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Sunday, May 3, 2009

मक्ख़नबाजी का निजी तजुर्बा

पत्रकारिता के क़िस्सों को लेकर एक सिरीज लिख रहा था। पिछले कुछ समय से वक़्त की थोड़ी कमी की वज़ह से लगातार नहीं लिख पाया। क्षमा करेंगे। लेकिन इन व्यस्तताओं के बीच ही चापलूसी या कहें मक्खनबाजी कला के बारे में कुछेक निजी तजुर्बे के बारे में पढ़ेंः संजीव

पत्रकारिता या फिर कोई भी दफ़्तरी कामकाज में मक्खनबाजी की विधा का क्या रोल है?... जाहिर है कि ये विधा कई- कई रूपों में सामने आती है और इसके असरात बेहद कारगर। अपने सहयोगियों को आगे और बहुत आगे जाते हुए देखा...बॉस हंसे तो उन साथियों को बेसबब ही बेसाख़्ता (हालांकि उतने जोर से न तो बॉस की हंसी होती थी और न ही इतनी तेज हंसी का कोई मतलब था।...फिर भी) हंसते देखा। बॉस किसी बात पर थोड़े मायूस हुए तो उन्हीं साथियों को जार- जार आंसु बहाते भी देखा। मतलब ज़िंदगी के सारी हंसी- ग़म बॉस के नाम। मैं थोड़ा पीछे रहता था। बॉस के इशारों पर भी नासमझ बना रह गया। इसका असर ये होता था कि मेरे साथी रिपोर्टर पूरे साल मौज करते लेकिन अचानक फरवरी से लेकर मार्च तक उनकी बाईलाइन स्टोरीज की झड़ी लग जाती। स्टोरी चाहे जैसी हो... उन रिपोर्टरों के नाम से इस ख़ास माह में रिपोर्ट खूब छपते थे। बहुत दिनों बाद माजरा थोड़ा- थोड़ा समझ में आया। दरअसल, मार्च महीना प्रमोशन का हुआ करता था। और यही रिपोर्टर बाजी भी मार ले जाते थे। ...हम जैसे लोगों के नाम पर विचार तक नहीं होना था...सो नहीं होता था। एक मजेदार किस्सा... मैं व्यवस्था विरोधी कभी नहीं रहा... और न ही किसी से बॉस से मेरा आज तक टकराव हुआ लेकिन दुर्योग देखिये कि मैं उस तरह की व्यवस्था में खुद को डुबो नहीं पाया और न ही अपने बॉसेज़ से काम के अलावा कोई ख़ास वास्ता नहीं बन पाया। ऐसा नहीं है कि मैं आगे बढ़ना नहीं चाहता था या मैं चापलूस नहीं होना चाहता था। लेकिन क्या करूं कि जब चापलूसी का हर हथकंडा पकड़ में आ जाता था और मुझे ख़ुद पर ग्लानि हुई। फिर मैने सोच लिया कि अब और नहीं। इनमें से चापलूसी का एक वाक़या याद आ रहा है। हुआ ये कि हमारे अख़बार में एक नये संपादक आए और पूरे ग्रुप पर छा गए। उनका फलसफा कुछ ऐसा था कि या तो आप उनके खेमे में हैं या फिर दुश्मन खेमे में। वहां तटस्थता जैसी कोई जगह नहीं थी। संयोग से मुझे भी मेरी निष्ठा अलग- अलग तरीकों से जानी गई। मेरे सामने धर्मसंकट था और मैं भी उनके खेमे में खुद को देखना चाहता था जिससे नौकरी बची रहे। सो, मैं भी लग गया बटरिंग में... एकदिन सुबह साढ़े छह बजे उन्हें फोन किया और बताया कि आज का लीड और उसका डिस्प्ले ग़जब है। आधे पेज पर कपिलदेव का कटआउट और उसके साथ बातचीत थी... ये समय ऐसा था कि जब प्रधानमंत्री के बयान या फिर कुछ ऐसी ही ख़बरें मुख्य पृष्ठ पर अनिवार्य रूप से होती थी। सो, कपिलदेव के साथ बातचीत देखकर मुझे अच्छा लगा था और ये बदलाव जैसा लग रहा था। मैने संपादक जी को फोन कर बताया कि क्या- क्या अच्छा लगा...ये भी बताया कि आपके आने से अख़बार का चेहरा बदला- बदला सा है। उन्होंने कुछ देकर मुझे सुनने के बाद फोन पर कहा कि इसमें मेरा कोई रोल नहीं है ...ये पेज फलां ( जो अख़बार में उनके प्रतिद्वंद्वी नंबर एक थे और बाद में उन्हें अख़बार से बाहर जाना ही पड़ा) ने फाइनल किया है। मेरे तो हाथ के तोते ही उड़ गए... और पसीना आ गया। शुक्र रहा कि तमाम आशंकाओं के बावजूद मेरी नौकरी नहीं गई। मुझे मेरी सबसे अच्छी ख़बर पर उन्होंने बाइलाइन नहीं दी और कहा कि इस ख़बर का ईनाम दूंगा। दोस्तो, बड़ी दिलेरी के साथ दिया गया ये ईनाम जानते हैं कितने का था- फ़क़त 75 रुपये का। उन संपादक जी का आभारी अबतक मैं इसलिये हूं कि उन्होंने मुझे मेरे पसंदीदा अख़बार से निकाला नहीं और तक़लीफ़ इसबात की है उन्होंने मेरे लिये वहां बने रहने की कोई सूरत नहीं छोड़ी थी।... ...मैं भी शाइस्तग़ी से दूसरे अख़बार में चला गया।

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अच्छा तजुर्बा है।
धन्यवाद।

narad baba said...

बेहद मजेदार आलेख है. इस आलेख से मीडिया नारद के पाठकों को दूर नहीं रखना चाहता था, इसलिए इसे मीडिया नारद पर भी डाल दिया है. [www.medianarad.com]

Bhuwan said...

शायद इसलिए कहा गया है जिसका काम उसी को साजे... पहली बार चापलूसी की कोशिश में फंस ही गए थे आप.