक ही शब्द बार- बार अलग- अलग चैनलों पर एक ही दिन में जाने कितनी बार चलती होगी, इसका अंदाजा लगाना ज्यादा कठिन नहीं है। मसलन, एक आदमी या व्यक्ति की हत्या यहां कभी नहीं होती है- होगी तो वह व्यक्ति या आदमी नहीं बल्कि शख़्स होगा। ये शख़्स ऐसा चिपका कि क्राइम से संबंधित ज्यादातर रिपोर्ट के पहले वीओ की शुरुआत कुछ ऐसी ही होगी- ग़ौर से देखिये इस शख़्स को- जैसे बाकी चीज़ों पर ग़ौर करने की जरूरत ही नहीं है। या फिर, इस शख़्स के इरादे बेहद ख़तरनाक हैं... या इस शख़्स ने अपनी दिलरुबा की ख़ातिर अपने साथी की हत्या कर दी। यहां व्यक्तित्व जैसे शब्दों को दरकिनार कर दिया गया है। शख़्स के बाद दूसरा शब्द है- शर्मसार। मजे की बात ये है कि ये शब्द कभी इंसानियत को शर्मसार कर जाता है तो कभी रिश्तों को। ये कभी नहीं होगा कि फलां की करतूत ने इंसानियत को भी शर्मिंदा कर दिया।
एक शब्द है तफ्सील। इस शब्द का कम दोहन नहीं किया जाता। हर ख़बर से संबंधित टीज़र के साथ –साथ ख़बर देते समय भी दर्जनों बार इसका प्रयोग देखा गया है। जैसे, हम आपको दिखाएंगे और बताएंगे.... सबकुछ तफ्सील से...लेकिन एक ब्रेक के बाद। इस चक्कर में मुझे डर है कि किसी दिन किसी चैनल पर ये सुनने को न मिले कि ख़बर के लास्ट सेगमेंट में जाकर कोई कह दे, हम आपको बताएंगे तफ़्सील से।
कई ख़बरों में सुनने को मिलता है कि – दिलचस्प बात ये है कि इस इलाके में पहले भी सूखा पड़ चुका है।– यानी सूखा जैसा भयावह तथ्य भी यहां दिलचस्प की श्रेणी में आ जाता है। हां, बिहार के भागलपुर रेलवे स्टेशन पर एक पुल अचानक ट्रेन के ऊपर आ गिरा। इसमें दबकर कई लोगों की जान चली गई। इस ख़बर को कवर करते समय एक चैनल के एंकर के पास जब शब्दों की कमी आने लगी तो उसने कहा- यहां सबकुछ लहूलुहान है... जिंदा लाशें मलबे के ढेर से निकाल रही हैं।
एक और शब्द लीजिये- ख़ुलासा। हर चैनल दिनभर में तो जाने कितने खुलासे करता है ...और उतनी ही बार इसी अकेले शब्द को दोहराया जाता है। इस एक शब्द पर चैनलों का इतना ज्यादा लोड है कि आप विश्वास नहीं कर सकते। चैनलों ने इसके समानांतर एक अच्छे शब्द को तक़रीबन बेदख़ल कर दिया है- रहस्योद्घाटन। कहते हैं कि एंकर को रहस्योद्घाटन बोलने में असुविधा होती है। सो, ये नहीं चलेगा। कुछ ये भी कह सकते हैं कि दर्शकों को समझ में ही नहीं आएगा। कितना गिरा हुआ तर्क है ये... अपनी मूढ़ता को दर्शकों पर थोपना जायज है? हर रिपोर्ट के फाइनल वीओ में एक चलन है- ये तो वक़्त ही बताएगा। - भाई मेरे अगर सबकुछ वक़्त को ही बताना है तो उसे ही बताने दो न... तुम ख्वामख्वाह में क्यों टांग अड़ा रहे हो भाई?

Saturday, May 9, 2009

बवंडर में खोया आदमी


आजकल ज़िंदग़ी का अजीबोगरीब सूरत-ए- हाल है। जरा ग़ौर फरमाइए। सुबह तक़रीबन साढ़े सात बजे बिस्तर छोड़ने के बाद कुछ देर अख़बार और चाय। उमस और भीषण गर्मी की वजह से पिछली रात नींद नहीं आई थी...हालांकि छोटे बच्चों की वजह से मच्छरदानी लगाकर सोने की आदत है इसलिये मच्छरों का आभार कि उन्होंने परेशान नहीं किया। चाय पीते- पीते पता चला कि इन्वर्टर में ख़राबी आ गई है। पत्नी से कहा कि बिजली वाले को बुलवाकर दिखवा लेना। नहा-धोकर तैयार हुआ। पत्नी ने कहा कि बच्चे का जिस स्कूल में दाखिला दिलवाना है... उसमें बच्चे के साथ- साथ मां-बाप का भी टेस्ट होगा। कहा कि, तुम बच्चे को लेकर चली जाओ और स्कूल में बता देना कि चुनाव का वक़्त है इसलिये फुर्सत बिल्कुल नहीं है।....पत्नी मुंह फुलाकर बैठ गई। ताना देने लगी कि पता नहीं क्या- क्या पूछेगा... ख़ुद तो ऑफिस में बैठकर कुर्सी तोड़ते रहते हैं... आपको बीबी- बच्चों से क्या। भागते- हांफते बस स्टैंड आया तो देखा नोयडा जाने वाली बस में इतनी भीड़ कि लगा आज सबके सब नोयडा ही जाने की तैयारी में हैं। जैसे- तैसे बस में खुद को ठूंस लिया। खुद पर भी आश्चर्य भी हुआ कि बस में मेरे लायक जगह तो थी ही... मैं ख्वामख्वाह परेशां था। एक टांग पर बामुश्किल खड़ा ही हुआ था कि कंटक्टर ने अपने ही अंदाज में पूछा कि कहां जावेगा। ...कहा दस का टिकट दे दो। बस तसल्लीबख़्श चल रही थी और साहिबाबाद मंडी पर बाहर आकर रोक दिया। कई लोगों ने ड्राईवर को कहा लेकिन तक़रीबन पंद्रह मिनट बाद ही वहां से दोबारा चला।... लेबर चौक पर आकर मेरे बगल वाली सीट खाली हुई तो पहले उसपर नजरें जमाए एक सज्जन तीर की तरह आए और बैठने लगे। मैने हौसला छोड़ दिया तो एक और सज्जन बैठने की होड़ में शामिल हो गए। अब एक सीट के दो दावेदार। हालांकि मैं सबसे करीब खड़ा था लेकिन मेरी दावेदारी को उन दोनों ने ख़ारिज करते हुए उसपर लद गए। एक बैठा तो दूसरा उसकी गोद में ही बैठ गया। दोनों मजबूत दावेदारों को देखते हुए मजा आ गया। ख़ैर। कुछ दूर चलने के बाद बारह- बाईस के पास मुझे भी जगह मिली लेकिन थोड़ी देर बाद रजनीगंधा चौक पर ही उतरना था। सो, उतरकर रिक्शा वाले की तरफ बढ़ा। रिक्शा वाले से पूछा कि सौ का नोट है। उसने कहा कि मेरे पास तो खुले हैं नहीं... मैने किसी दूसरे रिक्शे वाले से पूछने की बजाय सीधे सेक्टर सोलह ए की तरफ़ खरामा- खरामा चल पड़ा। तेज धूप और सड़क पर बेसाख्ता भागती गाड़ियों से खुद को बचता- बचाता। गाड़ीवालों की आंखों में देखता तो लगता कि उनमें खून सवार है ...या फिर आज ये मेरे ही नाम की सुपारी लेकर घर से निकले हैं। बीस मिनट तेज धूप में पैदल चलकर दफ़्तर पहुंचा तो गेट पर दरबान ने सलाम ठोका... मैं अक्सर उसे कोई जवाब नहीं देता। झेंप होती है। उसमें और मुझमें पोशाक भर का ही तो फर्क है...सताया वो भी दिखता है, मैं भी दिखता हूं। आदमी की परिभाषा (पैसे के हिसाब से) वो भी पूरी नहीं करता... मैं भी नहीं करता हूं। वो गेट के बाहर है तो मैं गेट के भीतर हूं।
अंदर दफ्तरी कामकाज पूरे तरन्नुम में है। भागदौड़ और ब्रेकिंग न्यूज़ वाली चहलपहल। मैं कुछ भी नहीं देखता और न ही सुनना चाहता हूं। सबसे पहले एकदम सर्द पानी गटकता हूं... चाय मंगवाकर पीता हूं। फिर कामकाज शुरू। टीआरपी के बारे में कुछ लोग चर्चा कर रहे हैं... कौन उठा और कौन गिरा। इन ख़बरों से बेजार काम में लगा रहा। एक घंटे- चार घंटे- आठ घंटे। नौवें घंटे में काम पूरा और मैं गेट के बाहर आ गया। इसबीच रोजाना होने वाले रोमांच और हाहाकार भरे क्षण आए और गुजरते गए। ...अब वापस रजनीगंधा आकर बस के इंतजार में खड़ा हो गया। बस आई तो उसी तरह झूमती आई जैसे अक्सर रात की नौ बजे के बाद आने वाली बसें होती हैं। ड्राईवर और कंडक्टर से लेकर इक्का- दुक्का मुसाफ़िर भी फिट। आराम- आराम से चलती बस डाबर पहुंच गई। वहां पहुंचकर कंडक्टर ने ऐलान कर दिया कि ये बस आगे नहीं जाएगी... दूसरी देख लो। सब हड़बड़ाए- हड़बड़ाए दूसरी में बैठने लगे... कुछ कंडक्टर से झिकझिक करने लगे। मैं दोनों ही स्थितियों से बेख़बर आराम से जाकर ऑटो में बैठ गया... और फिर वहां से मोहननगर तक का पूरा किराया भरकर घर पहुंच गया।
घर पहुंचा तो दोनों बच्चे बेखबर और पत्नी बाखबर सोई पड़ी थी। कॉलबेल तक़रीबन पांच दफे बजाया... हर बार राधे- राधे जपो चले आएंगे बिहारी वाला भजन बजकर खामोश हो जाता लेकिन नींद जो है सो टूटने का नाम नहीं ले रही थी। तो हजरत...जैसे- तैसे पत्नी की नींद खुली। अलसाई मुद्रा में पानी देकर हफियाने लगी। मैं जूते उतारकर कपड़े बदल ही रहा था कि पता चला कि दाखिला नहीं हो पाया। एक बार पहले ही बच्चे और उसकी मम्मी की लिखित परीक्षा ले ली थी... आज दूसरी बार परीक्षा ली गई। और शाम में बताया गया कि आपके बच्चे का दाखिला नहीं होगा। ...टीवी खोलकर देखा तो रामपुर पर सब खेल रहे थे... कोई रामपुरी छुरी की बात कर रहा था तो कोई रामपुर के जूते और रामपुर के शोले। थोड़ी देर बाद रवीश कुमार पप्पू का आइटम पढ़ते मिले... बेहद दिलचस्प लगा।
...हां.. इसी बीच बिजली चली गई। पत्नी से पूछा तो पता चला कि बिजली वाले बताया कि बैट्री बैठ गई है... नई लेनी पड़ेगी... लगभग आठ हजार रुपये लगेंगे। मैने कहा कि अभी सैलरी मिली नहीं है... तो ये एक नई बहस शुरू हो गई। सैलरी कटकर क्यों मिलती है... इतनी देरी से क्यों देते हैं सैलरी। मैं हलकान। बीबी ने बताया कि मामाजी की शादी की पच्चीसवीं सालगिरह थी.. काफी बुलाया लेकिन नहीं जा पाई। आज ही मेरी ममेरी बहन का भी फोन आया था... नाराज हो रही थी इतने साल बाद भी कभी हाल जानने भैया नहीं आए। ... पता चला कि आलू और प्याज अचानक महंगे हो गए... चीनी का दाम आसमान छू रहा। इन बातों में मेरी दिलचस्पी नहीं थी... मेरी पत्नी को पता है। सो, इससे बचने के लिए मैने अपना पसंदीदा किताब उठाकर मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ना शुरू किया तो पत्नी और नाराज हो गई। कहने लगी कि आंख पर चश्मा चढ़वा लीजिएगा... आपको तो हमलोगों की चिंता ही नहीं है। बीच में उसने दो- चार लफ़्जों में उस स्कूल वालों की भी ख़बर ली जिसने बेटे का दाखिला नहीं लिया। मैंने ये कहकर उसे और भड़का दिया कि तुम्हारे लिये सोने भर के लिए आंखों का उपयोग है... मेरे लिये आंखों का उपयोग पढ़ना है। ...ये कहकर मैने नई मुसीबत ले ली। उसका तर्क था कि मुझे उससे बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है...। मैने किताब बंद कर दिया तो कहने लगी कि क्या बनाऊं। मैने कहा कि आज ताजमहल ही बना दो, आज उसी की तमन्ना है। ....झिकझिक के बाद मैने कहा कि चावल –दाल खाने की इच्छा है। उसने कहा कि सब्जी बनी हुई है... परांठे बना दूं। मैने कहा कि इससे बेहतर था कि बगैर पूछे ही मेरे सामने सब्जी और परांठे रख देती।...इसी बीच बार- बार फोन पर मैसेज आ रहे थे...आईडिया के सिर्विस मैसेज... नया रिंगटोन और एमएमएस...और भी जाने क्या- क्या। एकदिन गलती से पता नहीं कौन का बटन दब गया कि हर दिन आईडिया की तरफ़ से एक रोमांटिक शायरी आने लगी। ऐसा ही इस समय भी कुछ आ रहा था। ख़ैर साहब। खाना बेहद स्वादिष्ट लगा। थोड़ी देर टीवी देखने के बिस्तर पर गया तो आंखें बंद कर सोचने लगा... शहरी ज़िंदगी यहां सिर्फ आपने बने भर रहने की कितनी क़ीमत वसूलती है। यहां किन- किन मोर्चों पर आप रोज़ हारते हैं। यहां किसी भी सूरत में आपकी जीत नहीं होगी- ये तय है। दोस्तों, आप कुछ मशविरा देंगे।

Sunday, May 3, 2009

मक्ख़नबाजी का निजी तजुर्बा

पत्रकारिता के क़िस्सों को लेकर एक सिरीज लिख रहा था। पिछले कुछ समय से वक़्त की थोड़ी कमी की वज़ह से लगातार नहीं लिख पाया। क्षमा करेंगे। लेकिन इन व्यस्तताओं के बीच ही चापलूसी या कहें मक्खनबाजी कला के बारे में कुछेक निजी तजुर्बे के बारे में पढ़ेंः संजीव

पत्रकारिता या फिर कोई भी दफ़्तरी कामकाज में मक्खनबाजी की विधा का क्या रोल है?... जाहिर है कि ये विधा कई- कई रूपों में सामने आती है और इसके असरात बेहद कारगर। अपने सहयोगियों को आगे और बहुत आगे जाते हुए देखा...बॉस हंसे तो उन साथियों को बेसबब ही बेसाख़्ता (हालांकि उतने जोर से न तो बॉस की हंसी होती थी और न ही इतनी तेज हंसी का कोई मतलब था।...फिर भी) हंसते देखा। बॉस किसी बात पर थोड़े मायूस हुए तो उन्हीं साथियों को जार- जार आंसु बहाते भी देखा। मतलब ज़िंदगी के सारी हंसी- ग़म बॉस के नाम। मैं थोड़ा पीछे रहता था। बॉस के इशारों पर भी नासमझ बना रह गया। इसका असर ये होता था कि मेरे साथी रिपोर्टर पूरे साल मौज करते लेकिन अचानक फरवरी से लेकर मार्च तक उनकी बाईलाइन स्टोरीज की झड़ी लग जाती। स्टोरी चाहे जैसी हो... उन रिपोर्टरों के नाम से इस ख़ास माह में रिपोर्ट खूब छपते थे। बहुत दिनों बाद माजरा थोड़ा- थोड़ा समझ में आया। दरअसल, मार्च महीना प्रमोशन का हुआ करता था। और यही रिपोर्टर बाजी भी मार ले जाते थे। ...हम जैसे लोगों के नाम पर विचार तक नहीं होना था...सो नहीं होता था। एक मजेदार किस्सा... मैं व्यवस्था विरोधी कभी नहीं रहा... और न ही किसी से बॉस से मेरा आज तक टकराव हुआ लेकिन दुर्योग देखिये कि मैं उस तरह की व्यवस्था में खुद को डुबो नहीं पाया और न ही अपने बॉसेज़ से काम के अलावा कोई ख़ास वास्ता नहीं बन पाया। ऐसा नहीं है कि मैं आगे बढ़ना नहीं चाहता था या मैं चापलूस नहीं होना चाहता था। लेकिन क्या करूं कि जब चापलूसी का हर हथकंडा पकड़ में आ जाता था और मुझे ख़ुद पर ग्लानि हुई। फिर मैने सोच लिया कि अब और नहीं। इनमें से चापलूसी का एक वाक़या याद आ रहा है। हुआ ये कि हमारे अख़बार में एक नये संपादक आए और पूरे ग्रुप पर छा गए। उनका फलसफा कुछ ऐसा था कि या तो आप उनके खेमे में हैं या फिर दुश्मन खेमे में। वहां तटस्थता जैसी कोई जगह नहीं थी। संयोग से मुझे भी मेरी निष्ठा अलग- अलग तरीकों से जानी गई। मेरे सामने धर्मसंकट था और मैं भी उनके खेमे में खुद को देखना चाहता था जिससे नौकरी बची रहे। सो, मैं भी लग गया बटरिंग में... एकदिन सुबह साढ़े छह बजे उन्हें फोन किया और बताया कि आज का लीड और उसका डिस्प्ले ग़जब है। आधे पेज पर कपिलदेव का कटआउट और उसके साथ बातचीत थी... ये समय ऐसा था कि जब प्रधानमंत्री के बयान या फिर कुछ ऐसी ही ख़बरें मुख्य पृष्ठ पर अनिवार्य रूप से होती थी। सो, कपिलदेव के साथ बातचीत देखकर मुझे अच्छा लगा था और ये बदलाव जैसा लग रहा था। मैने संपादक जी को फोन कर बताया कि क्या- क्या अच्छा लगा...ये भी बताया कि आपके आने से अख़बार का चेहरा बदला- बदला सा है। उन्होंने कुछ देकर मुझे सुनने के बाद फोन पर कहा कि इसमें मेरा कोई रोल नहीं है ...ये पेज फलां ( जो अख़बार में उनके प्रतिद्वंद्वी नंबर एक थे और बाद में उन्हें अख़बार से बाहर जाना ही पड़ा) ने फाइनल किया है। मेरे तो हाथ के तोते ही उड़ गए... और पसीना आ गया। शुक्र रहा कि तमाम आशंकाओं के बावजूद मेरी नौकरी नहीं गई। मुझे मेरी सबसे अच्छी ख़बर पर उन्होंने बाइलाइन नहीं दी और कहा कि इस ख़बर का ईनाम दूंगा। दोस्तो, बड़ी दिलेरी के साथ दिया गया ये ईनाम जानते हैं कितने का था- फ़क़त 75 रुपये का। उन संपादक जी का आभारी अबतक मैं इसलिये हूं कि उन्होंने मुझे मेरे पसंदीदा अख़बार से निकाला नहीं और तक़लीफ़ इसबात की है उन्होंने मेरे लिये वहां बने रहने की कोई सूरत नहीं छोड़ी थी।... ...मैं भी शाइस्तग़ी से दूसरे अख़बार में चला गया।