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Sunday, May 10, 2009

...क्या स्क्रिप्ट है !

( भाग- आठ) मीडिया जिन्हें कंटेंट के नाम पर परोसता रहा है, उससे दर्शक और पाठक बेहद ऊबे हुए हैं। ये कोई नया तथ्य नहीं है। ग़ौर करें तो मीडिया की भाषा से भी दर्शक और पाठक उतने ही ऊबे हुए हैं। भाषा की एक लीक बन गई है जिसकी गोल में सभी घूमते रहते हैं। ऐसा मानने में भी हिचकिचाहट नहीं हो सकती है कि आज की मीडिया दरिद्रता के असुविधाजनक दौर से गुजर रही है। इस दौर की अगुवा मानी जा रही मीडिया के भाषाई लिजलिजेपन पर एक सरसरी नज़रः संजीव

कुछेक महीने पहले मेरी नज़र एक ख़बर पर पड़ी थी कि हिंदी के एक विद्वान को एक चैनल ने अपने यहां बुलाया। उन्होंने भाषा को लेकर इस वर्कशॉप में वहां के पत्रकारों को भाषा के बारे में काफी कुछ बताया। अच्छा लगा...कम-से- कम अपनी कमजोरियों की पहचान कर उसे बेहतर बनाने की पहल तो है। लेकिन मेरा उत्साह दूसरे या तीसरे दिन ही ठंडा पड़ गया। उसी चैनल पर दोपहर से लेकर शाम तक एक टीज़र चलता रहा- पुर्नजन्म। मोटे- मोटे अक्षरों में ये पुर्नजन्म जाने कितनी बार चलता रहा ...और धड़ल्ले से चलता हुआ अपने निर्धारित समय पर सफलतापूर्वक वीरगति को प्राप्त हुआ। ये टीज़र जितनी बार भी मैं देखता, मुझे लगता कि टीवी स्क्रीन पर सुधार की गुंजाईश होती तो काश इसे सुधार पाता- पुनर्जन्म। ..ये किसी एक चैनल की ग़लती नहीं है। तक़रीबन हर चैनल पर इस तरह की गलतियां रोज़-ब-रोज़ हो रही हैं। अब कोसी की तबाही के समय एक हेडलाइन की सीजी थी- पानी का जलस्तर बढ़ा। ...मैं अवाक् रह गया था।
मुझे अख़बार के दिनों के कुछ किस्से अचानक याद आ रहे हैं...पहले उसे बता दूं, फिर आते हैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भाषा पर। एक अख़बार में सिंगल कॉलम की ख़बर छपी थी, जिसमें बताया गया था कि किसी आदमी की हत्या हो गई... हत्या उस वक़्त हुई जब मृतक साइकिल पर चला जा रहा था। कितना दिलचस्प है कि मृतक धड़ाधड़ पैडल मारता हुआ मौत तक जा पहुंचा। ...उसी तरह एक अख़बार की ख़बर थी कि मृतक पेड़ से कूद गया। ...एक ने उससे भी आगे बढ़कर ख़बर दी कि फलां गांव में ट्रांसफार्मर फुंक गया और ये एक चूहे की कारस्तानी थी... दरअसल, तारों पर चढ़कर एक चूहा अपने गंतव्य की ओर जा रहा था कि दो तारों के आपस में टकरा जाने से ये दुर्घटना हुई।...ऐसा कमाल का विश्लेषण आपने कभी देखा था क्या।
अख़बारों में एक दौर ऐसा भी आया था जब कुछेक ख़ास ख़बरों पर विशेषज्ञों की सलाह भी दी जाती थी जिसे बॉक्स आइटम बनाकर प्रकाशित किया जाता था। मसलन, किसी बीमारी के बारे में बताते हुए उससे बचाव का मशविरा। उसी दौर में एक अख़बार ने कहीं आग लगने की घटना के बारे में बताया था और बॉक्स में आग से बचाव का मशविरा दिया था। मशविरे पर जरा ग़ौर कीजिये- आग लगने का पता चलते ही एकदम से भाग खड़े हों। दूसरी सलाह थी- आग –आग चिल्लाएं। तीसरी सलाह फायर ब्रिगेड को फोन करने की थी। ये ख़बर उस अख़बार के प्रमुख पन्ने पर पूरे छह कॉलम के साथ बुलंद थी।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एक ही शब्द बार- बार अलग- अलग चैनलों पर एक ही दिन में जाने कितनी बार चलती होगी, इसका अंदाजा लगाना ज्यादा कठिन नहीं है। मसलन, एक आदमी या व्यक्ति की हत्या यहां कभी नहीं होती है- होगी तो वह व्यक्ति या आदमी नहीं बल्कि शख़्स होगा। ये शख़्स ऐसा चिपका कि क्राइम से संबंधित ज्यादातर रिपोर्ट के पहले वीओ की शुरुआत कुछ ऐसी ही होगी- ग़ौर से देखिये इस शख़्स को- जैसे बाकी चीज़ों पर ग़ौर करने की जरूरत ही नहीं है। या फिर, इस शख़्स के इरादे बेहद ख़तरनाक हैं... या इस शख़्स ने अपनी दिलरुबा की ख़ातिर अपने साथी की हत्या कर दी। यहां व्यक्तित्व जैसे शब्दों को दरकिनार कर दिया गया है। शख़्स के बाद दूसरा शब्द है- शर्मसार। मजे की बात ये है कि ये शब्द कभी इंसानियत को शर्मसार कर जाता है तो कभी रिश्तों को। ये कभी नहीं होगा कि फलां की करतूत ने इंसानियत को भी शर्मिंदा कर दिया।
एक शब्द है तफ्सील। इस शब्द का कम दोहन नहीं किया जाता। हर ख़बर से संबंधित टीज़र के साथ –साथ ख़बर देते समय भी दर्जनों बार इसका प्रयोग देखा गया है। जैसे, हम आपको दिखाएंगे और बताएंगे.... सबकुछ तफ्सील से...लेकिन एक ब्रेक के बाद। इस चक्कर में मुझे डर है कि किसी दिन किसी चैनल पर ये सुनने को न मिले कि ख़बर के लास्ट सेगमेंट में जाकर कोई कह दे, हम आपको बताएंगे तफ़्सील से।
कई ख़बरों में सुनने को मिलता है कि – दिलचस्प बात ये है कि इस इलाके में पहले भी सूखा पड़ चुका है।– यानी सूखा जैसा भयावह तथ्य भी यहां दिलचस्प की श्रेणी में आ जाता है। हां, बिहार के भागलपुर रेलवे स्टेशन पर एक पुल अचानक ट्रेन के ऊपर आ गिरा। इसमें दबकर कई लोगों की जान चली गई। इस ख़बर को कवर करते समय एक चैनल के एंकर के पास जब शब्दों की कमी आने लगी तो उसने कहा- यहां सबकुछ लहूलुहान है... जिंदा लाशें मलबे के ढेर से निकाल रही हैं।
एक और शब्द लीजिये- ख़ुलासा। हर चैनल दिनभर में तो जाने कितने खुलासे करता है ...और उतनी ही बार इसी अकेले शब्द को दोहराया जाता है। इस एक शब्द पर चैनलों का इतना ज्यादा लोड है कि आप विश्वास नहीं कर सकते। चैनलों ने इसके समानांतर एक अच्छे शब्द को तक़रीबन बेदख़ल कर दिया है- रहस्योद्घाटन। कहते हैं कि एंकर को रहस्योद्घाटन बोलने में असुविधा होती है। सो, ये नहीं चलेगा। कुछ ये भी कह सकते हैं कि दर्शकों को समझ में ही नहीं आएगा। कितना गिरा हुआ तर्क है ये... अपनी मूढ़ता को दर्शकों पर थोपना जायज है? हर रिपोर्ट के फाइनल वीओ में एक चलन है- ये तो वक़्त ही बताएगा। - भाई मेरे अगर सबकुछ वक़्त को ही बताना है तो उसे ही बताने दो न... तुम ख्वामख्वाह में क्यों टांग अड़ा रहे हो भाई?

2 comments:

ravishndtv said...

इस बीमारी पर लगातार लिखिये। सबको फायदा होगा।

uday said...

aap ne bhi tv media me istemal hone wale shabdo ka bare hi dilchasp andaz me khulasa kiya hai..aap ne bhi bari taphsil se shabdo ke bare men jankari di hai...ab to ye waqt hi batayega ki electronic media men istemal hone wale in shbdon par kab rok lagegi...to phir aap bhi karie iska intejar...