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Saturday, May 9, 2009

बवंडर में खोया आदमी


आजकल ज़िंदग़ी का अजीबोगरीब सूरत-ए- हाल है। जरा ग़ौर फरमाइए। सुबह तक़रीबन साढ़े सात बजे बिस्तर छोड़ने के बाद कुछ देर अख़बार और चाय। उमस और भीषण गर्मी की वजह से पिछली रात नींद नहीं आई थी...हालांकि छोटे बच्चों की वजह से मच्छरदानी लगाकर सोने की आदत है इसलिये मच्छरों का आभार कि उन्होंने परेशान नहीं किया। चाय पीते- पीते पता चला कि इन्वर्टर में ख़राबी आ गई है। पत्नी से कहा कि बिजली वाले को बुलवाकर दिखवा लेना। नहा-धोकर तैयार हुआ। पत्नी ने कहा कि बच्चे का जिस स्कूल में दाखिला दिलवाना है... उसमें बच्चे के साथ- साथ मां-बाप का भी टेस्ट होगा। कहा कि, तुम बच्चे को लेकर चली जाओ और स्कूल में बता देना कि चुनाव का वक़्त है इसलिये फुर्सत बिल्कुल नहीं है।....पत्नी मुंह फुलाकर बैठ गई। ताना देने लगी कि पता नहीं क्या- क्या पूछेगा... ख़ुद तो ऑफिस में बैठकर कुर्सी तोड़ते रहते हैं... आपको बीबी- बच्चों से क्या। भागते- हांफते बस स्टैंड आया तो देखा नोयडा जाने वाली बस में इतनी भीड़ कि लगा आज सबके सब नोयडा ही जाने की तैयारी में हैं। जैसे- तैसे बस में खुद को ठूंस लिया। खुद पर भी आश्चर्य भी हुआ कि बस में मेरे लायक जगह तो थी ही... मैं ख्वामख्वाह परेशां था। एक टांग पर बामुश्किल खड़ा ही हुआ था कि कंटक्टर ने अपने ही अंदाज में पूछा कि कहां जावेगा। ...कहा दस का टिकट दे दो। बस तसल्लीबख़्श चल रही थी और साहिबाबाद मंडी पर बाहर आकर रोक दिया। कई लोगों ने ड्राईवर को कहा लेकिन तक़रीबन पंद्रह मिनट बाद ही वहां से दोबारा चला।... लेबर चौक पर आकर मेरे बगल वाली सीट खाली हुई तो पहले उसपर नजरें जमाए एक सज्जन तीर की तरह आए और बैठने लगे। मैने हौसला छोड़ दिया तो एक और सज्जन बैठने की होड़ में शामिल हो गए। अब एक सीट के दो दावेदार। हालांकि मैं सबसे करीब खड़ा था लेकिन मेरी दावेदारी को उन दोनों ने ख़ारिज करते हुए उसपर लद गए। एक बैठा तो दूसरा उसकी गोद में ही बैठ गया। दोनों मजबूत दावेदारों को देखते हुए मजा आ गया। ख़ैर। कुछ दूर चलने के बाद बारह- बाईस के पास मुझे भी जगह मिली लेकिन थोड़ी देर बाद रजनीगंधा चौक पर ही उतरना था। सो, उतरकर रिक्शा वाले की तरफ बढ़ा। रिक्शा वाले से पूछा कि सौ का नोट है। उसने कहा कि मेरे पास तो खुले हैं नहीं... मैने किसी दूसरे रिक्शे वाले से पूछने की बजाय सीधे सेक्टर सोलह ए की तरफ़ खरामा- खरामा चल पड़ा। तेज धूप और सड़क पर बेसाख्ता भागती गाड़ियों से खुद को बचता- बचाता। गाड़ीवालों की आंखों में देखता तो लगता कि उनमें खून सवार है ...या फिर आज ये मेरे ही नाम की सुपारी लेकर घर से निकले हैं। बीस मिनट तेज धूप में पैदल चलकर दफ़्तर पहुंचा तो गेट पर दरबान ने सलाम ठोका... मैं अक्सर उसे कोई जवाब नहीं देता। झेंप होती है। उसमें और मुझमें पोशाक भर का ही तो फर्क है...सताया वो भी दिखता है, मैं भी दिखता हूं। आदमी की परिभाषा (पैसे के हिसाब से) वो भी पूरी नहीं करता... मैं भी नहीं करता हूं। वो गेट के बाहर है तो मैं गेट के भीतर हूं।
अंदर दफ्तरी कामकाज पूरे तरन्नुम में है। भागदौड़ और ब्रेकिंग न्यूज़ वाली चहलपहल। मैं कुछ भी नहीं देखता और न ही सुनना चाहता हूं। सबसे पहले एकदम सर्द पानी गटकता हूं... चाय मंगवाकर पीता हूं। फिर कामकाज शुरू। टीआरपी के बारे में कुछ लोग चर्चा कर रहे हैं... कौन उठा और कौन गिरा। इन ख़बरों से बेजार काम में लगा रहा। एक घंटे- चार घंटे- आठ घंटे। नौवें घंटे में काम पूरा और मैं गेट के बाहर आ गया। इसबीच रोजाना होने वाले रोमांच और हाहाकार भरे क्षण आए और गुजरते गए। ...अब वापस रजनीगंधा आकर बस के इंतजार में खड़ा हो गया। बस आई तो उसी तरह झूमती आई जैसे अक्सर रात की नौ बजे के बाद आने वाली बसें होती हैं। ड्राईवर और कंडक्टर से लेकर इक्का- दुक्का मुसाफ़िर भी फिट। आराम- आराम से चलती बस डाबर पहुंच गई। वहां पहुंचकर कंडक्टर ने ऐलान कर दिया कि ये बस आगे नहीं जाएगी... दूसरी देख लो। सब हड़बड़ाए- हड़बड़ाए दूसरी में बैठने लगे... कुछ कंडक्टर से झिकझिक करने लगे। मैं दोनों ही स्थितियों से बेख़बर आराम से जाकर ऑटो में बैठ गया... और फिर वहां से मोहननगर तक का पूरा किराया भरकर घर पहुंच गया।
घर पहुंचा तो दोनों बच्चे बेखबर और पत्नी बाखबर सोई पड़ी थी। कॉलबेल तक़रीबन पांच दफे बजाया... हर बार राधे- राधे जपो चले आएंगे बिहारी वाला भजन बजकर खामोश हो जाता लेकिन नींद जो है सो टूटने का नाम नहीं ले रही थी। तो हजरत...जैसे- तैसे पत्नी की नींद खुली। अलसाई मुद्रा में पानी देकर हफियाने लगी। मैं जूते उतारकर कपड़े बदल ही रहा था कि पता चला कि दाखिला नहीं हो पाया। एक बार पहले ही बच्चे और उसकी मम्मी की लिखित परीक्षा ले ली थी... आज दूसरी बार परीक्षा ली गई। और शाम में बताया गया कि आपके बच्चे का दाखिला नहीं होगा। ...टीवी खोलकर देखा तो रामपुर पर सब खेल रहे थे... कोई रामपुरी छुरी की बात कर रहा था तो कोई रामपुर के जूते और रामपुर के शोले। थोड़ी देर बाद रवीश कुमार पप्पू का आइटम पढ़ते मिले... बेहद दिलचस्प लगा।
...हां.. इसी बीच बिजली चली गई। पत्नी से पूछा तो पता चला कि बिजली वाले बताया कि बैट्री बैठ गई है... नई लेनी पड़ेगी... लगभग आठ हजार रुपये लगेंगे। मैने कहा कि अभी सैलरी मिली नहीं है... तो ये एक नई बहस शुरू हो गई। सैलरी कटकर क्यों मिलती है... इतनी देरी से क्यों देते हैं सैलरी। मैं हलकान। बीबी ने बताया कि मामाजी की शादी की पच्चीसवीं सालगिरह थी.. काफी बुलाया लेकिन नहीं जा पाई। आज ही मेरी ममेरी बहन का भी फोन आया था... नाराज हो रही थी इतने साल बाद भी कभी हाल जानने भैया नहीं आए। ... पता चला कि आलू और प्याज अचानक महंगे हो गए... चीनी का दाम आसमान छू रहा। इन बातों में मेरी दिलचस्पी नहीं थी... मेरी पत्नी को पता है। सो, इससे बचने के लिए मैने अपना पसंदीदा किताब उठाकर मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ना शुरू किया तो पत्नी और नाराज हो गई। कहने लगी कि आंख पर चश्मा चढ़वा लीजिएगा... आपको तो हमलोगों की चिंता ही नहीं है। बीच में उसने दो- चार लफ़्जों में उस स्कूल वालों की भी ख़बर ली जिसने बेटे का दाखिला नहीं लिया। मैंने ये कहकर उसे और भड़का दिया कि तुम्हारे लिये सोने भर के लिए आंखों का उपयोग है... मेरे लिये आंखों का उपयोग पढ़ना है। ...ये कहकर मैने नई मुसीबत ले ली। उसका तर्क था कि मुझे उससे बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है...। मैने किताब बंद कर दिया तो कहने लगी कि क्या बनाऊं। मैने कहा कि आज ताजमहल ही बना दो, आज उसी की तमन्ना है। ....झिकझिक के बाद मैने कहा कि चावल –दाल खाने की इच्छा है। उसने कहा कि सब्जी बनी हुई है... परांठे बना दूं। मैने कहा कि इससे बेहतर था कि बगैर पूछे ही मेरे सामने सब्जी और परांठे रख देती।...इसी बीच बार- बार फोन पर मैसेज आ रहे थे...आईडिया के सिर्विस मैसेज... नया रिंगटोन और एमएमएस...और भी जाने क्या- क्या। एकदिन गलती से पता नहीं कौन का बटन दब गया कि हर दिन आईडिया की तरफ़ से एक रोमांटिक शायरी आने लगी। ऐसा ही इस समय भी कुछ आ रहा था। ख़ैर साहब। खाना बेहद स्वादिष्ट लगा। थोड़ी देर टीवी देखने के बिस्तर पर गया तो आंखें बंद कर सोचने लगा... शहरी ज़िंदगी यहां सिर्फ आपने बने भर रहने की कितनी क़ीमत वसूलती है। यहां किन- किन मोर्चों पर आप रोज़ हारते हैं। यहां किसी भी सूरत में आपकी जीत नहीं होगी- ये तय है। दोस्तों, आप कुछ मशविरा देंगे।

2 comments:

संगीता पुरी said...

बिल्‍कुल सही चित्रण .. यही तो है शहरी ज्रिदगी .. जिसके लिए लोगों को सिर्फ समझौते ही करने पडते हें।

uday said...

khub bhalo..sahi chitran...hu-ba-hu rojana ki kasrat..jisse takriban har naukaripesha shakhs ko gujarna parata hai..khair itani bhagdaur ke bad parathe aur rasddar sabzi mil jaie to phir kya kahna...